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Full text of "Sahitya Tatha Sahityakaar"

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उपाध्याय ग्रन्थमाला, ग्रन्थ संस्या-३ 





ल्ेजद्यक 
हा. देवराज उपाध्याय फ्र-ए- पी एच ही. 
अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, 
महाराजा कालेज, जयपुर 


मंगल प्रकाशन 
गोविन्द राजियों का रास्ता, जयपुर 


अकाशक : 
मंगल प्रकाशन, 
गोविन्द राजियों का शब्ता, 


जयपुर 


पृष्ट सेश्या : २६० ; युल्य : ५) पांच रुपये 
प्रथम संस्करण ; नवम्बर, १६६० 


मुदक : ५ न 
सहकारी आह प्रिन्द्स, 
जयपुर 


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.. माई खव० रत्नावतो के 
__ जो माई के मरने 
ह संपोषण देकर फ़िर 












गई जहां माई गई 
“चाहे कन्यादाता 
. से अधिक कौन जान 











४ सपरगत ३ 


“साहित्य तथा साहित्यकार” मेरी नवीनतम कृति है । कृति है, 
ऐसा कहते हुए भ्रसमंजस सा हो रहा है क्‍योंकि कृतित्व में श्रपनत्व की 
भावना अधिक रहती है श्रर्थात्‌ कृति शब्द को ऐसी ही रचना के लिए 
प्रयोग में लाना चाहिए, जिसमें मोलिकता हो भश्रर्थात्‌ जो बात वहां कही 
गई हो, वह स्वतः-नचितन तथा मनन में से निकली हो, लेखक की प्रपन्ती चीज 
हो, उसकी प्रपनी कृति हो श्रौर उसमें संग्रहत्व कम हो । में ऐसा दावा 
“साहित्य तथा साहित्यकार” की ओर से उपस्थित नहीं कर सकता । 
ऐसा लगता है कि में पद-पद पर दुसरे विचारकों का ऋणी हूं । “बचपन 
के दो दिन ठीक इसके पूर्व बाली रचना में, ऐसा लगता है, मेरा कृतित्व 
प्रधिक था। उसका अधिकांश मेरा भ्रपता था । पर “साहित्य तथा 
सांद्वित्यकार” में मैं हूं ही नहीं, ऐसी बात नहीं । लिखते-लिखते जब मैं 
किसी उलभतमंयी परिस्थिति में पड़ गया हूं तो वहां पर मेरे मैं? ने हो 
सहायता की है। वैसे अपने से घुक्त होना सबके लिए कठिन ही होता है ! 


यह पुत्तक साहित्य की समस्यात्रों की समझने में कहाँ तक सहायक 
होगी, में नहीं कह सकता; परन्तु एक बात तो स्पष्ट ही है कि साहित्य 
की समस्या को यहां एक विशिष्ट ढंग से छेड़ा गया है । एक नया प्रश्न 
छेड़ा गया है कि साहित्य में हम क्या चीज हू'ढते हैं। जब हम किसी पुस्तक 
को पढ़ते हैं, तो क्यों पढ़ते हैं? रचना के स्थापत्य को देखने के लिए ? उमकफ्रे 


भ्र्ड प्‌ ## 
क््फ कम 


भावों में प्रवाहित होने के लिए ? उससे श्रपने ज्ञान-मंडार को समृद्ध करने 
के लिए ? उसमें अपने को देखने के लिए ? प्रणेता की महान आात्त्मा से 
(०्रप्रगरांठछ8 करने के लिए ? हम दिल को हू ढते हैं या कातिल 
को ढूढते हैं | इसी प्रश्न के उत्तर में इस पुस्तक की रचना हो गई है । 
आप तो जानते ही हैं कि प्रश्ंय का भी हाथ उत्तर के स्वरूप पर ही पड़ता 
है। जैसा प्रश्न, वैसा उत्तर ! उत्तर जो बन पड़ा है, वह यह है कि हम 
साहित्य जब पढ़ते हैं, तो हमारा उद्द ्य होता है एक दिव्य विभूति-मय 
आत्मा के सम्पर्क में भ्राना, उसके साथ (/0777प770968 करना , यह 
देखना कि साहित्य के पीछे जो हृदय बोल रहा है, वह केसा है । साहित्य 
के माध्यम से हम साहित्यकार को देख सकते हैं । यद्यपि आझ्राज इस कला 
को हम भूलते जा रहे हैं पर जब तक हम इस कला को फिर से प्राप्त नहों 
कर लेते, तब तक, आ्राज के वैज्ञानिक युग में, साहित्य की समस्या सदा खतरे 
में रहेगी । 


'साहित्य तथा साहित्यकार! श्राप से यही कहने श्राया है कि भाई, 
श्राज लेखक मरता जा रहा है, निराहत होता जा रहा है। एकओर साधा- 
रण मानवता उसे निगलने को तेयार है, तो दूसरी शोर विद्येषज्ञता उसे 
गिन-गिनकर सब स्थानों से निकाल रही है। उसकी रक्षा करो | देखो कि 
वह कहां है, केसे है, क्या कर रहा है ? तब देखोगे कि वहु कितना दिव्य 
है । तब उसे श्रापके सामने आ्राने की हिम्मत भी होगी | और जब वह ज्ञान 
और विज्ञान के रथ पर चढ़ कर ग्रायेगा, तब उसकी आत्मा और भी विराट 
लगेगी। उसे जरा स्नेह से पुकारों तो ! श्रादमी,- जो मांगता है वह्दी 
मिलता है | श्राज साहित्य से श्राप मांगते हो 40/07709#07, 7970- 
0029०70498 और वह मिलता भी है । साहित्य से साहित्यकार को भांगो 


# खा प्ू कक 
छा का कि 


तो जरा । 'मोहन मांग्यो आपन रूप ।' वह जरूर मिलेगा । वह आपसे 
दूर नहीं है ।जरा सहम कर दुबक गया है । क्‍या समभते हो कि कालिदास, 
होमर, शवसपियर और दांते यों ही कूद पड़े थे, मान न मान मैं तेरा मेह- 
मान ? नहीं, युग ने उन्हें पुकारा था। बिना पुकारे तो भगवान भी गज के 
पास दोड़े-दौड़े नहीं गये | १६२६, १६३० में कलकत्त से स्व० श्री ईश्वरी 
प्रसाद जी शर्मा के सम्पादकत्व में एक हिन्दी साप्ताहिक निकलता था 
“हिन्दू पंच |” उसके मुख-पृष्ट पर लिखा रहता था-- 


“लज्जा रखने को हिन्दू की, हिन्दू जाति जगाने को । 
आया हिन्दू पंच जगत में, हिन्दू धर्म बचाने को ॥” 


मैं कहूं क्या कि “साहित्य तथा साहित्यकार” भी साहित्यकार को 
पुकारने के लिए, उसके उद्धार के लिए श्राया है ! 


खेर, क्यों झ्राया है यह जानने के लिए दूसरा साधन क्या है कि वह 
क्या कर रहा है। खाने पर ही तो भोजन का स्वाद मिलता है । सो 
भोजन करने वाले, भ्रर्थात्‌ इस पुस्तक के पढ़ने वाले ही तो इसका निर्णय 
कर सकते हैं न | लेखक श्रपत्ती श्रोर से क्या कहे । “निज कवित्त केहि 
लाग न नीका ४ मैं तो 'मंगलजी” को धन्यवाद दू'गा कि उन्होंने मुझ से 
यह पुस्तक लिखवा ली शोर दिन रात प्र फ्र रीडिंग में गड़ गड़ कर सजधज 
के साथ प्रकाशित कर दी। श्रब मचले हैं कि “&7+% ० ए0०ए०) वाली 
पुस्तक तैयार कर दू" | देखू' क्या होता है। लिखवा ही लेंगे | इतना ्ौर 
कहना रह गया कि पुस्तक में संगृहीत लेखों में से कुछ, कल्पना तथा 
आजकल अंसी पत्रिकाप्रों में प्रकाशित भी हो चुके हैं। 


--देवराज उपाध्याय 


९, 


अनुक्रम 


साहित्य की प्रतिक्रिया 

साहित्य श्रौर समाजवादी दृष्टिकोश 
साहित्य का स्वरूप 

साहिध्य नहीं, साहित्यकार 

साहित्य का विश्लेषण--श्राधार ठमरी 
साहित्य शरीर स्वप्न 

साहित्य श्रौर ऐतिहासिक उपन्यास 
साहित्य और प्लेटो 

साहित्य से साहित्यकार 


१ से १४ 
१५० ढ़ 
डेप ७० 
७३० प८४ 
४५--१०० 

१०१०१ ३७ 
१२३८६--१६९६० 
१६१-२२५ 
२२६-२५२ 


साहित्य 
को 
प्रतिक्रिया 





ईघसी भी रचना के सम्बन्ध में कितने ही तरह के मतभेद हो 

कि, हैं परन्तु इससे सभी सहमत होंगे कि पाठक पर उसका प्रभाव 
पड़ता है, उसमें किसी तरह की प्रतिक्रिया जगती है श्रौर वह एक विशेष 
ढंग से प्रतिक्रिया-तत्वर होता है । तुलली की विवयपत्रिका ने हुदय में 
प्रेम और भक्ति की मन्दाकिनी प्रवाहित कर दी, सूर के अ्रमरगीत ने 
पाठक को विरह-रस से श्राद्न कर दिया और बिहारी की श्य गारिक 
फुहारों ने हृदय को महमह कर दिया, भूषण के उद्गबोधनों ने इबते प्राणों 
में भी वीर रस का संचार किया । तुलसी ने भक्ति-परक कविता की 
. पाठक ने भक्ति के भाव ग्रहण किये, सुर ने शव गार (विप्नलंभ) का रस-- 
राजत्व दिखलाया, पाठक को विरह रसास्वादन मिला, बिहारी ने श्वू गार 
काव्य लिखा, पाठक को श्र गार रस मिला, भूषण ने युद्ध के गीत गाये, 
पाठक में वीरत्व के भाव जगे। 

इन सब उदाहरणणों से हम किस परिणाम पर पहु चत्ते हैं? यही न, 
कि जिस तरह का वर्षण्य विषय होगा उसमें अपने अनुरूप प्रतिक्रिया जगाने 
की शक्ति होगी। असमुक भाँति का विषय अम्रुक भाँति की प्रतिक्रिया । ठीक 
उसी तरह से जिस तरह विज्ञान तथा मनोविज्ञान के क्षेत्र में उत्ते जक वस्तु 
(5४०प्राप8) तथा प्रतिक्रिया ( 83.00786 ) वाला सिद्धान्त काम 


करता है । बिल्ली ने चूहे को देखा, भपट पड़ी। यहां चूहा उत्त- 
जक पदार्थ का काम करता है भपठ पड़ना प्रतिक्रिया है, ॥०8]00786 
है जो बिल्ली में जागरित होती है । कविता को चूहे के स्थान पर 
रख लीजिये, पाठक को बिल्ली के स्थान पर । बस, जिस साहित्यिक प्रति- 
क्रिया के संदर्भ में हम विचार कर रहे हैं वह बात स्पष्ट हो जायगी । 


आ्राज का युग यंत्रों का युग है। अधिकांश मानव व्यापार और व्यव- 
हार यंत्रों के द्वारा परिचालित होते हैं। यंत्र के द्वारा गृह को श्रालोकित 
किया जाता है, उसे साफसुथरा किया या बुहारा जाता है। हमारा भोजना- 
च्छादन, ग्रध्ययनाध्यापन, गमनागमन, आदानप्रदान सब कुछ यंत्राधीन 
है । ऐसी परिस्थिति में मनुष्य की बुद्धि श्रथवा मस्तिष्क की प्रक्रिया पर 
भी यंत्रों का प्रभाव पड़े और वह यंत्रों के संदर्भ में सोचने लगे तो आ्राइचर्य 
की बात नहीं । आपने किसी यंत्र में कपड़े डाल दिये, सिला सिलाया 
तैयार सूट आपके सामने आा गया; मशीन में श्राप ने लोहे के टुकड़े रखे 
ग्रोर बना बनाया लोहे का बत॑न तेयार | तब हम' यदि यह सोचने तथा 
विश्वास करने के लिये तत्पर हो जायें कि युद्ध विरोधी साहित्य श्र्थात्‌ 
उस साहित्य से जिसमें युद्ध का बड़ा ही भयावह चित्रण किया गया हो 
युद्ध-विरोधी भावों का “प्रचार होगा, शान्तिपाठ से शांति उत्पन्न हो, 
क्रांति से क्रान्ति; प्र म चित्रण से प्रेम, घृणा से घृणा, तथा ईर्ष्या से ईर्ष्या 
की उत्पत्ति होगी तो यह श्रस्वाभाविक ही कहा जा सकता है। मनुष्य को 
मशीन बना देने की तथा उसे यन्त्रवत्‌ प्रतिक्रिया तत्पर होते देखे जाने 
की प्रक्रिया कई शताब्दियों से चल रही है। उसे हम 50777]08 और 
768]00786 की सीमा में देखने लगे हैं । 


पर वास्तव में प्रश्न यह है कि मानव पर क्या इस सस्ते तथा सरल ढंग 


किक. 


से विचार करना भी होगा ? क्‍या वह इतने सीधे सादे ढंग से परि- 
चालित होता है कि बटन दबाया और रोशनी जल गई ? यदि एक क्षण 
के लिए यह मान भी लें कि वह ऐसा ही सीधा सादा तथा भोलाभाला 
प्रासी है और व्यावहारिक जगत में वह इसी तरह आचरण करता है तब 
भी प्रश्न यह उठता है कि साहि्यिक जगत में प्रवेश करने पर भी वह 
साधारण सांसारिक व्यविंत ही बना रहता है ? क्या साहित्यिक जगत 
प्रौर साधारण संसार मैं कोई प्रव्तर नहीं ? व्यक्ति श्रौर पाठक एक ही 
है ? बाजार से सौदा खरीद कर लाने वाले, पेट काट कर एक एक पेसा 
जोड़ कर बैंक बैलेंस बढाने वशले, ईट का जवाब पत्थर से देने वाले, 
प्रौर कालिदास का “अभिज्ञानशाकु तलम” पढ़ने वाले में या महादेव 
वर्मो की कविता पर सर थुन धुच् कर रोने वाले में कोई अच्तर नहीं ? 


इस प्रइन की ओर हमारा ध्यान हठात्‌ इसलिये भी प्राकषित होता है 
कि जब हम विश्व साहित्य की अमर तथा प्रभगवोत्पादक एवं मानव की 
भाबात्मक सत्ता पर सर्वाधिक अ्रधिकार करने बाली क्ृतियों को देखते हैं ते 
पाते हैं कि बे दुखान्त हैं, 79280768 है, उनमें नाबक का पत्तन है 
मानों प्रकाश पर अन्धकार की विजय हो । हाँ, सुखात्मक कृतियां भी 
हैं, (/0770०088 भी हैं जिनमें उल्लास के गीत गस्‍ये गये हैं, प्रशयोच्छुवास 
की कथायें कही गई हैं, हमें ग्र॒दगुदाने की चेष्टा की गई है, जीवन के 
सुलमय तथा उज्ज्वल पक्ष का ही चित्रण किया गया है। पर ये प्रभाव 
की दृष्टि से उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं रही हैं श्रौर लोगो के हृदय की गंभीर 
लृष्ति के साधन बनने का गौरव नहीं प्राप्त कर सकी हैं। यह विरोधा-- 
भास कैसा ? लोगों को कहते तो यही सुना है 'रोप पेड़ बबूल का, 
आयाम कहां ते होय' । पर हम बबूल का पेड़ रोपते हैं और उसमें श्राम का 


ब> कह 


फल लगता है, वह करूणा जो 'भवभूति' से अधिक मूल्य नहीं रखती 
उसका उत्तर विश्व की विभूति बन जाता है। जीवन की जुगुप्सा साहित्य 
में प्राकर रस का उद्रे क करने वाली किस तरह ही जाती है ? 


इस प्रश्न पर इस ढंग से विचार कीजिये । हमें युद्ध विरोधी साहित्य 
का प्रणायन करना है। हम चाहते हैं कि किसी ऐसी कहानी की रचना करें 
या कविता लिखें जिसे पढ़ कर पाठक में युद्ध के प्रति घृणा उत्पन्न हो और 
लोग अपनी मनोवृत्तियों को विश्वशान्ति की ओर केन्द्रित करें। हमें क्‍या 
करना चाहिये ? अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये क्‍या यह ठीक होगा कि 
युद्ध की विभीषिका का उम्र वर्शन उपस्थित किया जाय ? इसके द्वारा जो 
जन धन को श्रपार क्षति होती है उसका भयावह चित्रण किया जाय ? 
हिरोशिमा तथा नागासाकी का जीता जागता चित्र खींचकर रख दिया जाए ? 
क्या ऐसा करने से हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे ? युद्ध का दूसरा 
पक्ष भी होता है| युद्ध के कारण हमारे प्रन्दर प्रसुप्त वीरत्व के भाव जाग 
पड़ते हैं, देश, जाति, राष्ट्र तथा किसी सिद्धान्त के लिये सर्वस्व की श्राहुति 
कर देने की प्रवृत्ति भी जाग्रत होती है, संगठन में हढ़ता आती है, एकता 
की भावना बढ़ती है, हम अ्रनुशासन का महत्त्व सीखते हैं। इस रूप को 
भी अपने वर्रान में स्थान दिया जाय तो क्या पाठक में युद्ध के 
प्रति श्राकषित होने तथा उसमें युद्धप्रियता के भाव उत्पन्न होने की 
सम्भावना हें ? युद्ध का मानवीय वर्णन क्या पाठकों में युयुत्सा के 
भाव उत्पन्न करेगा ? 


इसका दो टूक उत्तर देना कठिन है । पर यदि कोई यह कहता है क्‍ 
कि युद्ध के दुर्धध तथा लोमहर्षक वर्शान से युद्ध के प्रति आ्रासक्ति के भाव 


जो ऐड - 


उत्पन्न हीनेकी झ्राशंका है तो हम उसमें निहित सच्चाई के प्रति उदासीन नहीं 
हो सकते । यह बात युद्ध ही के लिए नहीं, सब तरह के भावों के लिए 
लागू हो सकती है । कम से कम यह तो सही ही है कि किसी भी विषय 
की भीषणता, कबष्टप्रदायकता तथा पीडोत्पादकता में नैसगिक रूप से 
तद्विरोधत्व या तद्बाधकत्त रहता हैं इस सिद्धांत को ठीक मानने में कई 
तरह की ब्रडचनें हो सकती हैं । 


पहली बात तो यही है कष्ट और पीडायें पाठक के हृदय में वीरता 
के भावों के लिए आधार प्रस्तुत कर सकती हैं। यह साधारण सी बात है 
कि वीरगण अपने उदंश की सिद्धि के लिए बड़े से बड़े बलिदान के लिए 
तेयार रहते हैं, कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं, देश 
भक्ति के उन्‍्माद में हमने स्वयंसेवकों को पुलिस की संगीनों को हंसते- 
हंसते छाती पर लेते देखा है । प्र्थात्‌ समीकरण यह हुआ कि जितना ही 
प्रधिक कृष्ट, बलिदान, पीड़ा उतनी ही बड़ी वीरजयमाला। वीर को 
कष्ट सहना पड़ता है इस सिद्धान्त से जरा सा घिसक कर इस सिद्धांत 
पर झा जाना कठिन नहीं कि जो कष्ट सहता है वह वीर है। श्रतः वीर 
कष्ट से डरे क्‍यों ? ठीक है, युद्ध में कृष्ठ उठाना पड़ता है, जन धन संहार 
होता है, नगर के नगर उजाड़ हो जाते हैं। तो इससे क्या ? इइक में 
लाखों हजारों बस्तियां फुक जाती हैं, आशिक शायद ही कभी फूलता 
फलता हो पर इससे क्या वह अपने प्रेमपथ से विचलित होगा ? नहीं 


मैं एक सच्ची घटना बताऊ' | मैं बहुत ही कायर व्यक्ति हूं । मैं सदा 
यही सोचता हूं कि यदि विपत्तियां सामने आकर खड़ी हो जाय॑ तो क्या 
कूद गा ? दुम दबा कर भाग जाऊगा या डढ कर उसका सामना कर गा? 


न्‍+ मं > 


मैं जब कांग्रेस में काम करता था श्रौर कभी-कभी जब सरकार-विरोधी' 
भाषरा देता था तो यही सोचता था कि पुलिस गोली चलाने लगे तो 
क्या होगा ? इसी तरह की दोलायमान चित्तवृति में मैंते अपने एक आ्रार्य- 
समाजी और काँग्रे सी मित्र से अ्पती बात कही और पुछा कि कृपया बतलाइये, 
. कि इस परिस्थिति में आ्रापकी प्रतिक्रिया क्या होगी ? उत्तर में उन्होंने नो 
कहा वह आ्राज भी मेरे कानों में गू ज॑ रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक 
विपत्ति नहीं भ्राई रहती है, पुलिस की बन्दूक नहीं उठी रहती है तब 
तक तो चित्त जरा चंचल रहता है जरूर, पर जब भय की सामग्री सामने 
प्रा खड़ी होती है तो चित्त स्थिर हो जाता है, उस समय कोई विकल्प 
नहीं रह जाता | बस, भय के मुख को पकड़ने की ही बात रह जाती है । 


इन बातों को जब मैं श्राज अपने स्थृति-पठटल पर लाता हूं तो दो 
कवितायें बरबस याद झा जाती हैं-एक संस्कृत का इलोक और दुसरा उद्ू 
का एक दीर। संस्कृत का इलोक यों है--- 


तावदूभयस्य भेतव्य यावद्‌ भयमनागतम्‌ 
आगतं तु भर्य वीक्ष्य नरः कुयात्‌ यथोचितम । 


दूसरा उदू का शेर है-- 


रग-रग तड़प रहा है नया रंग देख कर 
कातिल भी है, छरी मी है, मेरा गला भी है । 


बातें तो और भी याद ग्राती हैं जिनमें एक यह भी है कि जब खुदी« 
राम बोस फांसी के तख्ते पर चढ़ रहे थे तो प्रसन्नता के कारण उनके 
शरीर के भार में भ्रभिवृद्धि हो गई थी । 


७ हैं 
आओ 


इस दृष्टिकोण से प्रस्तुत समस्या पर विचार करें तो क्‍या ऐसा अनु. 
मान नहीं होता कि मनुष्य में कष्ट सहते की, दुःख से उलभने की, दुख 
को पछाड़ कर विजय सुखानुभृति प्राप्त करने की नैसगिक श्राकांक्षा होती 
है भौर वह अपना भोजन मांगती है ? क्या शिवजी हलाहल को प्रसन्नता- 
पूर्वक नहीं पी जाते हैं, गले में सपों तथा कबन्धों की माला धारण करके 
प्रातन्दित नहीं होते हैं, श्मशान भूमि में रुण्ड मुण्डों से बगोडा नहीं करते 
एवं ताण्डव कर प्रलयंकर नहीं बन जाते ? तब हम यह केसे कह सकते 
हैं कि किसी वस्तु का भयावह चित्रण कर, उसकी विभीषिका दिखला 
कर, रक्त की नदियां बहा कर हम पाठक के हृदय में भय का संचार कर 
देंगे, उसके हृदय में घृणा, विराग के भाव उत्पन्न कर देंगे। ऐसा भी 
मान लेने के लिए पर्याप्त अवसर हैं कि जिस विभीषका को खून में रंग 
कर हम लाल कर रहे हैं वह इतना चमक उठे कि उसमें रस पड़ जाय और 
ग्ापको वह श्रपनी ओर खींचने लगे । 


इस पहलू पर विस्तार पूर्वक तो एक क्षण बाद विचार होगा पर इस 
दृष्टि से भी क्‍यों न सोचें कि किसी विषय काग्रति चित्रण, रसस्य युक्ति : 
पुनः पुन: मानसिक कुण्ठा भी उत्पन्न कर सकती है, बुद्धि की धार को 
भोथर भी कर सकती है। मानस की वह दशा कर दे सकती है कि वह 
वरणित विषय के प्रति उदासीन हो जाय और उसके प्रति किसी प्रकांर 
का क्रिया-तत्परत्व उसमें थ्रा ही नहीं सके । उदाहरण के लिए श्र ग्रेजी 
के प्रसिद्ध उपन्यासकार टामस हार्ड़ी के प्रसिद्ध उपन्यास 888 ०0 ४06 ॥0! 
[7/0७०४ए7[68 को लीजिये। टेस पर मानों खुदा की मार है। वह जन्मजात 
ग्रभागिन है। जहाँ कहीं भी जाती है वहाँ उसका दुर्भाग्य पीछा करता है। 
ऐसा लगता है कि नियति ने उसे इसीलिए ही निर्मित किया है कि उसके 


०. 790 +« 


साथ दारुण तथा लोमहर्षक खेल-खेला जाय । हम एक बार देखते हैं कि 
बह विपत्तियों का शिकार हुई, हमें उसके साथ सहानुभूति होती है । पर 
जब हम बार बार उसे विपत्तियों में पड़ते देखते हैं, उसने सुवर्शा का स्पर्श 
. किया नहीं कि मिट्टी बन गया, तब हममें एक मनोवेज्ञानिक औदासीत्य 
( 7287070]08709!| (५]पए ) शभ्रा जाता है। हम कहां तक सहानु- 
भृति दें। यदि वह इसी के लिए बनी है तो हम क्‍या करें ऐसी मनोवृत्ति 
हो जाती है। एक बार भी भाग्य ने टेस का साथ दिया होता 
तो बात भी थी । 


जैनेद्र ने त्याग पत्र किसी की डायरी हाथ लग जाने की बात 
कही श्रौर विश्वास दिलाया कि उसी डायरी को जरा सम्पादित कर वे 
प्रकाशित कर रहे हैं तो बात समभ में श्राई आर पाठकों ने उसे सत्य समझ 
कर उस पर विश्वास भी किया | पर बार बार जब वही बात होने लगी, 
कल्याणी में भी वही बात, यहां तक कि झ्रागे जयव्रधेल में भी वही बात, 
तो पाठकों के लिए इस भ्रम के जाल को तोड़ना सहज हो गया और अ्रद्य 
उनमें इस तरह के कौशल के प्रति उदासीनता शभ्रा गई । 


मान लीजिये कि कोई कवि एक युद्ध विरोधी श्रथवा पूंजीवाद 
विरोधी महाक्ाब्य लिख रहा है। यह निश्चित है कि उस्ते बाध्य होकर 
युद्ध की दारुणता, महानाश, प्रलयंकरता का अतिमात्रिक चित्रणा करना ही 
पड़ेगा । वह इससे पीछा छुडा ही केप्ते सकता है जब वहु इसीके लिए 
प्रतिश्षत है । पूजीवांदी शोषण के भयानक हृश्यों का चित्रण 
करना ही पड़ेगा । लेखक के बावजूद भी उप्तकी कलात्मक प्रतिभा का एक 
बृहुद भाग दूसरी भ्रोर प्रेरित होगा । जब ऐसी बात पझनिवार्य है तो यह 


आर 


भी सही है कि उस वर्रान में एक शक्ति होगी,. श्राकर्षण होगा, उसमें 
प्रपील होगी, वह आमन्त्रित करता सा जान पड़ेगा और पाठक के हुदय 
में वह भाव जगेगा जिसे भयंकरता के प्रति मोह (#9800&#07 07 
ए९४!77688) कह सकते हैं। हमने देखा है कि सांप कितने भयंकर होते 
पर उनके व्यवहार से ऐसा भी लगता है कि उनकी भयंकरता में पक्षियों 
को सम्मोहित करने की शक्ति भी होती है। दीपक की लौ कितनी गर्म 
होती है, जला देने वाली होती है पर उसमें सम्मोहन भी होता है जो 
परवानों को अ्रपनी श्राहुति कर देने के लिए प्रेरित करता है । 


साहित्य के क्षेत्र में ऐसी घटनायें न घटी हों सो भी बात नहीं । 
मिल्टन के पाठकों से यह बात छिपी नहीं है कि वे साहित्य के द्वारा, 
विशेषतः 7979व88 09 तथा 79/७१88 हि88४ए8व के 
द्वारा शैतान पर धाम्मिकता की विजय का तिर्धोष करना चाहते थे पर 
साहित्य में कुछ ऐसी रहस्पमयी क्रिया हुई है कि शैतान अपनी शैतानियत 
को विकरालता एवं दुर्घघता के साथ, बल्कि उसीके कारण, झ्ाकर्षक बन 
बेठा है। कौन नहीं जानता कि वॉक्सपियर ने शाइलक को कितना 
गिराना चाहा है, कितनी गहरी काली स्याही उस पर पोतनी चाही है पर 
यह जो शाइलक है, वह शैक्सपियर के चंगुल से किसी न किसी प्रकार 
निकल कर पाठक को सहानुभूति पर अधिकार करने लगा है । विद्यावियों 
को न जाने कितनी बार इस प्रश्न का उत्तर देना पड़ा होगा कि 
509५9]00 एछ8 77076 छांश्श6ते ब8छांएओ सिक्ष) छाणेणांएर 
प्र्थात्‌ शाइलक उतना अपराधी नहीं जितना कि उसके विरुद्ध अपराध 
किया गया है । 


प्रेमचन्द गोदान में श्रपती सारी सहानुभूति होरी को देना चाहते थे 


१ असामाक , ट्ट्‌ न्‍नाा 


पर बात कुछ ऐसी हुई कि मालती का चित्रण श्रधिक सरस हो उठा श्रौर 
बह चोरी-चोरी दबे पांव आकर पाठक की सहानुभूति की अधिकारिणी 
हो उठी । चूकि साज्ती जिस अधिकार का दावा पेश करती है उसमें 
एक कौशल है, सफाई है, तर्ज श्रदा है, श्रतः उसमें व्यंग्य या ध्वनि का 
मज़ा है। होरी में वाच्यार्थ है तो मालती में व्यंग्यार्थ है । मालती भ्रपने 
प्रधिकार को व्यंग्यत्व की दशा तक पहुंचा देती है, होरी में तो ज्यादा 
गुणी भूत व्यण्य ही है। मालती भ्रधिकार के लिए लड़ती तो है पर हाथ 
में तलवार नहीं लेती है इसी लिए इसकी सादगी पर मर जाने की इच्छा हो 
जाती है। होरी तो शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित हो प्रेमचंद के नेतृत्व में सेना 
लेकर हमारे हृदय की सहानुभूति पर धावा बोलता है । द 


मनुष्य के स्वभाव में ही विरोधाभास रहता है। उसके भीतर सदा ही 
दो विरोधी प्रवृत्तियों में संघर्ष चला करता है । वह जिसे प्यार करता है 
उसके प्रति घृणा के भाव भी उसमें कहीं न कहीं पलते रहते हैं। बह 
श्रांखों भें श्रांस भर कर हंसता है श्रोर खिल-खिल कर रोता है। इस 
विरोधाभास को हम एक भूल, गलती, च्रुटि या दोष कह कर हो सनन्‍्तोष 
नहीं कर ले सकते । यह उसकी जैविक श्रनिवार्यता है, 00808) 
760688709 है। अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए जिस तरह से उन्हें 
निसर्ग से श्रन्य प्रवृत्तियां मिली हैं, उसी तरह यह भी उनमें से एक है । 


यही देखिये न। प्रकृति ने हमें उन सब साधनों से सम्पन्न किया है 
जिनसे हम सुरक्षित रह सकें, सर्वप्रयोजनमौलिभूत श्रानन्द को प्राप्त कर 
सकें, शिशिर ऋतु में भी बिस्तर पर पड़े-पड़े लिहाफ की गरमाई का मजा 
ले सकें। पांच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा कर्मेन्द्रियाँ सब हमारे सुखसम्पादन में सहा- 


ककया, ड़ ई0... डक 


यता देने के लिए प्रस्तुत हैं । ये हमारे लिए वरदान-स्वरूप हैं। पर 
: प्रकारान्त से अभिशाप भी हैं। कारण कि इनका अ्रस्तित्व ही इस बात का 
प्रमाण है कि इन साधानों के प्रयोग के लिए क्षेत्र चाहिये। इसका प्रथ 
यह होता है कि इन साधनों के चलते ही, इन्हीं के कारण ही हमारे 
श्रन्दर एक संघर्ष, युद्ध, छटपट, त्वरा,यह कर,वह्‌ कर सदा चलता रहेगा। 
जब तक यह हलचल बनी रहेगी तब तक हमें कहाँ शांति, कहाँ चैन की 
साँस। भूत तो हमारे बस में हो गया है अ्रवश्य और वह ऐसा शक्ति 
सम्पन्न है कि हमारे मु ह से कोई श्राज्ञा निकली नहीं कि उसने पुरी कर के 
दिखला दी । पर उसे तो काम्र चाहिये । काम नहीं होगा, वह व्यस्त 
नहीं रहेगा तो व्यक्ति को ही खायेगा । अतः कम से कम उसे काम देने 
की, व्यस्त रखने की ही चिता हमें खाती रहेगी । कहाँ हमने भूत को इस- 
लिए बस में किया था कि हमें सुख होंगा पर वही दुख का कारण हो 
गया । यही मानव है और उसका जीवन विरोधों का पुज || 


हम उत विरोधों में से किसी को भी घृणा की दृष्टि से नहीं देख 
सकते । ये विरोध हमारे जीवन के मूलाधार है, इनमें से हम किसी को 
छोड़ नहीं सकते । श्नौर यदि इन्हें जीवन में नहीं छोड़ सकते तो साहित्य 
में ही केसे छोड़ सकते हैं, जो जीवन के प्रतिनिधित्व करने का दावा 
करता है । द 

तब साहित्यिक क्या करे ? यदि युग के श्यामल, ध्वंशका री, जुग्मप्सा- 
जनक चित्रण उपस्थित करने से उसके प्रति अनुराग होने तथा पाठक में 
युद्ध मनोवृत्ति के उत्पन्न होने की सम्भावना है तो क्या यह भी सम्भव है 
कि युद्ध के प्रति नये हृष्टिकोण रखने श्रर्थात्‌ उसके कोमल चित्र खींचने 
से, उसके दिव्य तथा उन्नत पहलू दिखलाने से, उसके ग्र॒णानुवाद करने से 


2998: क हे 


युद्ध के प्रति वेराग्य उत्पन्न हो और हमें शांति के उपासक होने में सहायता 
मिले। यदि युद्ध के मानवीय पक्ष को दिखलाया जाय, युद्ध जन्य परि-- 
स्थितियों के कारण पारस्परिक संगठन की भावना का बिकास दिखलाया 
जाय, :कष्टसहिषणुता की श्रभिवृद्धि की बात कही जाय, प्रात्मशक्ति श्रौर 
पौरुष का चमत्कार दिखलाया जाय तो पाठक पर केसा प्रभाव पड़े ? 


जो हो, इतना अवश्य है। ऐसे साहित्य के द्वारा युद्ध जेसे दुद्ध र्ष 
तथा भयंकर वस्तु के प्रति भी एक शांतिमय दृष्टिकोण से देखते की 
प्रवृत्ति जगेगी | हम युद्ध को भी सांस्कृतिक हृष्ठि से देखना सीखेंगे । इस 
सांस्कृतिक दृष्टिकोण का विवास बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। हम युद्ध 
के वातावरण में भी शांति को झलक पायेंगे मानों श्र धकार में प्रकाश की 
. रेखा चमक रही हो | और जब प्र धकार में प्रकाश की रेखा चमकेगी तब 
वह प्रकाश की बाढ़ में छिप जाने वाली रेखा से कहीं अधिक प्रभावोत्पादक 
होगी । हम में आालोचनात्मक मूल्यांकन के भाव जगेगे और साथ ही हृदय 
में इस बात की ध्वनि जगेगी कि मानवता की सच्ची सेवा शांति के 
साधनों से ही होगी युद्ध के उपादानों से नहीं । 


शांति यदि युद्ध से श्रष्ठ है, उच्चतर है, श्रधिक वांछनीय है तो 
इसका सब से ग्रधिक प्रामारिक आधार इसी बात से दे सकते हैं कि इस 
युद्ध के प्रति भी हमारा दृष्टिकोण शांतिपूर्ण है, विद्वे षयुक्त या घुणा ूर्णा 
नहीं । बिच्छू डंक मारता जाय, पर साधु उसकी रक्षा से मुख नहीं 
मोडेग। । इस तरह साधुता को डंका पर विजय प्राप्त करने में सहायता 
मिलेगी। कम से कम साधुता का स्वरूप तो निखर कर सामने आायेगा। 
यदि बिच्छू के डंक की चोट लगते ही साधु भी बिच्छू के इंक को तोड़ने 


« हु क्‍३७० 


के लिए तत्पर हो जाय तो कहां गई साधुता । बिच्छू डंक-हीन होने से 
भले रह जाय पर साधु की साधुता की भटद्द तो उड़ ही जायेगी | 


इस सम्बन्ध में एक विचारक की उक्ति बड़ी हो उपयोगी है 7.० 
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6008 [07087906 छ9५8 0 ]069806. अ्रर्यात्‌ श्राप एक काम करें। 
युद्ध का वर्णन इस ढंग से करें मानों वह हमारे सांस्कृतिक जीवन का 
अ्रग हो, एक ऐसा व्यापार हो जिसमें मानवीय गुणों का अधिकाधिक 
विकास करने का श्रवसर मिले । परिणाम यह होगा कि मनुष्य में युद्ध के 
प्रति पूर्ण प्रतिक्रियातत्परत्व जगेगा । और वह प्रतिक्रिया ऐसी होगी जो 
मनुष्य में जोवन के शांति भय उपायों के प्रति श्रभिरुचि जागृत करेगी । 


- साहित्यिक प्रतिक्रिया के इस पहलू पर विचार करते समय अश्रर्थात्‌ 
युद्ध या किसी भी विषय पर सांस्कृतिक हृष्टिकोश श्रथवा मानवके नेस- 
गिक .विरोधाभास की बात करते समय वर्डस्वर्थ के विचार याद हो 
जाते हैं जो उसने कविता और छुन्द के पारस्परिक सम्बन्ध पर प्रगठ किये 
हैं। उसका कथन है कि काव्य का ध्येय ऐसी उत्त जना उत्पन्न करना है 
जिसमें आनन्द का पुट अत्यधिक है। पर उत्तेजना तो मानस की 


ग्रसाधारण या विषम अ्रवस्था मानी जाती है। इस ब्रवस्था में विचार 
प्रौर भाव किसी प्रशस्त मार्ग का अ्रनुसरण नहीं करते । यदि उत्तेजना 


ज्न्शई * 


को उद्दीप्त करने वाले अति सशक्त चित्रों एवं भावों के कारण 
प्रनुपात से अधिक वेदना का पुट आ गया तब इस बात का भय है कि 
उत्ते जना का रूप अ्पती उचित सीमा को लांघ जाय । परन्तु यदि वहां 
कुछ ऐसी चींज का समाधाधिकरणत्व हो जो नियमित्त है, जिससे माोनस 
की विविध अवस्थायें कम उत्त जना के अ्रवसरों पर परिचित हैं तो इसका 
ग्रच्छा प्रभाव पड़ेगा | परिशाम यह होगा कि साधारण भावों के मिश्रण 
के कारण उत्ते जनां से अंसम्पकित भावों के कारण उत्तेजना संयमित 
होगी, यह निबिवाद सत्य है । श्रतः यद्यपि ऊपरी तौर से देखने पर यह 
विरोधाभांस सा भले ही मालूम पड़े पर इसमें किसी भी तरह की शंका 
की गु जाइश नहीं कि छुंद के कारण भाषा की वास्तविकता कुछ ग्र श में 
पुड जाती है और सारी रचना के ऊपर वास्तविक सत्ता की भ्रद्ध चेतना 
छा जाती है तथा अधिक कारुशिक अ्रवस्थायें और भावनायें जिनमें वेदता 
का भ्रश ज्यादा है वे छन्दोबद्ध विशेषतः तुकान्त काव्य में गठ्य से भ्रधिक 
सहनीय हो सकती हैं । 


१४ 


साहित्य 
अ्रीर 
समाजवादी दृष्टिकोण 


दीपाभा444 67/५.3००+००+०#-००:४०५४/4-बनननन न जपि++ननिननननन-ननननिननन ननननननन नी न नानी न्‍कनी किन तन न ननन्‍॑ मी नल न ++++-++न लत लिलिललभ तन नली अन+ मम नमन लजल न तल जल तन न त- 5 


ले की विचार गोष्ठी में प्रनेक वक्‍ताओं ने साहित्य श्लौर सामयिकता 
कर भिन्न भिन्न दृष्टि कोण से भ्पने विचार उपस्थित किये, साहित्य के 
श्रभेक पहलुश्ों पर अपने मत श्रगट किये । विशेषतः, साहित्य को समाजवादी 
दृष्टिकोण से देखने की चेष्ठा की गई और यह कहा गया कि साहित्य 
को अपने समय का प्रतिनिधित्व करना चाहिए, उसकी समस्याग्रों से 
जूभना चाहिए तथा उन्हें सुलभाने में मानवता की सहायता करनी 
चाहिए । हम उस रचना को साहित्य का गौरव नहीं दे सकते जिसमें 
समाज को उन्नति-पथ की ओर अग्रसर करने वाले तत्व वक्त मान नहीं 
हों । जो साहित्य हमें श्रपनी समस्याश्रों को ठीक तरह से स्मभने और 
बूमने की शक्ति नहीं देता है वह अपने कत्त व्य का पालन ठीक तरह से 
नहों करता। यह समाजवादी दृष्टिकोण है, जिसमें व्यक्ति से अधिक 
समाज को महत्त्व दिया जाता है। इस दृष्टिकोण के सम्बन्ध में मुझे 
कुछ कहना नहीं है। इस दृष्टिकोश से भी लोगों ते साहित्य को देखा 
प्रौर परखा है और बहुत सी महत्त्वपूर्ण बातें कही हैं । 


परन्तु मेरी दृष्टि में इस तरह से किसी कलात्मक वस्तु अथवा साहि- 


ल्यिक रचना पर विचार करना सभीचीन नहीं है। साहित्य श्रभिव्यक्ति है 
और अभिव्यक्ति में व्यक्ति की स्वतन्बता की धोषणा होतो है । जब जब 
मनुष्य के प्रन्दर भ्रभिव्यक्ति की प्रेरणा होगी है तब-तब वह सब के ऊपर 
अपनी ही सत्ता का उद्घोष करता है । इसलिए श्रच्तिम विश्लेषण में 
साहित्य व्यक्ति की ही प्रभिव्यक्ति हो जाता है। यहाँ पर ग्रभिव्यक्ति शब्द 
प्र ही हमें ध्यान देना चाहिए इसमें “दो शब्द हैं प्रभि और व्यक्ति । अ्रभि 
उपसर्ग का जो भी अ्र्थ हो परन्तु इस पूरे यौगिक शब्द से व्यक्ति की ही 
प्रधानता निश्चित होती है। श्राप एक श्र कुर की केल्यता कीजिए जो 
पत्थर की छाती फाड़ कर निकल पड़ता है । पत्थर के सामने एक कोमल 
ञ्रकुर की क्या हस्ती है ? पत्थर चाहे तो एक क्षण में उसे ससल कर चकना- 
चूर कर दे सकता है लेकित फिर भी श्र कुर निकल कर ही रहता है । 


इसी तरह मानव शरीर, मस्तिष्क तथा हृदय के किसी कोने में 
व्यक्तित्व का बीज, सार-तत्व छिपा पड़ा रहता है, सब श्रोर से निराहत। 
यह कोई श्रावश्यक नहीं कि वह सदा निराहत और उपेक्षित ही हो । 
कभी कभी ऐसा भी होता है कि समाज के द्वारा उसे मान्यता भी आप्त 
हो । यदि ऐसा होता है तो उसी समय एक महात्‌ कला का सृजन होता 
है । परन्तु प्रायः मनुष्य के व्यक्तित्व की निराहत तथा उपेक्षित होने का 
ही गौरव प्राप्त होता है। इस निरादर और उपेक्षा की ठोकर से एक 
चिनगारी निकलती है। वही साहित्य का पूर्व रूप है.। साहित्य में साहित्य 
कार का व्यक्तित्व बोलता है प्रौर वह सारी विध्नवाधाश्रों को ललकारता 
सा दीख पड़ता है। ह 


खैर, यह बात एक क्षण के लिए अलग श्रलग भी रखी जाय प्रवति 


- १६-., 


साहित्य में व्यक्ति की श्रभिव्यक्ति होती है या समाज की इस प्रश्न को 
फिलहाल स्थगित भी कर दिया जाय तो प्रश्न यह उपस्थित होगा कि जिसे 
हम उन्नति कहते हैं या पतन कहते हैँ वह क्या चीज है ? उसका सच्चा 
स्वरूप क्या है ? कौन सी ऐसी कसौटी है जिसके आधार पर कहें कि 
ग्रमुक पद्धति से अमुक सिद्धाल्तों का प्रतिपादन करने वाला साहित्य उंनन्‍्ता- 
यक है और इससे विपरीत रहने वाला साहित्य पतन की ओर ले जाने 
बाला है। कल “किसी ने अपने भाषण के मध्य में कहा कि उपाध्याय जी 
का दृष्टिकोण तो संतों का है-'रपठट जा जा के लोगों ने लिखा दी जाके 
थाने में, कि अकबर नाम लेता है खुदा का इस जमाने में' । पहले 
तो यही बात विवादास्पद हैं कि हमारे देश के सांस्कृतिक उत्थान में संतों 
से क्‍या योय दिया ? कबीर ने, तुलसी ने या सर ने मानवता की अधिक 
सेवा की प्रथवा गांधी, नेहरू या'लेनिन-स्टालिन ने, श्रथवा डांगे ने या 
सम्बूद्री पाद की सरकार ने ? इसका निर्णाय भविष्य का इतिहास करेगा। 


दूसरी बात यह कि जब तक दुनियां का ग्रन्त न हो जाय और उसके 
भ्रन्‍्त होने के बाद नेखा जोखा लेने के लिए कोई बाकी न रहे तब 
तक यह केसे कहा जाय कि श्रमुक विचारक के अम्ुक सिद्धान्त ने विश्व की 
सर्वाधिक सेवा की है। नैयायिकों ने सिद्धान्त तो,बना दिया कि “यत्र-तत्र 
धूमः तत्र ततन्न वहि:” और यह लोग मानते भी हैं। फिर भी इस सिद्धान्त 
में कुछ आशंका की ग्रु॒जाइश है और लोगों ने इसकी सा्वभौमता 
और सार्वकालिकता में शंका भी प्रकट की है। उनका कहना है कि जब 
तक संसार के सब स्थानों और सब समयों-भूत भविष्य और वत्त मान-में 
धूम और अग्नि का साहचर्य न देख लिया जाय तब तक धूम से अग्नि का 
अनुमान केसे सम्भव हैं? और यह बात एक तरह से असम्भव है कि 


न्‍+ १७ «७ 


आदमी सार्वकालिक और सार्वभौम हो सके । उसी तरह किसी साहित्य के 
द्वारा समाज की उन्नति का बतलाया गया मन्त्र श्रन्त में चल कर समाज 
के लिए हित कर ही होगा इसका कौन दावा कर सकेगा ? 


१८ वीं शताब्दी में वाल्टेयर और रूसो ने समानता, स्वतन्त्रता 
और बन्धुता का नारा बुलन्द किया परन्तु इतिहास साक्षी है कि उन 
नारों से विश्व की कोई विशेष सेवा नहों हो सकी । क्रान्त्रि रक्त की धारा 
में बह गई श्रौर जाकर कोठेशाही में छिप गई । 


मैं बहुत से ऐसे श्रादभियों को जानता हुं जो जीवन भर लोगों की 
निन्‍्दा के पात्र रहे, लोगों ने उन्हे समाज का शत्रु समझा और उन्हें भांति 
भांति की यन्त्रणाओओं के द्वारा पीड़ित करने की चेष्टा की पर श्रन्तिम 


समय में मरने के पहले वे ऐसा काम कर गये कि उनके विषय में मनुष्य 
की भावनाश्रों में भयानक क्रान्ति हुई, लोगों ने श्रकचका कर देखा कि श्ररे 


जिसे हमने शत्रु समझा था वह तो हमारा परम मित्र था श्र उसके हृदय 
में हमारे लिए दूध की धारा ही बहती रहती थी । दूसरी ओ्रोर ऐसे 
आदमियों के भी उदाहरण हैं जो जीवन भर मानवत्ता के हितेषी समझे 
जाते रहे, समाज सेवियों में उनको गणना होती रही परन्तु मरने के बाद 
लोगों ने देखा कि वह तो समाज का पक्का शत्रु था। इसलिए कहता हूं कि 
साहित्य जेसी जटिल वस्तु पर भट से कोई फतवा दे देना ठीक नहीं ॥ 


साधारणतः लोगों का विचार यह है कि साहित्य में समाज का 
-तात्कालिक समाज का-प्रतिविम्ब पड़ता है श्ौर नहीं पड़ता है तो पड़ना 
ही चाहिए। श्रागे बढ़ कर यह दृष्टिकोण यथा्थंवादी हृष्टिकोश से 
मिल कर एक हो जाता है-वह यथार्थवादी दृष्टिकोश जो साहित्यकार 


कधका 4 ख्ब 


के व्यक्तिगत जीवन श्रौर उसकी रचना को एक कर के देखने की सिफारिश 
करता है। उसका कहना है कि व्यक्ति के जीवन में जो घटना घटती है 
उसी की ऋलक उसके साहित्य में मिलत्ती है। वे लोग साहित्य पर बहुत 
सस्ते ढंग से विचार करते हैं वे समस्या को (0४७/-४॥7770॥7%9 करके 
देखते है। मैं इस तरह के (0४8७४ 879])770%8%07 का सख्त विरोध 
करता हूं । “हम, उन सब किताबों को काबिले जब्ती समभते हैं, 
जिन्हें पढ़-पढ़ के बेटे बाप को खफ्ती समभते हैं” इसी तरह 
जो दृष्टिकोण साहित्य को सरमयिकता अथवा यथार्थवादिता या किसी 
सिद्धान्त के सीधे सादे फाम्रु ला के आधार पर काट-छांट कर रख देता है 
उसे हम बहुत गौरव नहीं देते । 


में साहित्य सूजन तथा स्वप्न निर्माण -को एक नहीं समभता । दोनों 
भिन्न-भिन्न कोटि की चीजें हैं। परन्तु दोनों की प्रक्रिया में कुछ समानता 
अवश्य है। जीबन की वास्तविक घटनाओं के आधार पर ही स्वप्नों का 
निर्माण होता है और साहित्य में भी लेखक की व्यक्तियत घटनाओं का 
प्रभाव हो सकता है। परन्तु स्वप्व जिस रूप में हमारे सामने उपस्थित 
होते हैं बह वास्तव से इतना परिवतित हो जाता है कि मूलोदगम से 
उसका बहुत ही कम सम्बन्ध रह जाता है और उस मूल से वह गणात्मक 
रूप से परिवर्तित नज़र आता है। 


एक उदाहरण लीजिए | एक नवयुचक्त फेरीवाले ने किसी ग्रहिसी 
को गोभी के सड़े फूल दिये। वह ग्रहिणी इस तरह ठगी जाने के करण 
बहुत श्रसन्तुष्ट है। श्रब स्वप्न में वह बालक फेरीवाला एक भीमकाय 
व्यक्ति के रूप में उपस्थित होगा जिसकी लम्बी-लम्बी दाढ़ी और मूछें हों । 


४8 


यह भी सम्भव है कि इस घटना के कारण उस गृहिणी के मानस का 
वह तंत्र भंकृत हुआ हो जिसे इल्कट्रा ग्रन्थि कहते हैं । यह 
ठगी हुई नारी स्वप्न में बालिका बन जा सकती है भौर अपने जन्म स्थान 
पर लौट कर अपने पिता को क्रोधावेश में तकिये से बार-बार मारने 
लग जा सकती है। अब यह सोचने की बात है कि फेरीवाल के द्वारा 
ठगी हुई नारी तथा अपने पिता को बार-बार तकिये अथवा भाडू से मारने 
बाली बालिका में कितना अन्तर है ? 


इसी तरह सम्भव है कि किसी साहित्यिक रचना के निर्माण में थोड़ा 
सा हाथ जीवन की व्यक्तिगत घटनाश्रों का भी हो परन्तु साहित्य में आते 
श्राते उनके स्वरूप मे इतना क्रांतिकारी परिवतंन हो जाता है कि मूल का 
पता लगा लेना कठिन है और ऐसा करना खतरे से खाली भी नहीं है । 
प्रेमचन्द ने कह तो दिया कि सूरदास की कल्पना उन्हें एक अन्घे भिखारी 
को देखकर मिली थी । परन्तु इतने मात्र से ही रद्जभूमि की रचना नहीं 
हो सकती । रंगभूमि की रचना के लिए प्र मचन्द की कल्पना, उनकी 
अनुभूति तथा उनके जीवन के सार तत्व के रसायन को इस तरह सक्रिय 
होना होगा कि वह घटना अपने सत्स्वरूप का त्याग कर श्रात्म-विसर्जन 
कर देती है श्नौर शुद्ध काल्पनिक रूप में उपस्थित होती है। श्रतः इस 
काल्पनिक अनुभूति को ही साहित्य का मूलतत्व समभना चाहिये। आत्मा- 
नुभूति जब तक साहित्यानुभूति श्रथवा काव्यानुभूति का रूप धारण नहीं 
कर लेती तब तक साहित्य सजन नहीं हो सकता । 


हिन्दी साहित्य में तो नहीं परन्तु श्र ग्रजी साहित्य के कथाकार 
हेनरी जेम्स ने यह दिखलाने का प्रयत्न किया है कि उपन्यासों के बीज 


काम र्‌ | 


उन्हें कहाँ से मिले और वे बीज किन किन परिस्थितियों में कहाँ कहाँ से 
रस खींचते हुए उपन्यास रूपी वृक्ष का रूप धारण कर सके। प्रपने 
उपन्यास 570॥8 06 09709 के मूल उद्गम की उन्होंने बतलाया 
है कि एक बार वे किसी पार्टी में सम्मिलित हुए । वहाँ पर एक मित्र ने 
चार्तालाप के सिलसिले में एक घटना का उल्लेख किया । एक मां है और 
उसका इकलौता पुत्र है। मां अपने पुत्र को बहुत प्यार करती थी और 
पुत्र भी माता के प्रति सश्नद्ध है। उसके पिता की मृत्यु सन्निकट है । पिता 
के पास कुछ बहुत ही मृूल्यवान फर्नीचर है । अ्रब इसी फर्नीचर के 
उत्तराधिकार के प्रश्न को लेकर मां और पुत्र में इतना वेमनस्थ बढ़ गया 
है कि श्राज वे एक दूसरे के जानी दुश्मन हैं। बात इतनी सी ही थी पर 
इसी ने किसी रहस्यमय ढंग से व्यक्तित्व के उस स्तर को छू दिया जहाँ 
से सृजन की क्रिया प्रारम्भ होती है और एक उपन्यास की रचना हो गयी । 
प्र उस उपन्यास के पाठक जानते हैं कि उपन्यास की शाखाग्रों और 
प्रशाखागों की जटिल संकुलता में से इस मूलतत्व को पा लेना कठिन हैं । 
उसकी कोई सार्थकता भी नहीं । 


मैंने कभी एक चित्र देखा था। वह चित्र एक वृक्ष का था उस चित्र 
के नीचे लिखा था कि इस वृक्ष में एक बन्दर छिपकर बेठा है, खोज 
निकालिये । सच कहता हूं कि मैंने बहुत ही कोशिश की पर उस बन्दर का 
पता नहीं चल सका। बन्दर वहाँ पर हो, हो, न हो, न हो, इससे क्या ? हमें 
तो वृक्ष से काम है और उसका सौंदर्य अ्रपने पूर्ण गौरव से मेरे सामने उप- 
स्थित था | 


साहित्य का काम ! बहुतों ने कहा है, सुधार करता है, हमारा मार्ग 


तल रे९ + 


इर्शन करना है, उसे प्रशस्त करना है। मेरा विचार है कि ऐसा कहना 
लक्ष्य से ऊपर नीचे या दूर निशाना लगाना है। साहित्य का काम सुधार 
करना नहीं है, पर व्यक्ति को सुधार करने योग्य बनाना है। कल्पना 
कीजिये कि लोहे से किसी पात्र का निर्माण करना है। यों लोहा तो बहुत 
ही कड़ा होता, उसे मोड़ना आसान नहीं है, उसे लाल करना 
पड़ता है, तब उसे मोड़ कर हथौड़े की चोट से इच्छित वस्तु का निर्माण 
किया जा सकता है । श्रतः सब से प्राथमिक महत्त्व की बात यह है कि 
लोहे में पात्र के रूप में ढल जाने की योग्यत्ता लाई जाय, उसे लाल किया 
जाय और उसे लचीला बनाया जाय । साहित्य का काम भी यही है। वह 
लोहे को लचीला बना देता है, यह हृदय के काठिन्य को दूर कर उसे सरल 
बना देता है। श्रब भ्रावें सुधारक, राजनीतिक नेता, धार्मिक उपदेशक, 
प्रपना काम करें । लोहा लाल है, पाठक का हृदय तरल हो गया है, वह 
बाहरी छाप को ग्रहण करने के मूड में है, जिस रूप में चाहें उसे मोड़े' । 


साहित्य ने उनके लिये जमीन तेयार कर दी है। यह सम्भव है कि 
सृजन और सुधार दोनों साथ हो साथ चलते हों । प्रायः ऐसा होता भी 
है। पर जब ऐसा होता है तो साहित्यकार वहाँ एक पग श्रागे बढ़ कर 
सुधारक का काम करने लगता है। मलुष्य के व्यक्तित्व की कितनी तहें 
होती हैं ? मेरे ही कितने रूप है ! मैं पिता हूं, पृत्र हूं, प्रोफेसर हूं और 
गज यहाँ भाषण भी दे रहा हुं । ये सब व्यक्तित्व अलग अलग हैं । साथ 
भी रह सकते हैं। उदाहरणार्थ मैं यहाँ भाषण दे रहा हूं न, सम्भव है 
उस भाषण-क्र्ता के अन्दर से पिता की भी कलक आरा जाती हो,. पिता 
की बोली सुनाई पड़ती हो, पर यदि वह नहीं भो सुनाई पड़ती तो भो 
भाषशणा-कर्त्ता पर कोई आंच नहीं आ सकती, वह अभ्रपनी जगह पर 


नशे 


ठीक है और अपने कत्त ध्य का पालन तत्परता से कर रहा है। उसी 
तरह यदि साहित्य आपकी रोटी की समस्या को न सुलझा कर आपको 
रोटी की समस्या को सुलभाने योग्य बनाये भर ही रखता है तो भी वह 
श्रपनी जगह पर ठीक है । 

और यह एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण काम है। अरे, मानव जीवन की 
सबसे बड़ी समस्या क्या है? यही न, कि मनुष्य की मानवता बची रहे, 
उसके अ्रन्दर जो स्नेह का एक सोता बहता रहता है वह सूखने न पावे | 
और यह दुनिया है जो उसे भून कर पापड़ बना देना चाहती है। यदि 
यह मानवता ही नष्ट हो गई तो फिर सब कुछ नष्ट हो गया । 


अगर किश्ती डूबी तो इबोगे सारे, 
न तुम ही रहोगे न साथी तुम्हारे । 
यदि किदती बची रही और हम पानी की सतह से जरा भी ऊपर अपने 
सिर को रखने में समर्थ हो सके तो दो एक रोज की फाकेकशी के बाद द 
भी कभी अन्न के दो दाने मिल जा सकते हैं। पर जब डूब ही गये तो ? 
मैं कल्पना की आंखों से देखता हूं कि जहाज डूब रहा है, मानवता त्राहि- 
त्राहि पुकार रही है, पर साहित्यिक छोटी-छोटी बचाने वाली डॉगी (!॥6 
9प09) को फेंक कर यात्रियों के प्राणों की रक्षा कर रहा है। वह श्रपना 
काम कर चुका। श्रब अनेक धामिक तथा सामाजिक संस्थात्रों के सदस्य 
आकर उनकी सेवा करें, प्रन्त दें, भोजन दें । * 
एक बार में अपने एक बहुत ही बड़े साहित्यिक मित्र के साथ बेठ कर 
वार्तालाप कर रहा था । उनके पास बहुत सी पुस्तकें पुरस्कार-निर्णयार्थ 
आई हुई थीं। उनमें एक था रशियन उपन्यास (शायद गोर्की का, मुझे ठीक 
थाद नहीं) का हिन्दी श्रनुवाद भी था। उसमें उन्होंने एक प्रसंग को 


४: जियो ने 


दिखलाया जो कामुकता की बातों से पूर्ण था जिन्हें हम श्रश्लील भी कह 
सकते हैं। मैंने उनसे पूछा कि “अच्छा, यह तो बतलाइये। ये लेखक 
गण अपनी कथाओं के बीच बीच में ऐसे प्रसंगों को लाते ही क्‍यों हैं ? 
यह तो कहा जा सकता नहीं कि वे इतके अशोमन स्वरूप से परिचित ही 
नहों।” उन्होंने कहा “कुछ नहीं, केवल पाठक की दिलचस्पी बनाये 
रखने के लिये ही ये लोग सेक्स का पुट दे देते हैं ।”” 


मुझे यह बात जंचती सी लगी । मैंने कहा “हाँ जी । यही बात ठोक 
है। में प्रोफेसर हूं । मेरें सामने सब से बड़ी समस्या यह रहती है कि 
छात्रों की दिलचस्पी सदा भेरे व्याख्यान में केते बनी रहे । ऐसा न हो कि 
वे मेरे व्याख्यान के प्रति उदासीन हो जाय ।। श्रतः मेने देखा है कि 
व्याख्यान के बीच में कोई रसीली बात कह देने, यथावसर सेक्स का हल्का 
पुट दे देने से श्रोताओं की भावात्मक सत्ता पर अ्रधिकार बनाये रखने में 
थोड़ी सुविधा जरूर हो जाती है। मेरे कहने का श्र्थ यह है कि साहित्य का 
भी काम कुछ ऐसा! ही है। मेरे लेक्चर में दोनों व्यक्तित््वों का सहयोग 
रहता है साहित्यिक का श्र व्याख्याता का । भावात्मक सत्ता पर अधिकार 
. बनाये रखने का काम साहित्यिक करता है और व्याख्येय विषय के सम्बन्ध 
में ठोस सामग्री देने का काम व्याख्याता करता है । एक जीने योग्य 
बनाये रखता हैं, दूसरा जिलाता है, सुधारता है, समृद्ध करता हैं । 


में ही ऐसा करता होऊ ऐसी बात नहीं । सभी ऐसा करते हैं । 
हां, भले ही उन्हें इसका ज्ञान न हो। कल ही मेरे भित्र ने जो व्याख्यान 
के प्रारम्भ में भूमिका के रूप में कुछ बातें कहीं उनका मूल विषथ से क्‍या 
सम्बन्ध था सिवा इसके कि किसी तरह श्रोताओं के यान को अपनी शोर 


भ्राकप्रषित किया जाय और उसमें ग्रहणाशील स्थिति उत्पन्न की जाय । 
इसीसे जिन विचारकों ने यह कहा है कि मनुष्य जन्मता कवि होता है 
उनकी बातों में विश्वास करने को जी चाहता है। सब से पहले हम 
जीना चाहते हैं, यह हमारी जेविक आवश्यकता हैं । ( 900ट209॥ 
76068809) इसी को साहित्य या कविता पूरी करती है । 


लाक्षणिक या रूपक की भाषा में बातें करवा सदा तो ठीक नहीं 
होता पर कभी कभी उसका सहारा लेना अ्रनिवार्य हो जाता है। मैं 
शक रावेष्ठित कुनेन की बात नहीं कह गा और न शक्कर के तौल पर साहित्य 
को और कुनेन के तौल पर उपदेश को रखू गा। यह बात बहुत बार कही 
जा चुकी है। मेरे सामने तीक्र ज्वराक़ान्त रोगी का चित्र उपस्थित है । 
यों रोग को शत्रु नहीं समझना चाहिये। श्राहर-विहा र सम्बन्धी अ्रनिय- 
मितता के कारण शरीर में कुछ विजातीय द्रव्य एकत्र हो जाते हैं। उन्हें 
दूर करने का प्रयत्न प्रकृति करती हे। उसे ही रोग कहते हैं। रोग को 
दबाना भी नहीं चाहिये। परन्तु रोगी पीड़ा से कराह रहा है, पीड़ा 
श्रसह्य हो रही है। इस समय सब से बड़ी तात्कालिक समस्या 
यह है कि पीडा को किस तरह सह्य बनाया जाय । ज्वर की तीन्नता को 
किस तरह कम किया जाय । रोग से मुक्त करने का काम तो भ्रन्त में चल 
कर प्रकृति के हाथों ही सम्पन्न होगा । हमने दवा की सुइयों के सहारे 
ज्वर को दबा भी दिया तो रोग से मुक्ति थोड़े ही मिल जायगी ? 


बुखार न सही खांसी ही सही । हमारा काम ऐसी परिस्थिति उत्पन्न 
करना है कि हम ज्वर के वेग को सम्माल सकें और प्रकृति को श्रपना 
काम करने का अवसर मिल जाय। उसी तरह रोगग्रस्त मानवता को 


_ रू ++ 


थोड़ी स्फूर्ति प्रदाव कर, उसकी पीड़ा को थोड़ा कम कर साहित्य निसर्ग 
द्वारा सम्पादित होते रहने वाले सर्वारम्भ को कार्य करने का अवसर देता 
है । यदि वह प्ञागे बढ़ कर, घुदी दे कर, दवा नहीं पिलाता तो श्राप उसे 
दोष नहीं दे सकते । 


मैं ग्रापके सामने दो, तीन कविताओं के ट्रुकड़े रख रहा हँ:--- 
करुणामय को भाता है तम के पर्दे में आना, 
है नभ की दीपावलियों क्षण भर को तुम बुक जाना । 
>< >< )८ >< >< 
विस्तृत नभ का कोई कोना कभी न मेरा अपना होना 
परिचय इतना इतिहास यही, उमड़ी कल थी मिट आज चली 
में नीर भरी दुख की बदली । 


मर 7५ ५ 2५ ५ 


जिस खेत से दहकोँ को मुयस्सर न हो रोटी, 
उस खेत के हर गोशाये गन्दुम को जला दो 
सुलतानिये जम्हर का आता जमाना, 
जो नक्शे कुहून तुम को दिखे उसको मिटा दो 


इन कविताभ्रों में श्राप किस को श्रेष्ठ कहेंगे ? समाजवादी हृष्टि-- 
कोण वाले मार्क्सवादी तो श्रन्तिम कविता को ही श्रष्ठ कहेंगे । परल्तु 
'उन्हें ख्याल रखना चाहिये कि बहुत जोर शोर से क्रान्ति का नारा बुलन्द 
'करने वाला हृदय अ्रन्दर से खोखला भी हो सकता है। क्रान्ति का भण्डा 
'उसके हाथों से उठकर भुंक भी जा सकता है। इतिहास इस बात का 
साक्षी है कि गरजने वाले मेघ सदा बरसे ही, यह कोई जरूरी बात नहीं । 


६ <« 


साथ ही “मो सम कौन कुटिल खल कामी” कहने वाले में विपत्तियों 
के पर्वत की धज्जियां उड़ा देने की ताक़त हो, उसकी देह तो तीन हाथ 
की ही हो पर उत्त पर जो छाती हो वह हजार हाथ की हो। वह अपनी 
पराजय को स्वीकार तो कर लेता हो पर वह एक स्फूतिदायक ललकार 
(378072 (/79/!8728) भी हो सकता है और जोर शोर की आवाज 
करनेवाले ढोल के अन्दर पोल भी हो सकती है । 


मेरे जानते साहित्य में सामय्रिकता, यथार्थवादिता इत्यादि की 
वकालत करने वाले व्यक्तियों के द्वारा जो सब से बड़ी भूल होती है वह 
यह है कि वे जीवन श्रौर साहित्य को एक में मिला कर देखते हैं । वे 
जीवन की वास्तविक अनुभूति और काल्पनिक प्रनुभूति को समानार्थक 
मान लेते हैं। वे उपन्यास में उल्लिखित घटना को पढ़ कर पाठक में उसी 
तरह की प्रतिक्रिया का उन्मेष देखना चाहते हैं जेसा वास्तविक जीवन में 
होता है। जहाँ आपने यह स्वीकार किया कि कला में उसी तरह की अनु- 
भूतियां खोजी जानी चाहिए जो वास्तविक जीवन में पाई जाती हैं तब तो 
यह स्पष्ठ है कि वास्तविक जीवन? के सामने थे काल्पनिक तथा साहित्यिक 
प्रनुभृतियाँ कितनी नगण्य हैं। एक साधारण सा सरदर्द या दाँत का दर्द 
बड़ी से बड़ी टू जिडी से अधिक वास्तविक है । जीवन में जो साधारण 
प्रणय की अनुभूति हमें होती है वह साहित्य के सर्वश्रेष्ठ प्रशय गीत क्‍ 
से महत्त्व-पूर्णा हैं, और अनुभवाह हैं (7070 650878706) हैं। जहाँ . 
आपने कला के कलात्मक पहलू को भुला दिया श्रोर उसमें वास्तव अनुभूति 
हू ढने लगे, कला की शप्रपील का श्रेय कला, तथा कल्पना को देने के 
बजाय वास्तविक श्रनुभृति को देने लगे वहीं श्रापने कला को कौड़ी का 
तीन' बना दिया ।। अनुभूतियां कला की सामग्रियां हो सकती है पर लक्ष्य 


** २७ «“« 


नहीं । लक्ष्य है श्रात्माभिव्यक्ति जो अनुभूति सामग्री के द्वारा अस्तित्व 
धारण करती है | कला है, अनुभूति--कुछ श्रौर चीज । यह कुछ श्र चीज 
बड़ी रहस्यमयी वस्तु है। इसके स्वरूप का विश्लेषण नहीं हों सकता । 


साहित्य में सामयिकता को मांग करने वालों के द्वारा जान या 
ग्रनजान में एक और भूल होती है। किसी उपन्यास या नाटक को लिया । 
पता लगाया किस समय में उसकी रचना हुई, उस समय की सामाजिक 
परिस्थिति केसी थी । उस समय जो राजनैतिक या झ्राथिक परिस्थिति थी 
उसके साथ संगति बैठाकर बतला दिया कि उसी समय में, दूसरे किसी 
समय में नहीं, क्‍यों इस तरह की रचना हो सकी श्रग्न जी में डिकेन्स 
के उपन्यासों का इस तरह से अध्ययन किया गया है । हिन्दी में हम चाहें 
तो भारतेन्द्‌ युग का इस तरह का अध्ययन सम्भव हो सकता है और हम 
तत्कालीन वेयक्तिक निबंधों ग्रौर नाटक के प्रचलन के रहस्य को तत्कालीन 
राजनेतिक परिस्थितियों में खोज सकते हैं । 


कहना नहीं होगा कि इन शोधों के द्वारा किसी रचना के सार स्वरूप 
को समभने में बहुत सहायता मिनेगी । पर साहित्य के झ्लालोचक को, 
इससे क्‍या ? क्‍या वह कहने का दावा करेगा कि चू कि इन निबन्धों के 
द्वारा समाज की सेवा हुई श्रतः ये उच्च कटि के निबंध हैं । यदि वह ऐसा 
कहता है तो मैं कहंगा कि वह सारे विध्रय को सस्ते ढंग से देखता है, 
गहराई में जाकर नहीं देखता, पालायनवादी है, समस्या को ठीक ढंग से 
देखने का मानसिक कष्ट नहीं उठाना चाहता । वह साहित्य को भाषण 
- (४४०७४0770) बना देता है, भाषण बना देता है, सामाजिक उपयोगिता 
- का ग्राधार लेकर उसे प्रचार का यन्त्र बना देता है । इस तरह से तो 


विचार करने से तो 'टाम काका की कुटिया” 'हेमलेट' से श्रधिक महत्त्वपुरों 
साहित्यिक कृति समझा जायगा। 'आदशे हिन्दु, 'सो अजान न एक 
सुजान' जेसे ग्रन्थ प्रेमचन्द के 'गोदान' से अधिक साहित्यिक होने का 
दावा करने लगेंगे । 


यदि यह तर्क मान लिया जाय तो विशुद्ध कलावादियों के तर्क को, 
कला कला के लिये मानने वाले के तकी को मानने में क्या आपत्ति हो 
सकती है ? आप सामाजिक उपयोगिता की कसौटी पर कला की 
श्रेष्ठता का निर्णय करते हैं। ठीक है । पर वे कहेंगे ऐसा क्यों ? हम कला 
की कसौटी पर ही सामाजिक संस्थाश्रों तथा उनकी उपयोगिता का निर्णय 
क्यों न करें ? मनुष्य में तथा भ्रन्य प्राणी में क्‍या अन्तर है ? यही न कि 
भनुष्य बुद्धिमान है, उसमें बुद्धि है, सोचने समभने की शक्ति है, उसकी 
शक्ति बौद्धिक क्रियाश्रों की ओर लगती हैं। यदि यह बात ढीक है तो 
सामाजिक उपयोगिता की कसौटी पर इनको ने जांच कर एक काम 
क्यों न करे ? 


देखें कि हमारी सामाजिक संस्थायें कहाँ तक इन बौद्धिक क्रियाग्रों 
के लिए, बौद्धिक व्यवसाय के लिये सहुलियत पेदा करतीं हैं। जो संस्थायें 
इस बौद्धिक व्यवसाय (कला भी जिसका रूप है) में अड़चन उपस्थित. 
करतों हैं वे निदनीय श्र जो जितनी ही इसके लिए सुविधा देतीं हैं वे 
उतनी ही श्रेष्ठ । बुद्धि ही संस्था का निर्माण करती है, संस्था बुद्धि का 
नहीं । सामाजिक संस्था तथा उपयोगिता के द्वारा कला का मूल्य निर्दारण 
करना तो वेसा ही है जेसा कि टाइप राइटर की सुविधा के लिए 
लिपि को तोड़ता मरोड़ना । यदि कला को अकलात्मक पैमाने पर 


#०: कह. पक 


जांचने लगेंगे तो कला ध्वंशात्मक लगेगी ही । पह कला के लिये ही नहीं 
सब के लिये लागू है। भ्रवौचित्य सदा रस-भंग का करण होता है । 
प्राचार्य ने कहा ही है। 


अनोचित्यात्‌ ऋते नान्‍्यत्‌, रसभंगस्य कारणम्‌ । 
ओवचित्योपनिबन्धस्तु रसस्योपनिषत्परा ॥ 


कलावादी कहेंगे कि श्रापके मत को मान लेने पर यही होगा न कि कला 
हानिकारक भी हो सकती है। क्या हुआ हानिकार हुई तो ? कला की मांग 
मानव हृदय में नेसगिक रूप से है । हम कला को प्यार करते हैं। बस, इसके 
प्रस्तित्व के लिए इतना ही पर्याप्त है। अपने ब्रस्तित्व के लिए वह सामा- 
जिक उपयोगिता श्रथवा राजनीतिक महत्त्व की सुरक्षा की आड़ नहीं लेगी । 
वह “मनो: प्रसृति” की तरह “स्ववीयंगुप्त” है | हितकर होना तो 
दूर रहे यदि वह ग्रहितकर भी है तो इससे उसके मौलिक महत्त्व में कुछ 
भी बद्दा नहीं लगता । ॥0 8407 #&76 080कप886 77 047 एप [7 
608 ॥7088888 07 006 णवाशावप), 48 (78 80707777782 66 
7088 0809088 'ए86 6987 ७५६४78७०६ 77070 70888 9 780]0]78 
707 7086 6५०४” श्रर्थात्‌ यहु कहना कि कला जनता या व्यक्ति को 
ऊपर उठाती है तो वसा ही हुआ कि हम गुलाब के फूल के महत्त्व को 
इसलिए स्वीकार करें कि उससे हम आँखो की दवा बना सकते हैं ।”” 
बाहरे खूब ! 


.. वास्तव में समाजवादी, आधिक प्रथवा मार्क्ससवादी हृष्टिकोण से 
साहित्य के मृल्यांकन करने वाले व्यक्तियों की तर्क-पद्धति को संक्षेपत: 
एक दो वाक्यों में कहा जा सकता है। सामाजिक या श्राथिक ढाँचे के 


5० हक 5८ 


परिवर्तत के साथ ही साथ कला के रूप में भी परिवर्तन होते देखा जाता 

है। शभ्रतः आथिक ढाँचे के परिवर्तन ही कला के स्वरूप के परिवर्तन के 
कारण हैं । यह तर्क-पद्धति सर्वथा भ्रामक है| दो वस्तुश्रों के सह श्रस्तित्व 
प्रथवा समानाधिकरण्य को देख कर एक को कारण तथा दूसरे को कार्य 
मान लेना तर्क-शास्त्र के प्रारस्भिक नियमों के विरुद्ध है । यदि दुर्जन- 
तोष-न्याय के प्रनुसार सह-अ्रस्तित्व को ही कारणत्व मानने के लिए 
पर्याप्त समभा जाय तो कारणत्व का श्रेय श्राथिक परिवत्न को क्यों 
मिले ? कलात्मक परिवर्तन को ही श्राथिक था सामाजिक परिवर्तन का 
कारण क्यों न माना जाय ? इतिहास से बहुत उदाहरण दिए जा सकते 


हैं जबकि कलात्मक श्रभिरुचि सामाजिक संगठन ( 5077र#पए78 ) के 
परिवर्तन में साक्षात्‌ उपकारक सिद्ध हुई है केवल आरादुपकारक नहीं। 


हाँ, यह तो कहा नहीं जा सकता कि परिस्थितियों का प्रभाव कला- 
त्मक अभिव्यक्ति पर कुछ पड़ता नहीं । कला भी परिस्थितियों के साथ 
8७०) करने का ही एक तरीका (77607700) है । पर ये परिस्थितियां 
व्यक्ति पर हावी नहीं हो सकतीं । समस्यात्रों का समाधान तथा उसे 
हलकरने का तरीका व्यक्ति की निजी वस्तु है, उसकी स्वतन्त्रता की 
घोषणा है। हल व्यक्ति ही निकालता है । सम्भव है हल के स्वरूप पर 
. परिस्थितियों का कुछ प्रभाव पड़ा हो, उनके द्वारा एक सीमा निर्धारित 
हो गई हो पर भअन्तिम निर्णाय तो व्यक्ति की भावना पर ही है। रज्जु में 
सर्प का, स्थाणो में ही व्यक्ति का, बाबू में ही पानी का श्रम हो सकता 
है । स्थारु में सर्प का, रज्जु में व्यक्ति का, बालू में रज्जु का भ्रम नहीं 
हो सकता । इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि रज्जु, स्थारु तथा बालू 
श्र्थात्‌ परिस्थितियों ने समाधान के रूप को प्रभावित तो किया है। पर 


#| >हं8: ४५ 


श्रन्ततोगत्वा हल तो व्यक्ति ही निकलता है। श्राप रज्जु में सर्प को देखते हैं, 
मैं नहीं भी देख पाता | यह भी हो सकता है कि रज्जु को देखते ही एक 
मर जाय, दूसरा डर कर भाग जाय, तीसरा उसे छंड़ी से हिलाकर देखे, 
चौथा उस पर लगुड़-प्रहार करने लगे । समाधान तो व्यक्तिगत होता ही 
है । कला भी एक समाधान ही है। वहाँ व्यक्तित्व तो सबके सर पर चढ़ 
कर बोलेगा ही । 


साहित्यिक तथा राजनीतिज्ञ दोनों को ही समान परिस्थितियों का 
सामना करना पड़ता है। परन्तु दोनों के काम करने के ढंग में श्रन्तर 
होता है। राजनीतिज्ञ को फूक फूक कर पेर रखना पड़ता है। जब तक 
जनता की श्रोर से स्पष्ट शब्दों में किसी बात के लिए मांग न हो, और 
उसे इस बात का भरोसा न हो जाय कि जनता की श्रोर से उसका विरोध 
न होगा तब तक वह किसी कार्य में हाथ नहीं डाल सकता । पर साहि- 
2त्यक जनता का विरोध भी कर सकता है, और यदि उचित हुग्ना तो 
अकेला भी । यह सही है कि परिस्थितियां पूरे तौर से तैय्यार रहेंगी तभी 
उनके सामना करने वाले, उनके सम्भालने वाले तरीके का प्रचार होगा, 
उसे मान्यता मिलेगी । बारुद तेयार हो तो चिनगारी पांते ही श्राग भड़क 
उठेगी । पर चिनगारी अलग चीज है और बारुद अलग । चिनगारी बारुद 
का अनिवार्य श्र श नहीं । उसे ऊपर से जुटाना (50]009 करना) पड़ता है। 
हो सकता है कि भारत की परिस्थितियां गांधी के लिए तेयार (77]06) हों पर 
गांधीवाद गांधीजी की देन है, वह एक व्यक्ति की ज्योति की चिनगारी है । 
उसी तरह वह चीज जो किसी रचना को सबसे प्रथक कर साहित्य की 
विशिष्ठ श्र णी में प्रतिष्ठित कर देती है वह समाज की ओझ्रोर से, श्रर्थ- 
शास्त्र की श्रोर से नहीं भ्राती, व्यक्ति की ओर से आती हैं । 


बह कि 5८ 


ऊपर की पंक्तियों में व्यवित के पक्ष का समर्थत किया गया है पर 
प्रधानता की ही दृष्टि से । इसी हृष्टि से कि सामाजिकता के बिना भी 
' साहित्य-सुजन की कल्पना हो सकती है पर व्यक्ति के बिना नहीं । 
समाज में व्यक्ति रहता है या नहीं इसमें एक क्षण शंका का अ्रवसर हो 
सकता है क्योंकि ऐसे सम।ज के उद्यहरण हमने देखे हैं जिनमें व्यक्ति को 
भून दिया गया हो । पर व्यक्ति में स्माज रहता है इसमें तो शंका हो ही 
नहीं सकती । जहां एक है वहाँ दो होगा ही । वास्तविक (60%) न सही 
संभाव्य ([0006969/) ही सही । माना कि साहित्य को रचना दूसरों के 
लिये है यदि कोई दूसरा पाठक च मिलेगा तो वही व्यक्ति अपने को विभक्त कर 
सृजन के समय पर ख्रष्टा होगा, पढ़ने के समय पाठक होगा। मैं झात्मा की 
स्वतन्ब्रता वाले सिद्धान्त की वकालत नहीं करता झौर न यही कहता हु" 
कि व्यक्ति जो चाहे करने के लिये, कला के सृजन के लिए, उपदेश 
देने के लिए पुर्ण रूप से स्वत्तन्त्र है। यह भी सम्भव है कि यदि जीवन 
को प्रभावित करनी वाली सप्री क्क्तियों को जान पाने की शक्ति मनुष्य में 
होती तो किसी घटना था परिस्थिति विशेष के आाषात्त से प्रतिक्रिया का 
क्या स्वरूप होगा यह कह सकना सम्भव होता । 


पर ऐसा होना सम्भव नहीं । मनुष्य की शक्ति सीमित है, वह निस्सीम 
नहीं । कोई चस्तु किसी विशिष्ट रूप में क्‍यों श्रवस्थित्त है ? १८वां 
शताब्दी में स्पेक्टटर में प्रकाशित होने वाले एसे नामक साहित्यिक रूप 
विधान की प्रधानता क्‍यों हो गई! १६वीं शत्ताब्दी में उपन्यासों का बोल- 
बाला क्‍यों हो गया ? इस बात को कारण-कार्य-थ खला में बांध कर नहीं 
बताया जा सकता । यह नहीं कहा जा सकता कि अझमुक आ्राथिक्‌ या सामा- 


क्र 
कर 


जिक परिवर्तन के कारण हमारी सौन्दर्ममुलक अभिव्यक्ति ने निबन्ध का 
प्रथवा उपन्यासों का रूप धारण किया । कारण को परिभाषा देते हुए 
कहा गया है अनन्यथासिद्धनियतपूर्वेभावित्य कारणत्थम्‌! कारण को 
अनन्यथा सिद्ध होना चाहिये श्रोर नियतपूर्वभावी होवा चाहिये। आाथिक 
प्रभिव्यक्ति को सौंदर्यमूलक अभिव्यक्ति से निमतपूर्वभावी नहीं कहा 
जा सकता | शअ्रतः अन्ततोगत्वा यही कहा जा सकता है कि जो चीज जिस 
हप में है वह है, उसका स्वभाव ही ऐसा है। यदि किसी समय किसी 
साहित्यिक विधा ने प्रप्नुखता धारण कर ली तो यहु उसका स्वभाव ही 
ऐसा है, उसे ऐसा होना ही था। यदि तक के सूत्र की इस सीमा तक 
घींचकर ले जाया जाय, तब तो इसमें किस को आपत्ति हो सकती है ? 
पर यहु बात सहों है कि ऐसा करने से साहित्य के मूल को श्रथ-शास्त्र में 
घोजने बाले आ्रविक-कारण सिद्धान्त' की जड़ ही हिल जाती है-। 
आथिक अथवा सामाजिक दृष्टिकोण से साहित्य पर विचार करने से 
पह तो सम्भव हो सकेता है कि बहुत सी उपयोगी बातें तथा तथ्यों को 
एकत्र किया जा सके | इन तथ्यों का साहित्य-सजन, साहत्य के रूप 
विधान तथा शिल्प से कुछ सम्बन्ध बेठा कर दिखाया भी जा सकता है । 
उदाहरणार्थ यह बतलाया जा सकता है कि लेखक का जन्म किसी भ्रर्थ-- 
तम्पन्त परिवार में हुआ तथा अपने जीवन भर एक विश्विष्ट समुदाय के 
_ व्यक्तियों के साथ उसका का सम्पर्क रहा अतः उसके साहित्य की वर्ण्य॑- 
वस्तु तथा शिल्प-विधान में भी विशिष्टतायें उत्पन्न हो गई । झालोचकों ने 
शेक्सपियर के नाटकों का अध्ययन इस हृष्टि से किया है। कहा गया है 
कि नाटक के दर्शकों के स्वरूप परिवर्तन के साथ-साथ शैव्सपियर की 
नाव्यकला में भी परिवर्तन होता गया है,जब 907 छत पर 0707- 


“» दे४ « 


७7 (9]008 के खुले मंदान में वाटकों का अभिनय होता था तो नाटक 
की रचना एक विज्ञेष ढंग की होती थी । बाद में 3]807 74978 के 
बन्द प्रेक्षाग्रहों में नाटकों का अभिनय होने लगा और आजभिजात्य वर्म 
के सुरुचि-सम्पन्न दर्शक आने लगे तो शेक्सपियर की कला ने भी दुसरा 
रंग पकड़ा । 

इसी तरह पंत के काव्य विकास के इतिहास को देखा जा सकता है। जिस 
परिवार में उसका जन्म हुआ, उसकी झार्थिक अवस्था क्या थी । बाद में जब 
राजा काला कांकर के साथ वे रहने लगे तो वहाँ के श्रभिजात्यवर्गीय 
जीवन का उन पर क्या प्रभाव पड़ा ? उनको नोका-बिहार झौर सांध्य- 
तारा तथा अप्सरा की बात सुक्ी। बाद में वे श्राम्या की श्रोर मुड़े और 
झाज वे अरविन्द दडन के अतिमानव की बालें कर रहे हैं। भारतेन्दु या 
अन्य किसी भी कवि के सम्बन्ध में एताहश बहुत्त सी ज्ञातब्य और उपयोगी 
बातें एक्र की जा सकती हैं। पर सूचतामों का एकन्रीकरण जितना ही 
सहज है उतना ही कठिन है उत्की व्ययख्या करना श्रर्थात्‌ साहित्य-सुजन 
में इनके समानुपातिक सहत्व का ऊचित मूल्यंंकव करना, यह बतलावा 
कि इन्हीं परिस्थितियों के चलते ही साहित्य-सजन को विद्विष्ट स्वरूपोप- 
लब्धि हो सकी ॥ यदि परिस्थितियां दूससी रहतों और लेखक को किसी 
ग्रन्य प्रकार की सामाजिक तथा प्राथिक समस्याझ्रों का सामना करना 
पड़ता तो उसके निर्मित साहित्य का रूप भी दूसरा ही होता । 

साहित्य को साहित्य के रूप में न देख कर, स्वतन्त्र, ग्रपन्ती शक्ति 
'से श्रपने पैरों के बल खड़ी रहने वपली वस्तु के रूप में न देख कर वाह्य 
पारिस्थितिक तरंगों पर उठने और गिरने वाली वस्तु के रूप में देख कर 
हम अपने सर पर कसी बला मोल लेते हैं, हम क्रिस तरह प्रराजकता के 


कक) ह5। 4 ] 


क्षेत्र में प्रवेश करने के लिये वाध्य हो जाते हैं, यह एक उदाहरण से 
स्पष्ठ होगा । यह बात मालूम हो जायेगी कि एक ही कवि या नाटककार 
के सम्बन्ध में कितनी परस्पर-विरोधी बातें कही जा सकती है। शैवसपियर 
के सम्बन्ध में ०0779 (७५००७: #७०ए४०७७ ने लिखा हैं कि शैक्सपियर 
जैसा महान्‌ साहित्य ब्रष्ठा का समुद्भव इसलिए सम्भव हो सका कारण 
कि जिस समय वह अवतीर्ण हुआ उस समय हमारी आर्थिक पारस्थिति 
ऐसी थी कि हम शेक्सपियर के भार को सम्भाल सकते थे । प्राथिक लाभ 
की स्फीति से शासक वर्ग को भ्राथिक चिन्ताग्रों से मुक्ति मिलती है श्ौर 
तज्जन्य स्फूर्ति तथा उल्लास के वातावरण में ही महान लेखक उत्पन्न 
होते हैं। मतलब यह कि आाथिक समृद्धि ही साहित्य ख्रष्टा की जननी 
है । यह भी एक दृष्टिकोण है और इसके समर्थन में कुछ तथ्य जुटाये 
जा सकते हैं । 


पर शैक्सपियर को दूसरा विचारक दूसरे ढंग से भी समझ सकता 
है । मार्क्सवादी दृष्टिकोण से विचार करने वाले 7,छा86॥978४ ५9 
प्रापके सामने एक समस्या रखेंगे । वे कहेंगे कि यह तो आप को 
मानना ही पड़ेगा कि शैक्सपियर की कला का चरमोत्कर्ष उसके दुखान्तक 
नाटकों में है। जीवन के प्रति उसका हृष्टिकोश $79270 है । इसका क्‍या 
कारण है ? यही कारण है कि शेक्सपियर के समय सामन्त वर्गीय प्रभि- 
जात्य अपने प्राचीन गौरव के श्रासन' से अश्रपदस्थ हो चुका था, उनके 
हृदय में श्रपती श्रपमानजनक दशा के कारण अवसाद के भाव भर गये 
थे, वे निराश हो छऊुके थे प्रोर ये ही भाव शेक्सपियर को रचनाओं में 
प्रकट हो रहे थे । द 

शेक्सपियर के संबंध में जो बातें कही गई हैं उस्मी तरह की बार्ते 


« पेंह +» 


किसी भी लैखक के बारे में कही जा सकती हैं और वे परस्पर विरोधी भी 
हो सकती हैं। युग की श्राथिक संपन्‍नता, समृद्धि एवं वेभव के साथ 
साहित्य सृजनोत्कर्ष की संगति बेठा लेना कठिन नहीं हैं। हम कह सकते 
हैं कि शेव्सपियर एलिजाबेथिन युग के वैभवोत्कर्ष की उपज थे। यदि यही 
बात ठीक है तो जर्मन के महात्‌ तथा दिव्य साहिस्यक महारथी गेटे के 
झस्तित्व की समस्या केसे चुलकभाई जा सकती है ? जिस समय नेपोलियन 
की दुर्दात्त सेचा जर्मनी को अपने पैसे से रोॉंद रही भी उस समय गेटे 
जसा महात्‌ कि, नाटककार तथा प्रालोबक की संभाव्यता किस 
सतरह हो सकती थी ? 


यदि हिन्दी साहित्य के झतेहास से उद्धहरुण लिये जाँय तो अनेक 
घटनायें मिलेंगी जिल्हें इस तरह समझा सकता सम्भव नहीं । सूर, तुलसी 
सथा केशव ये तीनों कवि समकालीन थे | बहाँ तक कि इन दीचों के 
शरस्पर मिलने की बात भी कही जाती है । पर इनके साहित्य की 
अभिव्यक्ति में कितना श्रष्तर है ? बंदि इतिहास की बत्राही हमारे सासने 
लू हो तो हम इसकी समकालीनता में किस तरह विश्वास करेंगे ? थदि 
शुक्ल जी “की बात को सही मान लिया जाता है ( हालां कि अरब इस 
में शंका की जाने लगी है ) कि वाह्य परिस्थितियों का प्रभाव साहित्य 
पर प्रनिवार्थ रूप से और सीधे ढंग से पड़ता है, और हिन्दी साहित्य, 
के विकास के इतिहास को इस्लाम के श्राक्रमण की क्रिया-प्रतिक्रिया के 
रूप में देखा जाय । हिन्दुओं ने विदेशी आक्रमण का डट कर मुकांबिला 
किया इसलिए तत्कालीन काव्य में वीरता के स्घर गज उठे और वीर- | 
गाथा कोल का अविर्भाव हुआ । बाद में जब वे असफल हो कर निराश 
हो गये तब भगवान की शरू में गये प्रौर भक्ति युग का प्ररमभ हुआ | 


चल डर छू * 


यदि इस तर्क-पद्धति पर विश्वास किया जाय ती १६वीं शताब्दी में 
भारतेन्दु युग के नव जागरण तथा नव स्फूति की संगति इससे केसे 
बैठाई जा सकती हैं? उस समय भी तो भारत निराश हो चुका था ? 
भारत ने श्र ग्नेजों के बढ़ते चरण के विस्तार को प्राशपन से रोकने की' 
वेध्टा की, सन ससावन में बूढ़े भारत में फिर से नई जवानी भ्रा गई थीं 
झ्ौर उसकी पुरानी तलवार चमक उठी थीं, पुरुष क्‍या स््रियों ने भी 
रखचण्डी का नुत्य किया था पर होनी हो कर रही । भारत के नभ का 
प्रभा-पूय, शीतलच्छाय सांस्कृतिक सूचे अस्तमित प्राय हो गया। 
ईदवर की शरण में जाने के लिए मार्ग-प्रशस्त था | तब साहित्य में भक्ति 
युग का प्रादर्भाव क्‍यों कर सम्भव नहीं हो सका ? 

निष्कर्ष यही निकला कि साहित्य मैं प्रमति लाने तथा उसके विविध 
रूप विधान के सुजन करने का श्रेय किसी एक बात को दे देना ठीक 
नहीं । साहित्य को सीमा में बांधता सम्भव भी नहीं । जो चीज सीमा के 
बन्धन में ग्रायेगी वह साहित्य न होकर कुछ ओर ही चीज होगी.। चार 
देव का 908, ॥79॥67 भझौर 37077876 का सिद्धांत हो च। 
हीगेल का 8)776 वाला सिद्धांत हो, चाहे मार्क्स का उत्पादन पद्धति 
बाला सिद्धांत हो सब एकांगी हैं । एकांगी तो व्यक्ति वाला सिद्धांत भी 
है | पर वहो एक चीज है जो हाथ लगती है । अतः हमें बात करनी 
होगी तो उसी की करेंगे । 

मध्यंयुग तथा .पूजीवाद के उदय में अनेक शताबिदियों का अन्तर है।. 
इस विज्ञाल अ्रवधि में ऐसा कोई वेज्ञानिक आविष्कार नहीं हुआ जिसके 
कारण उत्पादन के तरीके (77048 ० 7704 7४४00 ) जिसकी 
दुह्ाई मावर्सवादी देते नहीं थकते, में कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन हुआ हो । 


न्‍न् थे द्धू ध्ा 


परन्तु साहित्य की विधा ने न जाने कितने क्रांतिकारी परिवर्तन देखे ? 
श्रौद्योगिक क्रांति ने बहुत पहले ही प्रपनो जड़ जमा ली थी, हमारे जीवन 
के पद-पद पर उसका प्रभाव पड़ रहा था पर साहित्य में उसकी ऋलक 
११वों शताब्दी के पूर्वाद्ध के भप्रत्तिम दिलों में श्राने लगी थी जब वह 
प्रत्यन्त पुरानी हो गई थी | 


प्रालोत्रकों ने साहित्य श्नौर समाज की संगति बेठाने मैं बहुत ही परि- 
क्रम किया है और इसमें सुक्ष्नदशिता का परिज्य दिया है। साहित्य के क्षेत्र 
में उपन्यास (१९०४४|) जैसी विधा की [| मध्यवर्यीय उत्पत्ति के पक्ष में 
जब तकों की पंक्ति खडी की जाती है, १८थीं झताब्दी में (858ए जेसी 
चस्तु का मूल सामाजिक परिस्थितियों में हूढ कर दिखाया जाता है तो 
उस पर प्रविश्वास करना घठिन हो जाता हैं। भारतेन्दु युग में बेयबितिक . 
निबन्ध तथा रूपकों की भरमार क्यों हो गई इसके भी सामाजिक कारण 
उपस्थित किये जा सकते हैं। यदि समाज की प्रचलित धारा से साहिए्य 
की वर्ष्य वस्तु का साक्षात्‌ सम्बन्ध देखने में कठिनाई हो तो यह कह कर 
पड छुडाया जा सकता है कि वर्ण्य वस्तु में सामाजिक प्रभाव मे सही 
उसके प्रकाशन के ढंग में,तर्ज श्रदा' में तो है। जैसे पोप श्रौर ड्ाईडेन 
की कविताप्रों की चुस्ती और दुषस्ती, तथा सफाई में उस युग की 
बौद्धिकता देखी जा सकती है। कहा जा सकता है कि सामाजिक पष्यों 
का कोई कलात्मक महत्व ने हो पर वे अन्य रूप में कला के सहयोगी 
हो सकते हैं। पर यह कोई आवश्यक नहीं कि सामाजिक पूल्यों का कला 
सम्बन्धी योगदान हो ही । सामाजिक मृल्यों की बात्त को हम साहित्यक 
प्रध्ययन का केन्द्रीम भाव, अनिवार्य भ्रग नहीं मान सकते । ऐसा बहुत 


न ६ ++ 


सा साहित्य है और महत्वपूर्ण साहित्य है जी समाज से निलेप हो कर लिखा 
गया है। साहित्य अपने गौरव और महत्त्व को सामाजिक प्रति नधित्व से ' 
नहीं प्राप्त करता । उसका अपना, निजी महत्व है जिसके बल पर बहु 
अ्रपने श्रस्तित्व- की घोषणा कर सकता है । 


एक और बात पर विचार करना है। मनोवैज्ञानिक, सामाजिक अथवा 
प्राथिक हृष्टिकोण से वाहित्य के मुल्यांकन करने वाले सिद्धान्त को 
उत्वत्ति मुलक सिद्धान्त कहा जा सकता है। कारण यह हृष्टिकोण, प्रधा- 
नत: यह बतलाने की चेष्टा करता है कि यह जो साहित्यिक रूप विधान 
है उसकी उत्पत्ति किस प्रकार हुईं ? हमने इतिहास के सहारे श्राथिक तथा 
सामोजिक परिस्थितियों का अ्रध्ययन किया और इस परिणाम पर पहुंचे 
कि उस समथ की परिस्थितियां पतनोन्पुख-कारिशी थीं, नीचे ले जाने 
वाली थीं, समाज में श्राथिक वैषम्य उत्पत्न कर उत्पीडन करने वाली थीं | 
लेखक भी शोषक वर्ग का सदस्य था। ग्रतः इस वातावरण में ऐसे 
लेखक के द्वारा जो कुछ भी प्रयोग हुए वे अ्निवार्यतः दोषपुर्ण होंगे, पतव 
की ओर ले जाने वाले होंगे । 


उदाहरणार्थ ग्राधुनिक स्थिति को लीजिये । हमारी बौद्धिक एकता. 
छिलन्न भिनत्र हो गई है, कोई ऐसा विचार सूत्र, पहले की तरह नहीं रह 
गया है जो हम सब को श्राबद्ध किये रहे। परिणामतः, ग्राज के समा> 
में बैयक्तिकता का बोलबाला है, सब अपनी अपनी निजी दुनियां में 
बन्द डेढ़ चावल की खिचड़ी श्रलग पकाने में ही मस्त हैं। एक दूसरे 
की भाषा को समझ नहों पाता । सामाजिक परिस्थिति ही ऐसी हो गई हैं। 
इसका प्रसर साहित्य पर भी बहुत पड़ा है । कुछ दिन पूर्व तो ऐसा 


लगता था कि कथा-साहित्य का तो काॉयापलट ही हो जायेगा । उपन्यास 
की शैली, भाषा, विषयवस्तु पर इतना असर पड़ा और इतना क्रान्तिकारी 
परिवर्तन हुआ कि उपन्यास की मौत हो रही है, ऐसो शंका लोगों को 
होने लगी । इस ओर जेम्स ज्वायस के उपन्यास सम्बन्धी प्रयोग पर्याप्त 
प्रसिद्ध हैं। श्राधुनिक हिन्दी कविता ने जो रुख अख्तियार किया है शोर 
प्रयोगवाद तथा प्रपद्यवाद को अ्बोधगम्यता को लेकर जो सामने झा रही है 
उससे हम परिचित हैँ । 


समाज-शास्त्र यह तो बतला सकता हैं कि इन विचित्रताओ्रों के 
कारण क्या हैं, जेम्स ज्वायस ने जिस रूप में लिखा उसे उस रूप में 
क्यों लिखा ? पर प्रश्न यह हे कि इन प्रयोगों का साहित्यक महत्त्व क्या हैँ 
वह इस पर कया प्रकाश डाल सकता हें ? क्‍या हम कह सकते हैं कि 
चू कि इन प्रयोगों के द्वारा कथा साहित्य में जो लवखीलापन आया, उसके 
क्षेत्र में विस्तार हुआ वह एक ऐसी सामाजिक परिस्थिति को उपज है जिसे 
हम शोभनीय नहीं समभते श्रतः ये प्रयोग भी निदनीय हैं। यदि हम - 
कारण के मूल्यों को सीधे सादे ढंग से कार्य में भी देखने लग जायेंगेतो यह 


परिणाम होगा ही शोर हम श्रपने लिए श्रमेक उलभने मोल ले बेंठेंगे। 


यदि हम' कारण-सुल्यों को काय-मूल्यों पर इतने स्रीधे भ्रौर सहज 
ढंग से स्थानानतरित करने लगेंगे तो कीचड़ से कमल कंसे उत्पन्न कर 
सकेंगे ? गोबर या मलमृत्र की खाद से सुनहले तथा प्राण प्रद गेह' के दाने 
केसा उपजा सकेंगे ? बाढ़ के प्लावन की कौन अच्छा कहेगा ? बाढ़ से 
गांव के गांव नष्ट हो जाते हैं, कितने जान और माल की क्षति होती हैं ? कोसी 
नदी को आंसुम्रों की नदी कहा ही जाता हैं । पर वही बाढ़ या विफत्ति 


मनुष्य के ब्नन्‍्दर साहस, परिस्थितियों से टक्कर लेने का उत्साह भी तो 
पेदा करती है ? श्रतः इस साहस या उत्साह संचार को -आपदोद्भूत होने 
के कारण ही त्याज्य भी माना जाने लगेगा ? शरीर अनित्य श्र मलवाही 
सही पर इसके द्वारा प्राप्त सब चीजों को अनित्य और मलवाही 
श्रतः त्याज्य माने जाने लगेगा तो कवि को इस उक्ति को भी श्रसत्य 
मानना पड़ेगा । 


यदि नित्यमनित्येन निर्मल मलवाहिना। 
यशः कायेन लब्येत तल्लब्धं॑ भवेन्नु किम ॥| 


नहीं, श्रनित्य भर मलवाही शरीर से हम नित्य और निर्मल यश भी 


प्राप्त कर लेने में संकोच नहीं करेंगे। 

. अ्रतः साहित्य पर विचार करते समय हमें इसकी पृथक सत्ता को 
माव लेना चाहिये। मान लेना चाहिये कि इसमें एक विज्येषता है जो इस 
को मानवता की प्रभिव्यक्ति के प्रन्य रूपों से पृथक कर देती हैं । संभव 
है कि श्रत्य रूपों के साथ भी यह रहे, उन्हें सहायता दे श्रथवा उनसे 
सहायता ले पर यह हे एक अ्रलग वस्तु ही । 

में हर मन्द्रि के पट पर अध्ये चढ़ाती हूँ 
क्‍ भगवान एक पर मेरा है | 

: मैं हर पूजन-अचेन पर शीश भुकाती हूँ 
. अभिमान एक पर मेरा है। 

मैं किरण किरण की श्री पर प्यार छुटाती हूँ 
दिनमान एक पर मेरा है। 


में हर आशीष मन को स्वीकार कराती हैँ 
बरदान एक पर मेरा है । 


वन. पुन लत 


उसी तरह साहित्य भले ही किसी के साथ रहे पर वह है एक अलग 
चीज ही और उसी के आधार पर उसका मूल्यांकन होना चाहिए । 
“लज्ञगन्वम ताधारणव्मबचनप्‌” साहित्य के लिये भी श्रताधारण पर 
धर्म की स्वीकृति अनिवार्य हे भले ही हम इसके स्वरूप का निदचय न 
कर सके । 

हम सब जानते हैं कि टेबुल क्या हैँ ? इसका रूप रंग कैसा है ? इसका 
आकार प्रकार केसा है ? इनकी लम्बाई चौड़ाई कितनों होतो है ? यह 
संभव है कोई कारीगर ग्रपने घर में अपने कौशल से सुन्दरतर टेबुल का निर्माण 
करे और फेक्टरी में यंत्रों के द्वारा निर्मित टेबुल उसकी सुन्दरता को पा न 
सके । परन्तु ऐसा कहना तो तभी संभव है जब कि फैक्टरी या हाथ 
उद्योग दोनों से स्वतन्त्र हमारे भ्रन्दर टेबुल की रूपरेखा वर्तमान है। 
हां, यह कर सकते हैं कि सामाजिक परिस्थिति का विश्लेषण कर 
यह बतलावें कि श्राज के युग में हाथ-उद्योग का यंत्रोद्योग की वृहृदाकार 
उपज के मुकाबिले में टिकना सम्भव नहीं । यह भी बतला सके कि किस 
ऐतिहासिक शक्तियों के कारण यन्त्र युग सामने श्रा गया है । पर ऐसा 
कहने में हम तभी समर्थ हैं जब कि ट्ुबुल को टेबुल के रूप में [90७ (प७ 
पु9७]७, जांचने की कोई स्वतन्त्र कसौटी है जो टेबुल के स्वभाव के श्राधार पर 
ही प्राप्त हो सकी है। हम यह नहीं कह सकते कि यन्त्र सामूहिक निर्मिति 
टेबुल को खराबी है, विद्र पता है। हम कह सकते हैं कि टेबुल खराब है 
वयोंकि हमारे मन में टेबुल की जो एक धारणा है उससे यह मेल नहीं 
खाता इतना और भी कह सकते हैं कि आ्राधुनिक यम्त्रोत्पादन के युग की 
परिस्थितियों में इस तरह की खराबी अनिवार्य है। टेबुल के दोष को 
परक्षने के लिये हमें टेबुल की दुनिया से ब। हर जाने की जरूरत नहीं है ! 


न हुई -++ 


हमें टेबुल की दुनिर्यां से बाहर जाने की जरूरत इस लिए पड़ती है कि 
उस् कारण को हृंढ सकें कि टेबुल में जो अप्रक खराबी श्रा गई है और 
वह क्यों कर संभत्र हो सकी । श्रतः हमें किसी रचना का साहित्यक 
मूल्यांकन करने के लिये उसी कस्तौदी से काम लेना चाहिये जो साहित्य 
के स्वभाव से उपलब्ध हो, उसके ही घर में पाई गई हो, किसी दूसरे से 
से उधार न.ली गई हो । 


फू [ अंखिल भारतीय कुर्मार साहित्य परिषद के वार्षिक अंधि* 
. वेशन, बालोत॑रा ( राजस्थान ) की विंचाई गोष्ठी में दिया 
एर्या सांषर्ण | 


# 0३७ ्ु १. मन] 


पाहित्य 
का 
स्वरूप 





मे जब तब उपन्यास, कहानी अ्रथवा काव्य-संग्रह की पुस्तकों की 
आलोचना करने का अवसर मिला है। मेरे सामने सदा यही प्रश्न 

रहा है--किस दृष्टिकोण से उसकी आलोचना की जाय । हम उसमें नेति- 
कंता के उपदेश को हू ढ़ सकते हैं, माक्‌ सीय वर्ग-संघर्ष को, वेज्ञानिक तथा 
मनोवेज्ञानिक सत्य को ढूंढ सकते हैं, आदर्श तथा यथार्थवाद को हम बहुत 
दिन से ढूढते आरा रहे हैं। अर्थात्‌ हमारे सामने एक आधार का, दृष्टिकोण 
का व्यापकत्व होना चाहिए जो रचना के क्षेत्र में बिखरी सारी सामग्री को 
सार्थकता प्रदाव कर सके, उन्हें एकता के सूत्र में बांध सके । मान लीजिये 
आप एक खेल के मैदान में गये । वहां देखते क्या हैं कि एक छोटी-सी गेंद 
के पीछे कुछ ब्यक्ति बेतह्मशा पागल की तरह दौड़ रहे हैं। इससे भी बढ़- 
कर कोई पागलपन की बात हो सकती है कि ऐसे निरर्थक कार्य के लिये 
प्राणों को खतरे में डाला जाय ? पर उसी पर फुटबाल के खेल के सिद्धांतों 
के आधार पर विचार करें तो सारे व्यापार का एक बोधगम्य चित्र प्रापके 


«- 'डॉ9 + 


मानस पटल पर उतरेगा और आप विश्वास के साथ दूसरों को भी छस 
चित्र के दर्शन करने के लिये प्रामंत्रित कर सकेंगे । 


इस विश्व पर विचार कीजिये । यह कितनी विविधताओ्रों से भरा 
हुआ है। अराजकता का बोलबाला है; जो बात नहीं होनी चाहिये वही हो 
रही है।धरम लुट रहा है, पाप फल-फूल रहा है । “सागर तीर मीन तड़पत 
है इुलस होत पय पीन”' । जवानी रो रही है । बुढापा हंस रहा है। 
कबीर ने जो अजीबोगरीब उलद् वांसियां कही थी वह योंही नहीं । उन्होने 
इस विचित्रता को बड़े गौर से देखा था तब कहा था । 


बेल बियाइ गाइ भई बांस, बछरा दूहे तीन्यू" सांक। 
मकड़ी घरी माषी छछिहारी, मास पसारि चील्ह रखबारी । 

_ सूसा खेबठ नाव बिल्ञइया, मींडक सींचे सांप पहरइया। 
नित उठि स्याल् स्यंध से जूके, कहे कबीर कोई बिरला बूमे | 


तब इसे कथन की पद्धति विशेष कहकर ही हम संतोष नहीं कर 
सकते । कबीर ने पहले-पहल श्रवश्य ही उस दृष्टि से देखा होगा जिस तरह 
फु-बाल के खेल को पागल की दौड़ कहने वाले व्यक्ति ने देखा था। बाद 
में जब भगवत्लीला की दृष्टि जगी होगी तब उन्हें रहस्य समभ में आया 
होगा । भले ही वे विरल हों | 

निष्कर्ष यह कि श्रालोचक के सामने एक हृष्ट होनी चाहिये, एक ' 
'आधार होना चाहिये। प्रश्न यह है कि वह दृष्टि कौनसी हो ? स्पष्ठ उत्तर 
है--वेसी हो जिसमें ग्रध्रिक से अ्रधिक मतेक्य हो | सब सहमत हों यह तो 
सम्भव' नहीं, पर ऐसा ज़रूर हो जिसमें मतभेद की कम से कम गुजाइश 
हो और जिसको झढ से टाल देना कठिन हो । इस तरह से विचार करने 


जज पं अल 


पर पता चलेगा कि कविता या कोई भी कलात्मक कृति कुछ भी किसी के 
लिये नहीं करती ही पर कवि के लिये तो कुछ करती ही है । करती तो है 
बहू पाठक के लिये भी पर ऐसी विशिष्ट परिस्थिति की कल्पना की जा 
सकती है जिसमें उसका पाठक से कुछ भी सम्बन्ध न हो । ऐसा हो सकता 
है कि सृजन करते समय वही व्यक्ति स्रष्टा है, पढ़ने के समय वही व्यक्ति 
पाठक है । आ्राप चाहें तो पाठक के अश्रस्तित्व को मिठाकर उसे ख्रष्टा में 
मिला सकते हैं। पर ख्रष्ठा के अ्रस्तित्व का लोप करना कठिन होगा । यह 
आ्रापको मानना पड़ेगा कि कविता ख्रष्ठटा के लिये कुछ कर रही है । स्रष्टा 
के सामने एक परिस्थिति है, एक चुनौती है, एक ललकार है जिसका सामना 
बह कविता की 507980829 से कर रहा है । 

कहा तो यह भी जा सकता है कि ख्रष्टा के अस्तित्व को भी मिटाया 
जा सकता है, उसे भी मार कर मार्ग साफ किया जा सकता है। कल्पना 
कीजिये, अ्रक्षरों को आय यों हो श्रासमान में उछाल रहे हैं, ओर वे अक्षर 
इस तरह जमीन पर गिरते हैं कि वहां सार्थक वाक़्यों का रूप धारण कर 
लेते हैं मर वहां कविता भी बन जाती है। किसी ने ऐसा प्रयोग करके 
देखा है या नहीं यह तो ज्ञात नहीं । पर यह तो देखा गया है कि कोई 
कीड़ा काठ को काट रहा हो--काठते काटते एक ऐसी अ्रवस्था भी श्रा 
सकती है कि वहां पर 'गुणात्षर न्याय से राम नाम बन जाय । उसी 
तरह 'न किचिद्पि कुबाणः से काव्य की सृष्टि हो जाय-इस कल्पना में 
क्या बाधा है ? बाधा तो नहीं है पर इसका निवारण यह कहकर किया 
जा सकता है, जैसा साहित्य दर्पणकार विश्वनाथ ने एक दूसरे प्रसंग में 
किया था कि. दा काव्यस्य विरलत्व स्थात! अर्थात्‌ ऐसी अवस्था में 
कविता नाम की चीज इतनी विरल हो जायेगी कि नहीं के बराबर । तब 


चममफो ६4% | रल्क़ 


इसके बारे में विचार करना ही व्यर्थ है। हमारे सामने काव्य का इतना 
बड़ा स्तूप उपस्थित है उसी को ध्यान में रखकर विचार करना है | 


ग्रतः हमें उ्स प्रश्न की खोज करनो है, कविता जिसका उत्तर है । 
उस परिस्थिति का पता चलाना है कविता जिसका सामना शअ्रपनी 
5079/0829 से कर रही है | आलोचकों का एक दल ऐसा है जो प्रश्न को 
ने देखकर उत्तर को देखता है। यदि उत्तर अपने में ठीक है तो वह ॒श्रागे 
न बढ़ेगा । वह देख लेगा काव्य में अयुक्त अलंकार को, छन्द को, वाक्य 
सौष्ठव को झोर संतुष्ट हो जायेगा । श्राजकल जिसे ९७०० 8७880 
(४700 87 कहते हैं-उसका पूरा जोर इसी तरह की आलोचना पर है । 
पर उत्तर मात्र से संतुष्ट हो जाने वाले व्यक्ति में कहीं न कहीं स।हस का 
प्रभाव है, वह खत्तरे से डरता है श्रोर कतरा कर निकल जाना चाहता है । 


परिस्थितियां भी कितनी तरह की हो सकती हैं परन्तु हम॑ श्रपनी 
सुविधा के लिये उन्हें दो वर्गों में विभक्त कर लेंगे । श्रान्तरिक या बाह्य, 
प्रात्मनिष्ठ और बहिनिष्ठ, 570|७७४४७ और 09]७०७४४ए७ पहले का' 
सम्बन्ध मदुष्य के व्यक्तित्व से है श्नौर दूसरे का सम्बन्ध व्यक्तित्वेतर बातों 
से है श्रर्थात्‌ वे सब बातें जिन पर व्यक्ति का नियन्बरण नहीं है । वे हैं 
झोर उनका रहना सही है। यदि हम मनोविज्ञान के श्दों में 4 तो उन्हें 
500प्रप8 कह सकते हैं। किसी 5879पाोपढ के सम्पर्क में श्राक्र 
सचेतन प्राणी प्रतिक्रिया-तत्गर होता है। 50॥7प्रांप8 का स्वहूप दो 
नियत है उसमें किसी तरह का मतभेद नहीं हो सकता पस्‍्तु प्रक्रिया के 
स्वरूप में बहुत विभिन्नता श्रा जाती है | एक ही वस्तु की देखकर भिन्न- 
भिन्न व्यक्ति भिन्न-भिन्न तरह की प्रतिक्रियाएं करता है। इन प्रतिक्रियाप्रों 


न पंप 


के स्वरूप में जो विभिन्नता झा जाती है उसके मूल में मनुष्य ४ी झात्म- 
निष्ठता ही है | कुछ कारण विशेष के चलते प्रत्येक मनुष्य की मानसिक 
प्रवृत्ति ऐसी हो जाती है जो प्रतिक्रिया के स्वरूप के निश्चित करने में 
सद्दायक होती है । 


उदाहरणार्थ, कल्पना कीजिये कि एक निस्तब्ध निश्वीय में, जिस वक्त 
सारा श्रालम सोया हुआ है, पत्थर के बोक से भरी हुई एक बड़ी लारी 
कर्कश श्रावाज करती हुई हमारी सड़क से होकर निकल गई। उस सड़क 
के किनारे जो बड़े बड़े महल खड़े हैं उनमें हजारों श्रादमी सोये हैं, निद्रा में 
लीन हैं | कुछ व्यक्ति ऐसे हैं जिन पर लारी की श्रावाज का कुछ भी 
प्सर नहीं पड़ा । उनको पता भी नहीं कि लारी सड़क पर होकर गई भी 
है या नहीं । दूसरे व्यवित की नींद थोड़ी सी टूटी और वह जरा सा करवट 
लेकर पुनः नींद में लीने हों गया | तीसरा व्यक्ति सेनिक है जो श्रभी युद्ध 
के मोर्चे पर से कुछ दिन की छुट्टी पर श्राया है। वह सपने में देखता है 
कि एक हवाई जहाज बड़े जोर से श्रावाज करता हुत्ना (788) कर गया । 
एक बेचारी महिला है जो किसी न किसी तरह पेट काठ कर अपने परिवार 
का खर्च चला रही है। वह सपने में देखती है कि चाय लाते समय नौकर 
को ठेस लग गई और इसके कारण चीनी के सारे बर्तत कनभना कर गिर 
पड़े शऔर चूर-चूर हो गये । एक हमारे विद्यार्थी हैं जो विद्यार्थी-संघ के 
ग्रध्यक्ष पद के लिये चुनाव लड़ रहे हैं । उन्होंने सपना देखा कि प्रचार 
करने वाले उनके छोटे से पेम्फलेट ने एक बड़े पंजे का रूप धारण कर 
लिया और वह बढ़कर उनके प्रतिएन्द्दी के गाल पर जा कर सटाक से लगा । 
बाद में तुरन्त एक राकेट का रूप धारण कर कालेज भवन के चारों तरक 
चक्कर मारने लगा, '४४४7)] करने लगा | द 


* 8 «-- 


इन सब उदाहरणों पर ध्यान देने से यही पता चलता है कि ऊँ- 
घापोए8 तो एक ही है अर्थात्‌ पत्थरों से भरी हुई लारी या उसकी करकश 
ध्वनि । परन्तु इसके कारण भिन्न-भिन्न ब्यक्तियों में जिम स्वप्नों की 
सृष्टि हुई उनके स्वरूप में कितनी विभिन्नता है ? इससे हम क्या निष्कर्ष 
निकालते हैं ? एक ही चीज में इतनी भिन्न चोजों के उत्पन्न करने की शक्ति 
कहाँ से भ्राई ? स्पष्ट है कि इसका रहस्य बाहरी उत्त जक पदार्थ में नहीं पर 
उस व्यक्ति में हैं जिस पर 500पाप& का आधात हुआ है और जिसने उस 
ग्राधात को अपनी मनस्थिति के.अनुकूल ग्रहण किया है। इससे हम यह भी 
परिणाम निकाल सकते हैं कि बाहरी उत्तेजक पदाथ की प्रतिक्रिया सदा 
व्यक्त के व्यक्तित्व रूपी रंग में रंग कर ही उपस्थित हो सकती है । 


यदि पुरुष और प्रकृति के शब्दों में हम समभना चाहें तो यह कह 
ध्षकते हैं कि बाहरी पदार्थ का स्थान साहित्यिक या किसी भी रचनात्मक 
प्रक्रिया में वही है जो विश्वसूष्टि में पुरुष का है । पुरुष तटस्थ साक्षी 
होता है, निष्क्रिय होता है, उसका काम प्रकृति में एक हलचल पेदा कर 
देना है। काम कर श्रर्थात्‌ थोड़ी सी गति ५दा कर वह चुप हो जाता है । 
भागे के विश्व-सूजन का सारा काम प्रकृति कर लेती है । उसी तरह वस्तु. 
हूपी बाहरी 5070प्रोग्58 मन को सक्रिय तो कर देता है जरूर, झोर इस 
प्र तक उसके महत्त्व को भुलाया नहीं जा सकता, परन्तु रचना को वास्त- 
विक महत्व की वस्तु बनाने में व्यक्ति का ही &घधिक हाथ रहता है । इतो 
तरह हम कहेंगे कि बाहरी रूप में तो हम पर प्रभाव डालने वाले संसार 
तथा संसार के श्रनेक पदार्थ हैँ ही परन्तु उन्हें कलावस्तु या रचनावस्तु 
बनाने का श्रेय बहुत कुछ मनुष्य के व्यक्तित्व को है। यदि उसके व्यक्तित्व 


च्कः हूँ की पक 


में कोई शक्ति नहीं है तो संसार के सारे पदार्थ यों हो धरे के धरे रह जा 
सकते हैं॥ उसी तरह जैसे ऊपर के उदहारण में इतनी बड़ी लारी धूम 
भचाती हुई सड़क के इस पार से उत्तर पार चली गई परन्तु कुछ लोगों के 
कानों पर जू तक नहीं रेंगी । पर कुछ लोगों ने ने जाने कितमे विशभिस्त 
संसार की रचना कर डाली । 


मैं साहित्यिक प्रक्रिया में बाहरी पदार्थ के महत्व को अस्वीकार नहीं 
करता । भट्ट लोलटटू या रामचरद्र शुक्ल या (७6 77४0] ने जब 
बाह्य वस्तु के महत्व को बताया और कहा कि उच्च कोटि को कविता के 
लिये महत्त्वपूर्ण विषय का होना आवश्यक है (राम तुम्हारा चरित स्वयं ही 
काव्य है, कोई कवि बन जाय सहज सभाव्य है ) तो मैं उनके कथन की 
शुरुता को महसूस करता हूं। मेरा भी ख्याल है कि विषय वरतु को महत्त्व> 
पूर्ण होना चाहिये। मंदि विषय महत्वपूर्ण नहीं है तो कविता उच्च कोर्टि 
की नहीं हो सकती १ पर प्रश्च यह है कि इस महत्वपूर्ण का प्रर्थ क्या है ? 
महत्व कहाँ निवाख॒ करता है ? वस्तु के वस्तु रूप में ? बस्तु (7७ कच्ततु 
में ? नहीं$ मह्त्त रहता है वस्तु के प्रभाव में । 


एक वित्त भर भूमि का क्‍या महत्त्व है? उसमें एक पाव ग्रन्न भी नहीँ 
उपजाया जा सकता । पर उसी के लिगे हजासें व्यक्ति अ्रपने प्रास्यों की 
प्राहुति दे सकते हैं। राष्ट्रीय ध्वज था राष्ट्रीय गान अपने में तो एक गज 
कपड़ा या कुछ शब्दों के मेल के सिवा कुछ नहीं, पर जब ग्राखों या कामों 
की राह से यह हृदय-रंध्न में प्रवेश करता है तो कितना अमृह्य एवं शक्तिशाली 
हो जाता है ? सम्भव है फिसी महात्मा की दिष्य वाणी को हम अनसुनी 
कर दें प>एक दुर्किया, निरीह तथा तुच्छ सी विधवा की प्राह हमारे . 


हक नर 


प्राणों में हजारों हाथियों की शक्ति समन्वित कर दे । कहने का श्र्थ यह है 
कि वस्तु चाहे वह कितनी ही महात्‌ हो पर सजनात्मक दृष्टि से महत्त्व- 
पुर्णा है उसका प्रभाव। जो चीज हम पर प्रभाव डाले वही मह- 
त्वपूर्ण है । साधारण समीकरण तो यही समभा जाता है कि महान वस्तु- 
महान प्रभाव | पर साहित्य में इसके विपरीत यह भी हो सकता है महान 
प्रभाव”"महान वस्तु । 


रघुवंश के रघु के मोचारण वाली कथा किसे मालूम नहीं ? व्यात्न 
नन्दिनी को दबोच लेता है और उसे शअ्रपना ग्रास बनाकर अ्रपनी क्षुघा- 
तृप्ति करना चाहता है । रघु के हस्ताक्षेप करने पर यही कहता है कि 
यदि गौ के बदले तुम अपने को मेरे भोजन के लिये समपित कर दो तो 
नन्दिनी को छुटकारा मिल सकता है । बस क्या था ? रचु तेयार हो 
जाते हैं। व्यात्न रचु को बहुत समभझाता है, कहता है कि ऐसी यूढ़ता 
न करो | 
एकात्पत्र जगतः प्रझ्ुत्य॑लत्र॑ वयः कान्तसिद॑ वपुश्च 
अलपस्य हेतो बेहुह्ातुमिव्छुव्‌ जिचार-मूडः प्रतिभास्ति में ल॑ं ॥ 
भूतानुकम्पा तबचेदियं गोरेका भवेत्थ्रस्तिमतती च्वदन्ते 
जीवन्पुन: शाश्वतदुपप्ल्वेभ्यः प्रजा: प्रजानाथ पितेव पासि॥ 


ठीक तो है, व्याप्न का कहना क्‍या बुरा था ? एक छोटी सी गाय के 
लिए अ्रपने चक्रवतित्व, अपने यौवन तथा कान्‍्त शरीर को नष्ट कर देना 
विचार-मूढता नहीं तो क्‍या है ?. अपना नाश कर रघु बहुत करते तो एक 
गाय की रक्षा करने में समर्थ होते। अपने को नष्ट कर इतने बड़े 
प्रजावर्ग के जीवन की रक्षा का ख्याल न रखना इसमें कौन सा तुफ़ है ? 


ल्‍+ पर +े 


पर आप लाख समभझभावें, रघु श्रापकी बात मानने को तेथार नहीं । 
इसका कारण क्या है? यही न, कि गाय तो है छोटी सी ही परल्तु रघु के 
मादस पटल पर या हृदय-पटल पर श्राकर वह विश्व की सारो विभूति से 
भी श्रष्ठतर हो गई। इसीलिए कहता हुं कि साहित्य की प्रक्निया में 
व्यक्तित्व का बहुत महत्त्व होता है । | 


ध्रतः, यह निश्चित है कि साहित्य में घा कला में हम सब को. छोड़ 
सकते हैं पर व्यक्ति को नहीं छोड़ सकते । व्यक्ति किसी न किसी भांति 
साहित्य में श्रा ही जाता है। ऐसा भी सम्भव है कि लेखक-व्यक्ति को इस 
बात का पता भी न हो और वह चाहता भी हो कि उसके व्यक्तित्व के 
प्म्पर्क से उसका साहित्य लांछित न हो । पर इसके बावजूद भी साहित्य 
में बह श्राकर ही रहेगा । उसी तरह जिस तरह (/७78507 तथा 7780 के 
लाख विरोधों के रहते भी मनुष्य की अचेतन प्रेरणा उसके व्यवहारों को 
प्रभावित करती ही है । चाहे उन श्रान्तरिक प्रेरणाओ्रों के स्वरूप को 
पहचानने के लिए हमें बहुत सतर्कता से और छानबीन से काम लेगा पड़े । 
ह्वप्मतन्त्र का थोड़ा सा भी ज्ञान रखने वाले व्यक्ति को यह मालूम है कि 
स्वप्त के बाहरी रूप में अर्थात्‌ ((७४४686 (0शा०॥४ में उसको प्रेरित 
करने वाला झ्ान्तरिक रूप छिपा रहता है जिसे ॥,80076 (00767 
बहते हैं और यह ॥8(870 (0०४ ही स्वप्नतन्त्र का सार-तत्व 
धौर प्रेरक वस्तु हैं । 


किसी कविता में मनुष्य के व्यक्तित्व की बात-व्यक्तित्व ही नहीं 
उसकी व्यक्तिगत बात किस तरह रूप बदल कर भा जाती है इसका एक 
उदाहरण /4,ै..७. 507078 ने अपनी पुस्तक 097807%! फिछव4॥ 728 


न्‍ पु लत 


के “पृ ए0७0 कणवे ०४४5 “,,......................नामक लेख मैं 
दिया; है। उनकी एक कविता है जो बाहरी रूप से तो देखने में बहुत 
प्रशकृषक नहीं है । उसमें कोई विशिष्टता भी नहीं दिखलाई पड़ती परन्तु 
किसी न किसी रहस्यमय कारण से वह पाठकों को अधिक प्रिय रही है 
श्रौर प्रत्येक संग्रह में उसे आदरणीय स्थान मिला है । कवि को भी प्रारंभ 
में इस कविता) में कोई विशेष महत्व की बात नहीं मिली थी परन्तु बाद 
में, कुछ वर्षों के बाद जब उसने कविता पढ़ी और विचार किया तो उसका 
रहस्य खुलने लगा । कविता यों हैः 


3 फपणलते छ8ाणवे 28४8 77ए ४7220 0 ज्षणाशञह0 
7,0807702. पशगत660. 6  #पर्रिठण ॥69, 
विए९ए छातवे 807 87७8 8078 60 ज्ञांतआ ॥6७, 
90, ध्यप 7270% . 0078 #6७ 06. 


वफछ 80 4 एुएणँ 8004 प््र० 9७४06 776, 
जाए ग78 कावे तुपांश॑ >शपए गी6०0, 
+6 000 84 प्र7.00 ४76, ४867 986 |0076व 
छपएुतछ0 ४5996 गिशंद ३ शब्द आर ४00, 


छ56 889९0 ४6, क्या छश+्5 0790 60 0007 
४96०७ )0709ए ॥ऐ सादे प्रा0००जीभावे 78७ 
0 शी 80096 $96 ए0ा87879768 7९87७ 
0 फछांत इणाए ए॑ 0प १४6४. 


कृवि ने स्वयं इस कविता की प्रतीकात्मकता को समझाने की कोशिश 
की है। प्रतीकात्मकता से मेरा मतलब उन व्यक्तिगत घटनाग्रों से है 
जिन्होंने किसी रासायनिक प्रक्रिया के प्रभाव में श्राकर इस कविता का रूप 
भारण लिगा है। वे लिखते हैं कि जिस समय कविता लिश्ली गई थी उस 


जय हुँ पा. इक 


समय मैं एक लड़की के प्रेम में था जो मुझ पर सर्वाधिकार चाहती थी । 
उत्ते जरा भी पसन्द नहीं था कि में उसका ध्यान छोड़कर दूसरी किसी 
वस्तु पर ध्यान लगाऊ । में यह समझे गया था कि यदि इस लड़की से 
मेरा विवाह हो गया तो में जो कुछ भी रचनात्मक कार्य कर रहा हुं उसे 
पूरा करने में सफल न हो सकू गा श्रौर बहुत से काम अधूरे रह जायेंगे । 
वही लड़की हमारी कविता का उपजीव्य है। और कविता में जो 
एृःआा9१ (७ #पं)09०४7॥ ०१ है वह मेरा अधुरा कार्य है जिसे 
मैंने छोड़ दिया है। इस विवाह का परिणाम क्या होगा ? वह सन्तान 
जिसमें उसकी मां का सारा तेज प्रौर सौन्दर्य संभावित रहेगा ( फतह 
६786 थे वृ्णां& 92०8प/ए ॥60 ) मुझे प्रपने प्धूरे कार्य के 
लिए कोसेगी ( 709 ॥26 ३ #&0 70 ४060 ) भोर वह भागे 
बढ़ कर उस कार्य को पूरा करेगी । (6 8880 79 पते फछा६ 
£#07600 00 90007 ) 


इस कविता के पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि कवि के अन्तर्पठल 
पर सारा चित्र, सारे प्रतीक श्रौर सारा स्वप्त-तन्त्र वर्तमाव था । वास्तव 
. में यह कविता और कुछ नहीं अ्वेतन मन के द्वारा चेतन मन के पास 
प्राण-रक्षा के लिए लिखा गया अत्यन्त श्रावश्यक पत्र ( 5. (0. 5. ) है, 
झौर कहता है कि मूर्ख | सावधान इस लड़की से विवाह कर तुम्हारा जीवन 
कभी भी भुखी नहीं होगा । 


प्रत:, मेरे विवार में किसी कविता या कला-वस्तु पर विचार करते 
समय यही ध्यान में रवना चाहिए कि वह किसी न किसी तरह कवि के 
किसी निजी उ् श्य की सिद्धि कर रही है। यह कोई आवश्यक नहीं छि 


+> ४४ « 


कवि के जिस उद्दे ध्य की सिद्धि कविता द्वारा हो रही है उसी उहूँ श्य 
की सिद्धि पाठक के लिए भी हो । हां, पाठक और कवि दोनों के 
समान उददंश्य की सिद्धि हो यह संभव तो है पर कोई अनिवार्य नहीं । 
पाठक और कवि दोनों में सामानाधिकरण्य हो और वे समान-पधर्मी हों 
यह सदा ही आवश्यक नहीं। यह भी ग्रावश्यक नहीं कि पाठक के किसी 
उद्दश्य फी सिद्धि हो ही | संभव है कि पाठक के लिए वह कविता 
बोधगम्य हो. ही नहीं और हो भी तो उसके ऊपर ही ऊपर हरते हुए 
निकल जाय, उस पर जरा भी प्रभाव ने डाले। पर यह रुूभव नहीं कि 
कवि के लिए वह किसी भांति पअ्रभीष्ट-साधक न हो ! 


कवि के लिए जिस अभीष्ट की सिद्धि कविता करती है उसमें भी 
कोई अलोकिकता या चमत्कार नहीं है। कवधिता कोई अलौकिक व्यापार 
है भी नहीं । हंसना, रोना, क्रोध करना, द्वष करना इत्यादि देनिक 
ध्यापारों की तरह वह भी एक जैविक कार्य है। मान लीजिए कि राज- 
वतिक क्षेत्र में ग्रापका कोई प्रतिद्वन्द्दी है। श्राप हर तरह से उसको पराजित 
करना चाहते हैं। श्राप इसके लिए दो स्तर पर सक्रिय हो सकते हैं, मान- 
सिक ओर शारीरिक । मानसिक स्तर को भी दो भागों में विभाजित किया 
जा सकता है मृदु और उम्र । यदि झ्राप मृुद्ु स्तर पर हैं और श्रापको अपने 
प्रतिदन्दों की याद ग्रा गईं तो आप एक कविता लिखेंगे जो होगी तो किसी 
सेद्धान्तिक विषय पर ही, बातें भी बड़े मर्ज मर्ज में मृदु स्वर में कही 
जायेंगी परन्तु उनमें ऐसा 0787078 होगा, ऐसी ध्वनि ह।गी, जिससे 
स्पष्ट होगा कि उसका संकेत क्या है भौर किस ओर है ? आप कत्ल तो 


कर रहे हैं पर ऐसा न लगेगा कि झ्ाप हाथ में तलवार ले रहे हैं । वद्ठना 
नहीं होगा कि श्राप एक उत्तम ध्वनि काव्य लिख रहे हैं । 


| और “5४ 


यदि श्राय उस स्तर से थोड़ा भर नंचे उतरते हैं जिते हमने उम्र 
कहा है तो आप कादता तो लिखेंगे पर आ्राप दी झोली इतनी तीक्षण हो 
जायेगी कि आप की तलवार म्यान से निकलती दीखने लगेगी। बस श्राप 
शारो रक स्तर पर आा ही रहे हैं। यह गरुणी-भूत व्यंग्य का स्तर है। पहली 
स्थिति में श्राप तुलसी हैं, दूध्नरी स्तियि में लक्कड़तोड़ शैली के प्रयोक्ता 
कबीर प्रथवा कर्मचारी को चिन्ता करने वाले मदन वात्स्यायन | 
प्रब आप शारीरिक स्तर पर शब्राते हैं। जब ग्राप इस स्तर पर उतर पड़े 
हैं और आ्रापके सामने किसी ने आपके प्रतिद्वन्दी का नाम लिया कि आपने 
अपना मु ह फेर लिया और जोर से कहा “प्राक्‌ थू थू”| बस समझ 
लीजिए कि आपकी कविता यही “आक्‌ थु” है। यही आाक थू है जिसने 
कविता के अक्षरों का रूप धारण कर लिया है। श्रन्तर इतना ही है कि 
धआ्राक्‌ थू! से जमीम गन्दी हो जाती है पर कविता ऐसी ही है जिससे 
कागज भी गनन्‍दा नहीं होता । द 


में मनोविज्ञान के प्राचरणवादी सम्प्रदाय को मानने वाला तो नहीं 
हूं पर उनके कुछ शब्दों का सहारा अपने मंतव्य के स्पष्टीकरण के लिए 
प्रवश्य लू गा। उसका कहना है कि आचरण (3678४70प्/) दो तरह 
के होते हैं बाह्य श्रौर आनन्‍्तरिक । वाह्य को तो श्राप देख सकते हैं पर 
आान्तरिक को नहीं। पर वे भी हैं आचरण ही। श्राप विचार करते हैं, या 
सोचते हैं तो उस समय भी श्राप एक तरह वार्तालाप ही करते हैं, वह भी 
एक तरह का श्राचरण ही है। उसी तरह कविता भी आञाक थू ही है । 
भले ही उसकी प्रावाज नहीं सुनाई पड़ती हो श्रौर छीटें न उड़ते हों । 


अ्रमेरिका के एक बड़े आलोचक ने किसी कला वस्तु को तीन हृष्टियों 


सहवया 4 १ ' जलता 


से देखने के लिए कहा है। उनके मतानुसार कसी भी रचना में तीन तत्वों 
का समावेश रहता है। स्वप्न (278977 8]977676), प्रार्थना (7?78587) 
तथा वस्तु स्थितिश्रद्भून (87%) । स्वप्न तत्व से हमारा अभिप्राय 
झचेतन तत्व से है। ऊपर जो श्रग्र जी की कविता उद्धृत की गई है उसमें 
प्रचेतन के द्वारा चेतन की सेवा में लिखे गये [5.,0.5. | ही श्रवेतन या 
स्वप्न तत्व हैं। वही सारी कविता को भनुप्रारित कर रहा है चाहे स्वयं 
कवि को भी मालूम न हो। कवि से हमारा मतलब उस व्यक्ति से है जो 
हाथ में कलम लेकर कागज पर कलैजे को उतारता है। व्यक्ति के उस 
ग्रद्य से नहीं जहां पर सर्वप्रथभ एक विक्षोम, हलचल, या स्पंदन होता 
है । जो ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि सञ्था अज्ञात होता है, ॥रुबा 
कुछ भी मान नहीं होता पर इतना अ्रजश्य है कि वह ज्ञान शब्दातीत है, 
मात्र संवेध है, कहने सुनने लायक नहीं होता । उसका झ्रावि्भाव मनो-मय 
कोष से जरा नीचे गहराई में ही होता है । 


प्रश्न यह है कि इस स्वप्नतत्व का पता कैसे चले और इस बात को 
जांच केसे की जाय फि इस तत्व ने काव्य के स्वरूप को किस तरह प्रभा- 
वित किया है ? यह आप नहीं कह सकते कि उस तत्व का ज्ञान होता ही 
नहीं । ज्ञान तो होता ही है किसी न किसी भांति । यदि ऐसा नहीं होता 
तो ऊपर वाली उद्ध त प्रग्रेजी कविता इतनी प्रिय नहीं होती कि प्रत्येक 
काव्य संग्रह में स्थान पाती । उसका इस तरह ग्रादरशणीय होना ही इस 
बात का प्रमाण है कि वह लोक हृदय को छू रहो है, किसी सपने को 
जया रही है। नहीं तो उस कविता में कोई विशेषता तो है नहीं । उसमें 
जो सपना है वह केवल सपना है किसी चीज का सपना नहीं । इसी लिए 
बह केवल कवि का नहीं सब का है । 


तक $$ ] मान 


इस बात को, विशेषतः झ्राज के वेज्ञानिक युग में, यह ठीक से समझ 
लैना चाहिये कि अनुभूति (यहां सपना) तथा गनुभूति के ज्ञान में महाव्‌ 
प्रव्तर है । एक बार लक्षणा तथा व्यंजना पर विचार करते समय कुछ 
इसी तरह का प्रश्न मम्मठ के सामते उपस्थित हुआ वो उन्होंने यह कर 
समाधाव किया कि--- 


ज्ञानस्य ब्रिषयो ह्ान्यः फलमन्य मुदाह्मतम्‌। 
प्रत्यक्षादे्नीलादिविंषयः फलंतु प्रकटता सर्वितियां 


यहाँ पर मेरी कल्पना के श्रनुसार प्रनुभृति के ज्ञान की अभिव्यक्ति 
प्रत्यक्षादेनीलादि विषय की श्रभिव्यक्ति है और अनुभूति की अभिव्यक्ति 
प्रगटता अथवा संवित्ति की पश्रभिव्यक्ति। कवि का विषयीभूत पदार्थ 
प्रमुभूति या स्वप्न है, किसी चीज की श्रनुभूति या स्वप्न नहीं । यह तो 
बैज्ञानिकों या तथाकथित कवियों की वस्तु है-उन कवियों की जो अपने 
क्षेत्र में विज्ञान को प्राक़्मण करते देख कर उसी की तरह वेशभूषा बना 
लेते हैं )॥रौर इस तरह आ्राक्रमणकारोी का कृपा पात्र बनने को चेष्टा करते 
हैं हालांकि उनके मन में कहीं ने कहीं श्राक्रमणकारी के प्रति आाक़ीश 
के भाव भी रहते है। आ्राज विज्ञान हमारे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर 
छाता जा रहा है। मनुष्य को भी अपने अ्रधिकार में लेने की चेष्टा कर 
रहा है शौर उसे यंत्र बना देना चाहता है ॥ 


१६ वीं शताब्दी से हो विज्ञान का अभियान प्रारम्भ हुमा तब से 
उसके चरण निरन्तर गति से बढ़ते ही जा रहे हैं । ग्राज वह हमारे मन 
भौर मस्तिष्क पर भी भ्रधिकार करने लगा है । भ्रब तक यही समझा जता 
था कि विज्ञान सब कुछ कर सकता है:पर सोच विचार नहीं कर सकता । 


यही मानवता का अन्तिम गढ़ था जहां पर खदेड़ी जाकर वह शरण ले रही 
थी और )886 5७7॥व ले रही थी । पर श्राज वह भी अ्रभेद्य नहीं रह गया 
है। विज्ञान ने ऐसे यत्र भो तेयार विए है ज्ञो सोच सबते हैं, हिसाब 
किताब रख सबते हैं। ऐसी सूरत में मानव कहां जाकर पनाह ले? कविता 
ही उसे आ्राश्यय दे सकती है। पर तब कवि तथा कविता को एक बात 
भान लेती होगी कि उनका काम ज्ञान.दान नहीं, श्रनुभूति-दान है । कवि के 
पास कवि के रूप में ज्ञान वामक एक चुटकी भी चीज नहीं है, सब विज्ञान 
ने ले लिया है । 

कमाई जो बन्दरों की थी मिस्टर ने छीन ली। 

सिलाई की फबन................. मन कम जन लत लि 


डे 
पकछ # 958 क 9 कक $+७890५9800688 60% 96७0३ ७ ७04४5: फिक्स 0 क् बाक ० के फ केक कि ह ४ 2 ॥३ कक ०0 0940 ७+ ११५ सफार लोक का कक कफ की 


पा एक कल्ल बना के हजरते सिंगर ने छीन ली । 

प्रतः विशेषज्ञों के इस युग में भाव सम्पत्ति ही मानवता के लिए बची 
रह गई है । १हले जीवन में जब कभी कोई समस्या उठ खड़ी होती थी तो हम 
तुलसी, सुर या देनीसन या ब्राउनिंग के पास जाते थे। उनसे परामर्श लेते " 
थे । पर प्राज हम विशेषज्ञों के पास जायेंगे। श्रस्तद्व न्द्व उपस्थित होगा तो, 
मानस प्रछ्ुब्ध होगा तो धार्मिक ग्रथों का भ्रवलोकन न कर मनोविश्लेषक 
की तलाश करेंगे। पर जब हमारा हृदय प्रशय-स्वप्न को चइंचलता पर 
सर धुन-धुन कर रोने लगेगा तो नेताश्रों के तके बचन हमें प्र।श्वासन नहीं 
दे सकेगे। उस समय कवि की भावशक्ति की विशेषता ही हमारे काम 
प्रायेगी । भावंशक्ति ही, भावशक्ति का ज्ञान नहीं । 


जहाँ भांवशक्ति रहेगी वहाँ अनुभूति - भा ही जायेगी क्योंकि वह अनु- 
भृति-स्वरूप है। अ्रनुभूति-स्वरूप के स्थाव पर स्वप्न तथा स्वप्त स्वरूप भी 
कह सकते हैं कारणा मनुष्य की अनुभूति स्वप्नों की बदी है, भायुभों की 


सच है रे ह शिकार 


बनी है, उच्छवासों की बनी है । 

. यहाँ पर एक प्रश्न उठेगा । माना कि कविता में कवि के श्रन्ततंत्व, 
स्वप्न-तत्व या आत्मतत्व रहते हैं पर उनके स्वरूप का पता केसे चले ? 
इसके लिए कुछ सूत्र तो बताये जा सकते हैं जिनके सहारे कोई धु धत्ा 
चित्र उभर कर सामने झा सकता है। पर उस चित्र को धूर्णता देना, उसकी 
टूटी कड़ियों को जोंडने के लिए सक-बूक तथा प्रतिभा की आवश्यकता पड़ती 
है। साहित्य क्षेत्र के बाहर जाकर भी आलोक को चिन्यारी मांग कर 
अपनी सहायता करनी पड़ेगी । स्वप्नतन्त्र के जानने वाले जानते हैं कि 
स्वप्न कितने उलूल जलूल, पश्रव्यवस्थित, प्रनर्थक, असंवद्ध तथा बे सिर 
पैर के होते हैं, उनमें कितनी कडियां टूटी होती हैं॥ यदि आपने थोड़ी सी 
बत्पना से काम लिया तो सारा रहरय स्पष्ट धो जाता है । 


श्रापके सामने हमने एक चित्र का ढांचा देखने को दिया । यों तो वह 
चित्र ठीक ही है पर ऐसा लगता है कि कहीं न कहीं कुछ जरा सी चुटि है, 
कोई अभ्रभाव है जिसके कारण वह चित्र जो कुछ हंना था नहीं हो पा रहा 
है। आपने जरा सा एक विदु रख दिया । सारा चित्र मानो खिल 
उठा । ऐसा भी होता है कि मालूम हो कि कहीं एक बिदी अधिक पड़ गईं 
है जिसके कारण चित्र खुल कर सामने नहीं भ्रा पाता । उसे जरा सा पोंछ 
दीजिये। यह लो | चित्र सारे वेभव के साथ जगमगाता आपके सामने 
उपस्थित हो गया । इस संबंध में भवभूति वाली किवदंती बहुत ही प्रसिद्ध 
है। भवभूति ने जब उत्तररामचरित नाटक की रचना की तो कालिदास के 
पास ले गये। वे व्यस्त थे । कहा कि पढ़ कर सुनावो । सुन लेने के पश्चात्‌ 
कहा हि और सब तो ठीक है केवल प्रथम अभ्रक में “किर्माप किर्माप 
मन्दं मन्द्‌” वाले इलोक के अ्रन्तिम चरण में जो “रात्रिरेवं व्यरंसीत” 


_- दर 


पद प्राया है उसमें “रेवं” में जो प्रतुस्वार है उसकी कोई आवश्यकता 
नहीं । उसे हटा दिया जाय। स्वप्न तन्त्र या काब्यतन्त्र के स्वरूप को 
पहचानने में भी इस जोड़ तोड़ वाली पद्धति से काम लेना पड़ता है। 
कालिदास ने तोड़ पद्धति से काम लिया। 


एक जोड पद्धति का भी उद्हरण लोजिए। फ्रायड के द्वारा उल्लिखित 
एक स्वप्न से । स्वप्न यों है । स््रप्त द्रष्टा का चाचा सिगरेट पी रहा है। 
हालांकि उस दिन शनिवार था-एक स्थी स्वप्न-द्रष्टा को लाड प्यार कर 
रही है। इस स््रप्न के सम्बन्ध में श्र पूछताछ करने पर पता चला कि 
उप्तका चाचा बड़ा धर्मात्मा आदमी था | शनिवार को बह सिगरेट पीने 
जैसा पाप कर्म नहीं कर सकता था | इस वक्त स्वप्न में कोई ऐसी बात 
तो नहीं है जो बिलकुल बे सिर पेर की मालूम पड़े । परल्तु प्रश्न तो यह है 
कि चाचा के शनिवार को सिमरेट पीने और स्वप्न द्रष्ठा को किसी स्त्री 
के द्वारा प्यार किये जाने में क्या सम्बन्ध है ? कुछ न कुछ सम्बन्ध तो 
होना ही चाहिए । क्योंकि ये दोनों बातें किसी अन्य बड़ी बात के अ्रम 
रूप में ही है । कुछ न कुछ ऐसी व्यापक बात होनी चाहिए जिसके बीच 
में कर इन दोनों ट्रुऊड़ों को सार्थकता मिल सके । इसके लिए फ्रायड ने कहा 
है कि यदि इन दोनों टुकड़ों के बीच में “यदि” शब्द वाक्य संयोजक के 
रूप में जोड़ दिया जाय तो सारा रहस्य समझ में आजायेगा वह यों होगा । 
“यदि मेरा चाचा, जो इतना धामिक आदमी है, शनिवार को सिगरेट 
पीने लगे तो मुझे भी मेरी माता लाड प्यार कर सकती है” । अत्र यह 
बात पूरी तरह स्पष्ठ हो जाती है। स्त्रप्नों में विचारों के सम्बन्ध लुप्त 
हो जाते हैं, उनको कड़ियां टूट जाती हैं । झ्त: स्वप्नों के निर्वाचन करते 
समय उन्हें फिर से अपने ग्रनुभव और प्रतिभा के बल पर जोड़ना पड़ता है ! 


मेरा उ्द श्य स्वप्नतंत्र को सारी क्रियाग्रों और प्र-क्रपामों का उल्नेख 
करना नहीं है। मैं केवल इतना ही कहना चाहता हूँ कि कवित्ता में भी 
प्रेरित करने वाली आन्तरिक प्रेरणा की कड़ियों में कहीं कहीं टूट श्रा जाती 
है । मैं स्वप्न को और कविता को एक नहीं मानता, परन्तु ये दोनों कुछ 
दूर तक साथ साथ चल जरूर सकते हैं श्र जहां तक साथ साथ चल 
सकते है वहां तक हमें स्वप्नतंत्र के द्वारा कविता तंत्र के समभने में थोड़ी 
सहायता ले लेनी चाहिए । जिस तरह स्वप्न के निर्वाचन में हम अपनी और 
से कुछ मिलाकर, कुछ घटाकर उसकी सार्थकता को पकड़ते हैँ उसी तरह 
कविता में कवि की मूल प्रेरशात्रों की समझ सकने में इस तरह के 
जोड़ तोड़ से सहायता मिल सकती है । 


आ्राप किसो कवि की सारी रचनाओ्रों को पढ़े या यदि बहुत ही रच- 
नाए' उपलल्ध न हों तो एक ही रचना को लीजिए ! श्राप देखेंगे कि 
उसमें किसी विशेष शब्द का, किसी विशेष उपमा का, किसी विशेष उतक्ति 
का किसी विशेष ढंग से प्रयोग हो रहा है। एक ही कल्पना बार बार 
भ्रातो है। इन सब बातों को देख कर श्राप किसी न किस! निर्णाय पर पहुंच 
सकते है। और यदि उस निर्णय का समर्थन कवि की जीवनी से या कवि 
के सम्बन्ध में लिखे गये अन्य लोगों के कथन से अ्रथवा कवि के आत्मोल्लेख 
से मिल जाता है तो फिर आपको किसी निर्णय पर पहुंचने में बाधा ही 
किस बात की रह गई ? श्रग्न॒जी साहित्य में इस तरह से बहुत से 
कवियों का ग्रध्ययन प्रस्तुत किया गया है | कालरिज के काव्य का 
विजेषतः &706760 [97767 नामक कविता का अध्ययन विस्तार 


पूर्वक इस ढंग से किया गया है और प्रालोचक इस निर्णय पर पहुंचे हैं 
कि कालेरिज की सारी कविताग्रों की मूल प्रेरणा दो बातों में निहित है 


(१) अफीम सेवन को उसकी की बुरी लत 

(२) उसके, 'अपनो पत्नी से कट्ठु सम्बन्ध । 

इस तरह का अध्ययन अग्नेजी साहित्य में ही हो सो बात नहीं । 
संस्कृत साहित्य में भी मीमांसकों के सामने जब किसी ग्रन्थ के तात्पर्य 
निर्णय का प्रश्न उउस्थित हुप्ना तो उन्होंने यही कहा । 

उपक्रमोपसंहारों अभ्यासों पूषेता फलम्‌ 
अथेवादोपपत्तीच लिंग तात्पयें निणणेये 

श्र्थात्‌ किसी ग्रन्थ के प्रारम्भ अन्त, पुनर्रवृत्ति, खण्डन-मण्डन, फल 
इत्यादि को देख कर ग्रन्थ के तात्यर्य निर्णय में सहायता ली जा सकती 
है। आज की जो निवरचन पद्धति £, चाहे वह स्वप्न सम्बन्धी हो या 
साहित्य सम्बन्धी, उसके भी सूत्र इस इलोक में खोजे जा सकते हैं । 

इतना ही नहों, किसी कवि वी काव्य-शेली, उसकी बाहरी रूपरेखा, 
उसकी व्यवस्था-अव्यवस्था, संतुलन-असंतुलन के द्वारा भी उसके सपनों का 
प्राभास पाया जा सकता है। यह जाना जा सकता है कि उसके [किसी के | 
व्यक्तित्व का निर्माण किन वस्तुग्रों से हुआ है श्लौर उसकी आन्‍्तरिक प्रेरणा 
क्या है ? उदाहरण के लिए पोप की कविताश्रों में एक विचित्र संतुलन है, 
सारे तुक बड़े कुशलता पूर्वक मिलते दिखलाई पड़ रहे हैं, शब्दों के प्रयोग 
में देनिक व्यवहार के शब्द हो श्राये हैं, मानों तराश पर चढ़ाये हुए हों । 
कविता कटी छटी चुस्त दुरुस्त है। हिन्दी में द्विवेदी युग की कविता तथा 
प्रेमचन्द के उपन्यासों में भी यही बात देखी जा सकती है| वया यही बात 
इस बात का प्रमाण नहीं है कि हो न हो ये कवि गण वहों न कहों उस 
समय के पनपते हुए अ्रभिजात वर्ग की बाहरी तहजीब, एटिकेट तथा 
व्यावहारिक शिष्टाचार की सफाई से प्रभावित थे और मन ही मन उसो 
वर्ग के सदस्य होने के सपने देख रहे थे । 


“ दि डऔ «० 


कता हो । जिस देवता से हम प्रार्थना कर रहे हैं वह हमारी प्रार्थना के 
स्वरूप को ठीक से समझा सके । कहीं 'उलटे बुभल्ह राम” वाली लोकोक्ति 
चरितार्थ न होने लगे। किसी ने भगवान से प्रार्थना की कि उसके शत्रु 
का बैल मर जाये । पर उसका ही बल मर गया। राम कहीं उलटा ही न 
समभ लें इसलिए प्रार्थना में स्पष्ट प्रेषणीयता लानी पड़ती है, वाणी में 
दर्द लाना पड़ता है, मुद्रा में दीनता लानी पड़ती है। कविता के शब्द ऐसे 
होते हैं कि मानस-पटल पर तस्वीर उतर श्राती है, कलेजे में तीर चुभ 
जाता है । 

हम एक ऐसे युग से ग्रुज॒र चुके हैं जिसमें कविता के इस प्रार्थना 
परक श्र्थात्‌ पुरश्रस्सर, प्रभावोत्पादक रूप के प्रति उदासी नता सी बरती 
जाती है। १६वीं शताब्दी में विज्ञान ने कविता को बदनाम करने के 
लिए कितने ही लांछुन लगाये | उनमे से एक यह भी था कि कविता 
पधनेतिक 7777079)] होती है। जो लोग विज्ञान से झ्रांतकित थे पर 
साथ ही कविता का साथ भी देना चाहते थे उनके द्वारा बहुत ही क्षमा- 
परक रूप में कहा गया कि कविता 7777079) तो नहीं होती पर हां, 
8-70079)! अथवा (777079! हो तो हो। वह नेतिकता के प्रश्न के 
प्रति उदासीन होती है | सम्भव है कि उस समय इस तक से कविता की 
प्राण-रक्षा में सहायता मिली हो पर इसने साथ ही कविता को प्राणहीन 
भी बना दिया । कविता सफेद पड़ गई, पीली पड़ गई, उसमें लाल रक्त 
की गरमाई न रह गईं जो गालों पर चमकता हे, वह (0]0 हो गई । 
यही ॥', 5. #॥0० का युग है झौर हिन्दी में तार के प्रथम दो सप्तकों 
का युग । इ क्‍ 

कारण कविता चाहे जो हो उदासीन नहीं रह सकती। ऊपर ही 


ऊपर सहला कर नहीं रह जा सकती $ वह तो नुकीली छुरी की तरह कलेजे 
को चीर देगी । यदि ऐसा नहीं करती तो वह है काहे के लिए ? प्रभावो- 
त्पादकता को छोड़ कर वह एक क्षण के लिए टिक नहीं सकती । उसे 
किसी का पक्ष लेना ही होगा । यदि ऐसा नहीं करती सो वह कविता 
नहीं, साहित्य नहीं । 


फ्लावेयर का “मादाम बौवेरी” नामक उपन्यास जब सर्वप्रथम 
प्रकाशित हुआ तो मानों समाज में भूकम्प श्रा गया । कहा गया कि यह 
पुस्तक व्यक्तियों को सदाचार-अ्रष्ट बना कर समाज को नाश के गत॑ में 
ढकेलने वाली है। लेखक पर मुकदमा चलाया गया। विरोधी पक्ष की 
ओर से पैरवी करने वाले वकील ने बड़े भावपूर्ण ढंग से, सब वाक्यों पर 
उचित ढंग से जोर देते हुए पुस्तक के एक अश को वन्यायाधोश के सामसे 
फढ़्कर सुनाया 4 प्रसंग वह था जहाँ नायिका अपने प्रेमी के सामने 
निरावरण हो रही है । वहाँ के वर्णाव की शैली में एक ऐसा प्रवाह और 
ऐसी गतिमयता है जिसके द्वारा चीरहरण की क्रिया तथा अपने प्रेमी से 
मिलने के त्वरावेग की श्रदश्यता समूत्ते हो उठी है। इस प्रसंग को सर- 
कारी वकील ने जितने अ्रच्छे ढंग से पढ़ा उतना ही लेखक के विरुद्ध 
मुकदमा साबित होता गया क्योंकि अच्छे ढंग से पारायण करने के साथ 
ही उसके प्रभाव में श्रभिवृद्धि होती गई | 


परन्तु लेखक के पक्ष के वकील ने उसी भूमि पर खड़े होकर उसका उत्तर 
दिया । उसने उसी श्रश॒ को लिया श्रौर उसे अपने ढंग से पढ़कर सुन्ताया । 
चह पढ़ता था और बीच-बीच में रिमार्क भी करता जाता था। इस तरह 
उसकी प्रभावोत्पादकता छिन्न भिन्न हो गई। वह साहित्यिक उदाहरण के 
रूप में नष्ट भ्रष्ट हो गयी, जितना ही उसमें से प्रभाव का छास होता 


पलक ढ़ छू न+ 


गया उतना हो फ्लावर का पक्ष मजबूत होता गया। मेरे कहने का भश्र्थ 
यह है कि काव्य में प्रभावोत्पादकता, संप्रं बशीयता का रहता आवश्यक 
है| पर इस संप्रेषणीयता में भी एक ऐसी चीज हो सकती है जो बड़े ही 
सूक्ष्म ढंग से अचेतन मौलिक प्रेरणाओ्ं की कलक दिखला रही हो । 


एक क्षण के लिए श्राप भिन्‍न-भिन्‍न कवियों के भाव प्रकाशन के 
ढंग पर विचार कीजिये | जाने दीजिये भिन्‍त-भिन्‍न कवियों को | आाधु- 
निक काब्य पर ही विचार कीजिये | इन कविताओं के पढ़ने से आपको 
क्या यह पता नहीं चलता कि ये चाक्षुष हैं, कार्य नहीं । ये आ्रांख से पढ़ने 
के लिए लिखी गई है, कान से सुनने के लिए नहीं | प्रायः होता यह है 
कि जब हम पढ़ते हैं तो कान से सुनते भी चलते है । पर इन कविताश्रों 
की अ्रपोल आझ्रांखों तक ही है, केवल ग्ांलीं से ही पढ़ कर इनका श्रानन्द 
लिया जा सकता है । श्रापको कानों को म्‌ द लेना होगा। यदि श्राप कान 
खोल कर इनको पढ़ते हे तो आपको हृदय के धड़कने की बिसारी हो 
सकती है । श्राज जो लोग नई कविता की शेली पर भर भलाते है उनको 
हृदय धड़कने की बीमारी हो जाती है क्योंकि उन्होंने श्रभी तक श्रपने 
कानों को श्रलग रख छोड़ने की कला नहीं सीखी है । उनकी हालत उस 
दुर्योधन की तरह है जो भ्रमवश स्थल पर जल देख लेता है श्रौर पार 
करने के लिए अपने कपड़े संभालने लगता है तो द्वोपदी हंस पड़ती 
है । श्राज कषिता की शैली उन व्यक्तियों की शेली है जिनके कार्य 
श्रशरीरी हो चुके हैं श्रथातु जिनका जीवन निर्वाह शारीरिक परिश्रम 
पर नहीं होता, जो बेठ कर काम ज्यादा करते है, 5646787५ए 
0000]28807 के व्यक्ति हैं, जिनकी अभिव्यक्ति शारीरिक कार्यों का रूप 
नहीं प्रहरा करती जिस तरह पुराने प्रादिम काल में पत्थर काटते हुए 


खम्क द््‌ हद चकन 


नौग्नो के मुख से कविता फट पड़ती थी। कहने का श्रर्थ यह है कि साहित्यिक 
प्रभिव्यक्ति के ब/ह्य रूप में भी कबि का व्यक्तित्व काम करता रहता है । 


काव्य का तीसरा स्तर (४०9४#78९ का है, वस्तु स्थिति श्रांकलन 
का है | कविता ही नहीं जहाँ भी भाषण है, शब्दों का व्यवहार है, वहाँ 
बस्तु के स्वायत्त करने की भावना है। भाषा वैज्ञानिकों को कल्पना है, 
कि भाषा को उतत्ति में स्वेतर वस्तुओं पर अधिकार करने को भावना 
मल रूप से काम करती होगी। भ्रर्थात्‌ लोगों के श्रन्दर यह विश्वास काम 
करता होगा कि किसी वस्तु के नामकरण कर देने से उसे किसी संज्ञा में 
बांध देने से, उस पर अधिकार करना सहज हो जाता है ॥ ऐसी दंतकथाओओं 
की कमी नहीं जिनमें यह बताया गया है कि कवि ने श्राकाश बाँच दिया, 
पाताल बाँध दिया, वायु को गति रोक दी ॥ कविता के द्वारा मेंह वर्षा 
दिये | इसमें केवल श्रावश्यकता इस बात की थी कि प्रभिवांछित वस्तु 


को उसके ठीक-ठोक नाम से पुकारा जाए। यदि ज्ञिस नाम का वह पात्र 
है उस ताम से आपने पुकारा तो उसे श्रपने वश्ष में कर लेना कोई कठिन 


बात नहीं है ॥ प्रकारान्तर से यहाँ इस बात की भी आवश्यकता पड़ती थी 
कि जिस व्यक्ति, वस्तु या व्यक्ति को नाम लेकर पुकारना है उसका चित्र 
भी श्रापके मानस पटल पर स्पष्ट रूप से श्र कित हो । यदि ऐसा नहीं है । 
तो श्राप ठीक नाम नहीं दे सकेंगे श्रौर तब श्रापकी बातों में अ्रसर नहीं होगा। 
प्र्थात्‌ उस्त परिस्थिति का श्राप ठीक से (४8709 नहीं कर भ्केंगे | 


वास्तव में देखा जाए तो अपनी सारी जठिलतांमभों के बावजूद और 
प्रालोचकों के द्वारा अपने समर्थव में जो तक दिये गये है उनके 
बावजूद भी प्राधुनिक कविता का मुख्य ध्येय. यही है । आज की 
कविता भावों था विचारों की नहीं है, शब्दों की है और धाव्द भी ऐजेे 


आक प्‌ है «७ 


जिन्हें 00६ [प४ कहां गया. है, जिनके स्थान पर दुसरे शब्दों को नहीं 
रखा जा सकता है । कविता अ्रभिव्यक्ति की समस्या से उलर रहीं है तो 
श्राज की कविता में दुरूहता तथा अबोधगम्यता का दोषारोधण किया 
जाता है। वास्तव में श्राज की कविता कठिन है श्रौर जल्दी समझ में नहीं 
आती । इसका कारण यह नहीं कि कवि अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक 
नहीं है। बल्कि वह श्रति जागरूक है श्लौर अपने वक्तव्य को पूरी सच्चाई 
के साथ अ्रभिव्यक्त करना चाहता है। इसीलिए वह कठिन-सी प्रतीत 
होती है । जहाँ तक कविता के ध्येय का प्रइन है इसमें कोई मतभेद नहीं 
है । कवि भला क्‍यों चाहने लगा कि उसकी कविता अस्पष्ट 
हो । उसका एक-एक कामा या सेमिकोलन अथवा उसका काव्य शिल्प का 
भूगोल अ्रथवा शब्दों की तोड़ मरोड़ सब में कुछ न कुछ सार्थकता है शौर 
वे श्रपने श्रन्दर बहुत बड़े दाह को लेकर उमड़ रहे हैं। पहले के कवियों के 
काव्य में से यदि बहुत कुछ शब्दों को निकाल दिया जाय था इन्हें इधर 
उधर बेठा दिया जाए तो भो कोई हानि होंने वाली नहीं थी। पर श्राज 
की कविता' इस तरह के हस्तक्षेप को गवारा नहीं कर सकती श्र्थात्‌ 
आ्राज की कविता या साहित्य पहले की ही तरह किसी परिस्थिति विशेष 
(87079 करने में व्यस्त है। 


477088&80 सम्प्रदाय के कवियों ने जो काव्य सम्बन्धी कुछ नियम 
. प्रपनाये थे उनका भो उद्देश्य यही था | उनके कुछ सूत्र ये थे । 


[१] वस्तु का साक्षात्‌ चित्रण € 7)76060 $798/॥77676 0 
॥१6 0778 ) । 


[२] किसी ऐसे शब्द का सर्वया परित्याग जिससे वस्तु के चित्रण में 


, आत॥ 0 कक त 


किसी तरह की सहायता न मिले, । (/'0 एघ88 &080|प689 
70 ए076 ४9% तांतव 3० 6070009प68 60 ॥88 


0788877096707 ). 


[३] रचता का निर्माण संगीत की गति पर हो, वण्टा ध्वनि के श्रनु- 
सार नहीं | (70 6070088 9 5060707086 0 फ्रापशं- 
88) .0979888, 70 79 88606708 0६ 7786॥700076.) 


[४] कोई व्यर्थ शब्द और कोई विशेषण जो किसी चीज को प्रकाश 
में नहों लाता है उसका व्यवहार न किया जाये तथा अमूर्तता 


से डरा जाये । 


इन सब बातों से क्‍या पता चलता है ? यही कि कविता वस्तु को 
पकड़ कर इतना आत्मसातु कर लेना चाहती है कि उस पर उसका अ्धि- 
कार हो जाये। भर्थात्‌ कविता एक तरफ से उस मार्ग की ओर श्रग्नसर 
हो रही है जिस पर चल कर मंत्रों के अधिनायकवाद तक पहुंचा जा 
सकता है | हां, यह स्वीकार किया जा सकता है कि यह राह खतरे से 
खाली नहीं है। पर प्रश्व यह उठता हैं कि कौन सी राह निरापद है । 
खतरे से बचने का काम हमें मानवता की सहज बुद्धि पर ही छोड़ देना 
चाहिए । भनुष्य में सहज बुद्धि होती हैं जो उसे बतला देतो है कि बस 
धोर भ्रागे नहीं । श्रव थोड़ा मुड़कर देखता होगा । 


तिस पर भी हिन्दी काव्य पर तो इस तरह का दोबारोगगा किया ही 
नहीं जा सकता। हिन्दी के साहित्यकारों की प्रज्ञा प्रारूप से जागरित 
है श्र उन्होंने किसी भी श्रांधी या तूफान में श्र गद के चरण की तरह श्रपने 
को स्थिर रखा है। उन्होंने कभी भी श्रपने को उन अ्रतिबादिताग्रो का 


न हरे »- 


स्य 


शिकार होने नहीं दिया है जिसके फेर में पड़ कर पाश्वात्य कंवियों ने 
कविता को (!४088 ५००३ शिाह॒द्र& बना दिया है। तार सनन्‍्तक के 
तीनों भागों को देखें ओर इधर के १४-२० वर्षो के आधुनिक हिन्दी 
काव्य की दिशा को, उन्हें सूचक मान लें तो स्पष्ट है कि अब आधुनिक 
हिन्दी काव्य में भी स्थिरता भथ्रा रही हैं। वफाई थ्रा रही है । इनके सम« 
भने में इतनी कठिनाई नहीं होती । प्रथम तार सष्तक की कवितायें जरूर 
कुछ श्रजीब सी, कठिन सी और दुरूह सी लग रही थीं पर इनमें भी 
हिन्दी कवियों ने एक स्तर का निबाह किया था जिसके नीचे वे नहों 
श्राये । तीसरे प्तक की कविता तो अरब ऐसी मालूम पड़ती है जैसे पहले 
का ग्रान्दोलित जल श्रब स्थिर हो गया हो, साफ हो मया हो और मल 
सीचे जम क्र बैठ गया हो ! 


खेर, ऊपर जो काव्य में तीन तत्वों कै हु ढने की जो बात कही गई 
है उन में सबसे प्रधान तत्व स्व्रप्नत्व की ही है श्र्थात्‌ कवि के झ्रान्तरिक 
व्यक्तित्व की । श्र्थात्‌ उसके व्यक्तित्व का वह घ्तर जहाँ पर एक अविज्ञात 
शैब्दातीत, पकड़ और सम में नहीं श्राने वाल। परन्तु बाहर श्राने के 
लिए बेताब रहने वाला सल्का सा कम्पन होता है उसी को हमें काव्य में 
देखनें की चेष्टा करनी चाहिए । वह तो किसी न किसी तरह भलक देता 
ही है, प्रगटित होता ही है । केवल देखने के लिए आंख चाहिए। यदि 
इन आंखों की साधना की जाए तो कविता में उस तत्व का दीदार हों 
जाना कठिन नहीं है । झाज जो कविता में एक भाव-भंगी का टेढ़ापन 
है, वक्ता है, उपप्लब है, क्या उस से कवि की आन्तरिक अनुभूतियों की 
अभिव्यक्ति नहीं होती । क्या किसी हरस्यमय ढंग से वह कवि भिरावरणा 
रुप में आपके सामने नहीं श्रा जाता । 


** ४४ 


पाहित्य 
नहीं 
साहित्यकार 


नरम ४० की ५५०४० न अनपाभशन+++5५३११९५४७+ पाप ८9म ५५ रन +५++४५:९०७५१५७॥७ ७५ कक.3+५+५++4 न पन++ ७ न न + ५ अाजमसननकप 3 3334 ५»५»५५५-3333५>»>.3++>कननमरन++ 3 आकी3५५५५»«५७७५५७.-.५०+»कन«ननन-नन नमन ०० न ५५७००.॥२००६००० 





सहन 5कपमपय० इक सन++ ०" मक-०२५५० २० हक जन नमन कस >त++++ कप! ५+कसकाप उन फल “न - चैन .+०५०५७५ ०६ 


साहित्य के मूल्यांकत की समस्या सदा जटिल रही है। साधारण! 
पाठक जब श्रालोचना की अन्योन्यस्फालभिन्नद्विपरुधिरवसामांस- 
मस्तिष्कपंक रणात्तेत्र में उपरिकृतपदन्‍्यासविक्रान्त सेना पतियों को 
स्फीतासकपानगोष्टी रसदशिवशिवातूयेनृत्कबन्धों को देखता है भौर 
देखता है कि कहीं प्लेटो की काया क्षत विक्षत पड़ी कराह रही है, कहीं 
श्ररस्तू तथा लांगिनस निशस्त्र हो कर अ्रपनी भ्र तिम' सांस ले रहे हैं, पोप, 
ड्राइडन तथा जानसन' को पकड़ कर हथकड़ी' डाली जा रही है, श्रार्नल्ड पर 
मुश्कें कसी जा रही हैं, मम्मट, विश्वनाथ, तथा पंडितराज' जगन्नाथ 
पष्टामुष्टि तथा केशाकेशि गदाघात में प्रवृत्त हैं तो उसका रहा संहा धर्य 
भी जाता रहता है। मम्मट के काव्य विषयक लक्षण कौ विश्वनाथ से 
किस सूक्ष्मता के साथ खण्ड-खणंड कर दिया है, महोपाध्याय खुरफहम' 
सिद्धि चद्धगरि' ने तो 'काव्य प्रकाश खण्डंतः की रचना कर मम्मट 
की धज्जी-धज्जी ही उड़ा दीं है। जगन्नाथ की रमणीयता ने तो विश्वनाथ 
के रसात्मक वाक्य को मुह दिखलाने लायक भी नहीं रहने दिया है । 


पाठक इस चक्रव्यूह में पड़ कर हताश हो जाता है । क्‍यों हो जाता है ? 
उसके हताश होने का क्या कारण है ? क्‍या उसे हताश होना चाहिए ? 
नहीं, यदि वह हताश होता है तो इसका कारण यह है कि पाठक, पाठक 
के रूप में, श्रपने उत्तरदायित्व को महसूस नहीं करता । किसी भी काव्य 
प्रक्रिया में तीन पक्ष होते हैं। कवि, काव्य और पाठक । इसी त्रिपुटी को 
लेकर काव्य की प्रक्रिया पूर्णाता को प्राप्त करती हैं । कवि काव्य की 
रचना भले ही करे पर उसकी निर्मिति का साफल्य पाठक के ग्रहराशील 
तथा संवेदनशील हृदय में ही होता है। पाठक तटस्थ तथा निष्क्रय 
द्रष्टामात्र नहीं होता । उसे सक्रिय रहना चाहिए । उसे अपनी शोर से 


(० किक 


भी देने के लिए तैयार रहना चाहिए । वह उतना ही पा सकेगा जितना 


#०५, 


बह देगा । 


यहाँ हम आलोचना शअ्रथवा आ्रालोचनात्मक विचारों को भी काव्य 
मान लेते हैं। भ्राखिर आलोचना भी विधायक नि्मिति ही है, इसमें भी व्यक्ति 
का व्यक्तित्व रहता ही है। अतः, इसे काव्य का स्थानापन्न मान लेने में 
कोई हानि नहीं । क्योंकि आलोचना लिखते समय मानस की शब्रवस्था 
बही होती है जो काव्य का निर्माण करते समय कवि की । जब तक आालो- 
चक भ्रालोच्य रचना या वस्तु से प्रभावित नहीं होता, स्फू्त नहीं होता 
उप्रका बिम्ब ग्रहण नहीं करता तब तक उसकी आलोचना में प्राणवत्ता 
नहीं आ सकती । अ्रतः आलोचना हो, कहानी हो श्रथवा काव्य हो हमें 
देखना यही चाहिए कि इसके पीछे काम करने वाला मस्तिष्क कितना 
महान है ? हम उसके मत से सहमत भले ही न हो, जिस सत या सिद्धांत 
का उल्लेख किया गया है, वह हमारी मान्यताओ्रों से बिलकुल विपरीत 
हो फिर भी जिस सश्क्त तथा कुशल ढंग से हमारा विरोध किया 


स्ान 2 कु कस इस 


जा रहा है, जिस सृक्ष्मता से हमारी विचार-सेवा-पंक्ति को तोड़ने की 
चेष्टा की जाती है उसके हम प्रशंसक हो सकते हैं श्र होते हैं । 


कहा जाता है कि कुरुक्षेत्र के मैदान में जब कर्ण और अज्ु न के बीच 
तुमुल संग्राम छिड़ा तो दोनों श्रोर से बाणों की वर्षा होने लगी। अजु न 
जब बाण मारते थे तो कर्ण का रथ एक योजन पीछे हट जाता था श्र 
कर्या के बाण मारने पर अ्रज्ञुत॒ का रथ तीन पग पीछे हट जाता था। 
कृष्ण अ्रजु न के रथ का सारथित्व कर रहे थे। श्रर्थात्‌ू उतकी प्री सहातु- 
भूति श्रत्जुन के साथ थी और महाभारत युद्ध में वे पाण्डव पक्ष की ही 
विजय चाहते थे । पर कर्र के बाणबात से जब श्रद्धुन का रथ तीन पग 
पीछे हट जाता था तो वे कर्ण को साधुवाद देने लगते थे । शाबास कर्णा 
धन्य हो | पर शभ्रज्भुत के बाण जब कर्या के रथ को योजनों पीछे ढकेल 
देते थे तो वे मौन ही रहते थे। श्रज्भुन॒ के लिए उनके मुख से प्रशंसा का 
एक दब्द भी नहीं निकलता था । श्रज्भुन को यह बहुत ही बुरा लगा 
औ्रौर कृष्ण से इस पक्ष विरोधी'कार्य के लिए उन्होंने जवाब तलब किया | 
कृष्ण ने कहा, “देखो तो सही, तुम्हारे रथ पर में सारे ब्रह्माण्ड का भार 
लिये बेठा हूं, तुम्हारी पताका में हनुमान जी हैं जो अपने रोम रोम में 
पर्वत बांधकर जमे हुए हैं तिस पर भी कर्णा तुम्हारे रथ को तीन डग पीछे 
बसका देता है। तब उसको प्रशंसा क्‍यों न करू ? कर्णा के रथ में तो 
कुछ भी नहीं | यहां तक कि उसने कवच को भी उत्तार कर दान कर दिया 
है ।” कृष्ण विरोधी पक्ष के थे, कर्ण की विजय हो ऐसी कल्पना भी 
नहीं कर सकते थे । पर उनमें सच्ची परख थी, वे उचित मुल्यांकन करना 
जानते थे। वे सच्चे श्रालोचक थे | किसी वस्तु का सच्चा मूल्यांकन करना 
ग्रालोचना और झ्रालोचक की पहली शर्त है । 


प्रापके सामने श्रालोच॑नता के लिए दी पुस्तक उपस्थित हैं। एक पुस्तक 
ऐसी है जिस में की प्रत्येक बात से झाप सहमत हैं । दूसरी पुस्तक में 
चशणशित प्रत्येक बात के आप विरोधी हैं श्रौर उसके विरुद्ध मरते दम तक 
एक-एक सांस से लड़ने के लिए तेयार हैं। पर मुझे कल्पना कर लेने में 
कोई कठिनाई नहीं है कि श्राप एक पुस्तक को पढ़ कर लिखते हैं, “इस 
पुस्तक में जो बातें लिखी गई हैं, एक दम तथ्यहीन हैं, श्रनर्गल प्रलाप हैं, 
उपेक्षणीय हैं । पर इतना होते हुए भी इसमें कुछ ग्रण ऐसे हैं जिनके 
कारण सदियों बाद तक यह पुस्तक लोगों के कपष्ठ की हार बनी रहेगी । 
लोग इसे बड़े चाव से पढेंगे श्रौर इसके उद्धरण देते रहेंगे | श्राप तुलसी 
के शब्दों में यह कहेंगे :- 


“यद्यपि कबित गुण एको नाही, 
रास प्रताप प्रगद यही मांही ।” 


इसरी पुस्तक की श्रालोचना करते समय श्राप कह सकते हैं “इस 
पुस्तक की एक-एक पंक्ति से मैं सहमत हूं। लेखक मे बहुत सारगर्भित 
बातें कही हैँ, और मुझ से जहाँ तक हो सकेगा मैं इन विचारों के प्रचार 
में सहायता दूगा। पर यह भी कहे बिना नहीं रह सकता कि आ्राज से 
कुछ ही वर्ष बाद इस पुस्तक को पढ़ने वाला शायद ही कोई मिले” मैं 
कहूंगा श्राप सच्चे आलोचक हैं श्रौर श्रालोचना के मर्म को पहिचानते हैं । 


मैं ऐसा क्यों कहुँगा ? इसलिए कहुंगा कि आप पुस्तक की शोर ने 
देख कर पुस्तक-रचना को प्रेरणा देने वाली मौलिक प्रतिभा को देख रहे 
है, आप मस्तिष्क और हृदय की उस महानता श्रौर विशाज्ञता की भांकी 
ले रहे है-जो पंक्ति-पंक्ति में इस तरह रमा रहता है जिस तरह पत्ती पत्ती 


में वृक्ष का जीवन-रस सिंचित रहता है। आप वेदना श्रौर तड़प की ओर 
कम देखते हैं| श्राप देखते है कि तड़पने वाला कलेजा कैसा है-सवा हाथ 
का है या नहीं । कांट, हीगेल, शंकराचार्य के विचारों से हम भले ही 
सहमत न हों, और उनकी विचार-धारा की हम धज्जी-धज्जी उड़ा कर 
रख दें पर उनकी पुस्तकों के प्रणयन में प्रौढ़ मस्तिष्क की जो सतर्कता, 
जागरुकता तथा सुूक्ष्मता काम कर रही है उसका जादू सदा ही सर पर 
चढ़ कर बोलता रहेगा। 


ग्रतः हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि साहित्य से भ्रधिक महत्व- 
पूर्ण साहित्य का प्रणेता होता है। हम लेख में लेखक के मस्तिष्क की 
महानता को देखना चाहते हैं। हम देखना चाहते है कि साहित्य को 
प्रेरित करने वाला मस्तिष्क कैसा है, उसका विवेक केसा है, हम यह 
नहीं देखते कि वह किस पक्ष का समर्थन करता है परन्तु यह देखते 
हैं कि जिस पक्ष का वह समर्थन करता है उसमें वह कितनी सुक्ष्मता-ग्राह 
कता का परिचय देता है। हम उसके सिद्धांतपक्ष को नहीं देखते, उपलब्धि 
को नहीं देखते, साध्य को नहीं देखते, पर देखते यह हैं कि सिद्धांत के प्रति- 
वबादन के लिए मस्तिष्क को कितनी श्रगिति परीक्षाशत्रों से होकर गुजरना पड़ा 
है, कितना त्याग श्रौर बलिदान करना पड़ा है। श्राज हम वेज्ञानिक युग में 
निवास कर रहे हैं। वेदों की प्रपौरूषेयता तथा याज्ञिक श्रनुष्ठानों की अदम्य 
उपादेयता, वेदिक विधि निषेध की अनिवार्यता पर शायद ही विश्वास 
करें। पर जब मीमांसा अपने अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित हो कर वेदों की 
रक्षा में उपस्थित होती है तो हमें दांतों तले श्र गुली दबानी ही पड़ती है । 


मैं अपने मंतव्य के समर्थन के लिए, अथवा स्पष्टीकरण के लिए 
कहिये, श्र ग्रं जी साहित्य के दो व्यक्तियों का उदाहरण लूगा। हैजलिट 


का और बर्क का । ये दोनों दो विरोधी पक्षों के सक्रिय सदस्य थे । विलियम 
हैजलिट अपने विचारों के बड़े कट्टर थे और राजनेतिक क्षेत्र में तो उन्हें 
समझौता करना आता ही नहीं था। फ्रांस की राज्यक्रान्ति का उनके जेसा उम्र 
भशौर हृढ़ समर्थक तो शायद ही कोई हो । एडमंड बर्क ने 
ठीक इसके विपरीत, फ्रांस की राज्यक्रान्ति की भिन्‍दा करने में उसके. 
भयानक चित्र खींचने में अ्रपन्ती वाग्सिता की सारी शक्ति लगा दी थी । ये 
दोनों एक दूसरे के कट्टर शत्रु थे । पर जब. वर्क के मुल्यांकन का समय 
ग्राया तब हैजलिद ने कहा * तांधं 79 697७8 07 98 8007+76. 
3 छ88 8780, 8700 छा09 कत, [0700 88क्षाग7# 087 607- 
छ807 #णक 80786 98 कप907, 80वें फतह ए0ारशां- 
08780 88 70 8 ए8/ए 5>8७घ॥३०४ 99708%7 0] 608 00]00- 
808 868 ४४080 4 00009 70980660%6 0 #08790 
09707908007 ज्ञ98 008 0909-98 77988॥87ए 08690 
9 कया ॥छक07, 00087, 4 6070008ए8व ४00 
660 ग9 शांए। 098 फ्रणाहु 7 शांड शाक्षांर) 872प7१97, 
0प गा 48॥9४8% 67 किपओी व क्राएएए8 | 8 ७88 
(00[05:07 श्रर्थात्‌ भें उसके विचारों की परवाह नहीं करता। मैं 
उनकी संक्रामकता के लिए आज, भी उसी तरह अभेथ हु, जेसा पहले 
था। पर लेखक के लिए मेरे हृदय में श्रादर के भाव हैं। लोग मुझे 
विरोधी दल का हृढ़ समर्थक भी नहीं मानते थे । हालांकि मैं मन ही प्रन्‌ 
यह सोचता था कि ग्रादर्श सिद्धान्त प्रतिपादन एक चीज है और सशक्त 
तथा सजीव अलंकृत श्रण्िव्यक्ति दूसरी । मैं यह भी समझता था कि 
उसका श्रधानत विचार अमपूर्ण हो सकता था फिर भी एक प्रम-पूर्रा 
निष्कर्ष पर पहुंचने की राह में वह सैकडों सत्य दे सकता है । 


न चिट लि 


मैं सदा से इस विचार का समर्थक रहा हू कि साहित्य जैसी वस्तु 
पर भाद से दो चार फामूलों के श्राधार परे कोई फतवा दे देना ठीक नहीं । 
चाहे वह प्लेटो का फामू ला हो, अरस्तू का हो, मास का हो, मम्मट 
का हो या कुन्तक का । साहित्य बहुत ही जटिल वस्तु है। बह तो दिया 
कि साहित्य जटिल वस्तु है। परन्तु एक पद झोर बढ़कर कहा जा सकता 
है कि जीवन ही जठिलता का पुज है। मुभ से कोई पूछे तो मैं कहू गा 
कि सारी कटी छंटी, साफ सुथरी, मंजी संवारी, किसी विशेष मार्ग का 
अनुसरण करने वाली प्रत्येक वस्तु को मैं संदेह की दृष्टि से देखता हू । 
जहाँ मेंने देखा कि रेकार्ड पूर्ण है, पाई पाई का हिसाब सिला हुश्रा है, 
सारे वाउचर अपने स्थान पर हैं, एक भी पकड़ में श्राने वाली चीज नहीं 
है, वहीं मेरा माथा ठनका कि कहीं न कहीं गोलमाल अवश्य है। भला प्राक्ृ- 
तिक जीवन का हिसाब भी कहीं इतना स्पष्ट होता है ? यह मानव कृत 
नाटक है जिसमें प्रथम अ्रद्धू में प्रारम्भ, दूसरे में प्रयत्न, तीसरे में प्रात्प्याश, 
चौथे में नियताप्ति, पांचवें में फलागम । जीवन कभी भी ऐसे प्रवास 
राजमार्ग पर नहीं चलता । हमारे पार्क की लता भले ही माली की केची 
के इशारे पर नाचे पर वन्यलता तो जीवनोपप्लब की उमंग में आकर 
सब पर छा कर रहेगी । 


मात्र्सवादी जब वर्ग संघर्ष के पैमाने से विश्व के इतिहास को नचामे 
लगता है, मठाधोश धर्म के नाम पर, इतिहासकार इतिहास के नाम पर, 
दार्शनिक शुष्क विचारों के ताम पर सब कुछ समभाने, बुझाने का बीड़ा 
उठाता है तो, मुझे लगता है, उसने मनुष्य को बौना बना दिया । किसी 
पुस्तक या व्यक्ति के महत्त्व का माप-इण्ड यह नहीं है क्रि उस में दोष नहीं 
हैं। मैं ऐसी पुस्तकों को जानता ह्‌ जिनमें सबसे अ्रधिक दोष हैं तिस पर भी 


«* 98 « 


उनकी लखाता श्रेष्ठ पुस्तकों में होती है। कहा जाता है कि श्री हर ने 
अपनी पुस्तक “नेषधचरितम्‌” की रचना समाप्त की तो मम्मठ के पास 
सम्मति लेने के लिए गये । मम्मट ने ध्यानपुर्वेक पुस्तक के अ्रध्ययन करने 
के पश्चात्‌ कहा, “थ्ुके श्रफतोस है कि यह पुस्तक पहले श्रर्थात्‌ काव्य- 
प्रकाश की रचना करने के पर्व क्‍यों नहीं मिली। मुझे काव्य प्रकाश के दोष- 
प्रकरण। लिखने के लिए दोषों के उदाहरण देने के लिए सारे संस्कृत वाड़- 
मय को छातना पड़ा था। यदि यह पुस्तक हाथ लगी होती तो सब दोषों 
के उदाहरण -एक साथ एक ही पुस्तक में ही मिल जाते | पर इन दोषों के 
रहते भी क्या नैघध-चरित्रम्‌ की ज्योति में कुछ भी म्लानता श्राई ? 


दूसरी श्रोर ऐसी पुस्तकों के भी उदाहरण दिये जा सकते हैं, जिनमें 
किसी तरह की त्रुटि दिखलायी नहीं पड़ती । वर्ण्यं-वस्तु भी ठीक है, 
सर्वहारा वर्ग की प्रशस्ति गाई गई है ॥ साहित्य के नियमों, जैसे समकन्रय 
का भी पालन हुआ है पर फिर भी उनकी गणना उच्चकोटि के साहित्य 
में नहीं होती । इस विरोधाभास को किस तरह समझाया जाए ? 


इसका समाधान यही है कि हम साहित्य की शोर न देखकर साहित्य- 
कार की शोर देखते हैं। हम 'अ्रभिज्ञान-शकुन्तलम या 'हैमलेट' को न 
देख कर कालिदास और शैक्सपियर को देखते हैं। उनके मानसिक क्षितिज 
के विस्तार को देखते हैं, उनकी कल्पना तथा हृदय की गहर।ई को देखते 
हैं। नहीं तो हैमलेट या “ग्रभिज्ञान-शाकुन्तलम” में दोषों की क्या कमी है? 
इनमें किसी राजनेतिक, श्राथिक समस्या पर विचार नहीं किया गया है, 
किसी तरह के सुधार की बात का उल्लेख नहीं किया गया है । इनमें कोई 
भी सन्देश नहीं है । नाटककार अपनी तात्कालीन राजकीय व्यवस्था से 
. इतना संतुष्ट दीख पड़ता है कि उसके विरूद्ध एक सांस भी नहीं नेता । 


।.. ऋतकल प्र (0) ओला 


नाव्यकला की दृष्टि से भी यह पुस्तक बहुत भ्रच्छी चहीं कही जा सकती । 
पांचग्रद्धों तथा करीब दो दर्जन दृश्यों वाले इस नाटक में वहुत सी ऐसी श्रूलें 
हैं जिन्हें आज का एक अदना नाटककार भी नहीं कर सकंता। ये सब 
बातें कीथ ने कालीदास की आलोचना करते समय कही भी हैं । तिस 
पर भी किसी रहस्यमयी प्रक्रिया के द्वारा अभिज्ञान शांकुतलम्‌ एवं हैमलेट 
का आदर बढ़ता ही जा रहा है ? कारण कि इन पुस्तकों के पढ़ते समय 
हम एक महान दिव्य मस्तिष्क के सम्पर्क में आते हैं श्रौर स्वयं भी अपने 
में दिव्यता की अनुभृति पाते हैं। 


सबसे दुख की बात तो यह है कि हम पढ़ने का उहं श्य भरूलते जा 
रहे हैं। किताबें तो खूब प्रकाशित हो रहीं हैं पर पाठकों की संख्या कम 
होती जा रही है। हम पुस्तकें पढ़ते हैं जरूर, पर परीक्षा में सफलता प्राप्त 
करने के लिए, इतिहास या भूगोल की बात जानने के लिए तथा देश विदेश 
की कथायें जानने के लिए ताकि तथा-कथित विद्वदगोष्टियों में अ्रपनी 
विद्वता का रोब गालिब कर सकें । ऐसे पाठकों की संख्या कम है जो एक 
महान आत्मा, प्रबुद्ध मस्तिष्क तथा उच्च उद्ध ज्वलन प्रतिभा के साथ 
सम्पर्क स्थापित करने के लिए, (/0777प४76968 करने के लिए, पुस्तकें 
पढ़ते हों। पुस्तक के माध्यम से हम लेखक की आरात्मा तक पहुंचने की 
चेष्टा नहीं करते, हम उसके इरदें गिर्द चक्कर काट कर ही अपने कत्त व्य' 
वी इतिश्री समझ लेते हैं। आज हमें ऐसे पाठक-वर्ग को फिर से प्राप्त 
करना हैं, /8६/8607ए67 करवा है | जब तक ऐसा पाठक वर्ग सामने नहीं 
ग्राता जो साहित्य से अधिक साहित्यिक की श्रोर देखता हो, काव्य से 
श्रधिक कवि की ओर, कथा से अधिक कथाकार की ओर, तब तक वास्त- 
विक मूल्यांकन को समस्या खतरे में ही रहेगी । 


कक... हित 4 ख्ण्क 


लेखक या कवि श्रन्तिम विशलेषण में व्यक्ति ही होता है। उस पर 
अपने युग का, अपनी अ्भिरुचियों, अनुभूतियों, शिक्षा-दीक्षा तथा वातावरण 
का आवरण पड़ा रहता है । उसकी सीमायें होतीं हैं जिनसे ऊपर उठना 
कठिन होता है । पर जब व्यक्ति की प्रतिभा अ्रपने स्थल श्रावरणों का 
भेदन करने लगती है, वेदान्त के अनुसार जब वह अ्न्नमय कोष से आगे 
बढ़ कर प्राणमय, मनोमय, ज्ञानमय एवं श्रानन्दमय कोष की ओर बढ़ने 
लगती है तो व्यक्ति कवि बनने लगता है। साधारण व्यक्ति और कवि में 
यही भ्रन्तर है कि जहां व्यक्ति व्यक्तित्व की सीमा में ही सीमित रहता है 
वहां कवि अपने को सार्वकालिक और सार्वभौम बना सकता है। ऐसी 
भाषा बोल सकता है, ऐसे भाव अ्रभिष्यक्त कर सकता है जो सब के 
लिए ग्राह्य हो । 


होमर, देक्सपियर, कालिदास या अन्य किसी कवि का युग हमारे 
युग से कितना भिन्न है? इन सेकड़ों वर्षों की श्रवधि में ज्ञान और विज्ञान 
की जो आशातीत बृद्धि हुई है उसने व्यक्ति के मानसिक संगठन के ढांचे को 
ही बदल दिया है | हमारे सोचने विचारने के ढंग में ही परिवर्तन हो गया 
है । हम आज इतली बातें जानते हैं जितनी वे कल्पना भी नहीं कर सकते 
थे। यह बात केसे मान ली जाय कि वे व्यक्ति जिनको हमारी समस्याप्रों 
का कुछ भी ज्ञान नहीं था, जिनको हमारे सामाजिक, राजनेतिक अ्रथवा 
आशिक संगठन का कुछ भी परिचय नहीं था उनकी वाणी में हमारे लिए 
कुछ भी सार्थकता हो सकती है ? वे हमारे लिए दिव्य संदेश के वाहक हो 
सकते हैं? पर किसी न किसी तरह यह चमत्कार संपन्न होता ही है। कालीदास या 
शेक्सपीयर के दाब्द हमारे लिए सारग्भित होते ही हैं श्रौर श्राज भी हम उनमें 
अपने जीवन का पोषक तत्व पाते ही हैं । यह इन्द्रजाल रचना में नहीं, कृति 


बम श जे 


में नहीं, परन्तु रचनाकार तथा कृतिकार की महानता में है। हम उनके 
सिद्धान्तों पर मुग्ध नहीं होते, उनकी अच्छाई या बुराई की परवाह नहीं 
करते । हम प्रभावित होते हैं, उस सजीवता से, उस शक्ति से, उस सात्विक 
उत्साह से जो इस रचना के पीछे सक्रिय है। श्राज की विडम्बना यही है कि हम 
साहित्यकार की पूजा करना भूलकर साहित्य पर ही श्रटक जाते हैं। हम भूल 
जाते हैं कि साहित्यकार साहित्य से कहीं अधिक महान है। रचना में रच- 
यिता का प्रतिबिम्ब तो रह सकता है पर वह क्षीणा मात ही। ईश्वर अपनी 
सृष्टि में रमा तो है, पर उतने में ही वह समाप्त नहीं हो जाता । वह 
उससे भी परे है । जो सृष्टि ख्रष्टा को दिखलाये या उसे देखने के लिए 
प्रेरित करे वही सही बाव है। जो सृष्टि के ही उहापोह में फंस कर रह 
जाते हैं वे गलत राह पर हैं। - 


मैं जब मैट्रिक की परीक्षा में बैठ रहा था तो मेरे पाञउ्य विषयों में 
गणित भी था। गरित में में बहुत ही कमजोर था श्नौर उसमें मुझे सदा 
ही कम अभ्र क आते थे । विशेषतः ज्यामिति के साध्य तो समझ में श्राते 
ही नहीं थे। मेरी समभ में यह वात नहीं आती थी कि इन बातों का 
जीवन में क्या महत्व है ? ये बातें हमारे जीवन में क्या महत्व रखती हैं ? 
मैंने इसी तरह की आशंका प्रपने शिक्षक के सामने प्रकट की । भेरे प्रश्न 
के उत्तर में जो बात उन्होंने कही वह श्राज भी मेरे कानों में ग्रज रही 
है। उन्होंने कहा, “वैसे तो इन बातों की कोई उपयोगिता नहीं। पर 
एक बात है कि इन सूक्ष्म तथा बारीक बातों के द्वारा तुम उस महान 
प्रतिभा के सम्पक में श्राते हो जिसकी पकड़ इतनी गहरी थी, जो किसी 
भी चीज को सस्ते ढंग से तथा सस्ते मूल्य पर खरीदना नहीं चाहती थी, 
सब चीजों को खूब ठोक बजा कर देख लेती थी और उसका पूरा मूल्य 


न खरे के» 


चुकाती थी । इन प्रमेयों श्रोर वस्तृपाद्यों के साथ जूभने से तुम में भी 
किसी समस्या पर डूब कर विचार करने की प्रवृत्ति जगेगी और श्रवसर 
ग्राने पर तुम किनारे ही बेठ कर लहरों की गिनती करते रहने की 


पलायनवादी प्रवृत्ति से बचोंगे ।” 


प्रकारान्तर से मैं इसी बात की वकालत कर रहा हूं । शाप रखना 
के सौष्ठव की प्रशंसा कर सकते हैं, उसकी पंक्तियों की बारीकी तथा 
प्रलंकारों के प्रयोग पर फड़क उठ सकते हैं, कथा के गौरव पर मुग्ध हो 
सकते हैं प्रथवा ऐसे अनेक काम कर सकते हैं। पर जब श्राप वह चीज 
हुढ़ने लगेंगे, जिसके चलते रचना की यशकाया जरामरणज भय से मुक्त 
रहती है तो श्राप को रससिद्ध कवीश्वर की प्रतिभा की श्रोर देखना 


होगा । 


साहित्य का 
विश्लेषण 
आधार ठुमरों 


हिन्दी के तरुण पर लब्धप्रतिष्ठ कथाकार श्री फशीश्वरताथ रिणु' 
की नव कहानियों का संग्रह ठुमरी बाम से प्रकाशित हुआ है । एक बार 
न्यायज्ञास्त्र में 'नव' शब्द ने बड़ी गड़बड़ी मचा दी थी | किसी ने कह दिया 
'लव-कम्बलोडर्य देवदतः”। इस पर एक श्रोता ने तपाक से कहा, नास्ट्प्न्न 
नव-कम्बलाः सन्ति दरिद्र॒त्वात्‌ । नह्मस्य दयमपि सम्भव्यते कुतःनवः 
बड़े विचित्र आदमी मालूम होते हो जी। देवदत्त के पास नव कम्बल कहां से 
ग्राये । यह तो दरिद्र है। इसके पास दो कम्बलों की सम्भावना नहीं । नव 
की बात तो दूर रही ) पर मुझ पर श्राप यह दोषारोपण,. नहीं कर सकते, 
चाहे नव शब्द का श्रर्थ श्राप नूतन लें या नव, मेरी बात ठीक होगी । इस 
संग्रह में € कहानियां हैं। नवीन तो हैं हीं। कारण मेला आंचल, तथा 
परती परिकथा के बाद इन्हीं दो श्रांचलिक उपन्यात्तों की परम्परा में यह 
नवीनतम कहानी संग्रह है । 


रेशु के इस संग्रह के बारे में फट से दो चार शब्दों में कोई सम्मति 
दे देना कठिन है । यह कठिनता इसी संग्रह के बारे सें नहीं, किसी भी 


साहित्यिक कृति के लिए लागू है--बह कृति जो महान कृतियों की 
पंक्तियों में बेठने का दावा करती हैं। वेसे इस संग्रह के शुणों की गणना 
कर देवा कठिन नहीं है। ग्रामीण जीवन का बड़ा ही यथार्थ चित्रण है, 
स्थानीय बोलियों के दाब्दों के प्रयोग ने शैली से एक विचित्र “भंगी 
भरिति! को उपस्थित कर दिया है जिसे “वेदर्ध्य' ही कहना पड़ता है 
चाहे उनमें ग्रामीण शब्दों का प्रयोग ही क्‍यों न हुआ हो । थेथरई करना, 
पिनकना, छौंडा, लद॒नी और इन जैसे सेकड़ों शब्दों के प्रयोग से निश्चय 
ही हिन्दी की श्रभिव्यंजक शक्ति का विकास हो रहा है। इसके लिए हिन्दी 
साहित्य के इतिहास लेखक 'रेशु” का नाम आदर के साथ लेंगे। 


यह भी बात ठीक है कि ग्रामीण जीवन के चित्रण में 'रेणु” प्रेमचंद 
से कहीं आगे हैं। प्रेमचंद के कथा साहित्य में गांवों का वर्णन श्रवश्य है, 
किसानों को वहां स्थान अ्रवश्य सिला है, उनकी समस्‍यायें भी छेड़ी गई' 
हैं पर वह सब ऊपर ऊपर से ही हैं, श्रन्दर से नहीं । वह ऐसा ही है मानों 
कोई शहर का नागरिक हो, बड़ा ही स्पंदनशील और उदार | उसने सहा- 
नुभूतिपर्ण दृष्टि से गांवों को देखा हो, गांवों के जीवन में परकायप्रवेश 
किया हो और बाहर भ्राकर उसका हालचाल बता रहा हो। ऐसा नहीं 
लगता कि वह गांव का ही रहने वाला हो,उसने उनके पर्व त्योहारों में हाथ 
बटाया हो, दुख सुख का भागी हुआ हो । हां, इतना ही कह सकते हैं कि 
सब आन्दोलनों के आदशों तथा विचारों की शिलाधमिता के नीचे से 
ग्रामीण जीवन का एक श्रकुर फूटता श्रवश्य दिखलाई पड़ता है। 


प्रमचन्द के साहित्य से साफ प्रगट है कि वे गांव के रहने वाले नहीं 
पर गांव से सहानुभूति रखने वाले हैं। रेशु का साहित्य पुकार पुकार कर 
कह रहा है कि वे गांव के हैं, देहाती है, देहात में बेठ कर वहां के जीवन 


ब्भ_ टेप द्दू कक 


समर में खड़े होकर श्रपत्री आंखों से देख कर ठुमरी के गीत गाये हैं । 
प्रंमचन्द के होरी को देख कर ऐसा लगता है कि बह है तो गांव का ही, 
वहां रहता भी है पर शायद वह शहर भी जाकर घूम आया है श्र प्र म- 
चन्द जेसे नागरिक साहित्यकार से सीख पढ़ कर भी ब्राया है। नहीं तो 
जैसा साफ सुथरा उसका व्यवहार होता है, उसके कार्यो में जो एक सिल- 
सिला है, व्यवस्था है, सफाई है वह गांव के किसानों में विरल ही है । वह 
गाँव का हो तो सकता है, पर है नहीं। मानों किसी उपन्यासकार की 
साफ सुथरी (0076670ए प्रशा०ताणश8& 0 906 वाली कथा हो, जो 
जीवन का प्रतिनिधित्व भले ही करले, पर वह विशुद्ध जीवन की प्राणवत्ता 
नहीं है। 

परन्तु रेरु और उनकी ठुमरी के पात्र जैसे रसपिरिया गाने वाला 
मिरदंगिया, मोहना, मखनी फुश्रा, डोमन, सिरचन, ग्रुलरी काकी, गोधन, 
कालू, हिरामन इत्यादि को देख कर ऐसा लगता है कि वे शुद्ध देहात के 
रहने वाले हों, उत पर श्हरीपन का कुछ भी असर नहीं पड़ा हो । उन 
पर नवीन समभ्मता की रोशनी जो श्रा गई है वह स्वाभाविक रूप से ञआा 
गई है। किसी ने जानबूक कर सम्यता की मशाल उनके हाथ में नहीं दे दी 
है । ठुमरी की एक कहानी है 'पंचलाइट”। पंचलाइट बहु मतलब गैस लाइट 
है । पंचों ने पंचलाइट खरीद तो ली है पर उसे किस तरह जलाया जाय 
यह किसी को भी मालूम नहीं । उसे जलाने के लिए जिस कठिनाई का 
सामना करना पड़ता है वह गांव की सच्ची कहानी है । होरो जब राजा 
साहब के नाटक में भाली का पार्ट करने गया था तो वहां पर चारों 
ओर बत्तियां चकमक थीं । 


ठेस” एक बड़ी सशक्त कहानी है। ठेस तो सब. को लगती है। 


पर सवाल यह है कि वह हुदय कैसा है जिसे ठेस लगी है। मुझे ठेस लगे 
तो जिस पैर से ठेस लगी है उसे तोड़ दूं । चाणक्य के पर में ठेस लगी 
तो उसने कुशों की जड में मठ्ठा देकर उनके मूल के ही विध्वंस की बात 
सोची । भृग्न ने क्षीर सागर में लक्ष्मी के साथ सोये हुए विषयु की छाती 
में लात मारी तो वे भुग्मु के चरणों को चांपने लगे “भगवात्र मेरी 
छाती तो पत्थर की तरह कठोर है। पर श्रापके चरण तो कोमल हैं । 
इनको कितना कष्ट हुआ ।” दोनों उदाहरणों में दो बातें दिखलाई पड़ती 
हैं। वह हृदय जिसको ठेस लगी है ओर वह हृदय ( लेखक ) जिस ने ठेस 
की कल्पना की है। झागे बढ़ कर मैं यहां तक कहंंगा कि ठेस की कह्पना 
करने वाले हृदय की ही भलक मिलती है । क्योंकि पहली चोट उसके ही 
हंदय पर लगती है, पहले उसी हृदय ने 5700४ को 0807४ किया है, 
उसके बाद जो कहानी में बचीखुची चोट श्रा गई है श्लौर जिस से वह कहानी 
बीणा के तार की भांति कांप रही है वह तो उसकी हल्की छाया 
मात्र है। भ्रगार तो कल्पता करने वाले हृदय में बसला है, कविता तथा 
कहानी के रूप में श्राते-आते तो वह श्रगार बुभने सा लगता है । 


इसी हृष्टि से हम ठमरी की श्रालोचना करना चाहते हैं। हम देखना 
चाहते हैं कि इस गायक या लेखक का हृदय कैसा है जहां इन कल्पनाश्रों 
ने जन्म लिया है। लोग यह समझते हैं कि कोई कहानी या कविता जिस 
लिपिवद्ध या झ्ाव्दिक रूप में हमारे सामने हष्टिगोचर या श्रवरागोचर हो 
रही है वही वास्तविक रचना है। पर बात ऐसी नहीं है। श्रसल में कविता 
या कहानी तो हृदय की, आत्मा की गहराई में जन्म लेती है। एक रागा- 
गीत हल्का सा स्पन्दन होता है, कोई शब्द नहीं, कोई ध्वनि नहीं जिसे 
कान नहीं पर हृदय सुनता है । इसके हल्के स्पच्दन का श्रस्तित्र ही - 


#ं- ट ४० 


साहित्यिक श्रमुभूति की सूचना है । उच्चकोटि की रचना की यह पहली 
शर्त है। प्रत्येक रचना के पहले श्रात्मा में एक विक्षोम होता है, कम्पन 
होता है, एक ऐसी चीज होती है जो व्यक्तित्व की श्रत्तरतम गहराई से 
उठती है और गीत की सृष्टि करती है | (॥8-607व 77077 696 ६०00 
0 9078 804 507]0088 & 8078) यह निविकल्पक होती है, न 
इसमें शब्द रहते हैं, व रूप न रंग। बस हृदय संवेद्य कम्पत । रचना को 
इस का आधार प्राप्त है या नहीं इसी बात पर विचार करना है। 


किस रचना को यह आराधार प्राप्त है यह तो उदाहरण के द्वारा ही 
स्पष्ट हो सकता है। एक बहुत बडी फेक्ट्री है जिसमें कितनी ही वस्त्रो- 
त्पादक मशीनें काम करतीं हैं । उस मिल के आस पास की कोठरियों में 
रूई के गठर के गठर सजा कर रखे हैं ताकि भविष्य में उनका उपयोग 
किया जा सक्रे । एक व्यक्ति उन गदूरों की पंक्तियों को देख कर कहता है 
मानों “ये बेंक में झपये जमा कर रघे गये हैं” अर्थात्‌ उनमें उसे रुपयों की 
थेलियां दिखलाई देती है | एक दसरा व्यक्ति देखता है और उसे इनमें 
भुकी हुई कमरें दिखलाई पड़ती हैं--उन लोगों की कमरें जो कपाप्त 
लोढ़ते हैं शोर रुई निकालते हैं, उन लोगों की जो सृत कातते हैं, उन लोगों 
की जो सूत के गठूरों को ढो-ढो कर मिल में डालते हैं और इस पृ'जी- 
वादी गदिश में पीसे जा रहे हैं । 

कहना नहीं होगा कि दूसरा व्यक्ति कवि है जिसकी आत्मा की 
गहराई में किसी सत्य का श्रवतरण हुआ है और वही ऊपर झ्राकर शब्दों 


का रूप धारण कर रहा है । पहले ने भी देखा जरूर है पर बाहरी दुनिया 
में और उसके कइृतित्व को वाह्य का आन्तरिकी करण (7097एक्ष- 


बम... टि ड् ब्न्न्क 


8907 06 6४8779)) कहेंगे पर दूसरे में प्रकरण उलट गया है वहां 
(65677 88007 0 7706779) है श्रर्थात्‌ आन्‍्तरिक का वाह्यीक- 
करण है | एक में बाहर भीतर प्रवेश करता है, दूसरे में भीतर ही बाहर 
ग्राता है। एक में कलेजा थाम कर दर्द पेदा किया जाता है श्र दूसरे में 
दर्द होने पर कलेजा थाम लिया जाता है। पहला दुनियबी व्यक्ति है, वेज्ञा- 
निक है। दूसरा भावजगत का प्राणी है, कवि है। एक कहता हे शुष्क: 
वृक्ष: तिष्ठत्य्रे; दूसरा कहता है नीरस तरुरिह् बिलसति पुरत: । 
कादम्बरी काव्य को पूर्ण करने की क्षमता की कल्पना दूसरे व्यक्ति में 
ही की गई है। 


ठुमरी में जो बातें कही गई हैं उसकी पंक्ति-पंक्ति से हम सहमत हैं, 
उसमें कोई भी ऐसी बात नहीं जिस से किसी को जरा भी असहमति हो 
पर किसी पुस्तक के सिद्धान्त से, उसके वर्ण्य विषय से हमारा सहमत हो 
जाना ही उसके महत्व का प्रमाण नहीं है । हम उसमें लेखक को देखना 
चाहते हैं, हम उस व्यक्ति को देखना चाहते है जिसने पुस्तक लिखी हे । 
हम ढढ़ते फिरते हैं वह शमा कहां है, जो बज्म के हर शख्स को 
परवाना बना दे । मेरे पास एक पुस्तक श्राती है । उसके बारे में हम यों. 
लिख सकते है “पुस्तक में वरणित विचारों से मैं पूर्णातया सहमत हूं । इन 
प्रतिपादित विचारों के प्रचार के लिये में बड़े-से भी बड़े बलिदान से भी 
नहीं हिचकू गा। पर यह बात भी ठीक है कि श्राज से कुछ ही वर्षों के 
बाद इस पुस्तक का पाठक कोई नहीं रह जायेगा और कोई भी पुस्तक 
से उद्धरण नहीं देगा ।” एक दूसरी पुस्तक के बारे मैं लिखगा । 
“इस पुस्तक के किसी विचार से मै' सहमत नहीं हूं। जहां तक हो 
सकेगा में इन विचारों का विरोध करूगा । पर इसमें वह ग्रुण है, 


स्कना & (३ खाक 


बह महान्‌ प्रतिभा काम कर रही है जो इस पुस्तक को कभी भी विस्मर- 
णीय नहीं होने देगी श्रौर सदियों बाद भी इस पुस्तक के उद्धरण दिये 
जाते रहेंगे ।! हम शंकराचार्य, प्लेटो, भ्ररस्त के सिद्धांतों को चाकू से काट 
कर टुकड़े उड़ा दें पर क्या उन्हें सहज ही भुला भी सकेंगे ? उनकी रचनागश्रों 
में उनका विशाल व्यक्तित्व है, अभिव्यक्ति के पीछे आाकाश्-धर्मी व्यापकता 
है जो सबको अपने यहां स्थान दे सकती है । मित्र तो मित्र ही है, विरोधी 
का भी वहां स्वागत है । 


हम ठुमरी को या रेणु के पूरे साहित्य को प्रथम श्रेणी में ही 
रखेंगे। हम रेखु की प्रशंसा ही करेंगे कि कथा-साहित्य का ग्राम भ्रन्त- 
प्र यारा जो प्र मचन्द से प्रारम्भ हुआ उस प्रवृत्ति को इन्होंने श्रागे ही 
बढ़ाया । यहां भी जरा ठहरेंगे। प्र मचन्द के पश्चात्‌ कथा साहित्य की 
इस ग्राम ग्रत्त्रयाण की प्रवृत्ति भ्रन्दर ही श्रन्दर जारी रही है हानांकि 
इसका स्पष्ट रूप रेणु में ही दिखलाई पड़ता है। मानों नदी की धारा 
सूखती सी दिखलाई पड़े पर वास्तव में वह सूखी नहीं हो, जमीन के वीचे 
बह रही हो। फिर कुछ दूर पर जाकर सामने आरा गई हो और लोगों का 
ध्यात श्राकषित करती हो । जिस ग्रामीण क्षेत्र को रेणु ने श्रपताया है वह 
ओरों ने न श्रपताया हो सो भी बात नहीं । श्री दुर्गाशंकर प्रसाद सिंह का 
उपन्यास 'फरार की डायरी” इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। इसमें एक ऐसे 
फरार की कथा कही गई है जो एक देहात में जाकर वहां के लोगों के 
साथ, पासियों के साथ अ्रपना अज्ञातवास का जीवन व्यत्तीत कर रहा है । 
इस पुस्तक में भी देहाती बोली का खुल कर प्रयोग किया गया है । 
ठुमरी की एक कहानी 'तीन विदियां” में और इस पुस्तक के एक हृश्य के 
वर्णन में मुझे विचित्र साम्य मिला। दुर्गाशंकर के राम कनेसर की 


>४ है कै 7२७ 


पार्टी पक्षियों की नकली बोली बोल चाहों ( एक पक्षी विशेष ) को 
पकड ती हैं, जाल में फंसाती है । 'तीन विदियां' में भी हाराधन मादा मग 
को कामातुर पुकार देकर, स्वयं भ्रपततों कंठध्वति से स्वर निकाल कर 
मृगों के शिकार में सहायता देता है | में यह नहीं कहता कि इनमें से कोई 
_ दूसरे का ऋणी है। सम्भव है दोनों कथाकार ने स्वतस्त्र रूप से इस तरह के * 
उपक्रम का प्रयोग किया हो। पर इतना अवश्य है कि हिन्दी कथा साहित्य 
में ग्रामान्तप्र याणा प्रेमचन्द के बाद भी जारी रहा है। यह कहना कि 
रेणु ने ध्रमचन्द की परम्परा की भूली कड़ी को फिर से पकड़ी है स्थूल 
दृष्टि से ही. ठीक माना जायेगा । 


वास्तव में जन-जीवन का प्रवाह ही गांवों की ओर उन्म्रुख है, 
साहित्य तो उसी की एक भलक मात्र है। राजा जी राधिकारमण प्रसाद 


की कहानियों में भी यह झलक पाई जाती है । 


मैंने कहा कि रेशु ने प्र मचन्द की परम्परा को अ्रग्नसर किया है, वे' 
श्रागे की कड़ी हैं । पर फिर भी प्र मचन्द महान साहित्यकार हैं, जिसकी 
महत्ता को रेशु नहीं पहुंच पाते | प्र मचन्द विधायक, रचनात्मक कलाकार 
हैं, उन्होंने देखा है कम श्लौर गशूना' है अधिक । लड़कपन में मेरे दादाजी 
मभ पर नाराज होते थे तो खुलकर श्रौर लड़कों की तरह मुझ पर बरस तो 
नहीं पड़ते थे क्योंकि मैं पढ़ने लिखने में तेज था, मेट्रिक में पढ़ता था। भ्रतः 
मन ही मन मुभ से श्रातंकित थे, मेरे महत्व को महसूस करते थे। वे 
इतना ही कहने थे कि 'ऐ बच्चा, त पढ़लत बाकी शुतले ना (ऐ बच्चा ! 
तुम पढ़े हो सही पर तुम में विवेक नहीं है) । उसी तरह मैं रेशु के महत्व 
को खूब समझ रहा हैं । इसरा कोई कथाकार होता तो उसकी अश्रच्छी 


हक 7 लत 


खबर लेता । पर ठुपरी की श्रालोचना करते यही कह गा, है रेणु तू 
देखल त बाकी गुनलना ।! 


: जिस वात का मैं उल्लेख कर रहा हूं उसका समर्थन एक दूस 
ओर से रहा है । अमेरिका के सुप्रसिद्ध उपन्यास 5087706077 
सम्बन्ध में एक ग्रालोचक ने लिखा है--- 


रा 
के 


7 49800, 097940509|79, 006 87079 798000%7 ०६ #[0068/ 
पा 98 8#गप्रक्रा00 990 86 77७ 06 |77 ४786 0988 ए0ँर[ 
90977980/ 000 09ए8 2667 #68]00780]8 [07 768 709 
0078 & 87 06667 000%., नव 4098 शॉपा707 06७7 
]888 क्रोपशंगर +7 व887॥, 98 00प्रौद 90 ४9०७ #९!680 
80 878७67ए &प907 प०00 7 07 ३8 8]069॥, 87 
7779/6 ॥8ए8 दै008 70078, 80 जशञात्र पघ8, 0ए ॥96 4698]0]0- 
770876 07 67097980687', 68 6 78, 77708 07 696 60979 08687 
46४98 87 706, ए00 8 00 887 ४67 0878079- 
[09, >प"8७ए 700 87 #७80098779 ४5४0 578 29890 
8ं9प्रकरा00,.. 7967 06870 ४प४॥ (%०४7; ॥96ए 0970 706 १0, 
4087 878 ॥06888770 07 8 807९9770 0४ $798/70, 


(4॥86 £77080ल्‍09 ०0 ॥78787ए #077% 72886 78, 
7000 90098 09 १७४76 3778), 


ग्र्थात्‌ यह बात विरोधाभास सी भले ही लगे पर कि स्टेनवक की 
पुस्तक में वणित परिस्थिति में जो एक मौलिक तथा सशक्त अ्रपील है 
उसी ने इसे और भी महत्वपूर्ण पुस्तक बनने देने से रोका भी है । यदि 
परिस्थिति स्वयं इतनी श्राकर्षक नहीं होती तो अपनी पुस्तक में अपील 


ख्ण्न्् डे बज» 


लाने के लिये लेखक उस पर इतना निर्भर नहीं करता और तब पाठकों की 
सहानुभूति प्राप्त करने के लिए पात्र के चरित्र के विकास की श्रोर प्रधिक 
ध्यान देता | पुस्तक जिस रूप में हे उसमें तो पात्रों का चरित्र, उनका 
व्यक्तित्व मौलिक परिस्थिति से ही अपना स्वरूप ग्रहण करता है । वे जेसे 
हैं उनको वैसा होता ही पड़ेगा, वे इसके लिये बाध्य है। वे श्रपनी शोर से 
कुछ नहीं कर सकते । वे जन प्रवाह पर बहते तिनके की तरह हे । 


रेशु को सब से बड़ी कमजोरी है कि उन्होंने रेशु से श्रधिक वर्ण्य 
वस्तु पर विश्वास किया है श्र समझ लिया है कि अनुभूति की वास्तवि- 
कता ही प्रमुख है, व्यापक है श्रोर साहित्यिकता गौण है, व्याप्य है। राम 
तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है, कोई कवि बत जाए यह सहज संभाव्य 
हैं। न जाने हमारे लेखक इस प्रवाद को कब भलेंगे और अपने पर विश्वास 
करना कब सीखेंगे ? योरोप में तो जमातवा यह भा गया है कि साहित्यिक 
विषयहीन विषय पर उपन्यास लिख रहे है या लिखने की कल्पना कर रहे 
है श्रोर हम हैं कि विषय का बोफ सर पर उठाये ही जा रहे हैं। वास्त- 
विक श्रनुभूति कभी साहित्यिक श्रनुभूति की समता नहीं कर सकती « जहां 
आपने दोनों को एक समभा साहित्य को कौड़ी का तीन बना दिया । 
वास्तविक अनुभूति आवश्यक तो है पर उसे एक पग श्र भ्रागे बढ़ कर 
काव्यानुभति बन जाना पड़ता है। यदि वह अपने तक ही ठहर गई तो 
उसका कोई महत्त्व नहीं । साहित्य पाठक के हृदय में कभी भी वेसी प्रति- 
क्रिया नहीं उत्पन्न करता जेसा वास्तविक दृश्य करता है । आप वाटक 
देखने गये, एक श्रत्याचारी निरीह बालक की हत्या कर रहा है। आप 
उसे देख कर स्टेज पर जूते चला बेठे । यह साहित्यिक प्रतिक्रिया नहीं । 
वास्तविक प्रतिक्रिया है। जो साहित्य ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करेगा उसे 


बे 3 


मैं महत्वप॒र्ण नहीं कहंगा और समभू'गा कि वह अपना कर्तव्य ठीक से 
पालन नहीं कर रहा है। वह साहित्य से ज्यादा 006॥07706 है। वह 
ऐसा कुछ काम कर रहा है जो साहित्य से ज्यादा है या कम और ये दोनों 
श्रवस्थायें श्रवांछनीय हैं । 


डा० रामविलास शर्मा ने, 'निरालाजी के संस्मरण' नामक लेख में एक 
स्थान पर लिखा है जिस होटल में पंत जी से कविता सुनी थी, एक दिन 
वहीं खड़े होकर वह (निराला) किसी कुश्ती का वर्णान कर रहे थे। नाना 
करने पर भी एक श्रोता को पकड़ कर उन्होंने ऐसा फोंका दिया कि 
बेचारा दरवाजा न पकड़ लेता तो सड़क पर ही श्रा गिरता । हर चीज का 
सक्रिय वर्रान उन्हें पसन्‍द था ।” इस तरह से झटका साहित्य में नहीं दिया 
जाता, जेसा प्राय: निराला के कथा साहित्य में पाया जाता है । 


रेशु की कहानियां बड़ी उम्र है, हिसात्मक हैं, बड़े जोर-शोर के साथ 
पाठकों के सामने हश्यों के रख देतीं हैं, इस तरह कि पाठक पाठक नहीं रह 
जाता साधारण द्रष्टा रह जग्ता है। कल्पना का कल्पना से सम्मेलन नहीं 
होने पाता | पाठक बड़े मजे मजे में दश्य से अलग रहते भी आनन्द नहीं 
उठाता । कह सकते हैं कि दृश्यों को पाठक के पास लाया जाता है, 
पाठक को दृश्य पर नहीं पहुंचाया जाता । यदि पाठक को समभा-बुझा 
कर दृश्य के पास पहुंचाया जाता तो वह मन बना कर जाता, तैयारी 
करके जाता | यहां तो दृश्य इस तरह सामने आा जाते हैं कि देखोगे नहीं 
तो जावोगे कहां, दं खना ही पड़ेगा । श्रतः उनके सामने साधारण द्रष्टा 
की ही प्रतिक्रिया होती हैं, साहित्य के पाठक की नहीं । यदि इसे ही आाप 
अच्छा समभते हैं तो रेणु कहानियां सर्वोच्चकोटि की हैं| पर ऐसा करने 


आल 


के पहले श्राप ट्रू जिडी के द्रप्टाश्रों के लिये एक एक जहर की पुडिया की 
व्यवस्था कर दें । 

प्राज के बेश्ञानिक, या मनोवेज्ञानिक जो कहें, युग में दो बातें स्पष्ट 
हो जानी चाहिए। श्रनुभूति की प्र पणीयता श्रलग वस्तु है. और अनुभूति 
के ज्ञान की प्र पशीयता अलग | दोनों को एक मे मिला देने से गड़बड़ी 
होती है श्रोर यही बात ठुमरी के लेखक द्वारा हो * रही है । रेण ने प्रामीण 
जीवन को खूब देखा है, अपने चक्ष भ्रों को फाड़-फाड़ कर देखा है, इतना 
देखा है कि कल्पना की श्राँखें खुलने नहीं ५ई हैं | उसकी चाक्ष ष॒श्रतीति 
उसकी काल्पनिक प्रतीति पर हावी हो गई है । श्रौर सच पछिये तो यही 
उसकी त्र्‌ दि है। साहित्य स॒जन के लिए विस्तार नहीं चाहिए, गहराई 
चाहिए । साहित्य में जीवन का ज्ञान नहीं रहता, विशुद्ध जीवन रहता है । 
जब तक हम यह महसस नहीं करते श्राज के वेज्ञानिक युग में साहित्य 
का अ्रस्तित्व खतरे में रहेगा । 


हेवरी जेम्स ने श्रपने एक उपन्यास के सजन की कथा कहते हुए कहा 
है कि एक दिन एक पार्टी में उसे बातचीत के भ्रवसर पर कुछ बातें सुनने 
को मिलीं। बस वे ही उपन्यास के लिए पारस बन गई । उनके ही स्पर्श 
मात्र से उसकी आत्मा में वह भंकार पेदा हो गई जिसने रचना का रूप 
धारण कर लिया। बाद में उस घटना के सम्बन्ध में विस्तार की 
बातें मालम होने लगी तो उसने अपने कान मद लिए। प्राकृतिक 
तथ्यता तो एक ऐसी पगली मां है जो अपने «पुत्र को पालने में इतना 
हलराती-दुलराती है, कि उस बालक का दम ही घुट जाए। कला 
कार का काम यह है कि इस पगली मां से बालक की रक्षा करे। 
हो सके तो छीव कर. नहीं तो चुरा कर ही सही। किसी तरह से 


#«:ह है: #+ 


उस बालक को श्रपती शरण और सुरक्षा में ले । कलाकार ऐसी ही नर्स 
है, जो बालक को माँ की गोद में से छीन तो लेती है पर उस चिरंजीव 
बनाने के लिए। ऐसी ही नर्स बाल्मीकि थे, जिसने राम को प्रकृति की गोद 
से छीना और श्राज राम अमर हो गये हैं | 

लंकापतेः संकुचितं यशों यत्‌ यत्कीतिपात्र रघुराजपुत्रः, 

स सर्वेबाद्यकवे: प्रभावः न बंचनीया कबयः जषितीन्द्र:। 

ग्राज राम का घर-घर उच्चार हो रहा है। यह सब श्रादि कवि का 
प्रभाव है। राम का नेसगिक अ्रधिकार नहीं । लेने दीजिये किसी कवि को 
रावण को भी अपनी सुरक्षा में, देखिये वही रावण क्या से क्या हो जाता 
है । प्रकृति ने तो कितने रामों को पैदा किया पर वे न जाने कहां विलीन 
हो गये, पर बाल्मीकि के राम श्राज भी जीवित हैं। 


ठुमरी का लेखक ऐसी नर्स नही है। उसमें इतनी ताकत नहीं है कि 
कि वह घट्ताओं को अ्रपने संरक्षण में ले। मनोविश्लेषण की शब्दा- 
वली में कहें तो स्थानाव्तरण करे, संघनन करे जैसा स्वप्नतन्त करता 
है। /वह माँसे डरता है। वह माँ से श्रनुनय विनय भी करता है, 
बालक की रक्षा की श्रोर माँ का ध्यान भी दिलाता है। पर माँ का पागल. 
पन प्रबल है जिसके सामने नर्स की बुद्धि हार जाती है। प्रेमचन्द में 
ज्यादा ताकत थी। प्रेमचंद के साहित्य को पढ़ कर हम कह सकते हैं कि 
इस लेखक ने गलत निष्कर्ष निकाला है। पर इससे क्या ? एक गलत 
निष्कर्ष पर पहुचने की राह में उसने पचासों सच्चाइयों का पता लगाया 
है। मैं उस लेखक को अ्रधिक महत्त्व नहीं देता जो एक सत्य के लिए 
पचासों झूठ कहता है । 


+ा हैं3 6 


रेशु ने तो गांव वालों की तीथ्याबा की बात तीर्थोदिक” में कही है, 
'सिर पंचमी” के सगुन में देहाती जीवन के उपेक्षित श्र श को लिया गया है, 
तीसरी कसम' भी बड़ी रोचक कहानी है (हालांकि कुछ प्रनावश्यक विस्तार 
है जरूर) । में तो कहता हु कि ग्रामीण जीवन के गहित पहलू को क्‍यों 
न लिया जाय ? चोरों, गंजेड़ियों, भंगेड़ियों, लुटेरों को भी क्‍यों न लिया 
जाय ? पर बात इतनी सी है कि उस पर इस तरह लिखा जाय जिस 
तरह टालस्टाय, प्रेमचन्द श्रौर कालिदास लिखते हैं। उस तरह नहों जिस 
तरह एक स्कूली छोकरा लिखता है ! 


3.,0., (80676 ने अपनी पुस्तक 0700888 0 ॥ 8878 
प/8 में साहित्यिक प्रक्रिया पर विचार करते हुए उपन्यास के संबंध 
में भी कुछ बातें कही हैं जिनसे मेरे कथन के स्पष्टीकरण में सहायता 
मिल सकती है। मैं उन्हें यहां संक्षेप में लिख रहा हूं । 


यह देखा जाता है कि उपन्यात्त दो तरह के होते हैं। उपन्यास के 
पढ़ने में कुछ समय लगता है। हम इसे एक' ही भलक में नहीं देख 
सकते । हमें इसके-पास चल कर ग्राना पड़ता है. । जिस तरह #४826 
से चलकर मृति के पास आता पड़ा हो । पर जब हम मंजिले मकसूद 
पर पहुंचते हैं तो दो बातें हो सकती हैं । हमारे मानस पठल पर 
उस हृश्यावली के जो संस्कार पड़े, वे ऐसे हों जेसी 9०४9७ की 
स्मृति, जैसी-तैसी अनुभूतियों की परिणति । साधारण उपव्यास 
पढ़ने पर ऐसे ही संस्कार उत्पन्न होते हैं । उनमें ॥)6%7॥8 की 
- छोटी-छोटी बातों की स्मृति की ही प्रधानता होती हैं । हम कह सकते हैं 
कि मैकबैथ की हत्या के लिए ।)प7097 ने क्या-क्या उपाय किये, किन- 


या बे 


किन हथकण्डों से काम लिया । वहां की एक-एक बात पर हम थीसिस 


लिख सकते हैं । 


पर एक तरह का श्नौर उपन्यास होता है जिसके प्रन्त में श्राने पर 
ये प्वारी बातें अलग-श्रलग याद तो नहीं रहती पर किसी रहस्यमयी 
प्रक्रिया से सारी बातें मिलकर एक सार्थक रूप धारण कर लेती हैं, उनमें 
विचित्र श्रथवत्ता श्रा जाती है शर हम एक ऋलक मात्र में ही सब कुछ 
देख लेते हैं। यही साहित्य है। ,इसमें ब।तें याद तो नहीं रहतीं पर पुस्तक 
की स्घृति मानस की गहराई में अद्धित रहती है, स्वयं पुस्तक मेरे जीवन 
की साथिन हो जाती है। पहला उपन्याप्त श्रनुभूति, का रेकार्ड मात्र है। 
भले ही वह 377]॥97)0 हो, उसमें अनुभूति ज्ञान-विज्ञान की कथा भले 
ही कही गई हो पर वह स्वर्य अनुभूतिस्वरूप नहीं है। उदाहरणार्थ 
ज़राए०णंगए म्रिशंठु08 में यह विशेष महत्त्तपृर्ण बात नहीं कि इसमें 
र्ति8४0204 या (/७028.0786 के बारे में क्या बातें कही गई हैं परन्तु 
स्वयं पुस्तक ही महत्वपूर्ण है। इसकी “्रर्थवत्ता” इसमें नहीं कि वहु क्‍या 
कहती है पर इसमें है कि वह क्या “है”। प्रधाचतः इस पुस्तक से जो 
चीज हमें प्राप्त होती है वह कविप्रोद्ोक्तिसिद्धपात्र का रेकार्ड अथवा उसकी 
अ्रनुभृतियों की व्याख्या नहीं है। यह स्वयं हमारी श्रनुभृतियों को जाग्र॒त 
करती है श्रथवा 077ए7 370769 की श्रनुशृतियों में प्रवेश कराती 
है । इसरे शब्दों में यह विज्ञान नहीं, कला है। इसमें पुस्तक, पुस्तक के रूप 
में ही याद रहती है। इस रूप में नहीं कि इसके द्वारा हमें भ्रमुक-अ्रमुक 
बातों का ज्ञान हुप्ला, 77907779907 मिली । 


में शायद जरूरत से श्रधिक कड़ा पड़ गया हूं। पर उसकी भ्रावश्यकता 


जल हा 


है। में पागल भी नहीं बनु गा। रेणु-बालक को उन पागल माताओं से 
बचाऊ गा जो उसे चूम-चूमकर उसका दम घोंट रही हैं। में जानता हूं ऐसी 
माताम्रों की कमी नहीं हैं। में यह भी जानता हू कि मेरी इस कड़ाई 
के बावजूद रेरु बचा रहेगा और जो कुछ बचा रहेगा वही उसका 
श्रेष्ठतम रूप होगा। रेणु के साहित्य के द्वारा वह खाद जरूर तेयार हो 
रही हैं जिस पर एक विज्ञालतर साहित्य का झौर दिव्यतर रेसु का 
निर्माण होगा । 


बा 0 की मम 


साहित्य 
और 
स्वप्न 


अर अपना पतििलाब जन 





में आपके सामने तीम उदाहरण रख गा, एक स्वप्न का, दूसरों दिवा- 
स्वप्न का, तासरा एक उंउ्वात्त करा, जिकसे यह॑ स्पष्ट होगा कि 
तीनों के सजनात्मक पहलू में कितना साम्य है। स्वप्तों में भी काध्य के 
क्षण होते हैं, दिवास्वप्नों में भी कल्पना का विलास सक्रिय रहता हैं और 
काव्य तथा उपन्यास में भी सपने रहते हैं| वास्तव में प्रध्येक सृजनात्मक 
कृति का निर्माण स्वप्न के तंतुओं को लेकर ही होता है '5परा[ (एक्षा 
थै78७708 &78 70948 07 और इसकी मूल प्रेरक शक्ति श्राती है सृजक 
की श्रवेतन ((777007-800प8) से। इन्ही दोनों के श्लंयोग से विश्व को 
उन सारी दिव्य, रहस्यमयी, हृदय को दहला देने वाली, पृथ्वी पर ही 
स्वर्ग तथा नरक की सूष्टि लाने वाली कृतियों का जन्म होता हैं। चाहे वे 
रात की सुधुप्तावस्था के स्वप्न हो, दिन की जाग्र॒तावस्था के विविध श्रर्द्धा 
स्वप्न हों, चाहे दन्‍्तकथाएं , कविता, लोक कथा, उपन्यास, मन्दिर, दीवाल 
की चित्रकारी, गिरिं-गद्गरों में काटं कर निकाली गई मूर्ति, दर्शन- शास्त्र 


की तुतन पद्धति की धआ्ाविष्कृति, भौर चाहे कितनी भी ग्राइचर्यजनक 
कृतियां हों | इन तंत्र के मुल तत्व तथा घूल प्रेरक ज्क्ति एक ही हैं। 
इन सबों के सजन करने वाले को स्वप्नद्रष्टा कहा ही जाता है और इसी के 
द्वारा इनके स्वप्तवत्‌ रूप का झाभास मिलता है। श्रतः, इन तीनों के घूल 
में एक ही शक्ति के कार्य करते रहने के कारण इनके बाह्य रूपाकार में 
भी कभी कभी बहुत ही साम्य हो जाता है । 


पहले स्वप्व की बाब लीजिए | एक मनुष्य दिन भर के कठिन 
परिश्रम से चूर-चूर हो, सोने जा रहा है। वह झपसे मित्र से क्रिसी बात पर 
भागड़ पड़ा है । अतः, इस बात को ले कर भी उसके मन पर बोझ है। 
किसी मे उसको सलाह दी थी कि तुम एक काम क्‍यों नहीं करते । काम से 
छुट्टी पा कर संध्या समय जब घर जावो तो उस व्यक्ति से टेलीफोन पर 
बात कर सारी बातें तय कर लो (5770009 786 धृष77898 0एा) । 
पर भोजनोपरान्त वह परिक्‍जान्त हो जाने के कारण सीधे शयनागार में 
जाकर सो गया। स्वप्न में क्या देखता है कि वह अपने हाथ में वंसुला लेकर 
किसी लकड़ी के टुकड़े को छीलकर चिकना बना रहा है ब्र्थात्‌ 87000 
०४४ कर रहा है | कहने का श्रर्थ यह है कि वह अपनी जागरणावस्था की 
बटनाओ्रों की कथा को ही प्रतीकात्मक भाषा में दुृहरा रहा है। 


यह उदाहरण एक उपन्याक्ष का है, वास्तविक स्वप्त का नहीं । 
स्वप्तों की ही प्रकृति के श्राधार पर एक साहित्यिक स्वप्न की सष्टि कर 
ली गई है। हिन्दी का भारतेन्दु युग अपने साहित्यिक स्वप्तों के लिये 
प्रसिद्ध है। पर एक सच्चा स्वप्त लीजिए जिसका उल्लेख फ्रायड से किया 
है। वह एक रोगिणी की चिकित्सा कर रहा था और वह उसकी मनोविकृति 
के वास्तविक मूल का पता लगना चाहुता था। कहने की प्रावश्यकता 


#|०। शक रे रु 


रहीं कि इस मूलोदगम का पता चलाने के लिए स्वप्त कितने महत्त्ववुणा 
समझे जाते हैं। उस रोगिणी ने एक बार स्वप्न देखा कि उसने एक 
बिल्‍ली को अपनी छाती से दबाया श्रौर वह बिल्‍ली मर गईं। स्वप्न कुछ 
उठपटांग सा है। श्रन्त में चल कर फ्रायड को पता चला कि इस रोगिणी 
की एक सौतेली बहन थी जिसका नाम केठ रिक्वा७ था । उसकी सौतेली 
मां केट को बहुत प्यार करती थी पर इस रोगिणी को नहीं। इस दुराव को 
देख कर इस लड़की के हृदय में ईषा के भाव जगते थे और मन ही मन 
बह श्रपने स्नेहाधिकार के मार्ग में बाधा पहुचाने वाली इस केट की मृत्यु 
कामना करती थी। अतः इस रोगिणी ने स्वप्त में बिल्ली (6७४) को 
नहीं, अपनी सोतेली बहन /५७68 को ही गला घोंट कर मार डाला | 
कैट श्रौर केट इन दोनों दब्दों के उच्चारण में कितनी समता है । श्रतः, 
एक काल्पनिक स्वप्न और वास्तविक स्वप्न की प्रतीकात्मकता स्पष्ट हो 
जाती हैं। दोनों ही किसी वास्तविक घटना को ही काट छांट कर श्रपने 
हग से उपस्थित करते हैं । ' 


दिवा-स्वप्त के बहुत से उदाहरण मिलते हैं। एक भिखारी है । रोज 
जोगों से भिक्षा के रूप में चने प्राप्त कर अपना पेट भरता हैं । उसके 
पास कुछ चने जमा हो जाते हैं। बस क्या है? वह श्रपने घर बेठा है| चने 
की पोटली को देख कर उसकी कल्पना के घोड़े दौड़ने लगते हैं। चने एकत्र 
' हो जाते हैं। वह उन्हें बेव कर कुछ पैसे बना लेता है। फिर वह फेरी 
लगाने लगता है, खोंमचे की दृकान करने लगता है । अरब क्या है ? पैसे 
श्राने लगे । कई दुकानें खुल गईं । मिल, कोठी, कार सब कुछ प्राप्त है | 
पुत्र, कलत्र, धन-धात्य-चुर्ण, सफल जीवन ! 


भब उपन्यास को बात लीजिये । हेनरी जेम्स को अपने उपन्याधप्त 


बज 4 ५ डे न्क् 


8७908 ० 7220ए7607 के निर्माण का बीज कहां से प्राप्त हुआ, उसकी 
कथा लिखी है। एक दिन किसी वार्तालाप के क्रम में उसके मित्र ने एक 
घटना सुनाई । एक मां अ्रपने पुत्र को बहुत प्यार करतो थी। पुत्र भी 
ग्रपनी मां का बड़ा भक्त था | उसके पिता की मृत्यु सन्निकट जान पड़ती 
थी | पिता के पास कुछ बहुमल्य #प्रश्णांप8 थे । उनके ही उत्तरा- 
धिकार के प्रशइनत को लेकर मां और पृत्र में पारस्परिक विरोध के भाव 
इतने उग्र हो गये कि वे श्रागे जानी दुश्मन बन गये हैं। बस इसी संकेत 
को लेकर जेम्स ने अपने उपन्यास की रचना की और इसके इर्द-गिर्द 
लेखक के श्रचेतन में काम करती रहने वाली शक्तियां इस तरह जुड़ गई 
कि वहां एक दिव्य मूर्ति खड़ी हो गई जिस तरह बिखरी हुईं सिकता 
राशि के बीच आप तार छेड दें तो वह उस की शक्ति के श्रनुरूप स्वयं 
एक चित्र की रचना हो जायेगी । स्वप्न में भी यही होता है, वास्तविक 
रूप से जागृत जीवन की घटी हुई घटनायें, जिन्हें 09ए?8 69076 
कहते हैं ले ली जाती हैं। पर उस घटना-श्वखला की कुछ कड़ियों को 
छोड भी दिया जा सकता है, कुछ को विस्तृत रूप देकर, कुछ को संक्षिप्त 
कर, कुछ का स्थानांतरण एक-एक संगठित रूप में उपस्थित किया जा 
सकता है । कुछ के रूप को एकदम बदल भी दिया जा सकता हैं । 


प्र सब शोधन, परिशोधन, परिमार्जन श्रथवा संस्करणशा व्यक्ति के 
प्रचेतन की क्रिया-पद्धति के अनुरूप होता है और इस बात पर निर्भर 
करता है कि अचेतन के किस तार को छेडा गया है, कौन से श्र श॒ को स्पर्श 
किया गया है । एक फेरी वाले मे किसी ग्रहणी को सड़े हुए गोभी के फूल 
दिए । वह भ्रहणी मन ही मन इस तरह ठगी जाते के कारण ग्संतुष्ट है। 
तब स्वप्न में वह फेरी वाला भीमकाय व्यक्ति के रूप में उपस्थित होगा 


जज ९ कक 


जिसकी लम्बी-लम्बी दाढ़ी श्र मछें हों ॥ भले ही जिस फेरी वाले ने 
गोभी के फूल बेचे थे बह कृशकाय तथा अ्रजातशमश्र्‌ व्यक्ति हो । 
कारण कि घटना ने इस ग्रहणी की एलेक्ट्रा ग्रन्थि को कुरेदा 
और तत्कालीन परिस्थिति जग गई हों, और वह फेरीवाला उसके पिता 
का स्थानापन्न बन गया हो- वह पिता जिसकी बडी-बड़ी दाढ़ी मूछें थीं, 
जिसका डील-डौल चौड़ा था, जिससे वह चाहती थी कि वह एक बेवी 
प्राप्त करे पर पिता देता नहीं था । कभी कभी ये प्राचीन भावनायें इतने 
भयंकर और उम्र रूप में जागृत हो सकती हैं कि स्वप्त के रूप में श्रामलचूल 
परिवर्तन हो जा सकता है | यह ठगी हुई नारी स्वप्न में बालिका बन 
जा सकती है, और अपने जन्म स्थान को लौट कर अपने पिता से किसी 
बात पर क्रूढ हो उसके सर पर बार बार तकिये से मार सकती है । कहने 
का ग्रर्थ यह है उपन्यास तथा स्वप्न दोनों की गति एक ही है । दोनों की 
रचना किसी वास्तविक घटना तथा अचेतन की शक्तियों के पारस्परिक 
सहयोग से होती हैं । 

यद्यपि स्वप्त, दिवा--स्वप्न तथा काव्यात्मक रचनायें तीनों व्यापारों 
की मूल प्रेरणा में प्रचेतन वक्तियां सक्रिय रहती हैं, पर इन तीनों में 
इनके कार्य करने के ढंग अलग श्रलग होते हैं -। क्षेत्र और परिस्थिति की 
विज्येषता के अनुसार शक्ति के कार्य करने की पद्धति एवं परिणाम में भी 
विभिन्‍नता श्रा जाती है| विद्यत शक्ति की धारा का मौलिक रूप तो 
एक ही है पर परिस्थितियों के अनुसार उसे पंखा चलाने का, रोशनी 
जलाने का, एवं बोफ उठाने का तथा सेकड़ों तरह के काम लिए जा 
सकते हैं | स्वप्न में भी अचेतव का विजभरा है। परन्तु यह एक शअ्न्य- 
लोक को वस्तु है। अन्य-लोक का मतलब यह कि स्वप्न का निर्मारा मानस 


जप ९ ] फू करके 


के ग्रताधारण स्तर पर होता है, वह अपना तानाबाना उस क्षेत्र में बुनता 
है जिसके द्वार की कुजी निद्रा के पास है और किसो के पास नहीं | श्रतः, 
हमारे जागरण के चेतन ब्यापारों, जिनमें दिवा-स्वप्नों एवं साहित्य-सुजन 
की भी गणना है, से वे सर्वथा भिन्‍ने हो जाते हैं। यद्यपि इसमें श्राधार का 
साम्य अवश्य है परन्तु कार्य-झेत्र के सब था विपरीत होने के कारण जो 
परिणाम सामने झाता है उसके रूप में समानता के सूत्र को खोज लेना सहज 
हीं । ग्रतः, हम दिवा-स्वप्न एवं काव्यसाहित्य तक ही श्रपने को सीमित 
रखेंगे क्योंकि इन दोनों का निर्माण हमारे साधारण, जागृत, तथा 
देनिक व्यापार में सक्रिय होने वाले मस्तिष्क के द्वारा होता है और दोनों 
के बाह्य रूपों में भी कुछ समता होती है । 


विवास्वप्न अ्रसामाजिक होता है; पूर्ण रूप से आत्म केन्द्रित होता है 
( ॥॥90087॥70 ) रूप हीन होता है, इसके वाह्म श्राकार-प्रकार में 
किसी तरह का संगठन नहीं होता। इसके ठीक विपरीत साहित्यसूजन 
सामाजिक होता है। इसकी रचना दूसरों को प्रभावित करने, उच्छृुवसित 
करने के लिए होती है। इसके वाह्य रूपाकार में एक संगठन, सौपष्ठव तथा 
समानुपात होता है और इसकी रचना करते समय रचथिता की हृष्ठि 
आ्रात्म केन्द्रित व हो, विश्व केच्धित होती है, श्रर्थात्‌ जब वह इसकी रचना 
में प्रवृत्त होता है तो, उसके सामते पाठकों का एक बृहद समुह वर्तमान 
रहता है । जिस व्यक्ति की कल्पता विवास्वप्न की प्रवस्था में उन्प्क्त 
उडान लेने लगती है उस समय उसमें किसी प्रकार की लज्जा या शर्म 
का प्रश्न नहीं उठता क्योंकि वहां दूसरे की ग्र॒जाइश ही नहीं है। दिवा- 
स्वप्त में केवल प्रचृत्त होने वाला ही व्यक्ति उपस्थित है, अतः उसे घृघट 
काढ़ने की जरूरत नहीं। वह अपने क्षेत्र का एक छत्र सम्राठ है जिसके 


ख्| श0०५६५_; 


ग्रधिकार में कीई किसी तरह का दखल नहीं दे सकता। वह मानों कहता है 
का 700709876॥ 0 का 3 ड577ए०ए, 
6ए ४876 00878 78 7078 60 दा59प78, 

मैं सारे हृश्य जगत का स्वामी हूं। सेरे श्रधिकार को कोई चुनौती नहीं दे प्कता । 


प्रजातन्‍त्र की व्याख्या करते हुए प्रायः एक श्रग्नजी वाक्य 
का प्रयोग किया जाता है। 2877000790ए 48 608 (४09977777067/ 
07 8086 ?8098, 07 ॥88 #60./8 804 407 ६88 /609!8 
ग्रथात्‌ प्रजातन्‍्त्र में जवता की, जनता द्वारा तथा जनता के लिए ही 
सरकार बनती है। उसी तरह दिवास्वप्न में व्यक्ति ही सर्वेसर्वा होता 
है । यह रचना व्यक्ति की, व्यक्ति के द्वारा, तथा व्यक्ति के लिए होती 
है। यदि दिवास्वप्न में नायक, जो स्वय॑ स्वप्नद्रष्टा है, के सिवा 
कोई व्यक्ति लाया भी जाता है तो उसका कोई एथक व्यक्तित्व नहीं 
होता | उसका रूप गोौणख होता है श्लौर उनकी उपयोगिता स्वप्नद्रष्टा के 
रूप को, भावों को स्पष्ट करने के लिए होती है। स्वप्नद्रप्टा उन्हें मार 
सकता है, काट सकता है, नष्ठ कर सकता है। उन्हें प्यार भी कर सकता द 
है, बटना-क्रम के उन्हें थोड़ा बहुत स्थान भी दे सकता है। १२ सबका 
उद्देश्य एक ही होगा स्वप्नद्रष्टा के स्वार्थ की सिद्धि, उसकी ही सेवा में 
अपने रूप को विलीन कर देना । इपी से दिवास्वप्तों को असामाजिक तथा 
श्रात्मकेन्द्रित कहा गया है। दूसरों के लिए बोधगम्पता की छार्त से यह 
मार्यादित नहीं। यहां पर स्वप्लद्रष्टा ही रचयिता है और पाठक भी । 
श्रतः, कह सकते हैं कि दिवास्वप्वय एक ऐसी साहित्यिक रचना है जिसका 
लेखक श्र पाठक एक ही है। दूसरों को श्रपने स्वप्नों में सहमोक्ता होने 
के लिए वह प्रामन्त्रित नहीं करता । 


प्र काव्य-व्यापार की सामाजिकता स्पष्ट है। कविता निकलती है तो 
एक हृदय से पर अनेक हृदयों को प्रभावित तथा आनन्दित करती है। 
इतना ही नहीं कि वह समसामयिक व्यक्तियों को ही अ्रानन्द प्रदान कर 
विरत हो जाये । वह युग-युग तक भिन्न-भिन्न रुचि के व्यक्तियों, भिन्‍न 
प्रवस्था में भावपुलक का संचार कर सकती है । संस्कृत के कवि ने 
काव्य के स्वरूप पर विचार करते हुए कहा है--- 


कबिता-रस-माधुये कविवेत्ति न तत्कवि। 
भवानी-श्र्‌ कुटि-भंगं भव वेत्ति त भूधरः ॥ 


भ्रतः, कहा जा सकता है कि पार्बती के रसास्वादन का ज्ञान जहां 
भूधर को होने लगेगा वह दिवास्वप्न का क्षेत्र होगा। पर व्यावहारिक जगत 
में, जो काव्य जगत है, तो पार्वती के रसास्वाद के अ्रधिकारी हर ही हो 
सकेंगे । 


कविता में रूप सौष्ठव का तत्व अनिवार्य है। इसके अ्रभाव में काव्य 
का स्वरूप खड़ा हो ही नहीं सकता । यहां तक कि विचारकों का एक दल 
तो काब्य के वाह्य रूप तत्व को ही काव्य-तत्व समझता है और इसी के 
ग्राधार पर कविता के महत्व का मूल्यांकन करता है। इस तरह की 
एक 6४087 के समर्थन करने वालों में बड़े बड़े गम्भीर 
विचारकों के नाम भ्राते हैं। परन्तु दिवास्वप्न में रूप-सौष्ठव का प्रश्न 
ही नहीं उठता ॥ वहां तो प्रायः एक ही बात, विषय, या घटना की पुन- 
रावृत्ति होती रहती है भ्ौर उसी को अनेक परिस्थितियों में ले जा कर 
देखा जाता है। दिखाये जाने की तो बात ही वहां नहीं रहती । श्राप कोई 
भी ऐसी कहानी या उपन्यास नहीं पायेंगे, चाहे वह कितनी ही निद्ृष्ट 


श्रेणी की क्‍यों न हो, जिसमें कारण-कार्य की शव खला को बनाये रखने की 
चेष्टा न की गई हो, घटनाओं में पारस्परिक श्रादान-प्रदान ने होता हो 
गऔर चरित्र की विशिष्ठता की रक्षा करने का प्रयत्न न हो। कविता चाहे 
कितनी ही श्री हीन और लचड़ क्‍यों न हो वह दिवास्वप्त की अ्रनगढ़ता, 
फहड़पन, तरलता तथा बिखराहुट की सतह॒ पर नहीं ञ्रा सकती । 
दूसरी ओर दिवास्वप्न कितना ही संगठित क्‍यों न हो (कुछ एसे दिवा- 
स्वप्तों का उल्लेख मिलता है जो कथा की तरह प्रतिभासित होते हैं, 
जिसमें एक की चर्चा अभी ही होगी) वे कविता की सतह को छू नहों 
सकते । कविता कितना ही भुके, दिवास्वप्न कितना ही ऊचा उठने का 
प्रयत्त करे दोनों की खाई पाटी नहों जा सकती । दोनों में पार्थक्य 
रहेगा ही । 


कविता श्र दिवास्वप्न दोनों में ही इच्छा-पूर्ति की बात रहती है । 
दोनों का स्रपष्टा श्रपतो किसी इच्छा की पूर्ति करना चाहता है जिसकी 
सम्भावना व्यावहारिक जगत की कठिनता के कारण चूर चूर हो जाती 
है । किसी दरिद्र, विपन्‍न, पद-दलित नायक की सम्पन्नता, समृद्धि तथा 
सफलता की कथा दोनों में ही रह सकती है | परन्तु दिवास्वप्न में श्रपनी 
मनोवांछित कामनाग्रोंकी प्राप्ति की इच्छा इतनी उतावली रहती हैकि उसमें 
एक क्षण का भी विलम्ब श्रसह्य होने लगता है। उसमें समय तत्व को मिटा 
देने की प्रवृत्ति होती है, चरम सीमा पर घटनायें तुरन्त पहुंच जाती है। 
उसमें एक अदम्य तात्कालिकता होती है । श्रतः बीच की कड़ियों को स्पष्ट 
होकर सामने श्राने का अ्रवसर कम मिलता है । यदि ग्रालंकारिकों की 
भाषा के सहारे कहूं तो यही कहा जा सकता है कि कविता, दिवास्वप्नों 
में वही श्रन्तर है जो उपमा, रूपक श्रौर रूपकातिशयोक्ित में है | 


किम ५ 908 « 


श्रापके सामने तीन वाक्य या वाक्यांश हैं। यह मुख चन्द्रमा के 
समान सुन्दर है ( उपमा )। यह चन्द्रमुख कितना सुन्दर है ( रूपक ) 
यह चांद ऊगा हुआ है (रूपकातिशयोक्ति) | प्रथम में सारी बातें स्पष्ट हैं 
उपमान, उपमेय, साधारण धर्म, संयोजक शब्द सब वत्त मान हैं, श्रलग 
झलग। दूसरे में चर्रमा आकाश से जमीन पर उतर कर सुख 
के पास चला ग्राया | हाँ, अपनी स्थिति को एकदम विलीन नहीं कर पाया 
है । संयोजक शब्द तो हट ही गया है । यह्‌दिवास्वप्न है। तीसरे में सब 
को निगीर्ण कर केवल चांद ही रह गया है। यह हुआ्ना स्वप्न । स्वप्न में 
आधार-वस्तु को ऐसी कायापलठ हो जाती है कि उसका रूप ही तिरो- 
हित सा हो जाता है । वास्तविकता का पता लगाना साधारण व्यक्ति के 
लिए कठिन हो जाता है । फिर भी स्वप्न के )४७77/880 00797 के 
सहारे, कुछ मनोविज्ञान के सिद्धान्त के प्राधार पर ॥,88४॥ 20006870# 
का पता लगाया जा सकता है, जिस तरह चांद के सहारे मुख का । रूपक 
में, उपमेय में विकार अवश्य आ गया है पर वास्तविकता के चिन्ह एक दम 
लुप्त नहीं हो जाते | दिवास्वप्त में भी कल्पना मात्र का परिवर्तन भले ही 
कर दे, दरिद्रता को हर तरह से धत-धान्य सम्पन्न भले ही कर दे, पर 
श्रादमी को पशु नहीं बना सकती, ७08 को (/७ नहीं बना सकती। 
लेकिन स्वप्न में यह बात साधारण सी है। कविता में सारी बातें स्पष्ट 
रहती हैं जिस तरह उपमा के चारों चरण वर्तमान रहते हैं । 

मनोविज्ञान के साहित्य में अनेक दिवास्वप्नों का उल्लेख तो मिलता! 
है । पर ऐसे उदाहरण एक दो ही मिलते हैं, जिनमें दिवास्वप्न के द्रष्टा ने 


अपने स्वप्नों को लिपिबद्ध करने का प्रयत्त किया है | कैवल 775 
27890 ने एक स्थान पर श्रपनी एक रोगिणी महिला की चर्चा की है, 


जा है१० - 


जिसने अपने दिवास्वप्म के झ्राधार पर एक कहानी की रचना की थी। 
एक कहानी कहने से पश्रधिक कहानियों की श्र खला की रचना कहना 
प्रधिक उपयुक्त होगा । क्योंकि कहानियां ले दे कर एक ही थीं। एक 
शक्तिशाली व्यक्ति एक नर्बल निरीह व्यक्ति को बार-बार उत्पीडित करता 
है| पर भ्रन्त में दोनों में सदभाव की स्थापना हो जाती है। इस कल्पना 
के जटिल मल उद्गम का पता लगाना कठिन है। स्वयं रोगिणी की 
स्मृति भी इसमें श्रधिक सहायक नहीं होती थी । वह इतना हो कह सकती 
थी कि इस तरह कल्पना में हल्का सा मेथशुनिक रंग का पुट रहता और 
हस्तमेथुन की प्रवृत्ति होती | मनोवेज्ञानिकों ने जिसे (88097099/07ए 
%&७707 कहा है। उसका सम्बन्ध मानस की उस ग्रवस्था से जोड़ा गया है 
जिसे 06ए9प8 8प%7४07 कहते हैं, जिसमें पिता प्रतिह्न्द्दी के रूप में 
देखा जाता है, एक प्रोढ़ व्यक्ति एक मिरीह बार-बार पीठते हुए देखा जाता 
है । हमें इस स्वप्व के इस पहलू से विशेष मतलब नहीं । हमें देखना यह 
है कि जब तक यह दिवास्वप्न श्रपने श्रात्म केन्द्रित रूप में ही रहा तब 
तक इसका स्वरूप क्या रहा है ? बाद में इसी दिवास्वप्त को लिपिबद्ध 
किया गया तो इसके स्वरूप में क्या परिवर्तन उपस्थित हुए। तब फिर 
यह विचार करना है कि दिवास्वप्न में इतना परिवर्तन हो जाने पर भी 
वह दिवास्वप्न ही क्‍यों बना रहा ? श्रांगे बढ़ कर साहित्यिक कहानी का 
गौर क्यों नहीं प्राप्त कर सका ? 

पर्व लिपिवद्धावस्था में कहानी यों थीं । "एक मध्यकालीन सामंत कई 
वर्षों से अपने शन्रुओ्रों के संगठित दल से युद्ध करता भरा रहा है। एक युद्ध 
के अवसर पर उस सामन्‍्त के सैनिकों ने एक पद्वह वर्ष के ( दिवास्वप्स 
देखने वाले की श्रवस्था ) राजकुमार को बन्दी बनाया । बह बन्दी सामंतत 


“१११ - 


के गढ़ में लाया गया । वहां वह कुछ दिनों तक बन्दी बना कर रखा गया 
पर श्रन्त चल कर उसने पुनः अपनी स्वतन्त्रता प्राप्त करली” इस कहानी 
में दो ही पात्र तो मुख्य हैं, विशालकाय दुर्दान्त सामन्‍त तथा अ्रल्पकाय 
कोमल राजकुमार। इन्हीं दोनों पात्रों को लेकर कहानी की रचना 
कितने दिनों तक होती रही । सब कहानियों का चरमोत्कर्ष कहां रहा 
जहां विशालकाय उत्पीडक सामन्‍्त के हृदय में बालक राजकुमार के लिए 
दया और करुणा के भाव जगने लगते। प्रारम्भ में कुछ दिनों तक जिन 
कहानियों की रचना की गई । उनमें कथा धीरे-धीरे श्रागे बढ़ती और भ्रपनी 
चरभावस्था पर पहुंचती श्रौर दोनों प्रतिद्वन्द्रियों में मैत्री भाव की स्थापना 
होती है । परन्तु बाद में इस अवस्था में परिवर्तन होता सा दीख पड़ने लगा। 
भूमिका भाग का तथा उस प्रारम्भिक भाग का लोप होने लगा जो 
चरम सीमा के लिए पृष्ठभूमि का निर्माण करता है। यह सब के व्यावहा- 
रिक अनुभव की बात है कि लक्ष्य और उसकी सिद्धि में समय और साधन 
का व्यवधान होता है। हम उचित साधनों का उपयोग कर ही, उचित 
समय पर ही, उचित मार्ग से चल कर ही श्रपने लक्ष्य प्र पहुंचते हैं। 
कृबीर ने कहा है कि 


हासी हंसि कंत न पाइया, जिन पाया तिन रोय 
हांसी खेले पिय मिले, विरलों सुहागिन होय। 


पर दिवास्वप्न द्रष्टा ऐसी ही सुहागिन होता है जो हांसी खेल में ही 
प्रिय को प्राप्त कर लेना चाहता है। रोने के लिए धेर्य उसे नहीं रहता । 
उसके लिए यह सम्भव भी नहीं है क्योंकि स्रष्टा भी वही, भोक्ता भी वही, 
तब यह विलम्ब क्‍यों ? जब मां ही पूरी पका रही है तो उसका पूत तरसे 
क्यों ? द 


ही 3 हर 2 


श्रभी तक यह कहानी लिखी नहीं गई थी । मस्तिष्क में दिवास्वप्त 
के रूप में ही श्रवस्थित थी । कुछ वर्षों के बाद इस महिला ने इसे कहानो 
के रूप में लिपिबद्ध किया, तब इसमें परिवर्तन करने पड़े । 


पहली बात तो यह है कि दिवास्वप्न के वर्तमान को कहानी का श्रतीत 
बनता पड़ा। दिवास्वप्न चाक्षुप और वर्त्तमाव होता है, वह कल्पना के 
सामने घटता होता है । कहानी शाब्दिक होती है और अतीत घटना के 
रूप में उपस्थित होती है | श्रतः, यह वर्त्तमान का श्रतीत रूप धारण कर 
लेना प्रथम परिवत्त न हुआ्ला । दूसरी बात यह कि ग्रतीत व्यवस्था-प्र धान 
होतव है, इसकी घटनाओं में एक व्यवस्था होती है, वर्त्तमान की तरलता 
नहीं होती । अ्रतः अ्रतीत के क्षेत्र में श्रारोपित होने के कारण अरब णो 
कहानी लिखी गई वह अधिक संगठित थी, श्र खलित थी । एक नया पात्र 
भी लाया गया जो दिवास्वप्त में नहीं था । वह था बन्दी राजकुमार का 
पिता श्रौर इस नये पात्र की सामन्त के साथ वार्तालाप के माध्यम से ही 
सारी कहानी कही गई। यह बात भी देखी गई कि कहानी की चर- 
मावस्था, जिसमें बच्दी राजकुमार तथा सामन्त में मैत्री तथा स्नेहभाव की 
स्थापना हो जाती है, का महत्व कम होने लगा । 


कथाकार का सारा ध्यान एृष्ठभूमि तैयार करने, कारण-कार्य की 
कड़ियों को जोड़ने तथा कथा के रूप सौष्ठव के निर्माण करने में प्रधिक 
केन्द्रित होने लगा | पहले चरमावस्था का स्पष्ट शब्दों में वर्णन किया 
जाता था। अभ्रब इस लिपिबद्ध कहानी में सारा वातावरण तैयार कर 
चरमावस्था पर पहुंचने का भार पाठक की कल्पना पर डाल दिया गया । 
पहले जहां फल्ागम, फल-बप्ति, चरमावस्था पर पहुंचने की जल्दबाजी 


4 


थी, वहां उसका स्थाव कथावस्तु के निर्माण-कौशल ने ले लिया । दिवास्वप्न 
की श्रसमाजिकता दूर होने लगी श्ौर कहानी श्रात्म-केन्द्रित श्रवस्था का त्याग 
कर एक श्रोता की श्रपेक्षा से गति में गम्भीरता लाने लगी । पहले दिवा- 
स्वप्न की अवस्था में प्रारम्भ कहानी, कट से फलागम पर पहुंच जाती 
थी । पर प्रब उसमें प्रयत्त, नियताप्ति इत्यादि गब्रवस्थायें भी परिस्फुटित 
होने लगीं । 


परन्तु फिर भी इस लिपिबद्ध दिवास्वप्त को कलात्मक-वस्तु श्रथवा 
कहानी नहीं कह सकते । कारण कि सब कुछ होते हुए भी इसमें श्रात्म- 
केन्द्रिता, स्वार्थ-प्रियता, उपभोक्ता की श्रात्मीयता से पिंड नहीं छूट सका 
है। उपभोक्ता स्रष्टा नहीं बन पाया है। उसकी श्रनुभृति प्रात्मानुभूति से 
प्रागे बढ़ कर काव्यानुभूति का रूप नहीं धारणा कर सकी है । कलावस्तु- 
कविता, उपन्यास, नाटक जिसकी श्रेणी में पाते है, के निर्माण का प्रश्न 
उपभोक्ता और ख्रष्दा की दूरी का, पार्थक्य का प्रश्न है। जहां तक ख्रष्टा 
ने उपभोक्ता से श्रपने को दूर कर लिया है, वहीं तक वह सफल कलाकार 
हो सका है। हम, आप, वे, राम, श्याम, मोहन, कालिदास, शैक्सपियर, 
निराला और पन्‍त सभो तो काव्य-रचना में प्रवृत्त होते हैं। सबमें श्रनुभूति 
होती है,जिसकी श्रभिव्यक्ति वे करना चाहते हैं, पर फिर भी वे कवि कहला 
गये, श्रमर बन गये, पर मैं कुछ भी नहीं बन सका ? मेरी रचना एक क्षण 
तक भी जीवित न रह सकी, ऐसा क्यों ? उनकी उपलब्धि का रहस्य 
प्रपनी वास्तविक ग्रनुभृति की यथातथ्यता से श्रपने को हटा कर उन्हें एक 
बहद-क्षेत्र में रखने की शक्ति में है। जिन्हें हम निम्न श्रेणी का कथा- 
कार कहते हैं उनमें भी स्वार्थानुभूतियों की साक्षात्‌ तात्कालिकता से द्रष्टव्य 


“११४ ० 


द्री पर ही सूजन कार्य प्रारम्भ होता है श्रौर श्रनुभृतियों को स्व” की सीमा 
से हुटा कर पर! के विज्ञाल क्षेत्र में स्थापित करने की चेष्टा होती है । 


इसी पार्थक्य वाली बात को 44, ॥720, 57[067७20 इत्यादि शब्दों 
के सहारे भी समझा जा सकता है। मनोविज्ञान के क्षेत्र में ये शब्द प्रसिद्ध 
तो हैं ही। साधारण साहित्य के विद्यार्थी के लिये भी ये शब्द सहज हो 
चले-हैं। । 4में हमारी मूल आदिम प्रवृत्तियां स्वच्छन्द रूप में विचरण करती हैं। 
वहां व्यक्ति एक तरह से श्रद्व॑त क्षेत्र का निवासी होता है, 'एकोहं द्वितीयो 
नास्ति', वहां इच्छा तथा उसकी पूत्ति में कोई भेद नहीं। बालक की इच्छा 
दूध की हुईं नहीं कि वह प्राप्त हुआ | उसे प्राप्त होना ही है, अविलम्ब ! 
मां का दूध देने वाला स्तन दूध चाहने वाले बालक से पृथक भी है और 
कभी-कभी दूध नहीं भी दे सकता, यह |04 की समझ के बाहर की बात 
है। मैं आगे यही कहने जा रहा हूं कि स्वप्न-पू्ति के निर्माण में ॥0 की 
शक्तियों की प्रमुखता रहती है, दिवास्वप्त के निर्माण में 220 की तथा 
उपदेशों, प्रवचनों एवं सोह श्य साहित्य के निर्माण में 57097-880 
की । ग्रतः, इनके स्वरूप पर ठहर कर विचार लें तो हमें श्रपने विषय को 
समभकने में सहायता मिलेगी । 


44 सर्वथा श्रानन्द-मूलक होता है। ॥2]088776 ॥?/770796 पर 
काम करता है । श्रान्तरिक या वाह्य उत्तेजना से मनुष्य के श्रन्दर जो 
एक तनाव सा झा जाता है, एक भार सा, दबाव सा महसूस होने लगता 
है उसकी निवृत्ति, उससे मुक्ति उसका प्रधान लक्ष्य होता है। नासिका- 
रंक्ष के संवेदनशील तन्तुओों में किसी वाह्य वस्तु के स्पर्श से सुरुराहट 
पैदा हुई । बस छींक श्राई श्र परिस्थिति की श्रनुकूलता से मुक्ति हुईं । 


45050 


यह ॥0 का मौलिक रूप है। यह बहुत लचीला होता है, अपने लक्ष्य की 
प्राप्ति में बाधा होने पर यह बड़ी आसानी से अपने लक्ष्य तथा वांछित 
वस्तु के रूप में परिवर्तत कर ले सकता है। मानिये कि वह जो 
मेरी चाची है न, मेरी इच्छा होती है, कि उसे ठोकर मार कर सीढ़ी से 
नीचे पटक दू, पर यह कठिन काम है। श्रतः, मैं उसे न मार कर उसके 
कुत्तो को मारने लगम॒गा। पत्नी अपने पति पर नाराज होती है तो वह 
प्रपने क्रोध को पुत्र पर निकालती है, यह तो देनिक अनुभव की बात है। 
गोपियां जब कृष्ण पर रुठीं श्रौर उन्हे कुछ कहने सुनने की इच्छा हुई तो 
बंसी को ही खरी-खोटी सुना कर अ्रपने मन के ग्रुब्बार को निकाल लिया। 
प्रतः [6 की सहायिका मानसिक पद्धति को 7779797ए ॥07000888 
कहा जाता है। इसमें किसी वस्तु को श्रात्मनिष्ठ स्मृति तथा उसके वाह्य 
ग्र[कलन में क्‍या अन्तर है यह स्पष्ट नहीं होता । प्यासे वी कल्पना बालू 
के कण में भी पानी की धारा देखती है, भूखे को चांद श्र स्रज भी 
रोटी के टुकड़ों की तरह दीख पड़ते हैं। यह ख्राहित्यिक भाषा मात्र ही 
नहीं है। मानस की एक श्रवस्था होती है जिसमें यह बात सही होती है । 
व में कोई ताकिक संगठन नहीं होता, कारण-कार्य की श्वूखला की 
परवाह वहां नहीं होती । यह आत्मनिष्ठ वास्तविकता का संसार है, 
प्रानन्द की खोज तथा दुख की तिरस्कृति, यही एक मात्र कार्य है ! 


परन्तु देर या सबेर व्यक्ति को ठोस वास्तविकता का सामना करना 
ही पड़ता है। भूख लगने से ही श्लौर रोटी की मरति देख लेने से ही तो 
पेट नहीं भरता। कल्पना कीजिए कि श्राप छुत पर है, भूख के मारे 
व्याकुल हैं, नीचे रोटी पड़ी दिखलाई दी, +. 0 तो कहना है कि बस अब 
विलम्ब क्‍यों ? पर यदि व्यक्ति उसी के संकेत पर चले तो कूद कर हड्डी 


की का की, 2 


पसली एक कर ले । 780 कहता है कि नहीं ऐसा न करो, थोड़ा ठहरो, 
सीढ़ी से धीरे-धीरे उतर कर जावो और व्यक्ति ऐसा करता भी है। इसमें 
रोटी रूपी वाह्य उत्तोजना से हमारे श्रच्दर जो तनाव की स्थिति श्राई 
उससे तत्काल मुक्ति नहीं हुई,उसमें विलम्ब हुआ । यहां की मानस-प्रक्रिया 
को 880607497ए 7700888 कहा जाता है श्र इसमें, श्रादमी में, समय 
झ्रौर स्थान पर नियन्त्रण करने की क्षमता श्राने लगती है। मनुष्य बाहरी 
सम्पर्क में श्राने के कारण अनुभव से सीखने लगता है । 4 में वाह्य वस्तु 
की सत्ता है ही नहीं, सब कुछ स्व” है, 'पर' है ही नहीं । श्रतः, अनुभव 
प्राप्त करने का प्रश्न ही नहीं उठता। यहां आराकर मानसिक आत्मनिष्ठ 
संसार तथा वाह्मयनिष्ठ वास्तविक संसार का पार्थक्य स्पष्ठ हो जाता है। 
दोनों को एक में मिला कर देखने की भूल यहां नहीं होती | इसी को मनी- 
वैज्ञानिक शब्दावली में कहा जाता है कि [890 090॥॥7ए 7/780009 
पर काम करता है । 


ऊरर जिस (४986 रा807ए का उल्लेख किया गया है श्र जो 
तीन पहलू दिखलाये गये हैं उन पर पुन; विचार करें । साहित्यिकता, 
कलात्मकता के पास पहुंचने के लिए इसे तीन कदम उठाने पड़ते हैं। प्रश- 
मत: तो कल्पना के जागरित होते ही, मतलब दिवास्वप्न के उद्भवमात 
से ही, ॥/980770%707 787698ए के द्वारा प्रपनी काम-वासना की 
तृप्त की समस्या खड़ी हो जाती है। श्रर्थात्‌ इसमें क्रियात्मकता प्रधान 
है। दूमरी श्रवस्या में दिवास्वप्त के स्वरूप में और विस्तार ग्राता है 
जिसमें कामुकता का श्रश है तो सही पर उसका रूप गौरा होने लगता है, 
दूसरी-द्सरी कहानियां श्राकर उसे मौलिक कार्य क्षेत्र से दूर रखने 
लगतीं हैं। तीसरी लिपिबद्ध श्रवस्था में श्राकर दिवास्वप्न में निर्मित कथा 


09 «०02 


में एक संगठन की मात्रा आ जाती है। यह पता नहीं कि इस रोगी के 
सन्पुख दिवास्वप्त की लिपिबद्ध कथा-सृष्टि के समय कोई श्रोता 
ध्यान में था या नहीं । वह जिस समय इस तीसरी अवस्था में कथाओ्रों 
का ताना-बाना बुनने लगा उस समय वह यह चाहता था या नहीं कि कोई 
इसरा व्यक्ति भी उसे पढ़े । पर भनोविज्ञानवेत्ताश्ों ने दूसरे-दूसरे 
(79888 का प्रध्ययन कर जो परिणाम निकाले हैं उससे तो इसी विश्वास 
की पुष्टि होती है कि उसके सामने किसी न किसी रूप में श्रोता श्रवश्य 
वर्तमान था । वह श्रोता भले ही कोई भन्य व्यक्ति न होकर स्वयं हो, पर 

बता श्रोर श्रोता में पार्थक्य का श्र कुर उगने जरूर लगा था। दिवास्वप्न 
की अश्न॑ंमाजिकता में दरार पढ़ते लगी थो और उनयें समाजोन्ग्रुखता के 
तत्व आने लगे थे । 


यदि हम इसको बेधड़क पूर्ण-विकसित कहानो नहीं कह देते, जैसे 
प्रेमचन्द या प्रसाद की रचनाश्रों के बारे में कह देते हैं, तो इसका एकमात्र 
कारण यही है कि इसमें श्रभी तक प्रेरक शक्ति के स्वरूप का ठीक तरह से : 
शुद्धीकरण नहीं हो सका है, जिसे मनोवेजानिक शब्दावली में 5प- 
77%707 कहा जाता । शक्ति तो सब जगह रहती ही है। श्राज कल के 
वेज्ञानिक तो (७6087 को भी 777072ए का पूजीभृत रूप मानते हैं । 
प्रश्न तो यह है कि वह +॥70727 जो एक दूसरे काम में लगी हुई है, 
अच्छे या धुरे, उसे वहां से हटा कर दूसरे मार्ग में क्रिस तरह प्रवृत्त किया 
जाय । इसके लिये हमें पहले इसे ।र७प//४७।58 करना होगा। पारद को 
जब तक श्रच्छी तरह भस्म नहीं कर लेते तब तक हम उसका जीवन-प्रद 
रासायमिक ग्रोषत् के रूप में प्रयोग नहीं कर सकते । 


“ १ै३८ « 


कला वस्तु की निर्मिति के लिए, यह सब जानते हैं, कि मानसिक 
शक्तियों को 500॥7708 करना पड़ता है। इस 570॥779709 के दो 
पहलू होते हैं, जिनके पार्थक्य पर ध्यान प्रायः नहीं दिया जाता । उदात्ती- 
करण के लिए प्रथमतः तो शक्ति को ग्रसमाज-सम्मत लक्ष्य से हटा कर 
समाज-सम्मत लक्ष्य की श्रोर प्रेरित करना पड़ता है। पर इतने से ही 
काम नहीं चलता । श्रागे बढ़ कर काम करने वाली शक्ति के रूप में भी 
संशोधन करना पड़ता है। श्रर्थात्‌ लक्ष्य तथा रूप दोनों में परिवर्तन झ्राव- 
इयक होता और यह कोई आवश्यक नहीं कि दोनों में परिवर्तत एक साथ 
ही हो जायें। मान लीजिये आपने श्रपनी काम शक्ति को मोड़ कर किसी 
उच्च धामिक कृत्य की ओर मोड़ दिया । यह है तो ठीक । पर यह भी ठीक 
है कि श्राप जिस त्वरा के साथ, जोश-खरोश के साथ, अ्रदम्यता के साथ, 
लाचारी श्रौर बेवसी के साथ, इस उच्च कृत्य में प्रवृत्त हों, उसमें कामुकता 
की बृ मौजूद हो। श्रर्थात्‌ आपकी शक्ति में वह मूल प्रवृत्यात्मक गुण 
लगा ही रह गया हो । 


शुक्ल जी ने कहीं लिखा है कि मैंने ऐसे बहुत से उपदेशकों को देखा 
है जो विधवाश्ों की दीन दशा का वर्णान बड़ा ही विस्तारपूर्वक करते है 
पर फिर भी उनके छाब्दों में एक ऐसी शक्ति होती है जो पुकार पुकार कर 
कहती है कि यह तो कामुकता का ही प्रच्छन्न रूप है। जाने दीजिये शुक्ल 
जी के उदाहरण को । आपने बहुत सी ऐसी कहानियां पढ़ी होंगी जिनके 
उद्द श्य बड़े ऊंचे होते हैं, लोगों के अ्रन्दर नैतिकता को जागरित करना, 
व्यभिचार को रोकना, स्त्री-पुरुष-सम्बन्ध की मर्यादा की प्रश्स्ति गाना । 
पर उनके वर्णान करने का ढंग कुछ ऐसा मजेदार हो जाता है, भाषा कुछ 
ऐसी लज्जतदार हो जाती है कि जिसके विरुद्ध जिहाद बोला जाता है 


् 


उसके ही प्रति पाठक के हृदय में दिलचस्पी उत्पन्न होने लगती है। दूसरी 
श्रोर इसके ठीक विपरीत बात भी देखी जाती है। लेखक स्पष्ट वक्ता हैं, 
यथार्थवादी है, समाज के नग्न रूप का चित्रण करने से कतराता नहीं, 
उपदेश भी नहीं देता पर फिर भी पाठक में वर्ष्य वस्तु के प्रति आसक्ति 
उत्पन्न नहीं होती । ऐसा क्‍यों ? इसीलिए कि उसने मुल प्रेरक शक्ति को 
धो पोंछ कर 'ं०४४७१४७ कर दिया है, उसका शुद्धीकरण हो गया 
है। झ्रतः, उसकी रचना में 5०57७]89007 या 2227888 77 29- 
5707 नहीं है। इसी तरह हम यहां पायेंगे कि तृतीय लिपिबद्ध श्रवस्था में 
भी जिसे हम शक्ति का शुद्धीकरण या 7२७७०४९७)४०७ करना कहते हैं वह 
ठीक तरह से नहीं हो पाया है। जिस ढंग से घटनाओं की योजना की गई 
है उसमें एक ऐसी त्वरा है, उमंग है, स्वतःप्रेरिता है जो साहित्य में नहीं 
रहती भशौर व होनी चहिए । 


हमने ऊपर ख्रष्टा और भोक्‍ता के पार्थक्य की बात कही है। भोकक्‍ता 
से दूर होकर ही कला-वस्तु की सृष्टि हो सकती है, साहित्य का सूजन 
हो सकता है। यह बात तब और भी स्पष्ठ होगी जब हम स्वप्न या 
दिवास्वप्न के क्षेत्र को छोड़ कर साहित्य के क्षेत्र में श्रा जाय॑ श्रौर साहित्य 
के विविध रूपों पर विचार करें । साहित्य का कितने ढंग से वर्गीकरण 
हो सकता है तथा इसमें श्रेणियां स्थापित हो सकती हैं। पर उनसे 
हमारा मतलब नहीं श्नौर न हम विस्तार में जाना ही चाहते हैं। पर हम 
साहित्य की दो श्रेणियां तो बड़े मज में बना सकते हैं हल्का मनो- 
रंजक तथा गम्भीर। श्रग्नेजी में इसे ॥॥800 तथा 560४0प8 कह 
सकते हैं । प्रथम में दिलबहलाव, 78797777076 तमाशबीनी 


“ १२० - 


की प्रधानता होती है। पाठक के हृदय को सहला देना, उसकी मनो* 
वांछित वस्तु को तुरन्त उपस्थित कर देना, बालक को भ्ुुन-झुना बजा कर 
चुप कर देना उसके उह् ब्य होते हैं। दूसरे में मनोरंजन को प्रवृत्ति नहीं 
रहती, सारे वातावरण में श्रवसाद की छाया वत्त मान रहती है, हृदय की 
पीड़ा जागृत करने की प्रवृत्ति होती है। साहित्य में (/070०48ए और 
47884697 नाम बहुत प्रसिद्ध हैं। सुखान्त और दःखान्त साहित्य से 
सब परिचित हैं। हम यह भी जानते हैं कि वह ट्रे जिडी जिसमें नायक को 
हर तरह की पीड़ा का सामना करना पड़ता है, विपत्तियां उठानी पड़ती हैं, 
श्रोर भरी जवानी में सारे श्ररमानों को लिये दिये मृत्यु की गोद में चला 
जाना पड़ता है। उसकी गणना उच्चस्तर कोटि के साहित्य में होती है। 
विश्व का सारा श्रेष्ठ साहित्य ट्रौजिडी है श्लौर उसने लोगों को प्रभावित 
किया है। इसका क्‍या कारण है ? 


इसका कारण यह है कि प्रथम कोटि में श्राने वाले मनोरञ्जन 
साहित्य में भले ही श्य्म गये हों, पर श्रभी तक वे दिवास्वप्न वाली अवस्था 
को सर्वथा छोड़ नहीं सके है। बालक पूर्गरूप से ए687760 नहीं हो सका 
है, हृध नहीं छोड़ सका है। श्रन्न खाने लगा है तो क्या, उसे मां के स्तन 
की याद ग्रा ही जाती है । 


सघन कुतञ्सल, छाया सघन, शीतल मंद समीर । 
मन अजहुँ चलि जात हज, वा जमुना के तीर ॥। 


वाली श्रवस्था बनी रहती है| वह तुरन्त श्रपनी इच्छा-पूति कर लेना 
चाहता है, क्षण भर का व्यवधान उसके लिए श्रस्नह्म है। 'क्षण भर की 
चेतनता अब सहाय नहीं ओ भोली' | यह सुखद श्रन्त वाला साहित्य 


“ ९२६ « 


भी तो यह छोड़ श्रौर कया करता है| इस +997099ए 67०४४४ वाले 
साहित्य में दो विछुड़े प्रेमी मिल जाते हैं, (कसी दुर्दान्त खल से उद्धार कर 
नायक नायिका से विवाह कर लेता है, किसी रहस्यमय ढंग से कोई 
समस्या सुलझ जाती है, किसी ताबीज या ग्रुप्त पत्र के द्वारा विपन्न बालक 
किसी बड़ी धन-राशि का उत्तराधिकारी हो जाता है। ऐसे उपन्यासों की 
एक परम्परा ही रही है श्रौर आ्राज भी है। शक्ुन्तला के बारे में दुष्यन्त के 
हृदय में एक बार शंका जरूर उठेगी पर वह तुरन्त शान्त हो जायेगी । 


अशसयं क्षत्रपरिग्रहक्षम यदस्यामभिलाषि मे मनः । 
सतांहि सन्देह पदेषु प्रसाणमन्तकरणप्रवृत्तय: | 


इच्छा-पूति के मार्ग में बाधा नहीं आयें सो बात नहीं । बाधायें तो 
झ्रावेंगी । तरह-तरह की जटिलतायें भी श्रारवेंगी । परन्तु वे प्रन्तिम रूप में 
इच्छा-पूति का रंग गाढ़ा करने के लिए ही शआ्ावेगीं । देर होने दो, कोई 
परवाह नहीं। 'दिर पके फल मीठा होय ।” इससे मिलन-सुख में वृद्धि ही 
होगी । इस तरह का प्रश्न एक बार संस्कृत के श्रलंकार शास्त्रियों के 
सामने भी आया था । समस्या थी कि खलनायक के गुणों का विस्तार- 
पूर्वक वर्णत किया जाय या नहीं । उसमें वीरत्व, शौर्य, वीर्य को दिख- 
लाया जाय या नहीं । एक ने कहा कि नहीं ऐसा नहीं करना चाहिए । 
यदि ऐसा करेंगे तो पाठकों के द्वारा नायक के. लिए सुरक्षित सहानुभूति 
में वहु भी हिस्सा बटाने लगेगा। श्रतः यहां ग्रुणहीनता ही श्रे यस्कर है। 


दूसरे दल वालों ने कहा कि ऐसा नहीं | खल का भी वर्णन विस्तार- 
पृ्वक होना चाहिए और उसमें सदगुणों का श्रारोप होना चाहिये। ऐसे 
शक्ति-सम्पन्न शेतान को पछाड़ने में नायक के गौरव की वृद्धि ही होगी। 


शी पर लत 


जो स्वयं निश्शक्त है, उसे मारने में क्या वीरता है। मच्छर मारने में तो 
वीरता.नहीं | पर दोनों दलों की वाह्य विभिन्नता रहते भी एकता थी। दोनों 
नायक की विजय देखना ही चाहते थे। श्रतः, सारी पेचीदगियों के रहते भी' 
उनकी मौलिक एकरूपता में कोई ग्रन्तर नहीं आया । वे दिवास्वप्त 
मात्र थे | उनमें इच्छा पूर्ति की तात्कालिक श्रदम्यता मुखर थी । यही 
कारण था कि ये साधारण बुद्धि वाले, श्रपरिपकत्र मस्तिष्क वाले, वच« 
काना दिमाग वाले पाठकों को, जेसा कि अधिकांश पाठक होते हैं, बड़े 
प्रिय भी थे । पाठकों के अ्रन्दर भी उनके द्वारा दिवास्वप्त का ही जागरण 
होता था-वह दिवास्वप्न जिसमें इच्छा-पू्ति की क्रियात्मकता की ही प्रधा- 
नता रहती है । 


सच पूछिये तो ऐसी +790.9-०706792 वाली सुखान्तक कथाश्रों 
में से उनकी सामाजिकता निकाल ली जाय श्रर्थात्‌ इतनी सी बात दूर कर 
दी जाय कि वे समाज के श्रनेक व्यक्तियों को प्रभावित करने की दृष्टि से 
लिखी गई हैं तो उनमें श्रौर साधारण तरह के दिवास्वप्तों में कोई ग्रन्तर 
नहीं रह जायेगा । इस तरह की कयागझ्नों के लोकप्रिय होने का कारण यह 
भी है कि इनके द्वारा मनुष्य के श्रन्तर-प्रदेश के कोने में दुबकी हुई इच्छाग्रों 
की प्रातिनिधिक तथा प्रतीकात्मक पूर्ति की समस्या सहज ही हल हो जाती 
है। पाठक अपने मानस की गुप्त क्रिया [6600/09807 के द्वारा नायक 
के साथ तारात्य कर लेता है श्र उसके माध्यम से श्रपनों ही इच्छापूर्ति 
का श्रानन्द उठाता है। इस तरह के साहित्य ख्रष्टा उस पद्धति का सहारा 
लेते हैं जिसे श्रग्न जी में ॥)प्राणाए 7७०४णांपृप७ कहा जाता है। 
आपने देखा होगा कि बाजारों में या मेलों के श्रवसर पर ऐसे फोटोग्राफर 
होते हैं जिनके पास हर तरह के चित्र ( [)पाशा79 ) होते हैं । आपकी 


2४0 5 


इन चित्रों के प्तामनै बेठ जाना पड़ता है श्र झाप चाहें तो नाविक के 
रूप में, पर्वतारोही के रूप में, ग्वाले के रूप में, तैराक के रूप में श्रपना 
फोटो खिचवा सकते हैं । 


परन्तु गम्भीर साहित्य को, जो दिवास्वप्न से बिलकुल प्रथक वस्तु है, 
इस तरह के टेकनीक की श्रावश्यकता नहीं पड़ती और वह जानबूभ कर 
भी इसका परित्याग करता है। क्योंकि वहु जानता है कि इस तरह के 
दिवास्वाप्नों का कोई स्थायी श्रसर मानव जीवन पर नहीं होता । लोग 
होते हैं जो श्राजीवन मन के लडड खाते रहते हैं, ॥777960898 #0777- 
॥]2 करने में ही जीवन व्यत्तीत कर देते हैं । उन्हें इस बचपन से बचाना 
भी साहित्य का उद्द श होता है, भले ही वह प्रत्यक्ष न हो श्रप्रत्यक्ष हो, 
ठोक-पीठ कर वेद्यराज बनाने से श्रधिक कान्‍ता सम्मिततयोपदेशयजे 
हो, पर साहित्य इस उत्तरदायित्व से श्रपने को मुक्त नहीं कर सकता । 


वाह्मय दृष्टि से देखने पर तो यही प्रतीत होता है कि सुखान्त कथायें, 
उपदेश देने वाली उक्तियां जो पाठकों की मांग के स्रामाजिक रूप को ही 
लेकर चलती हैं, जिनमें समप्माज कल्याण की प्रशस्ति डंके की चोट पर गाई 
जाती है, लोगों की 'कल्पना पर अ्रधिक प्रभाव जमाये रख सकेंगी । पर 
व्यवहारतः ठीक इसके विपरीत ही बात देखी जाती है। इन कथाश्रों से 
तथा एताहश साहित्य से क्षशिक मनोरंजन तो हो जाता है। जब तक पाठक 
पढ़ रहा है तब तक इनका प्रभाव भी उसके मन पर पड़ता है पर पुस्तक की 
समाप्ति पर आति-श्राते उनकी पकड़ पाठक के मानस पर से छूट जाती है । 


हम इन्हें भूल जाते हैं। मानस में सक्रियता बनाये रखने के लिए, 
शक्ति की गर्मी कायम रखने के लिए नये सुखान्तक ॥)0868 की 


कक 4 रह +- 


ग्रावश्यकता पड़ती है श्रौर बाजार में उनकी कमी भी नहीं है, सस्ते मनो- 
रंजन व कहानियां मिल भी जाती हैं सहजता से । मनोर॑ंजक कहानियों, 
की क्या कमी है ? कमी है तो रुपाभ की, प्रतीक की,अबं तिका की ! पर 
हमारे सांस्कृतिक तथा बौद्धिक विकास में, दूसरे शब्दों में हमें मानवता को 
उच्चस्तर पर लाने में अ्रधिक महत्व किसका है, यह किसी से छिपा नहीं 
है। श्रागे श्राने वाली संत्रति जब अ्रपने विकास के चरण चिन्हों को 
खोजने लगेगी तो उसका ध्यान मनोहर कथाओ्रों की ओर नहीं जायेगा । 
ऐसा क्यों ? कारण तो बहुत से दिये जा सकते हैं पर एक यह भी है कि 
पहला दिवास्वप्न हैं, उसे वास्तव की यथा्थता का ज्ञान नहीं। दूसरा 
साहित्य है, सच श्रोर भूठ की उसे पहचान हैं। वह श्रांस शृद कर नहीं, 
श्रांख खोल कर चलता है । 

साहित्यिक कृतियों का विभाजन एक दूसरे ढंग से भी किया जाता 
है। रोमांटिक और क्लासिक । इन दोनों प्रकार के साहित्य में अनेक 
तरह के श्रन्तर हो सकते हैं। परन्तु एक बात तो स्पष्ट ही दिखलाई पड़ती 
है कि रोमांटिक साहित्य में कवि की आ्रान्तरिक इच्छाश्रों को भ्रदम्य श्ौर 
अ्प्रतिहत वेग से सामने आ जाने की प्रवृत्ति होती है। नायक को नीलम 
देश की राजकन्या, र्त0)ए 2797] या डिबिया की रानी की खोज में 
निकल पड़ने तथा राक्षसों को मार कर उसके उद्धार करने की उत्तावली 
रहती है । तारीफ यह कि उद्धार करने वाला सदा निरीह, सुकुमार और 
कोमल-गात बालक होगा, उसे कठिन से कठिन विपत्तियों का सामना 
करना पड़ेगा, उसका प्रतिद्वन्द्दी हर तरह से शक्ति-सम्पन्न होगा, उसकी 
काया लम्बी चोड़ी होगी, पर फिर भी वह राजकुमार के हाथों परास्त 
होगा । एक बालक के हृदय में जो भावात्मक संघर्ष है, आ्रात्म-गौरव की 


- १२५ - 


भावना है, स्वरति (797088877) है, उसी की ठीक प्रतिमूर्ति इस 
साहित्य में मिलती है। इसमें विद्रोह के स्वर रहते हैँ। मर्यादा की अव- 
हेलना, नियम और प्रतिबन्धों की श्रवहेलना कर, सब प्रतिबन्धों और पर- 
म्पराश्नों को किनारे रखकर, अपने लक्ष्य पर पहुंचने की उतावली रहती है। 
इसके रचयिता किशोर बालक होते हैं। इसमें पुत्र के द्वारा पिता के 
प्रति, विरोध की भावना मौजूद रहती है। इसमें भावनाश्रों का साम्राज्य 
रहता है जो बालकों का विशेषाधिकार है। श्रर्थात्‌ इसमें ७20 की 
शक्तियां 46 के क्षेत्र के समीप काम करती सी दिखलाई पड़ती है | यह 
श्रवश्य है कि ते की समीपता ऐसी नहीं है कि 8४० को किसी क्रिया- 
त्मक ढंग से प्रभावित करे, पर प्रभाव श्रवश्य पड़ता है श्रौर कभी-कभी 
सुई सी हिलती दिखलाई पड़ जाती है। कहने का तात्पर्य यह है कि 
रोमांटिक काव्य बहुत कुछ दिवास्वप्न के समीप पढ़ता है। 


दूसरी बात एक ओर भी है। रोमांटिक काव्य के पाठक में श्र 
क्लासिक काव्य के पाठक में स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रिया उत्पन्न होने की 
जो प्रवृत्ति होती है उसमें भी ग्रन्तर है । रोमांटिक कवितायें वर्ण्य विषय की 
ओर पाठक का ध्यान नहीं श्राकषित करतीं, परन्तु कवि अथवा स्रष्टा की 
मानसिक स्थिति की ओर देखने को प्रवृत्त करती हैं श्रौर इसी मार्ग से 
उनकी श्रोर देखने पर कुछ उपयोगी बातें मिलती हैं । वर्डस्वर्थ का 
77770769]6ए 066; कालरिज का )0]6८807 008, महादेवी या 
रामकुमार वर्मा की गीतियों का रसास्वादन कवि के मानसिक स्वास्थ्य के 
आलोक में ही ठीक तरह से हो सकता है। इन में कवि का ग्रात्मतत्त्व 
श्रधिक से श्रधिक है, 406 में काम करने वाली शक्तियां बस 620 के 
आस-पास ही भाँकती सी दिखलाई पड़ती हैं। कला का काम श्रवेतन 


- १२६ - 


में काम करने वाली शक्तियों को परिमाजित कर, 8प7777966 करके 
उपस्थित करना होता है, उसके लक्ष्य तथा शक्ति दोनों के रूप को प२- 
वरतित करना पड़ता है| परन्तु रोमान्टिक साहित्य में कभी-कथी ऐसा 
लगने लगता है कि यह कलई अब खुली, श्रब खुनी | उदाहरण के लिए 
बह कविता लीजिए, 


करुणामय को भाता है तम के पर्दे में आना 
हे नभ की दीपावल्लियों ! क्षण भर को तुम बुक जाना । 


इन पंक्तियों के संकेत सूत्र को पाकर कवि के बैयक्तिक जीवन के 
क्षेत्र में जाकर वहां के दृश्यों के देखने का स्वाभाविक प्रोत्साहन मिलता 
है | जिस तरह दिवास्वप्न को देखने वाला श्रपना नायक स्वयं होता है, 
श्रौर सारे वातावरण को श्रपनी सेवा में नियोजित करता है, उसी तरह 
रोमांटिक कवि में भी श्रपना नायक बनने की, अभ्रपनी कथा कहने की 
प्रवृत्ति होती है । 


मैंने यहां जिस सिद्धान्त की स्थापना की है उसकी ओर दूसरों का 
ध्यान नहीं गया हो सो बात नहीं है। हिन्दी के कविवर पंत को रोमांटिक 
कवि मान लेने में किसी को विशेष आ्रापत्ति नहीं होगी। श्री ननन्‍्ददुलारे 
वाजपेयी जी का ध्यान इस पहलू की श्रोर गया था और पन्‍्त के 'उच्छुवास' 
तथा असाद के आंसू” की कुछ पंक्तियों पर विचार करते हुए इस बात की 
ओर पाठकों का ध्यान श्राकषित किया था कि इन स्थलों में कवि की 
काव्यानुभूति से श्रधिक वेयक्तिक श्रनुभूति ही श्रधिक मालूम पड़ती है । 
श्र्थात्‌ इन कविताश्रों में वरशित प्रेम वास्तविक है, कवि के श्रात्म-जीवन 


« ९१९२७ - 


से सम्बन्धित है, काल्पनिक नहीं । श्री वाजपेयी जी के शब्द ये हैं । 


पन्‍त जी इसे “कल्पनाश्रों की कल्पलता” कह कर श्रपनाते हैं, इसलिए 
बालिका का शारीरिक अस्तित्व कल्पना में बिलीन होता जान पड़ता है 
पर साथ ही अदेह सन्देह के कारण” जुड़े स्वभाव छुड़ाने श्रादि की घट- 
नाए फिर बीच में विक्षेप डालती हैं। यह श्रस्पष्टता कविता के लिए 
काम्य नहीं हुई है। निष्कर्ष तो केवल दो ही निकल सकते हैं....यदि दूसरे 
निष्कर्ष के श्रनुपार देखें तो 'उच्छृवास” की बालिका यौवनागम के द्वार पर 
खड़ी श्रपने प्रिय के परिणय-पादय में बंधने से वंचित अश्रवश्य ही करुणा है 
ओर उसके निराश प्रेमी के आंसू” भी अश्रवसर-जन्य ही हैं परन्तु यह सब 
वर्शान-सम्भवतः पन्‍त जी के उस समय के संकोच के कारण स्पष्टता नहीं 
प्राप्त कर सका है।' इस बात को स्वयं पन्‍त ने भी स्वीकार किया है कि 
इन कविताग्रों में उनके व्यक्तिगत जीवन की झलक अ्रवश्य है--हां, 
उच्छवास में मेरे व्यक्तिगत जीवन का कुछ प्रभाव भरा सकता है । 


पर क्लासिक साहित्य में सारी बातें इसके विपरीत होती हैं । वहां 
पर वर्ण्य-वस्तु तथा उसके वाह्य रूपाकार की पालिश, सौष्ठव, समावुपा- 
तिक संगठन का श्रधिक महत्त्व होता है । वहां उबलते हुए कडाह की उम- 
ड्न या उछलन नहीं रहती, श्रांधी श्लौर तूफान की हिसात्मक उम्रता नहीं 
रहती है । भाव-संघर्ष, अ्रवेतन शक्तियों की यगुत्य॑ं-ग्रुत्थी, आद्रिम प्रवृत्तियों 
की कशमकश' वत्त मान रहती है श्रवश्य,कारण कि उनके अ्रभाव में कला 
का जन्म ही नहीं हो सकता पर उन पर व का पूरा नियंत्रण रहता है, 
उनके प्रवाह के लिये उचित मार्ग दे दिया जाता है। नदी की बाढ़ को 
बांध कर उसके प्रवाह को समबजोपयोगी तथा जीवन-प्रदायक कार्यों की 


का ९ र्‌ पट न» 


झौर मोड़ दिया जाता है । कोसी श्रांसुश्रों की चदी कही जाती है, उसकी 
प्रलयंकारी बाढ़ हजारों परिवारों के जीवन की तहस-महस कर देती है। 
पर उप्त पर बांध बांध कर हम उससे व्यक्तियों के जीवन में घुस्कानों के पुष्प 
खिलाने का काम ले सकते हैं, श्रांस बह्मने के बदले श्रांसू पोंछने का काम 
ले सकते हैं। क्लासिक में ही साहित्य या कला का वास्तविक रूप निखर 
कर सामने श्राता है । रोमांटिक में वहू अ्रपनी भ्रविकसित भ्रवस्था में ही 
रहता है। क्योंकि रोमांटिक साहित्य को जन्म देने बाली मानसिक श्रवस्था 
बहुत कुछ मनोविकृति (2%670087%9) के क्षेत्र के श्रासपास पड़ती है। 
इसमें दिवास्वप्त के सारे चिन्ह वर्त्तमान हैं, सिवाय इसके कि इसमें सामा- 
जिकता और प्रेषणीयता का समावेश हो गया है । 


दिवास्वप्न स्वकेन्द्रिक होता है, कला या साहित्य परकेन्द्रिक | जब मन 
अपने स्व” को नष्ट कर देता है, सर्वथा विसर्जित कर देता है, तो पूर्ण कला. 
चन्द्र का उदय होता है । दिवास्वप्न में स्वरत्यात्मक श्रवुभृति की चरिता- 
थता प्रधान रहती है, उसमें व्यक्ति का प्यार अपने श्रौर अपने शरीर के 
ऊपर केन्द्रित रहता है। इस स्वरूपासक्ति या स्व॒रति का परित्याग कला 
की पहली शर्त है । बीज अपने स्वरूप को नष्ट कर देने पर ही श्र कुर 
का गौरव प्राप्त करता है। जब तक बीज स्वरत्ति में आसक्त रहेगा, अपने 
स्वरूप से चिपका रहेगा, अपना नाश नहीं करेगा, प्रात्मसमर्प ण॒ नहीं करेगा 
बब तक सृजन में समर्थ नहीं हो सकता ! 


पर प्रश्न यह होता है कि कलाकार जो इतना बड़ा स्वार्थ व्याग करता 
है, उसके बदले से उसे मिलता क्‍या है ? कया इस त्याग का कोई प्रति- 
दान नहीं मिलता ? विश्व के मूल में काम करने वाला यह सिद्धान्त कि 


कम हक 


किसी त्रस्तु का सर्वथा नाश नहीं होता, यहां लागू नहीं होता ? जिस 
तरह-- 


वासांसि जीग़ानि यथाविहाय, नवानि यृहणाति नरोप्राणि, 
तथा शरीरानि विहाय जीणान्यन्यानि संजाति नवानि देही। 


उसी तरह यहां कवि को पुराने वस्त्रों को छोड़ने पर कौन सा नया 
चोला मिलता है ? कबीर ने कहा--- 


रितु बसंत जाचक भया, डाल दियो द्र म पात । 
ताते नव पलल्‍लव भया, दिया दूर नहीं जात ॥ 


कबीर का कहना है कि बसंत ऋतु वृक्षों के पास याचक के रूप में उप« 
स्थित हुश्रा । वृक्षों ने उद्ारतापुर्वक श्रपने सब पत्ते दे दिये। पतभड़ का 
हृश्य उपस्थित हो गया । पर इसका परिणाम यह हुश्ना कि नये-नये 
पल्‍लवों से वृक्ष लद॒ गये । चारों श्रोर बसंत की हरियाली छा गई क्योंकि 
सात्विक दान कभी भी व्यर्थ नहीं जाता । उसी तरह कला कलाकार के 
पास भिखारिणी के रूप में उपस्थित हुई। है कवि मुझे रूप दो, मैं निरूप 
हूं, जड़ हो गई हूं, मुझे श्राकार दो, चेंतन्य दो |! कवि ने उसे श्रपता स्वरूप 
प्रदान कर दिया । इसका परिणाम क्या हुआ्ना ? 


परिणाम यही हुआ कि कृति में, रचना में रूप और सौन्दर्य का श्रव- 
तार हुआ । पहले जो मिट्टी का ढ़ेला मात्र था, पत्थर का टुकड़ा मात्र था, 
दब्दों का निर्जीव उच्चार मात्र था, वह सोना बनकर चमक उठा। प्रसंख्य 
मानवता के हृदयों को स्पन्दित करने लगा, लोगों को श्राकषित करने लगा, 
गले और कण्ठ का हार बनने लगा, श्रपूर्व सौन्दर्य से समन्बित हो उठा ॥ 


जे १ | 8. बन्‍-« 


इस सौन्दर्याविष्करण की समस्या इस तरह कलाकार को अभिभूत कर ले 
सकती है कि वह हुसरों को थोड़ा फुसला देने वाली सुन्दरता से ही संतुष्ट 
नहीं रह सकता । वह इस सौन्दर्य के चरम रूप का दर्शन करना चाहता 
है, इसे [287/०06007 पर पहुंचाना चाहता है। सम्भव है कि कृति की 
सुन्दरता दर्शकों को संतोषग्रद हो, उन्हें ग्रात्मतुष्टि प्रदाव करे, पर कला- 
कार को उससे संतोष न हो । अतः वह इस सौन्दर्य की खोज में और भी 
उत्साह के साथ प्रवृत्त हो भर यहु खोज उसके जीवन भर की खोज हो 
जाय । दिवास्वप्न के देखने वाले ने अपने स्वरति (/४७४७८०88877) का 
बलिदान तो कर दिया पर वही स्वरति अपना स्वरूप बदलकर कवि के 
सौन्दर्यात्वेषण तथा रूपविधायकत्व के रूप में सामने श्रा गई । श्रर्थात्‌ 
कृति, रचना कवि के व्यवितत्व का प्रतीक हो गईं, कवि का स्वयं-रूप ही 
बन गई, कवि और उसमें कोई ग्नन्तर ही नहीं रह गया । 


ग्र्थात्‌ जो पहले दिवास्वप्न मात्र था, वह अ्रब सच्चा और सार्थक बन 
गया, जो पहले साधन मात्र था वह श्रव साध्य सा बन गया । स्वरति तो दोनों 
में है पर जो स्वरति पहले रचबिता में केन्द्रित थी वह रचना में केन्द्रीभृत 
हो गई | स्वरति का यह परिवर्तित रूप, यह श्रवस्था भी धारण कर ले 
सकता है कि रचना जीवन के बहुमूल्य से बहुमूल्य पदार्थ' से भी अभ्रधिक 
मुल्यवान लगने लगे । कलाकार प्रेम का बलिदान कर सकता है, मेत्री का 
बलिदान कर सकता है पर अपनी रचना का परित्याग नहीं कर सकता ॥ 
कलाकार के जीवन में बहुत स्री ऐसी कथाएं सुनने को मिलती हैं जिनमें 
उन्होंने बड़े से बड़े प्रलोभनों को ठुकरा दिया है पर श्रपतती कलाकृति को 
अपने से दूर करना पसन्द नहीं किया है | यह अवस्था यहां तक बढ़ जा 
सकती है कि बाहरी सौन्दर्य का श्राविष्करण, वस्तु की बाहरी रूपरेखा को 


हक मे है उमर 


मुन्दरातिसुन्दर रूप में रखने की प्रवृत्ति ही प्रमुखता धारण कर ले और 
कला के क्षेत्र में टेकनीक का साम्राज्य हो जाय । मतलब यह कि कवि 
ने अपना विलीनीकरण अवश्य कर दिया है पर इस रूप में वह श्रमर हो 
गया है | 


शैक्वपियर, होमर, कालिदास, तुलसी और सूर की वेयक्तिक जीवनी 
भले ही हमें मालूम न हो, पर हमें यह उतना नहीं खलता । क्या ह॒र्ज है, यदि 
व्यक्ति का पता नहीं ? कवि तो श्रजर श्रमर है) उसके संघर्ष, राग- 
विराग, श्राशाएं, श्राकांक्षाएं तो हमारे सामने हैं ही, उसके व्यक्तित्व के 
सारतत्व के सम्पर्क में हम आते ही हैं। यहां यह और याद रखने की आ्राव- 
श्यकता है कि व्यक्तित्व का जो रूप साहित्यिक कृति में निहित है, वह 
दैनिक जीवन के चलते-फिरते रूप से समानधर्मी ही हो, यह कोई श्राव- 
इयक नहीं । बाहर का कायर, नीतिश्रष्ट, राक्षस, अत्याचारी श्रपने साहित्य 
में भी वैसा ही बना रहे यह आवश्यक नहीं । वह बोरता, नैतिक मूल्यों, 
साधुता और करुणा की प्रशस्ति भी गा सकता है। 7)6 पिक्षप087 के 
लेखक 5077]67 की वीरोचित, हृदय में श्राग लगाने वाली, क्रान्ति का 
मंत्र फू कनें वाली उक्क्रियों को पढ़कर पाठकों के हृदय में उसकी जो काल्प- 
निक मूर्ति सामने भ्राई वह वीरत्व की विग्नहवती मूरति थी पर जब उन्होंते 
शिलर की शर्मीली तथा दूसरों की आंखों को बचाकर चलने वाली मृतति 
को देखा तो उन्हें कितनी निराज्ञा हुईं । 


कौन यह विश्वास करेगा कि जीवन भर रोमांस की प्रशस्ति गाने 
बाला कवि 39707 एक मिनिट भी किसी युवती के सामने नहीं ठहर 
सकता था । इस सम्बन्ध में ॥., 5. 5/00 की वह प्रसिद्ध उक्ति 


हि है यह 


सहज ही याद श्राती है “8 ७०७ 88 #06 & 00780707ए, 
60 8597888, 976 8 ए9काकाठ्परौकए क764 या, जार प5 
0गोए 8 एन्‍8व[प79, 890 900 # 987809809, 798. ज0308 
[7076880ग्र8 80वें 85098708009 06778 ३7४ 9 980 प्रव%॥7' 
870 प्र765७9800806 ज़&ए8. +7707888/078 80वें 85089778708 
जछ़00 878 [90077 407 ४06 घात्या $876 70 [0॥8086 [ए 
508 .00687ए वे ६9088 ज़9760 8800788 प्रानं॥7907शयएई 
7 508 90807ए हा9ए 77/9ए चृधा।.8 & 7०2270]6 997" ३7 
678 7397, 5086 [0678098|09, .श्रर्थात्‌ कवि के पास अ्रभिव्यक्त 
करने के लिए कोई व्यक्तित्व नहीं होता, परन्तु एक माध्यम होता है। 
बह व्यक्तित्व नहीं, माध्यम मात्र है। जो धारणायें या अनुभूतियाँ महत्त्व- 
पण हैं उन्हें कविता में कोई स्थान नहीं भी मिल सकता श्रौर जिन्हें कविता 
में महत्व मिले वे व्यक्ति के व्यक्तित्व के लिये नगण्य हो सकती हैं । 


इसमें मतभेद नहीं हो सकता कि स्वष्न, दिवास्वप्त, कला श्रर्थात्‌ हम 
जो कुछ भी करते हैं वे सारे व्यवहार श्रात्माभिव्यक्ति के सिवा कुछ नहीं हैं । 
परन्तु श्रात्माभिव्यक्ति शब्द का प्रयोग प्रायः संकुचित श्रर्थ में किया जाता 
है। आात्माभिव्यक्ति से क्या अ्रभिप्राय है ? किसी परिस्थिति का सामना 
करने के लिए व्यक्ति के ग्रन्दर ॥8765 80007 के रूप में स्वतःपरि- 
चालित क्रिया होती है वह ? चोट लगने पर निकलती हुई श्राह ? विजय- 
सन्देश पाने पर झट से मिकली हुई हर्षध्वति ? एक दूसरे को देखकर 
युद्धोद्धत कुत्त' की गुर्रहद ? क्षुधा-तृष्त व्यक्ति की डकार ? खिलौने पाने 
वाले बच्चे की किलकारी ? हम इन्हें श्रात्माभिव्यक्ति कह सकते हैं पर यह 
पुर्णा झ्रात्माप्निव्यक्ति न होकर उसका एक श्र॑श मात्र ही है। पश्रात्माभिव्यक्ति 


का 2 


अपने को सहूपवती या विग्रहवती देखकर ही संतुष्ट नहीं होती । वह एक 
पग आगे बढ़कर दूसरों पर पड़े अपने प्रभाव को भी देखना चाहती है | हम 
आह करके ही नहीं रह जाना चाहते । हम चाहते हैं कि हमारी श्राहों में 
तासीर हो, हमारे वाले दिलगीर हों, वे दूसरों पर प्रभाव डालें । यदि 
ऐसा नहीं होता तो हम सोचते हैं कि हमारी श्रात्माभिव्यक्ति श्रधरी है, 
कहीं न कहीं चूक है। यदि मेरी घुस्कान ने दूसरों को प्रफुल्लित नहीं कर 
दिया, यदि मेरी किल-कारी ने दुस्तरों के हृदय को भी पुलकित नहीं 
कर दिया, तो उसका महत्व ही क्‍या है ? 


एक व्यक्तिगत उदाहरण से काम लू' | में बधिर व्यक्ति हु । मुझ 
से लोग लिख-लिख कर ही बातें कर सकते हैं। एक बार में एक नये 
भित्र से मिल कर आया तो उन्होंने मुझे पत्र में लिखा उपाध्यायजी, श्राप 
तो अपने को श्रभिव्यक्त कर लेते हैं पर दूसरा नहीं कर पाता, वही घाटे 
में रहता है, श्राप नहीं |! में श्रभिव्यक्ति में सफल इस लिए रहा कि मेरी 
अभिव्यक्ति शीघ्र दूसरों पर चोट कर सकती है, उन्हें प्रतिक्रिया-तत्पर कर 
सकती है। पर दूसरों की अ्रभिव्यक्ति इसी श्रर्थ में अ्रभागिव है कि वह 
मुझे प्रतिक्रिया-तत्पर शीघ्र नहीं कर सकती, उसमें विलम्ब होता है | 
ग्रत: हम इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि भ्रभिव्यक्ति की सीमा, मात्र श्रभि- 
व्यक्ति तक ही नहीं, वह प्रभाव तक भी बढ़ती है। कवि का काम आत्मा- 
भिव्यक्ति करके नहीं रह जाना है परन्तु दूसरों के प्रन्दर भावों को जाग्रत 
करना भी है। “जग जांय तेरी नोक से सोये हुए जो भाव हैं।” 
बल्कि दूसरों पर प्रभाव डालने वाली बात श्रधिक महत्त्वपूर्ण है। 


यदि प्रात्माभिव्यक्ति को मात्र अभिष्यक्ति तक ही सीमित रखें तो पागल 


ल १३४ -+ 


को श्रभिव्यक्ति में और कवि की श्रभिव्यक्ति में क्या अन्तर रह जाता है । 
पागल कहता है कि मैं भगवान का अ्रवतार हूं, नेपोलियन हूं । यह भी 
तो उप्तकी श्रात्माभिव्यक्ति ही है। पर भगवान का सच्चा श्रवतार भक्तों 
को मोक्ष प्रदान करता है, साधुश्रों का परित्राण करता है, दुष्कृतों का 
विनाश करता है, धर्म का संस्थापन करता है। नेपोलियन एक बहुत बड़ी 
सेना का नेतृत्व करता है और अनेक देशों पर विजय प्राप्त करता है । 


कुछ पागलों की कलाक्ृृतियों का भी श्रध्ययन किया गया है । कुछ 
ऐसे भी पागल होते हैं जो चित्र बनाते देखे गये हैं और इस तरह प्रपनी 
श्रचेतन शक्तियों की प्रभिव्यक्ति करते हैं। उन्‍्माद की प्राथमिक शअ्रवस्था में 
तो उनके चित्रों की सार्थकता का पता लग जाता हैं श्रर्थात्‌ वे दूसरों को 
प्रभावित कर सकते हैं पर बाद में ज्यों-ज्यों उनके मनोविकार में वृद्धि 
होती जाती हैं त्यों-त्यों उनके चित्रों में स्पष्टता का श्रभाव श्राता जाता 
है और भ्रन्त में उनमें श्र्थ खोज निकालना श्रसम्भव हो जाता है श्रर्थात्‌ 
उनमें दूसरों के हृदय में भावों को जाग्रत करने की शक्ति एकदम नहीं 
रह जाती । अभ्रत्तः इसी रूपक के सहारे श्राकार के स्वरूप को, उसकी 
ग्रात्माभिव्यक्ति के स्वरूप को समभने में हमें सहायता मिल सकती है । 


कला या कलाकार का शुद्ध स्वरूप क्या है ? कौनसी चीज उसे दूसरों 
से पृथक करती है ? हम कह सकते हैं भावों की ग्रभिव्यक्ति ही उसकी 
विशेषता नहीं । यह कार्य तो श्रन्य लोग भी करते हैं शऔरौर कर सकते हैं । 


उसकी विशेषता प्रभावोत्पादकता है, दूसरों में स्वजातीय भावों की 
जागृति । यदि हम व्यक्ति के रूप में, कहते हैं कि हम नेपोलियन हैं तो 
कलाकार के हूप में श्रागे बढ़कर सेना का नेतृत्व करते हैं, देश-प्रदेशों पर 
साम्राज्य की स्थापना करते हैं । 


- श३५ - 


बही काम दिवास्वप्नों से नहीं हो सकता । वे श्रपने शुद्ध स्वरूप में 
नैत॒त्व नहीं कर सकते । दूसरों के श्रन्दर वांछुनीय श्रनुभूति नहीं जगा 
सकते । वे श्रपनी इच्छा-पूर्ति कर लें पर दूसरों का नेतृत्व नहीं कर सकते ! 
इसी स्थान पर कविता, कला दिवास्वप्न से सर्वथा पृथक हो जाती है। 
इन दोनों की रचना में ज्रष्ठा को जो पार्ट अ्रदा करना पड़ता है वह सर्वथा 
भिन्न है। स्वप्त-द्रष्टा श्रपनता 870 स्वयं श्राप होता है, कवि कभी नहीं । 
कवि लोक-हुृदय को पहचानता है, लोक हृदय संवादभाजी होता है, उसकी 
दृष्टि अपने पर नहीं दूसरों पर होती है। दिवास्वष्न-द्रष्टा स्व-हृदय को ही 
जानता है, लोक-हृदय-संबाद-भाजन-योग्यता उसमें नहीं भ्राती । कवि 
जब कभी आत्मकथा भी कहता सा दीख पड़ता है, ऐसा लगता है कि 
अपने ही जीवन की घटनाओ्रों तथा विचारों को श्रभिव्यक्त करता है उस 
समय भी उसके कार्य करने का ढंग दिवा-स्वप्न-द्रष्टा से सर्वथा पृथक 


होता है । 


कवि जिस किसी घटना का उल्लेख करता है उसमें एक जिज्ञासा 
होती है, वह उन घटनाओं के द्वारा मानों आगे बढ़कर किसी चीज को 
खोजना चाहता है, लोगों को उसे दिखलाना चाहता है, जिस सत्य का 
उसने साक्षात्कार किया है उसका सहभागी होने के लिए दूसरों को 
आमंत्रित करना है। दिवास्थप्न श्रपने से आगे नहीं बढ़ता । वह श्रपने स्व 
का चारण होता है, 50०[-20777096707 में ही निमग्न रहता है, 
अपनी ही बात त्ोटे जाता है पर कवि का काम 50 2800ण768/70॥ 
नहीं है, वह श्रपने सत्स्वरूप को पहचानना चाहता है-वह सत्स्वरूप जिसमें 
विश्वरूप की भलक रहती है। स्वरति तो सब में होती है । स्वप्न-द्रष्टा 
में भी और कवि में भी | दपंण में सब अपने रूप को देखकर श्रपने 


बा 


ए97088$87 को संतुष्ट करते हैं। पर कुछ लोग होते हैं जो दिव-रात 
दर्पण के सामने बेठकर श्रपने शरीर के सौंदर्य को निहारने में ही मण्न 
रहते हैं और कोई काम करने की फ़ुरसत ही उन्हें नहीं मिलती । दूसरे होते 
हुँ जो जरासा मु ह देखकर, बालों पर कंची फेर कर भटपट बाहर काम - 
करने के लिए निकल पड़ते हैं। पहला स्वप्न-द्रष्टा है, दूसरा कवि | 


एक का चित्र स्थिर है, दूसरे का गति-शील । एक निस्पन्‍्द है, दूसरा 
गतिद्वील मामों शांत जलाशय में कंकड़ी पड़ी, निरन्तर प्रगतिशील लहरों 
की श्वु खला बँध गई । पुरानी बातें ही नृतन श्रथों से समन्वित हो उठीं, 
. हम में नई भनुभूतियां जगने लगीं श्रौर हमारे जीवन में समृद्धि श्राई । 


* ३७ -« 


साहित्य 
और ऐतिहासिक 
उपन्यास 





साहित्यिकों में यह प्रवाद प्रचलित है कि #6]6[79 प्रथम उप- 
न्यासदतर हैं श्रोर स्काट प्रथम ऐतिहासिक उपन्यासकार | उसी तरह 
हिन्दी में लाला श्री निवासदास को प्रथम उपन्यासकार का गौरव प्राप्त है 
और श्री किशोरीलालजी गोस्वामी को प्रथम ऐतिहासिक उपन्यासकार 
का । परत्तु श्र ग्र जी साहित्य के प्रनुसंधानकर्त्ताश्रों ने उपन्यास की वंशा- 
वली की खोज करते-करते इसके लिए इतने पिता खोज निकाले हैं जितने 
कि संस्कृत साहित्य के अन्वेषकों ने कालिदास के निवास-स्थानों का या 
जन्म-स्थानों का भी पता नहीं पाया होगा। अतः, हम इस उलभन में 
नहीं पड़ेंगे कि ऐतिहासिक उपन्यास का जन्मदाता कौन है ? हमारा काम 
इतने से ही चल जायेगा कि किसके घर इसका पालन-पोषण हुआ और 
जब से यह हमारे सामने श्रपता जाला पसारने लगा तब से इसका क्‍या 
रंग-ढंग रहा भ्ौर अश्रपनी प्रकृति का श्रनुसरण करते हुए इसका स्वरूप 
किस रूप में प्रगट होना चाहिए । 


ऐतिहासिक उपन्यास में दो शब्द हैं इतिहास और उपन्यास # इतिहास 

का श्रर्थ है वास्तविक सत्त्य अर्थात वे घटनाएं जो घट चुकी हैं और जिनके 

विषय में किसी चरह के मतभेद का झवसर नहीं उपन्यास का श्रर्थ है कल्पना 
अर्थात्‌ यहां कल्पना उड़ान भरती तो है ( कल्पना का काम ही है उद्घान 
भरना है ) पर उस पर ऐतिहासिक घटनाओं का खिंचाव लगा ही रहता है । 

वह इनसे सम्बन्ध तोड़ नहीं सकती, ग्रुडी कितनी ही दूर झ्रासमान में चली 

जाय पर उडायक का नियन्त्रण सदा श्रपना प्रभाव बनाये रहता है)। यहां 

हम रोमांस, उपन्यास श्रौर ऐतिहासिक उपच्यास पर नियन्त्रण की दृष्टि 

से विचार करें तो बातें कुछ स्पष्ट होकर सामने आ्रायेंगी । रोमांस का 

वास्तविक स्वरूप क्‍या है ? क्‍या नीलम देश की राजकन्या अथवा 

0]7 (०७7! की खोज में निकल पड़ने वाले वीरों के श्रति साहसिक 

कारनामें ? सागर को बांधने वाले तथा हिमगिरि को हिला देने वाले श्रति- 

मानवीय कृत्यों, तलवार, समरांगणश तथा रक्तपात की दाब्दावली में 

वर्णित घटनाश्रों को रोमांस का नाम देना पर्याप्त होगा ? नहीं, बाहरी 

दृष्टि से दुर्दान्त, भयानक, प्रे रक घटनाएं श्रथवा विध्ववाधाए' मनुष्य को 

प्रनेक भ्रकाण्ड तांडवों में प्रवृत्त कर सकती है पर साधारण सी, देखने में 

“निरीह सी लगने वाली छोटी सी घटना भी ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर 
सकती है जो जीवन की सबसे भयंकर घटना लगे और उसका सामना 

करने के लिए हमें सर्वेस्व तक का बलिदान करना पड़े । सम्भव है कि 

नेपोलियन की सेना रूस को ध्वस्त कर दे पर टालस्टाय के कानों पर ज़ूः 

तक न रेंगे, भारत का विभाजन हो जाय और तज्जन्य प्रभाव के कारण 

भारत वसुन्धरा में रक्त की नदियां बह चलें, पर जैनेनद्र उसकी शोर श्रांख 

भी उठाकर न देखें। पर यह भी सम्भव है कि नित्यप्रति होने वाली 


कर 6 ह6 


क्रॉबवध जेसी घटना एक व्यक्ति के हृदय को कचोट दे। भले ही वह तलवार 
न उठाकर लेखबी उठाये और वह विरोधियों की हत्या करने के लिए 
समरांगण की सृष्टि न कर अपने. हृदय-मंथन के बल पर एक महाकाव्य 
की सृष्टि कर दे । अभ्रतः बाहरी विध्नवाधाश्रों तथा श्रापत्तियों की बाट पर 
रोमांस तोला नहीं जा सकता है । #|एछ06/४ के प्रसिद्ध उपन्यास 
७8७776 30797ए का नाम किसने नहीं सुना होगा ? मेडम बोवारी 
से बढ़कर रोमांटिक मिजाज का व्यक्ति कौन हो सकता है ? पर फिर भी 
उसके साहसिक कार्यों को हम रोमांस नहीं कह सकते | तब रोमांस की 
पहिचान क्‍या है ? 


रोमांस की पहिचान श्रनुभूति का स्वरूप है। श्रनुभूृति और क्रिया का 
पारस्परिक सम्बन्ध है। क्रिया का स्वरूप अनुभूति के स्वरूप पर आ्राश्चित 
रहता है । चिन्गारी की स्पर्शानुभूति हुई नहों कि हाथ हट गया स्पर्शा- 
नुभृति श्रोर हाथ का हट जाना ये दोनों एक ही वस्तु के दो पहलू हैं । 
जिस तरह आत्मा शरीर से श्राबद्ध होकर विभ्ु और व्यापक होते हुए भी 
शांत और सीमित रूप में श्राचरण करने के लिए बाध्य है उसी तरह शअनु- 
भूतियों की भी सीमाए हैं जिनके नियच्तण में ही उन्हें अभ्रपना स्वरूप 
निर्माण करना पड़ता है । पर ये श्रनुभृतियां जब अपनी सीमा श्र शर्तों 
के नियन्त्रण से मुक्त होकर स्वच्छन्द बिहार करने लगती हैं तब रोमांस 
का श्रस्तित्त सामने आ्राता है । एक पत्तंग की या वेलून की कल्पना 
कीजिए। पतंग श्रासमान में बहुत दुर खिल गई है। वेलून सुदूर व्योम 
सण्डल में मंडरा रहा है । परन्तु एक पतली सी डोर--भले ही वह बहुत 
लम्बी हो--इस प्रथ्वी की खू'टी से बंधी हो और जब हमारी भ्रनुभूति 
कल्पना के बेलून में बेठी उड़ान भर रहौ हो उस समय इसी डोर से पता 


हक १ धुछ ०० 


चलता है कि हम किस स्थान पर हैं। पर यदि इस डोर को काठ दिया 
जाय और इस सफाई से कि इसका पता भी न चले तो हम रोमांस के 


क्षेत्र में प्रवेश करते हैं । 


अतः, हम कह सकते हैं कि भ्रशरीरी, अनियन्त्रित, उन्पुक्त, निर्बाध 
अनुभूति रोमांस का निर्माण करती है। हां, इस बात को ध्यान में 
रखता आवश्यक है कि डोर एक भटके से न काटी जाय कि उसका 
धक्का वलून में बेठी अनुभूति को लगता सा मालूम पड़े । काट ऐसी सफाई 
से हो कि कहीं से उसका आ्राभास न मिल सके । कुम्भकार चाक चल ना 
बन्द भी कर देता है तो भी मोमेंटम शक्ति के सहारे उसमें गति कुछ देर 
तक बनी रहती है। प्रेरणा-प्रदान की समाप्ति श्रौर गति की समाप्ति के 
बीच की श्रवस्था को हम एक तरह से रोमांस की शअ्रवस्था कह सकते हैं । 
हालांकि यह तुलना पूर्णरूप से सही नहों उतरती | हां, तरीके हैं जिनके 
द्वारा पृथ्वी से लगी डोर काटी जा सकती है और उनका सफल प्रयोग 
करना लेखक के कौशल पर निर्भर करता है | 


उपन्यास का क्षेत्र यथार्थवाद (789]4877) का क्षेत्र है । इसमें अनुभूति 
के वेलून को उड़ान भरने की मनाही तो नहीं है । वह दूर से दूर तक 
उड़ान भर सकता है- मेंडम बोवारी से अधिक कौन उड़ान ले सकता है- 
पर डोर पृथ्वी पर ही रहती है श्रौर भ्रपत्ता हल्का प्रभाव दिखलाती ही 
रहती है श्रौर जोला, बलजाक के साहित्य की जन्मदात्री होती है। कह 
लीजिए गोरकी और प्रमचन्द की। पर ऐतिहासिक उपन्यास में यह 
नियन्त्रण दुहरा हो जाता है। मेरी कल्पना के श्रनुसार यथार्थ वह है 
जिसको पृथ्वी से सम्बद्ध करने वाली डोर को हम पा ले सकत्ने हैं। भले 


»> डरे >« 


ही वह हमारी शक्तियों की त्ात्कालिक सीमा के कारण पश्राज नजरों से 
प्रोफल हो । पर जिस समय हमारे प्रयत्नों पर से सीमा का बन्धन ह॒टेगा 
उस समय वह डोर हमें दीख पड़ जायेगी ठीक उसी तरह जिस तरह पापों 
के क्षय होने पर हमारी प्रिय वस्तु सामने भ्रा जाती है श्रथवात जिस तरह 
पानी की छोटे पड़ने पर पृथ्वी से सोंधी गन्ध श्राने लगती है। यथार्थवाद 
में पृथ्वी की सतह से अनुभूति के विमान॑ की डोर को श्राज या कल देख 
लेना अ्सम्मव नहीं है। रोमांस में इस सम्बन्ध-सूत्र को देखा नहीं जा 
सकता | पर ऐतिहासिक उपन्यास में यह सम्बन्ध-सूत्र हमारे सामने सदा 
दीखता रहता है और ऐतिहासिक उपन्यासकार इस यथार्थता के दुहरे 
नियन्त्रण से अपने को दूर नहीं कर सकता । 


एक स्थान पर मैंने कहा था कि कथा श्र जीवन में चार तरह के 
सम्बन्ध हो सकते हैं--भ्रसम्भव, दुर्लभ, सम्भव श्रौर सुलभ। चू'कि हम 
सम्बन्ध-सूत्र के रूपक में तथ्य को समभने का प्रयत्न कर रहे हैं अत: 
कहना यह चाहिये कि ये चारों सूत्र हैं जिनके द्वारा कथा-जीवन तथा प्रकृत- 
जीवन में सम्बन्ध बना रहता है। प्रथम दो सूत्र एक जाति के हैं, द्वितीय 
दो सूत्र दूसरी जाति के। यदि दोनों में भेद है तो थोड़ा ही। प्रथम दो 
सूत्रों के श्राधार पर दंतकथाग्रों और रोमांस की सृष्टि होती हैं, द्वितीय 
दो सूत्रों के श्राधार पर उपन्यास श्रौर ऐतिहासिक उपन्यास की। अतः 
विकास क्रम की दृष्टि से श्रथवा इसी को कहें नियन्त्रण-क्रम की दृष्टि से 
तो प्रगति का सूत्र यों होगा--दंतकथायें, रोमांस, उपन्यास और 
ऐतिहासिक उपन्यास । प्रथम में सम्बन्ध-सूत्र का श्रत्यन्ताभाव तो नहीं 
कह सकते पर श्रभाव जरूर है, दूसरे में सम्बन्ध है तो सही, पर दूर का, 


नल श भ्ट र्‌ कब 


दृतीय में सम्बन्ध-सूत्र समीप आ जाता है, चतुर्थ में सम्बन्ध के गाढ्त्व 
की वृद्धि हो जाती है | 

इस प्रश्न पर हम स्पष्टता के लिए मनोविज्ञान की दृष्ठि से भी 
विचार कर सकते हैं। फ्रायड की मान्यताम्रों के श्रनुसार व्यक्ति का जीवन 
तीन प्रमुख शक्तियों के द्वारा परिचालित होता है [4, #780 श्रौर 87987- 
680 व्यक्तित्व का वह ग्रादिम', स्वच्छुन्द, खुलकर खेलने वाली प्रवृत्ति जिसे 
सभ्यता ने दमित कर दिया है पर जो बार-बार श्रपनी तृप्ति के लिए 
बाहर शभ्राना चाहती है उसे ॥6 कहते हैं। 20 वह श्रश् है जो हमारी 
भ्रादिम दमित श्रवृत्तियों के महत्व को, उनकी आ्रानन्द-प्रदायकता को मह- 
सूस करता तो है पर उनके जाल से बचने के लिए सचेत भी करता रहता 
है । दिल में यादे-बुतां भी है, खौफे-खुदा-भी-है” वाली परिस्थिति बनी 
रहती है। परल्तु 5प997-820 में यह स्थिति एकदम बदल जाती 
है। यहां सभ्यता की गदिश्ञ प्रव्ृतियों को पीस देती है और कहती 
है कि इसके मोहक रूप पर मत जावो, यह धोखे की टट्ठी है तुम्हें पतन और 
महानाश् के ब्रावर्त में ढकेलने वाली है। ग्रतः, नियन्त्रण की हृष्टि से देखें 
तो स्पष्ट होगा कि 40 स्वच्छन्द हैं, वहां किसी तरह का नियन्त्रण 
नहीं है, ॥080 में नियन्त्रण की कसावट भरा जाती है पर वहां इधर- 
उधर घृम-घाम लेने की थोड़ी छूट भी है, 0प७087/-७४० में श्राकर 
नियन्त्रण का पेच इतना कस जाता है कि व्यक्ति जरा भी हिलडुल 
नहीं सकता। ऐतिहासिक उपन्यास की स्पृष्ट कल्पना मन पर लाने 
के लिए ऊपर जो नियन्त्रण का रूपक बांधा गया है उसे यहां मिला 

देखा जाय तो पता चलेगा कि दंतकथाझ्रों श्रौर रोमांस में तो 6 
की श्रादिम श्रौर उन्मुक्त प्रवृत्तियों का प्राधान्य रहता है, उपन्यास में 


न+। शडओे ब+ 


780 के प्रति हृढ़ नियन्त्रण का प्रतिनिधित्व रहता है पर ऐतिहासिक 
उपन्यासों में श्राकर 50]007-880 के सर्वग्रासी नियन्त्रण की श्रधानता 
हो जाती है। पर यह भा सत्य है कि सर्वग्रासी नियन्त्रण के अस्तित्व 
का सदा बना रहना सम्भव नहीं रहता, बांध में जहां तहां दरारें 
डालकर 70 का प्रवाह प्रवेश कर ही जाता है भोर मनोविकृति 
या न्यूरोसिस का जन्म होता है। उसी तरह ऐतिहासिक उपन्यास 
की दुहरी तिहरी रक्षा-पंवितयों में बरारें डालकर कल्पना के शीतल 
समीर के एक झ्राध भोंके प्रवेश कर ही जाते हैं श्र ऐसा वाता- 
बरण उत्पन्न करते है कि वहां इतिहास महज इतिहास न रहकर ऐति- 
हासिक उपन्यास बन जाता है । 


इतिहास ओर उपन्यास 


श्रग्नेजी में दो शब्द हैं 87077 और .नि7-80079. #ैपहप४४768 
]77०] ने एक स्थान पर कहा है कि 5/077 झौर .+-80075 इन 
दोनों शब्दों की उत्पत्ति एक ही ग्रीक शब्द से हुई है जिसका श्रर्थ है जांच 
पड़ताल कर प्राप्त की गई कोई सूचना । श्रतः, एथ्वी पर रहने बाले मानव 
की कथा ही इतिहास की स्वाभाविक और सच्ची परिभाषा हो सकती है 
औ्ौर इस कथा को किसी परिच्छेद या श्रंश की कथा कहने वाला ही 
ऐतिहासिक है ) परिशाम यह निकला कि ऐतिहासिक की वफादारी हर 
तरह से वर्णित युग या मनुष्य के जीवन में घटित घटनाओ्रों की यथा- 
तथ्यता के प्रति है और वह उनकी सीमा को छोड़कर जरा भी इधर 
उधर नहीं हो सकता | भ्रर्थात्‌ वास्तविक घटनाश्रों में उसे अ्रपनी गांठ से 
कुछ भी मिलाने की श्रनुमति नहीं है। श्रनुमति नहीं, यह तो ढीक है, 


जल 4 चुड अत 


पर प्रश्न यह होता' है कि मनुष्य के लिए अपनी झ्ोर से कुछ वे मिलाने 
वाली प्रवृत्ति से सर्वथा मुक्त होना सम्भव भी है? क्‍या पुष्प से यह. 
प्रात करता कि वह सुगंध देना छोड़ दे या अ्रग्नि उत्ताप व दे, ठीक है ?: 
मनोवैज्ञानिकों ने तो प्रयोगशाला की वेज्ञानिक परिस्थितियों में परीक्षण 
करके देखा है कि किसी एक घटना-आ्रांख से देखी हुईं घटना की रिपोर्ट 
में भी समानता नहीं होती | एक व्यक्ति एक रिपोर्ट-देता है तो दूसरा: 
दूसरी । यह हाल श्रभी की देखी हुई तात्कालिक घटनाओ्रों की सूचना के 
बारे में है तो समृह की प्रवृत्तियों से सम्बन्ध रखने वाले-एक अतीत युग: 
की बात ही क्‍या ? 


..€ इतिहास को लेकर जो विचारों कीं भ्रराजकता है उसका उदाहरख', 
में भारतीय इतिहास से न दूगा। भारतीय तो अपनी ऐतिहासिक बुद्धि 

(980700 88788) के श्रभाव को लेकर. बदनाम हैं ही। पर पश्चिम' 
तो अपनी इतिहास-प्रियता के लिए प्रसिद्ध है। उसने तो श्रपने इतिहास 

को सुरक्षित तथा सुसम्बद्ध रूप में उपस्थित करने में सतकता श्रौर तत्परता' 
से काम लिया है !! पर उसे इसमें सफलता मिली ? हम हृढ़ स्वीकारात्मकः 
उत्तर नहीं दे सकते। श्रपने मंतव्य की पुष्टि के लिए हम ॥%6 0७ 
कगावे 7786908 एा तराछ0:69 का00ता एए &॥79फ्शा) 

-फआ8ा0088 5प्तए97४४80 के झ्ाधार पर कुछ मनोरंजक उदा 
हरण दे रहे हैं--मेकाले, कारलाइल, गिव्बन, गार्डनर ये प्रमुख इति 
हास-लेखक माने जाते हैं। पर ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करते 
समय इनकी कल्पना कुछ इस तरह सक्रिय हो गई है कि उनका स्वरूप, 
ही बदल गया है। तिस पर भी उनके द्वारा वणित घटनाओ्रों में अ्ज्ञानवश . 
तथा अधूरी जानकारी के कारण भूलें भी हुई हैं, उनकी बात ही दूसरी है. !. 


५; कर 
कन् १४४. क्रणक 


सब वालपोल, श्रत्राहम लिकन, ला्ड चेस्टरफील्ड, कार्लाइल जैसे 
“व्यक्तियों ने भी इतिहास को सशंक दृष्टि से देखा है। कारलाइल ने तो 
एक स्थान पर इतिहास को किम्बदन्तियों का श्रक॑(ा809॥8007 0०0ँ 
0770प४8) तक कह डाला है | श्राश्वर्य तो तब होता है जब हम देखते 
हैं कि श्रसंदिग्ध, श्रकाव्य और अ्रभेय समभी जाने वाली ऐतिहासिक घटनाओं 
तथा व्यक्तियों की प्रामारिकता में भी झ्नास्था का भ्रवसर मिल ही जाता 
है । कुछ उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जायेगी । 


नेपोलियन का नाम किस इतिहास के विद्यार्थी ने नहीं चुना होगा 
आर उसकी दुर्वारवी्यता, साहस और श्रपूर्व श्रात्मविश्वास पर किसने 
शंका की होगी ? पर 370799809 फ्रपका० ९ ने १८१६ में 
पछा80070 ॥200प0088 नामक पुस्तक प्रकाशित की थी जिसमें उसने 
सबल प्रमाणों के आधार पर नेपोलियन सम्बन्धी श्रनेक प्रचलित धारणाप्रों 
पर सीधा कुठाराघात किया था। नेपोलियन सम्बन्धी श्रनेक इतिहास प्रसिद्ध 
घटनाओ्रों को उसने भ्रवास्तविक तथा जन-कल्पना की उपज बतलाया । 
नेपोलियन का मास्को पर आक्रमण, एल्बा प्रायःद्वीप में उसका बंदी किया 
जाना, द्वाफालगर का युद्ध, विभिन्न शक्तियों का पेरिस में प्रवेश करना, इन 
सत्र इतिहास सम्मत घटनाओ्रों को उसने श्रप्रामारि]क बतलाया है। उसका 
कथन है कि श्र ग्रे जों ने अ्रपनी महत्ता, श्रपती शक्ति श्रौर वीरता का दांभिक 
प्रदर्शन करने के लिए नेपोलियन के व्यक्तित्व में दल्त-कथाश्रों में पाये जाने 
वाले शौर्य तथा प्रताप का भरूठमूठ समावेश इसलिए कर दिया है कि उसके 
जैसे ।,02007687ए 780० के पछाड़ने से उनकी तेजस्विता और निष्ठा 
का स्वरूप लोगों के सामने और भी चमत्कृत रूप में प्रकट होगा । ग्रीक 
भाषा में नेपोलियन का श्रर्थ ही 'वन-सिंह हैझर वन के सिंह को पछाड़ने । 


- १४६ - 


वाले से बढ़कर वीरता क्या हो सकती है ? श्री हर्ष ने दमयन्ती के सौंदर्य 
का वर्गान करते समय कहा हैं कि-- 


इत: स्तुति का खलु चंद्रिकायाः यदुब्ध्यमप्युत्तरली करोति | 

भ्र्थात्‌ चन्द्रिका की प्रशंसा इससे अधिक और क्या हो सकती है किंः 
उसके स्पर्श से शान्त सागर में भी तरंगें उठने लगती हैं । उसी तरह 
अ्रग्न जों की कल्पना ने भी एक साधारण से व्यक्ति को बन सिंह” के रूप में 
परिणत कर दिया श्रौर उसे परास्त कर एक ऐसे .वातावरंण की सृष्टि 
की जिसमें उनके स्वाभिमान को संतोष प्राप्त हो सके । कालिदास को 
बालक भरत के सोभाग्य तथा वीरता की सूचना देनी थी, भरत: उन्होंने 
भरत द्वारा परास्त सिंह को ला बैठाया । | 


भारतीय महाकाव्यों में दो पात्र होते है नायक झौर प्रति-नायक | नायक 
को सर्व-ग्रुण-सम्पन्न चित्रित करने की प्रथा है श्रौर प्रतिवायक को सर्व-गुण- 
हीन । वह कायर, डरपोक और खल होता है श्रौर नायक से पराजित 
होता है। पर कुछ विचारकों का यह भी कहना है कि प्रतिनायक को 
शूरता तथा वीरता इत्यादि गुणों में नायक के समकक्ष ही होना चाहिये, 
घट कर हो भी तो किचिन्त्यून हो, कारण कि वीर को ही पराजित .करने 
में नायक के चरित्र का जौहर खुल सकेगा। पर ये सब बातें .तीः साहि. 
त्यिक कल्पना की है। श्रग्नेज इतिहास लेखकों ने नेपोलियन को सिंह 
के रू । में चित्रित किया है, उसमें उन्होंने कल्पना से काम-नहीं लिया है 
बया ? एक दूर द्वीप से इतते प्रहरियों की श्रांखों में धूल भोंक कर भाग 
जाना और फ्रांस की भूमि पर पैर रखते ही बात. की बात में एक दुर्दान्त 
सेवा का संगठन कर लेना, हम इतिहासकारों की गवाही पर सच्ची बात 
मान लें, पर सुनने में तो कथाश्रों, जेसी ही लगती है। 


ल श्‌ः डर छ, ७« 


इसी तरह बअलफ़ ड, जॉन आफ श्रार्क, हैम्पडन, इत्यादि व्यक्तियों के 
बारे में, उनके चरित्र तथा व्यक्तित्व-चित्रण के बारे में तरह तरह की ' 
ग्रात्वंकायें की जाती हैं। इ गलिस्तान के राजा जॉन के द्वारा घोषित तथा : 
हस्ताक्षरित श्रग्न॑जों की स्वतन्त्रता का स्तंभ मेगनाकार्टा (१9279... 
(70909) नामक ऐतिहासिक दस्तावेज (600777080%) को कितनी प्रसिद्ध 
घटना समझी जाती रही है। पर उसके बारे में भी लोगों में तरह तरह की ' 
शंका यें: हैं।। यह कहा जाता है कि जॉन ने किसी ऐसे दस्तावेज पर दस्तखत : 
नहीं किये थे.। जब क्रॉमेवेल, नेपोलियन तथा विक्टोरिया जैसे हाल के 
व्यक्तियों के इतिहास के बारे में इतनो अतिया फैली हैं तो सुद्ृर अतीत . 
के बारे में. क्या. कहा जा सकता है ? इसी को देख कर कुछ लोगों ६...“ 
का कहना है कि भारतीयों में. जिसे हम ऐतिहासिक बुद्धि का अभाव 
कह ॒ कर उनका उपहास करते हैं वह. उनकी बुद्धिमत्ता, सुक्ष्म-दर्शिता 
का ही दोतक है जिसने इतिहास: की व्यर्थंता को सहज ही में, 
समझा लिया था। समझा लिया था कि इतिहास: को कल्पना से पृथक 
नहीं रखा जा सकता | 


री 


भारत के सस्‍्वातंत्योत्तर काल में १८५७ की क्रान्ति के प्रति और उसे ' 
गौरवान्वित करने के प्रति लोगों में प्रवृत्ति का जागना स्वाभाविक है । पर 
प्राज डॉ० मजूमदार जैसे इतिहासज्ञ वर्तमान: हैं.जो इस घटना को भारत के- 
प्रथम स्वातन्त्य-युद्धःका गौरव देने के लिये तेयार नहीं हैं श्रौर कहते हैं 
कि इसमें भाग लेने-वाले तांतिया तोपे, लक्ष्मीबाई, नाना साहेब, बहादुर. 
शाह श्रपने स्वार्थ से प्रेरित्र थे. ओर इन्हें बाध्य होकर संग्राम में श्राना पड़ा, 
था । (9708 -ग्राद90900, , +2प707658 07 06478 870 . 
४96 (०६४6० ० 82०7४ ने जब जोहेमिया के नृप अपने पितामह 


'लथा ,6परं8 370 के सम्बन्ध में इतिहासोल्लिखित कुछ घटनायें पढ़ीं 
' तो बोल उठी । 
[[ 8069 [68 #78॥0] 07 जछ96 9990[097606 8070]0879678५ 
'09ए, ज्रा7088884 0ए 07 09ज़788ए88, ज़9क पर छ8 
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“बदि गप्रपेक्षाकृत हाल की घटनाग्रों के बारे में जिन्हें हम' 
' लोगों ने स्वयं देखा है इस तरह की भ्ूठी बातें कही जाती हैं तो बहुत 
प्राचीन घटनाओ्रों के सम्बन्ध में जो बातें कही जायें उनका क्या विश्वास ? 
'घेरा तो विश्वास है कि +70!7 506ल्‍079प/88 के सिवा सारा इतिहास 
इतना ही अ्रसत्य है जितनी कि कोई रोमांस-कथा | भश्रन्तर है तो केवल 
इतना ही कि रोमांस अभ्रधिक मनोरंजक होता है।” इन सब बातों को 
देखकर इतिहास को भी कल्पना से अधिक मानने का जी नहीं करता । 


इधर उपन्यासों पर भी दृष्टिपात कर लिया जाय । उपन्यातों के 
'लाम पर आज जो तरह-तरह के प्रयोग चल रहे हैं में उनकी बात नहीं 
करता | बात कर रहा हूं थेकरे की, डिकेन्स की, प्रेमचन्द की, जिनकी प्रतिभा 
ने उपन्यास की निरादर, अपमान तथा उपेक्षा के गत से निकाल कर 
उसे शिष्ट मंडली में झादर श्रौर गौरव का स्थान दिलाया और जिनके पद 
चिन्हों का अनुसरण उपन्यास-कला श्राज भी कर रही है। प्रेमचन्द के 
उपन्यामों में तत्कालीन गआ्रान्दोलनों तथा सामाजिक विचारधारामप्नों का 


गम 4 धुंह ब* 


इतिहास मिल जाता है। प्रेमचन्द की शैली पर लिखित सेठ गोविन्द दास 
के उपन्यास इन्दुमती में कांग्रेस के श्रान्दोलन का तारीखवार इतिहास 
मिल जाता है | यदि कोई घुभ से कांग्रेस के इतिहास का ज्ञान देने वाली 
पुस्तक का नाम पूछे तो मैं इन्दुमती का उल्लेख करूगा।। इससे यही 
स्पष्ट होता है कि उपन्यास में भी ऐतिहासिकता होती है और इतिहास में 
भी श्रीपन्यासिकता । तब इन दोनों में विभाजक रेखा क्‍या है ? 


यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो विभाजक रेखा की कोई ग्राव- 
श्यकता नहीं । कारण मूल में जाकर सब चीजें इस तरह हिलमिल जाती हैं 
कि एक ही तत्व हाथ लगता है उसे चाहे जिस नाम से पुकारा जाय। कुछ ऐसे 
विचारक हैं जो यह कहते हैं कि ताटक, उपन्यास, कविता, महाकाव्य श्रदि 
के पृथक वर्गीकरण की क्या श्रावश्यकता है? केवल एक शब्द साहित्य से ही 
: संतोष क्‍यों न किया जाय ? भेद तो वाह्य उपाधियों को लेकर है, मूल में 
तो ये सब एक ही हैं। ऐसी श्रवस्था में हमें उपन्यास पर ही रुक जाना 
चाहिये | ऐतिहासिक उपन्यास जेसी एक नई जाति की क्या श्रावश्यकता ? 
बात ठीक भी है। पर श्रालोचना व्यावहारिक जगत्‌ की वस्तु है और हम 
इसका आश्रय तभी लेते हैं, जब हमारा ध्येय उसके व्यक्त स्वरूप पर ज्यों 
का त्यों विचार करना होता है, हम उसके न तो श्रतीत को देखते हैं, न 
भविष्य को । हमारा ध्यान उसके वतंमान स्वरूप पर रहता है, हमारी 
दृष्टि प्रधोगशाला में परीक्षण करने वाले व्यक्ति की सी हो जाती है । 
प्रयोगशाला में क्या होता है ? यही न कि परीक्ष्य वस्तु को उसके प्रकृत 
व्यापकत्व से हटा कर नियंत्रित परिस्थिति में लाकर हम उसके व्यापार क॥ 
निरीक्षण करते हैं। उसी तरह एक पुस्तक को लेते हैं, उसे ज्यों की त्यों 
प्रयोगशाला में ले जाते हैं, उसे नियंत्रित ( (१!०7/70!]60 ) परिस्थितियों 


« ० + 


में स्थापित कर बाहरी प्रभावों से मुक्त कर देते हैं भर तब परीक्षण 
प्रारम्भ करते हैं) यहां पर प्रयोगशाला तो वही है श्रालोचक की भाव- 
यित्री प्रतिभा, पर परिस्थितियों का निर्माण इतिहास करता है। इस 
प्रयोगशाला में ही ऐतिहासिक उपन्यास की पहचान होती है । 


परन्तु ऊपर की पंक्तियों में इतिहास श्रौर उसकी विचित्रताश्रों के 
सम्बन्ध में जिस मत का उल्लेख किया गया है उससे इतिहास में प्रयोग- 
शाला की वेज्ञासिक हृढ़ता कैसे श्रा सकती है ? इसके लिये यही कहा जा 
सकता है कि इतिहात में श्रराजकता सी भले ही दीख पड़े परन्तु यह भी 
ठीक है कि हमारे अ्रन्दर एक साधारण ज्ञान है कि इतिहास क्या है 
ग्रौर यह किस तरह व्यवहार करता है !! चेतनता के नाते यह 
साधारण बुद्धि हमारे अन्दर सदा वर्तमान रहती है और बतलाती 
रहती है कि इतिहास क्‍या नहीं है ! ज्यामिति में बिन्दु था पंक्ति की जो 
परिभाषा दी गई है वे कितनी श्रामक्र हैं। पर उन्हीं के सहारे हम न जाने 
कितने महत्त्वपूर्ण कार्य साधित करने में सफल होते हैं । कितनी श्रश्न लिह 
प्रदालिकाशओं तथा सेतुबंधों का निर्माण करते हैं। इसी तरह हमारी सहज 
ऐतिहासिक बुद्धि इतिहास और कल्पना का भेद-ज्ञान बनाये रखती है झो 
दोतों की सीमा को पहचासती कु 


प्राधुनिक युग में इतिहास तथा उपन्यास अ्रथवा किसी कल्प- 
नात्मक साहित्य के पार्थक्य का निर्धारण करना और भी कठिव हो 
गया है (एक युग था जब कि कल्पना (5707) को ही सत्य (79820) 
बना कर उपस्थित किया जाता था यह उपन्यास कला का प्रार- 
म्भिक युग था (और भ्राज परिस्थिति यहश्रा गई है कि सत्य को ही 


बन १ े रै न्नज्क 


कहपना बना कर रखा जाने लगा है प्र आपकी कांग्रेस का इतिहास 
लिखना है, स्वातंत््योत्तर भारत की राजनेतिक या सामाजिक परिस्थिति 
'का चित्रण करना है, बस श्राप दो चार पात्रों को लेकर कहानी रच डालें । 
आपका काम चल जायेगा । हम' चाहें तो इन्हें /287600 २०४४४ कह 
'कर कल्पनात्मक साहित्य के गौरव से वंचित रख सकते हैं । 


पर बात इतनी सीधी और सरल नहीं जितनी ऊपर से दिखलाई 
पड़ती है। भाषा अपने व्यवहार करने वालों से कहीं भ्रधिक सामर्थ्यवर्ती 
होती है। प्रायः समभा तो यही जाता है कि भाषा व्यवहार करने वालों 
अर्थात्‌ उसे लिखने-पढ़ने वालों प्रथवा बोलने वालों के हाथ में निर्जीव श्रस्त्र 
के रूप में रहती है वे जेसा चाहे उसका उपयोग करें। पर नहीं वह 
अधिक सशक्त होती है श्रोर कभी कभी क्‍या सदा ही वागडोर को छीन- 
कर अपने हाथ में ले लेती है। प्राचीन साहित्य में एक लोकोक्ति चल पड़ी 
थी “विनायकं प्रकुबांणशः रचयामास वानरम्‌” तो लोगों ने सस्ते ढंग 
से यह बात नहीं कही थी। वे जानते थे कि कला कलाकार से कहीं 
प्रधिक प्रबल है | प्रतः, जितने भी तथा-कथित 78760 ९०४७) हैं 
उनके गर्भ में से कुछ ऐसे श्र कुर विकलमने लगते हैं जो श्रागे बढ़कर कल्पना 
की सीमा को छूते से दीख पड़ते हैं। 


सम्भव है कि लेखक की इच्छा के बावजूद भी कोई पात्र अपूर्व 
महिमा से मंडित हो उठे, श्रतिरिक्त शक्ति से समन्वित हो जाय, इतिहास 
की सीमा ने उसकी जिस रूपरेखा का निर्माण किया है उसको लांघ कर 
प्रपने रूप को चमकाले | प्रर्थात्‌ वास्तविकता की रिपोर्ट के लिए जितनी 
बात कहने की श्रावश्यकता है उससे कुछ अधिक मुखरित हो उठे । जड़ 


यो 


पत्थर भी सजीव हो उठे और रवीन्द्र के पाषाण की भांति अ्रपनी कहानी 
कहने लगें ।, लेखक कुछ ऐतिहासिक घटनाओ्रों के सहारे उस समय की 
परिस्थिति का चित्रण करना चाहता है। पर वे घटनायें परिस्थिति का 
चित्रण मात्र ही ने होकर बअब्रात्ममोध भी देने लग जा सकती हैं। 
हम उनमें रस भी लेने लग जा सकते हैं। पत्थर में से रस की एक पतली 
रेखा भी फूटती सी दीख पड़ती है * ऐसी सूरत में आालोचक बेचारा 
क्या करे ? 


यहां एक प्रश्त किया जा सकता है। श्राप ऐसे ग्रन्थों की चर्चा ही 
क्यों करते हैं जिनमें इतिहास की रिपोर्टिज्ध के श्रतिरिक्त भी कुछ बातें 
मिलती हैं, भ्रच्छी या बुरी। श्राप उन्हीं भ्रन्थों पर विचार करें जिनका 
उद्द श्य उपन्यास के नाम पर इतिहास भर देना है| क्‍या ऐसे भ्रन्थों की 
कल्पना नहीं की जा सकती जिन्हें उपत्यास का नाम दिया गया हो, परन्तु 
किसी ऐतिहाहिसक तथ्य के वर्णन मात्र से अधिक उसमें और कुछ न हो । द 
इसके उत्तर में कहा जा सकता है कि सिद्धान्ततः ऐसी विशुद्ध पुस्तक को 
'रचना को मान लेने में कोई आपत्ति तो नहीं है परन्तु व्यवहार में ऐसा 
होता कम है। कितनी भी श्रभेय्य तथा मजबूत रक्षा-पंक्ति बैठाई जाय 
उसमें दरार पड़ ही जाती है और वहां से घटनायें क्रांक कर मनवता के 
भाग्यधेय की श्रोर देखने लगती हैं । 


मुझे ठीक चांद है; बचपन में, एक दिन मेरी मां रसोई घर में भेरे 
खाने के लिये रोटी बनाने की तैयारी कर रही थी। तवे पर से पहली 
रोटी जो उतारी गई तो मैंने उसे खाने के लिए हाथ बढ़ाकर मांगा। मां 
ने वह नहीं दी। कारण पूछने पर उसने कहा कि प्रथम और श्रन्तिम 
रोटी नहीं खानी चाहिये । इस बात से मुझे सन्‍्तोष नहीं हुआ । मैते पूछा 


“- रैशरे 


“अच्छा, यह तो बताश्रो, यदि दो ही रोटियां बनी हो तब क्‍या किया 
जाय ? इस पर उसने कहा कि गईल घर की बातनइखीं करत अर्थात्‌ 
मैं गये घर की बात नहीं कह रही हूं | एक साधारण ग्रहस्थ की बात कर 
रही हूं जहां सदा दो से श्रधिक रोटियां बनती हैं। उसी तरह शायद ही 
कोई रचना होती हो जिसके यहां दो से श्रधिक रोटियां नहीं पकती हों । 
यदि कोई रचना है तो वहां चूल्हा जलता नहीं, या तो फाकेकशी की जाती 
है या भीख मांगी जाती है श्रर्थात्‌ वहां पर उपन्यास या ताठक बनाने का 
नाम भी नहीं लिया जाता । 


ग्रत: ऐसी किसी भी रचना पर विचार करने के पूर्व जो साहित्य 
का श्रर्थात्‌ उपन्यास, कहानी था नाटक का पर लगा कर चलती हो, 
ग्रालोचक को सब तत्वों की पहचानना होगा, इनके पारस्परिक सम्बन्धों 
का मूल्यांकन करना होगा । तय करना होगा कि रचना किन किन 
तत्वों के सहारे किस हद तक साधारण सतह से उठ कर साहित्य की 
ऊ'ची भाव भूमि पर पहुंचाती है। क्योंकि ऐसे उपन्यास होते हैं और हुए 
हैं, जो दोनों स्वामियों श्रर्थात्‌ उपन्यास श्रौर इतिहास की सेवा में नियोजित 
हो सकते हैं ।॥ श्रग्रंजी में चार्ल्स डिकेन्स के उपन्यास ऐसे ही हैं। वे 
उपन्यास कला को भी संतुष्ट करते हैं, साथ ही तत्कालीन सामाजिक 
बुराइयों पर भी प्रकाश डालते हैं। हिन्दी में सेठ गोविन्ददास के उपन्यास 
इन्दुमती का भी नाम लिया जा सकता है जिसमें कलात्मकता की सुरक्षा 
के साथ राष्ट्रीय श्रान्दोलन का इतिहास भी दिया हुआ है। 


परन्तु ऐसी पुस्तकों पर विचार करते समय भ्रालोचक को श्रपनी 
दृष्टि स्पष्ट रखनी होगी । जब वह पुस्तक पर साहित्य भ्रथवा उप- 


निजरन ५ प्र्डं किक 


सास कला की दृष्टि से विचार करता है तो ऐतिहासिक सत्यता की मांग 
करने वाली दृष्टि को पृथक रखना पड़ेगा । अश्रथवा यदि ऐतिहासिकता की 
मांग करता है तो कला की दृष्टि श्रोभल रहेगी। दोनों दृष्टियों के यौग- 
पत्य को लेकर आप इन पुस्तकों के साथ न्याय नहीं कर सकते । इस हृष्टि 
से इतिहास के संदर्भ में विचार करने पर उपन्यासों को चार श्र णियों 
में विभक्त किया जा सकता है । 

(१) ऐसे उपन्यास जिन पर कला की दृष्टि से विचार किया ही 
नहीं जा सकता। उनके सम्बन्ध में विचार करते समय यही कहा 
जा सकता «है. कि इसके लेखक ने चीन की या जर्मनी की या 
स्वातंत््योत्ततर भारत की ऐतिहासिक प्रगति की रूपरेखा देने की चेष्टा 
की है और इस उद्दंश्य से उसने साहित्य के उस रूप-विधान का 
आश्रय लिया है जिसे उपन्यास कहते हैं । श्रागे बढ़कर उपन्यास की एक 
एक-एक घटना के सहारे कहा जा सकता है कि इस उहं श्य में कहां तक 
उसे सफलता या विफलता प्राप्त हुईं है । 

(२) दूसरी श्रेणी में वे उपन्यास होंगे जिनका मूल्यांकन कला की 
दृष्टि से भी हो सकता है और इतिहास की दृष्टि से भी, पर दोनों का यौगपत्य 
स्वीकार नहीं किया जा सकता । डिकेन्स की 4'!6 ०07 'छ0 (68 
श्रथवा सेठ गोविन्ददास की इन्दुमती नामक उपन्यास इसी श्र णी में पायेंगे । 
इन दोनों दृष्टियों से विचार किया जा सकता है पर अलग श्रलग । 

(३) तीसरी श्रेणी उन उपन्यासों की होगी जिन पर हम दोनों हृष्टियों 
से युगपत्‌ रूप में विचार कर सकते हैं । स्काट के तथा एलेकजेंडर ब्यू मा के 
उपन्यास, वृन्दावनलाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास, मुन्शी के उपन्यास, 
यशपाल की दिव्या, श्रीवास्तव का 'वेकसी का मजार” इसके श्रच्छे उदा- 


ले रे 


हरुण हो सकते हैं। इनमें कलात्मकता तथा ऐतिहासिकता दोनों का अ्रधुर्व 
समन्वय हो सका है । 


(४) चौथी श्र॑णी में हम उन उपन्यासों को रख सकते हैं जिनमें 
किसी ऐतिहासिक पात्र का जरा सा सहारा ले लिया गया हो । जैसे मानों 
हुदय का घाव पका हो, जरा सा किसी नुकीली सुई से छू दिया कि 
वह फूट कर बह चला | सम्भव है ऐसे उपन्यास में घटनायें या 
पात्र एकदम कल्पित हों पर उनको इतिहास के पात्रों तथा घटनाश्रों से 
मिला कर देख लेना कठिन नहीं होता । जेनेन्द्र का जयवद्ध न इसका ग्रच्छा 
उदाहरण हो सकता है। यह है तो कलात्मक वस्तु ही, पर किसी भी 
पाठक के मस्तिष्क पर यह संस्कार उगे बिना नहीं रहेगा कि स्वातंत्रयोत्तर 
"भारत की राजनीति ने इसके लिए पृष्ठभूमि तेयार की है । राजनीतिक 
रंगमंच पर काम करने वाले नेताश्रों में भी इस उपन्यास के पात्रों की 
भालक देख लेना कठिन नहीं । 

इतिहास लेखक तथा कलाकार भश्रर्भात्‌ उपन्यासकार की कार्य-प्रणाली 
में क्‍या श्रन्तर है, इस पर भी विचार कर लेना चाहिये। यह देख लेना 
चाहिए कि दोनों की श्राधारक्ष्‌त सामग्री के निर्वाचन में तथा उसके प्रति- 
पादन के ढंग में क्‍या श्रन्तर है । ऐसी कौन सी वाध्यता है जिसके कारण 
इतिहासकार कलाकार का गौरव पाने से वंचित रह जाता है । आखिरकार 
कोई हृढ़तापूर्वक कह ही केसे सकता है कि इतिहास में साहित्यिकता कथा 
का लिबास अपनाए बिना थ्रा ही नहीं सकती । 070009 इतिहासकार 
भी हैं और उनकी पुस्तक 98 ॥060706 876 576 #9)| 07 ॥06 
]80797 ४777789 इतिहास के सिवाय श्रन्‍्य किसी श्रेणी की पुस्तक 
नहीं है | पर उसे साहित्य की पुस्तक भी कहां जा सकता है। यही बात 


“- १५६ “ 


(0878ए]6, 67087 तथा श्रन्य बहुत से ग्रन्थकारों के बारे में भी कही' 
जा सकती है । 


इन दोनों घुल्यों के एक साथ मिल जाने का कारण यही है कि इति-- 
हासकार को कल्पना से काम लेना ही पड़ता है । जहां तक कुछ घटनाश्रों . 
तथा आंकड़ों को उपस्थित करने का प्रश्न है वेज्ञानिक स्थुलता, हढ़ता तथा। 
य्यातथ्यता वाली पद्धति श्रपनाई जा सकती है | परन्तु जरा भी प्ागे 
बढ़ कर इन घटनाओं को व्यवस्थित कर, उन्हें परस्पर संबद्ध रूप में उप- 
स्थित करने का प्रश्न श्रावा, इतिहासिक खंडहरों में से प्राप्त टुकड़ों की. 
व्याख्या करने की समस्या सामने श्राई, जो श्रनिवार्य है,. वहां-वहां ही. 
विज्ञान की शक्ति की असमर्थता प्रगट हुई 0८ कर 


हम इन घटनाशओ्रों के श्राधार पर कारण-कार्य की शड्डला को हूढ़ 
ले सकते हैं, ऐतिहासिक विकास के नियमों का भी अनुसंधान कर सकते हैं, , 
प0807ए 0 87779प8 एप या 7098070%/ (७/8779|877 
के सिद्धान्त का प्रतिपादनः कर सकते हैं। मास ने किया ही था। पर यह 
स्पष्ट है कि ये बातें रसायन शास्त्र श्रथवा भौतिक शास्त्र के नियमों 
का स्वरूप नहीं प्राप्त कर सकतीं । उनका रूप एक- तरह से काम. चलाऊ 
ही हो सकता है। हम विज्ञान की प्रयोगशाला में- परिस्थितियों. पर-मिय« 
खरण कर सकते हैं। जिन चीजों पर प्रयोग: करना है उन्हें. जब. चाहें 
ला सकते हैं, जब चाहें. तब ही हाइड्रोजन श्रौर आवसीजन - को : मिलाकर 
जल की बू दे तेयार कर ले सकते हैं, पर श्रकबर श्ौर शिवाजी को कौन: 
बुलाने जायेगा ? भश्ौर तो और, हमें इतनी सी बात का भी निश्चय नहीं 
हो सकता कि जो घटनायें हमें उपलब्ध . हैं.शर जिनके श्राधार पर हम 


नन्क्न 4 पक ०. 


इतिहास की इमारत खड़ी कर रहे हैं वे परिस्थिति का वाह््तविक द्योतन 
करती भी हैं या नहीं ? 


( यदि इतिहासक्रार सच्चा इतिहासकार है केवल सूखा लक्कड़ 
चीरने वाला नहीं, तो उसे मृत घटनाश्नों के सहारे एक सजीव चित्र का 
निर्माण करना ही पड़ता है, उसे इधर उधर की बिखरी सामग्री को संग- 
ठित रूप देना ही पड़ता है। यहां तक तो ठीक है कि वह इतिहासकार ही 
“है, कलाकार नहीं, हालांकि उसने कलाकार के साधन त्र्थात्‌ कल्पना से ही 
काम लिया है। यदि वह मात्र चित्र-निर्माण करके रुक जाय तो वह 
इतिहासकार से अधिक गौरव का दावा नहीं कर सकता । एक ऐतिहासिक 
अनुसंधानकर्ता ने बड़े परिश्रम से नेपोलियन की इतिहास-विषयक सामग्री 
को खोजबीन की । वह इस परिणाम पर पहुँचा कि नेपोलियन कायर था । 
उसने विशेषज्ञों की एक समिति के सामने श्रपने प्रनुसंधान के परिणाम 


को पढ़ सुनाया | उसकी प्रक्रिया शुद्ध वैज्ञानिक है 0 


_ परन्तु वह एक और भी काम कर सकता है। वह चाह सकता है कि 
उसकी बातें लोग सुनें, उसके कथन में संप्र षणीयता आये, उसके कहने 
का ढंग प्रभावोत्पादक हो | श्रतः, उसे शब्दों के चुनाव में कौशल से काम ' 
लेना ही पड़ेगा । यदि कोई ऐसा इतिहास लेखक है तो हम उसकी कारी-. 
गरी की, कुशलता को दाद दे सकते हैं। कह सकते हैं कि वह अपने 
भ्रनुसंधान को कुशल कारीगर की भांति सजा कर रखने में सफल हुआ ' 
है । इसपर भी वह एक कुशल इतिहासकार ही है, कलाकार नहीं । उसकी“ 
रचना इतिहास का ग्रन्थ है, साहित्य का नहीं। साहित्य की श्रोर वह! 
श्रागे बढ़ा जरूर है, श्रोर समीप भी श्रा गया है पर वह साहित्योपकण्डः 


तप ९ ््‌ ०4 | >+ 


में ही निवास करता है, साहित्य प्षेत्र में नहीं । गंगातदे घोषः है, 
गंगायां घोषः नहीं । 


मेरे इस कथन का कारण वया है ? कारण यह है कि इस कुशल 
इतिहासकार की सारी रचनात्मक प्रक्रिया, उसकी प्रतिभा के सक्रिय होने. 
की पद्धति, उसकी मूल श्र रणा का स्वरूप साहित्य से एकदम भिन्न है। 
दोनों में मौलिक विभिन्नता है। इतिहासकार की रचना-प्रक्रिया में दो बातें ' 
स्पष्ट है, उसकी प्रतिभा के दो चरण-निक्षेप स्पष्टतया दृष्टिगोचर होते हैं । 
दो नहीं तीन कहिए। प्रथमत: उसने सामग्री एकत्रित की है,.द्वितीयतः ! 
उसने उस सामग्री के आधार पर चित्र तेयार किया है भ्रौर तब 
 तृतीयतः उसने कौशल का सहारा लेकर संप्रेषणीय बनाया है । 


“घर॑न्‍्तु साहित्यकार की कार्य-प्रणात्री दूसरी होतो है। उसमें विषय 
(0070076) तथा उसके प्रतिपादन के ढंग (0770) की समस्‍या अलग- 
प्रलग नहीं उपस्थित होती । यह नहीं होता कि कवि ने पहले विषय 
सोचा हो तब उसके प्रतिपादन करने की श्रथवा संप्रेषणीय बनाने की 
बात सोची हो । ये दोनों चीजें साहित्य में साथ साथ श्रवतरित होती हैं । 
कोई भी साहित्यिक संवेग अपनी झूपाभिव्यक्ति को साथ ही लिये ग्राता 
है। “ख़ुदा जब हुस्न देता है नजाकत आ ही जाती हैं ।” हुस्न को 
नजाकत खोजने की आ्रावश्यकता नहीं पड़ती । जहां हुस्न को नज्म्॒कत की 
खोज है वहां समझ जायें कि वह हसीन का काम नहीं | वह तो नाटक में 
प्रभिनय करने वालों का काम है। शभ्रौर इन दोनों को अश्रलग अलग देखना 
- सच्ची श्राशिकी नहीं, बाजारू हुस्त-परस्ती है, पफ श्रौर पाउडर पर जान 
' देने वाली विक्ृत-रझाचि है | 


5 


रोम के प्राचीन इतिहास का लेखक गिब्बन अ्रपन्ी पुस्तक [४७ 
4260#706 &04. 46 #9॥ 07 396 07979 #70778 में 
लिख तो रहा है इतिहास ही और रोम के पतन के कारणों पर प्रकाश भी. 
डाल रहा है पर जहां कहीं भी किसी रहस्यमय कारण से ऐसा हो सका है. 
कि रोम का इतिहास विश्व का इतिहास बनता सा दीख पड़ता है, रोम 
के पतन का कारण विश्व के पतन के कारण के रूप में उपस्थित सा. 
होता दीख पड़ता है,. श्रनधिगतशास्त्र तथा उत्मार्गगामी रोमन नुपों की 
कहानी संस्था ओर व्यक्ति के पारस्परिक सम्बन्ध की व्याख्या का रूप. 
धारण करने लगी है वहां इतिहासकार का रूप छिपने लगा है। इति- : 
हासकार दो रूपों में दिखलाई पड़ने लगा है। दार्शनिक के रूप में तथा 
साहित्यिक कलाकार के रूप में | जहां पर वह खुलकर स्पष्ट शब्दों में 
डंके की चोट से रोम के इतिहास की विश्व के इतिहास को प्रतीकात्मकता' 
प्रदान कर रहा है वह दार्शनिक बन गया है। पर जहां उसकी भाषा की 
समृद्धि, शेली के सौष्ठवः के कारण सावंभौमिक प्रतीकात्मकता स्वयमेव 
भलकती सी हो, वहीं: साहित्य की घूति अश्रवतरित होती है। वहां ऐसा 
लगता है--- 


लटा 'सवन ते प्रगठ भो, तेहि अवसर दोड भाई,. 
निकसे जनु जुग विमत्न बिधु, जलद पठल बिलगाइ, 
श्र 


यह कहने के लिए तो बहुत साहस चाहिए कि इतिहासकार भी" 
काल्पनिक गाथाओं का प्रयोग कर सकता है। पर जब कभी भी उपन्यास- 
कार इतिहास की सामग्री से काम लेगा, वह गड़े मुर्दे उखाड़ कर नहीं: 
रह. जायेगा; वह श्रतीत का चित्र खड़ा करके ही सत्तोष . नहीं कर लेगा .। , 


- १६० « 


वह वर्तमान को उद्भासित करेगा, अपने युग के सपनों को उसमें मिला- 
येगा । इतना ही वह उसे भविष्य का सन्देश-वाहक भी बनायेगा श्ौर 
इसके लिये उसे श्रपनी झोर से कुछ कहने की श्ावश्यकता नहीं होगी । " 
उसकी शैली, भाषा तथा उपन्यास का 2877४ स्वयं अपनी कथा 
कहेंगे | परिचय ? 'अखियन के आंसू” श्रपता परिचय स्वयं बतायेंगे ? 

( घटनाओ्रों पर इतिहास श्रपना पैटर्न देता है, साहित्य श्रपना । साहित्य 

ऐतिहासिक घटनाओं पर श्रपना पेटर्न देकर उपस्थित करता है, पर यह 
पेटर्न इतिहास के घर से उधार मांगी हुई या चुराई हुई चीज नहीं होती ! 
वह उसकी मौलिक चीज होती है। जब साहित्य तथा इतिहास के पैटर्न 
एक हो जाते हैं तो वहीं इतिहास कला की वस्तु हो जाता है । 


यह बात तभी स्पष्ट होगी यदि हम हिंदी के ऐतिहासिक कहे जाने वाले 
दो उपन्यासकारों को देखें, श्री किद्योरीलाल गोस्वामी तथा प्रतापनारा- 
यण श्रीवास्तव । गोस्वामीजी हिन्दी के प्रथम ऐतिहासिक उपन्यासकार 
कहे जाते हैं। उन्होंने मध्ययुगीच राजपुत इतिहास के ग्राधार पर श्रपने 
उपन्यासों की रचना की है। पर-तु राजपूत रमशियों का चरित्र उनके 
उपन्यासों में इतना विक्ृत हो उठा है कि वे जौहर करने वाली, मर्यादा की 
रक्षा करने वाली, प्रियतम के प्राणों के पण में, हमीं भेज देती हैं. रण 
में, ज्ञात्र धर्म के नाते कहने वाली वीर महिला से अ्रधिक प्राशिकी-माशूकी 
की बाजारू हुस्त-परस्ती की पुतली मात्र हो गई हैं। तब भला इतने 
बड़े भ्रस॒त्य को पाठक किस तरह निगल सकता है ।“पाठक के मनोविज्ञान 
को देखा जाय तो पता चलेगा कि वह इतिहास के सहारे थोड़ी कल्पना 
प्र्थात्‌ अ्सत्य को चला ले सकता है पर कल्पना श्रर्थात्‌ असत्य के सहारे 
इतिहास को नहीं ले सकता ॥ 0887 (४0986 कुनैच की टिकिया 


बा 3 


की बात तो ठीक है पर इसके विपरीत वाली स्थिति (पांप्रांप्6 
(४0964 8प297 की बात कोई नहीं करता ॥ 


श्री प्रतापनारायण श्रीवास्तव ने १८५७ के भारतीय स्वातंत्य संग्राम 
के नायक बहादुरशाह की जीवनी के आ्राधार पर 'वैकसी का मजार! नामक 
ऐतिहासिक उपन्यास्त लिखा है। उन्होंने इतिहास और उसकी घटनाओं के 
प्रति पर्याप्त सचाई और इमानदारी का निर्वाह किया है और पाठकों का 
विश्वास प्राप्त किया है । पर उस महान श्रान्दोलन को श्रग्नसर करने वाले 
सेनिकों में एक ऐसी नारी को भी ला बिठाया, जिसका धीरे-धीरे यौन 
परिवर्तन होता है, वह स्त्री से पुरुष बन जाता है। पर दो कारणों से यह 
बात खटठकती सी मालूम नहीं पड़ती, प्रथमतः तो ऐतिहासिकता की धूम- 
धाम में पाठक को इसकी ओर देखने की फुरसत नहीं रहती । दूसरी बात 
यह कि वह मुख्य पात्र है भी नहीं | यदि कभी इसकी शभ्रोर ध्यान जाता 
भी है तो पाठक जरा सा हंसकर रह जाता है। 


ग्रतः हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि इतिहास और ऐतिहासिक 
उपन्यास की सीमा बहुत कुछ झापस में मिल जाती है पर हम सुविधा के 
लिए एक सीमा रेखा मान ले सकते हैं । इतिहास में कल्पना का पुटठ 
आजाना सहज है पर घटनाम्रों पर काल्पनिक रंग चढ़ाना इतिहास का 
काम नहीं। ऐतिहासिक उपन्यास में यात्रा के लिए निकलती तो है कल्पना 
ही, पर इतिहास को भी साथ ले लेती है। साथी मनोनुकूल हुआ तो वह 
उसका आदर सत्कार कर सकती है, उसकी दुर्बल तथा क्ृश देह-यष्टि को 
स्मेह-पोषण प्रदान कर हुष्ट-पुष्ट तथा सौंदर्य मंडित बना सकती है। यदि 
पूर्णारूपेण हादिक सम्मेलन नहीं हो सका तो उसे बराबर हृदय से लगाये 
न रखकर कभी कभी उसको छोड़ भी सकती है-कभी सदा के लिए या 


४0% 


अस्थायी तोर पर श्रथवा बीच.बीच में छोड़ कर भी साथ ले सकती है। 
उपन्यास का क्षेत्र अधिक व्यापक होता है। वह इतिहास के बाजार में 
दुकान छान सकता है पर घर नहीं बसा सकता, उसका वास्तविक स्थान 
/ए07ए 40फ967 है। हां, कभी-कभी वहु उस ऊ चाई से उत्तरकर इतिहास 
की सतह पर श्रा जा सकता है | इतिहास उसके ग्रह पर अतिथि के रूप में 
निमंत्रित होकर आ गया तो बह हर तरह के ब्लादर सत्कार का अधिकारी 
होगा, पर वह वहां दखल जमा कर “मालिक मकां? नहीं बन सकता । 


परिभाषा--अ्रव्याप्ति और ग्रतिव्याप्ति दोष से रहित परिभाषा देना 
ञ्रति कठिन है । हम केवल पहिचान के सूत्र से ही सनन्‍्तोष कर ले सकते 
हैं। ऐतिहासिक उपन्यास इस तरह की काल्पनिक कथा है जिसमें इतिहास 
का पुट हो | कुछ लोगों का कहना है कि यदि उपन्यास में ऐसी तिथियों, 
घटनाओं अथवा व्यक्तियों का समावेश हो जिन्हें हम पहचान सके तो वह 
ऐतिहासिक उपन्यास कहा जायेगा। अधिकांश आालोचकों का यही मत 
मालूम पड़ता है कि इसमें किसी श्रतीत युग की ही कहानी होनी चाहिये । 
ब्राधार-भूत इतिहास कितना पुराना हो, एक दिन, एक मास, एक वर्ष 
या एक हजार वर्ष, इस पक्ष पर भी विचार किया गया है । इसके लिए 
कोई समय निश्चित नहीं किया जा सकता । 

एलेक्जेन्डर ड्यूमा का जन्म १८०३ में हुआ था। उन्होंने अपने 
उपन्यास '!08 806-ए0!788 0 (७७7600ग्र|” में सत्‌ १७६४ से 
१८४३ तक के बीच की फ्रांस की क्रांति की लगभग श्रद्ध शताब्दी के इति 
हापत को स्थान दिया है । इस तरह इसमें वरित अधिकांश घटनायें 
उसके समकालीन हो जाती हैं । फिर भी इस उपन्यास को ऐत्ति- 
हासिक उपन्यास की श्रेणी से बाहर करता कोई भी पसंद नहीं 


हक पे नल 


करेगा, हम अपनी श्रोर से इतना ही कह सकते हैं। साक्षात्‌ तात्कालिक 
तथा समकालीनता के कारण घटनाओ्रों तथा लेखक का व्यक्तित्व इतनी 
उम्रता के साथ वर्तमान रहता है कि उसमें काल्पनिक तटस्थता का श्रवसर 
नहीं रहता, जो कलात्मक वस्तु के निर्माण के लिए झावश्यक है। संस्कृत 
श्रालंकारिकों के शब्दों में कहें तो कह सकते हैं कि उसमें भाव-दशा तक 
पहुंचाने की पात्रता तो रहती है, पर इससे श्रागे बढ़कर रस-दशा तक 
पहुंचाने की पात्रता उनमें नहीं रहती । श्रत: उपन्यास के आधार बनने की 
सुगमता के लिए इतिहास को साधारणतः ५० वर्ष पुराना होना चाहिये । 
इस श्रद्ध दाताब्दी का भ्रतीतत्व घटनाओं पर से श्रांखों में चकाचौंध 
उत्पन्न करने वाले श्रतिरिक्त प्रकाश को हटा देगा। कुछ श्र 
धुधले हो जायेंगे श्रौर लेखक को बाध्य होकर श्रपनी तठस्थ कल्पना के 
सहारे उन चित्रों को भरना पड़ेगा । इतिहास घटनाश्रों को जिस विशिष्ट 
गौरव से समच्वित कर उन्हें साहित्योपयोगी बचा देता है यह समय करने 
में समर्थ हो सकता है श्रन्य कोई शक्ति नहीं | 


ऐतिहासिक उपन्‍्यासों का वर्गीकरणः--सिद्धान्तः ऐतिहासिक 
उपन्यासों को कुछ श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। 

प्रथम विशुद्ध ऐतिहासिक उपन्यास जिसमें इतिहास संज़ग प्रहरी 
की तरह श्रपने श्रस्तित्त की घोषणा करता रहता है | इसमें पात्र, 
उनके नाम, घटनायें, घटनाश्रों की रंगस्थली, हृ्य ग्र्थात्‌ देश, काल तथा 
पात्र सब के सब ऐतिहासिक होते हैं । उपन्यात्त का सारा वातावरण 
इतिहास के द्वारा नियंत्रित रहता है । 


दूसरी श्रेणी उच उपन्यासों की हो सकती है जिसमें लेखक की 
कल्पवा श्रपनी लक्ष्य-सिद्धि के लिये चूतन श्राविष्कार का सहाय्य 


लक १ ध ४ 


भी प्रदान करती रहती है | उदाहरणार्थ, पात्र ऐतिहासिक हों, पर 
उन्हें प्रनेक तुतन परिस्थितियों, परीक्षाओं में ले जाकर कल्पित साहसिक 
कार्यों से सम्बद्ध कर उनकी प्रतिक्रियाश्रों का चित्रण किया जा सकता 
है। अथवा पात्र भी कल्पित हों, बदनायें भी कल्पित हों पर उनका 
संयोजन इस ढंग से किया जाय कि किसी युग के इतिहास से वह 
पूर्ण रूप से संगत होजाय, ऐसा लगे कि किसी कारण-बश नाम मात्र में 
परिवर्तन कर दिया गया है नहीं तो वर्णित पात्र तथा घटनाओं के छंद॒मवेश 
के पीछे रांककर वास्तविकता को पहचान लेना कठिन नहीं है । 

तीसरी श्र णी श्रतंत्र ऐतिहासिक उपन्यासों की होगी जिसमें उपन्यासका र 
हर तरह के मिश्रण से काम ले सकता है। एक ही उपन्यास में भ्रपनी सुविधा 
के अनुसार वास्तविक तथा काल्पनिक पात्रों, ऐतिहासिक तथा कल्पित 
घटनाश्रों का सम्मिश्रण कर एक भरे-पूरे उपन्याप्तों की रचना की जा सकती 
है। अधिकांश ऐतिहासिक उपन्यास्त प्रायः इसी श्ोली में लिखे गये हैं। 


( प्रथम वर्ग के उपन्यासों को कुछ प्रारम्भिक सुविधायें श्रवध्य मिल 
जाती हैं। कथाकार की सबसे बड़ी कठिनाई है अपनी कथा के प्रति पाठकों 
का विश्वासोपाजन करना | इतिहास का हृढ़ आधार पाकर यह बहुत कुछ 
सिद्ध हो जाता है। पाठक देखता है कि पात्र जाने पहचाने हैं, धटनायें 
तथा वातावरण भी इतिहासाचुमोदित हैं तो लेखक की सत्य-निष्ठा के 
प्रति उसका हृदय श्रद्धावनत हो जाता है श्र उसके द्वारा दिये गये थोड़े 
से 7707079 के प्रति वह नरम पड़ जाता है ऐ पर लेखक को जहां एक 
ग्रोर थोड़ी सी सुविधा मिल जाती है तो दूसरी श्रोर उसकी कठिनाइयों में. 
वृद्धि भी हो जाती है। ग्रनुभव यही है कि (ऐतिहासिक घटनायें भ्रपती 
सत्ता की पृथकता तथा अपने स्वरूप की विशिष्ठता के प्रति इतनी सतके रहती 


न 


हैं कि किसी भी बाहरी हस्तक्षेप को वे सशंक दृष्टि से देखती हैं शोर 
उसके प्रति विरोध की मनोवृत्ति बनाये रहती हैं। यदि लेखक ने विषय 
की रोचकता के लिए श्रथवा किसी उद्देश्य की सिद्धि के लिए थोड़ी सी 
भी अ्रसावधानी की, तो वह पाठकों का विश्वास खो बेठता है। ऐतिहासिक 
घटनाओं में उपन्यास के रूप में हल जाने की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं 
होती | विशुद्ध ऐतिहासिक उपन्यास के उद्यहरण कम मिलते हैं । ५ 


इस कठिनाई से बचने के लिए कथाकार दूसरे वर्ग के ऐतिहासिक 
उपन्यास की रचना करता है । (ईसमें घटनायें ऐतिहासिक हों तो पात्र 
कल्पित हो सकते हैं, अथवा पात्र ऐतिहासिक हों पर घटनायें कल्पित । इस 
तरह के ऐतिहासिक कथाकार को कल्पना-प्रसुत वस्तु को विश्वासोत्पादक 
ढ ग से उपस्थित करने में बड़े कोशल से काम लेना पड़ता है । इतिहास में 
भी बहुत सी घटनायें ऐसी घटित होती हैं जो असम्भव सी लगें, पर उन्हें 
स्वीकार कर लेने में कोई कठिनाई नहीं होती) क्योंकि इतिहास की चश्म- 
दीद गवाही का समर्थन उन्हें प्राप्त है और हाथ कंगन के लिए आरसी 
मांगना कौन पसन्द करेगा ? प्र कल्पना को तो श्रपनी सफाई देनी पड़ती 
है | दूसरी कठिनाई यह है कि पाठक-बर्ग (४074700760 होता है । 
परम्परा से सुनते आने के कारण किसी पात्र या घटना के प्रति उसके भाव 
हृढ़ होजाते है, उसके मानसिक संस्कार बद्ध-मूल होजाते हैं, वह एक 
विशिष्ट हृष्टिकोण से देखने के लिए श्रम्यस्त हो जाता है ) राम-रावण, 
प्रकबर-प्रताप, शिवाजी-प्रौरंगजेब की विशिष्ठ मृत्ति उसके मानस-पठल 
पर श्र कित है। उस मूर्ति पर झ्राथात करने वाले साहित्य को स्वीकार 
करने के लिए वह सहज ही तैयार नहीं होता । 


इस कठिनाई से बचने के लिए कथाकार पपनी प्रतिभा पर विश्वास 


् 


कर कल्पना के सहारे पाच श्रोर घटनाम्रों दोनों को इतिहास से श्रलग कर 
स्वतन्त्र रूप में उपस्थित करता है, उनका जन्म इतिहास के पृष्ठभूमि पर ने 
होकर कथाकार के मानस-पटल पर होता है । केवल ऐतिहासिक वातावरण 
का पुट बनाये रखना पड़ता है। इस पद्धति में कथाकार को थोड़ी सुविधा 
ग्रवश्य हो जाती है। उसे घटनाग्रों तथा पात्रों को मनोवांछित तथा 
प्रभीष्ट-आधक ढंग से चित्रित करने की स्वतन्त्रता रहती है । इतनी सी 
बात का ध्यान रखना पड़त्ता है कि वे ऐसे स्वतन्त्र न हों कि घटनाओ्रों का 
विकास तथा पात्रों का व्यवहार ऐतिहासिक वातावरण से संगत न हो 
सकें । संसार में इष्ट-सिद्धि के लिए मूल्य देना ही पड़ता हैं) । डायन भी 
अपने मंत्र की सिद्धि प्राप्त करती है तो उसे 'मांग' था कोख' दोनों में से 
एक का बलिदान करना ही पड़ता है । तब कथाकार को ही यह सुविधा बिना 
मुल्य चुकाये केसे प्राप्त हो । भ्रतः इस पद्धति में कथाकार को इतिहास के 
साथ से जो एक सहज विश्वासोत्पादकता, सत्यता का बल प्राप्त रहता है 
उससे हाथ धोना पड़ता है श्रौर इस क्षति की पूत्ति उसे श्नौर अनेक ढ़द्धों से 
करनी पड़ती है । 


(_कथाकार को परकाय-प्रवेश-कला मैं पूर्णरूप से प्रवीण होना 
चाहिये । उसे पात्रों तथा धठनाम्नों के शरीर में प्रवेश कर प्रपती प्रभीष्ठ- 
सिद्धि की साधना करती पड़ती है। परकाया-प्रवेश कठिन कार्य है और 
खतरे से खाली नहीं है । पर मृत शरीर, निर्जीव शरीर, प्रवेश-निरविरोध 
शक्ति से हीन-निर्वीय शरीर में परकाया-प्रवेश में सफल होजाना फिर भी 
भ्रपेक्षाइृत कठिन नहीं है । पर जो शरीर जीता जागता हो, शक्ति-सम्पन्न हो, 
ग्रपने साथ स्वतन्त्रता लेने का विरोधी हो उसकी काया में प्रतेश करना कितना 
कठिन है| यही काम ऐतिहासिक कथाकार को करना पड़ता है। कल्पित 


“ १६७ « 


पात्र तो निर्जीव होते हैं,उन्में कथाकार के विरोध करने की क्षमता नहीं होती । 
ग्रतः उनके श्रन्दर पेठकर उन्हें मनोनुकूल बना लेना कठिन तो है, पर फिर 
भी असम्भव नहीं । किन्तु इतिहास की लंका के परकोटे के चारों प्लोर तो 
बड़े-बड़े मल्ल, योद्धा, राक्षस पहरा देते रहते हैं, इनमें पेंठ जाने के लिए 
मशक का रूप धारण करना पड़ता है। शब्रतः, ऐतिहासिक कथाकार की 
समस्‍या दुहरी हो जाती है। प्रथमतः ऐतिहासिकता की रक्षा करते हुए 
पाठक के हृढ़ चेतन्य को, उसकी सतक॑ संज्ञा को बड़े कौशल से कमजोर 
बनाना पड़ता है, उसे सुलाना पड़ता है श्र तब श्रपना कार्य श्रारम्भ 
करना पड़ता है। लिठन का प्रसिद्ध उपन्यास 4,886 तै&ए8 ७0 ?07- 
77 इस वर्ग के उपन्यास का प्रसिद्ध उदाहरण है । 


» इससे भी अधिक स्वतन्त्रता उस वर्ग के ऐतिहासिक उपन्यातों में 
होती है जिनमें कुछ पात्र अ्रथवा घटनायें ऐतिहासिक हों और कुछ कल्पित 
तथा दोनों के मिश्रण से, ऐतिहासिक वातावरण से, सहज ही संगत होजाने 
वाले उपन्यास की रचना की गई हो) लिठ्न का 706 ॥,886 0 68 
37078 इस वर्ग के ऐतिहासिक उपन्यात्त का श्रच्छा उदाहरण है। 
यहां ध्यान रखने की बात यह होती है कि / कल्पित पात्र और घटलनायें 
ऐतिहासिक प्रगति को न प्रभावित करने पादे क्योंकि ऐसी दशा में वह 
इतिहास से इतना भ्रलग पड़ जायेगा कि उसे ऐतिहासिक उपन्यास की 
संज्ञा देने में संकोच होगा | हां, ऐतिहासिक घटनायें .या पात्र कल्पित 
व्यक्तियों के जीवन एवं घटनाग्रों के प्रवाह को प्रभावित करे तो इसमें 
कोई प्रस्वाभाविकता नहीं ॥ राजनीति-तथा इतिहास उन व्यक्तियों के भी 
जीवन को बहुत ही सूक्ष्म ढंग से प्रभावित करता है जो सब से दूर तथा 
तटस्थ हो कर जीवन व्यतीत करते हैं और जिन्होंने उनका नाम भी कभी 


“- दैदद «“* 


नहीं युना हो । अ्रत: इस तरह के उपन्यासों के दो ही रूप हो सकते हैं । 

(ऐतिहासिक तथा कल्पित घटनाओं या व्यक्तियों में से कोई एक प्रधान रहे 
दूसरा गौरा । संस्कृत नाटकों की श्वब्दावली में कहना चाहें तो कह 
सकते हैं कि एक श्राधिकारिक रूप में रहेगा, दूसरा प्रासंगिक । 
यदि इतिहास प्रधान हुआ्रा तो कल्पना उसके द्वारा निश्चित 
स्वरूप को और भी पुष्ठता प्रदान करेगी, उन्हें अभिभूत करने का 
प्रय॑त्त नहीं करेगी । यदि कल्पना प्रधान हुई तो इतिहास उसके द्वारा 
बनाये चित्र में रंग भर उसके स्वरूप को निखार कर सामने लाने का 
प्रयत्न करेगा । कल्पना ने जो रेखाए' खींच दीं हैं उन्हें मिटाने को अथवा 
उनसे बाहर जाने की चेष्ठा न करेगा ) शैक्सपियर के ऐतिहासिक नाटकों 
में इतिहास ही प्रधान है। जितने पात्र कल्पित हैं वे स्थिति को संभाल भले 
ही लेते हों, पर श्रधिक सक्रिय होकर घटना-प्रभाव को मोड़ने का साहस 
नहीं करते । स्काट हैंतो ऐतिहासिक उपन्यासकार, पर इतिहास मुख्य 
कार्य का विधायक नहीं है, उसकी मुख्य विधायिका है कल्पना । इतिहास 
कल्पना का सहायक मात्र है | 


(साधारणत: लोगों की यह धारणा है कि जीवन की यथातथ्यता को 
उपजीव्य मान कर तथा उसका अ्रधिकाधिक अनुसरण कर चलने वाली रच- 
नाए' ही उत्कृष्ट साहित्य की श्रेणी में श्रा सकती हैं। जब से यथार्थवाद 
का प्रचार हुआ है और वेज्ञानिक दृष्टि लोगों में जगी है तब से इस प्रवृत्ति 
को और भी प्रोत्साहन मिला है। किसी साहित्यिक रचना की मूल प्रेरणा 
का पता पा लेना सहज नहीं है कारण कि उसकी सिद्धि के लिए कितनी 
ही चेतन या श्रचेतन प्रवृत्तियां सक्रिय रहती हैं पर जब उपन्यास कला' ने 
इतिहास की श्रोर पेर बढ़ाया होगा उस समय यथार्थवादौ दृष्टिकोण से 


हल: 0 पर 


ही संकेत मिला होगा ओर उसने ही उपन्यास को इतिहास के क्षेत्र में 
पदाप॑ण करने के लिए प्रोत्साहित किया होगा। दंत-कथागञ्रों ने बहुत काल 
तक लोगों के हृदय में स्फ़ुति का संचार किया होगा, तत्वश्वात्‌ रोमांस को 
यह कार्य-भार सौंपा गया होगा । बाद में इनसे काम न चलता देख कर 
साहित्य ने यथार्थवाद को श्रपताया होगा । इस प्रवृत्ति का प्रतिफलन हम 
डीफो, फील्डिग इत्यादि की रचनाग्रों में पाते हैं। यद्यपि डीफो और 
फील्डिंग की रचनाओं में हम यथाथंवाद का प्रवेश अ्रवश्य पाते हैं पर फिर 
भी [207 (घा5०068 तथा "077 ००४७४ की साहुसिकता और ७0- 
9७777768 रोमांस के इ्द-गिर्द ही घुमते दिखलाई पड़ते हैं । ऐसा लगता 
है कि यथार्थवादिता को इससे पूरा रान्‍्तोष नहीं होगा श्रौर उसने इस 
स्थिति से मुक्ति पाने के लिए 8006 की प्रतिभा को ऐतिहासिक उपन्यासों 
की रचना की आर प्रवृत्त किया होगा । 


5000 के ऐज्रिहासिक उपन्‍न्यासों में रोमांटिक तत्व नहों सो 
बात नहीं । प्रचुर मात्रा में उनका उपन्यास रोमांटिक तत्वों से भरा 
पूरा है। पर इतिहास का श्राश्रय ले लेने से उसकी तीक्ष्णता ओर 
उग्रता बहुत कुछ दूर हो जाती है, डंक बहुत कुछ टूट जाता है। 
अ्रन्ततोगत्वा साहित्य का उद्द श्य पाठकों के हृदय में एक सुख . भ्रम 
का संचार करना है न ! एक ऐसी स्थिति उत्पन्न करना, जिसमें पाठक 
की विरोधी मनोवृत्ति शांत हो जाय, लेखक के प्रति उसमें विश्वास 
भावना जगे और वह देय को ग्रहण करने की मनोवृत्ति धारण कर ले । 
ऐसे मौके पर इतिहास ने आकर बड़ा काम किया और इस विरोधी मनो- 
वृत्ति को शांत किया | यह विरोधी मनोवृत्ति वाली बात भ्रौर भी स्पष्ट 
होकर हमारे सामने श्राती है जब हम देखते हैं कि उपन्यासों के प्रति लोगों 


में अच्छी धारण। न थी और उपन्यासों के पढ़ने को हेय दृष्टि से देखा 
जाता था। स्काट की उपन्यासकला ने इतिहास का सहारा पाकर यथा- 
थंवाद की बढ़ती प्रवृत्ति को गम्भीरतर संतोष प्रदान किया साथ ही समाज 
के सभ्य तथा शिष्ट वर्ग के लिए आझ्रादर का पात्र बनाया | 


यहां पर एक और प्रश्न पर विधार कर लेना ग्रावश्यक प्रतीत होता 
महत्व अधिक है ॥ यों तो कवि की प्रतिभा किसी भी वस्तु को छू कर 
पारस बना दे सकती है। पर प्रश्न यह है कि वस्तु अपने विशुद्ध रूप में 
उपन्यास कला को श्रेष्ठ बनाने वाली कौन सी होगी ? क्या ऐतिहासिक 
कथा-वस्तु में साहित्य को उद्घात्त बनाने की श्रधिक मौलिक योग्यता होती 
है और कल्पित कथावस्तु में अपेक्षाकृत कम ? क्या शभ्रृत-प्रेत-परियों, 
दानवों तथा देवताग्रों की कथा कहने से उपन्यास्-कला अपने लिए एक 
ग्रतिरिक्त बला मोल लेती है और श्रकबर, शिवाजी, रिचार्ड और क्रामवेल 
को साथ लेकर अपने मार्ग को प्रशस्त कर लेती है ? किसी वस्तु पर 
विचार करने के दो तरीके हो सकते हैं । 


(१) प्रथमतः तो यह कि हम उसके मूल से प्रारम्भ करें और उसकी 
प्रगति के प्रत्येक चरण के साथ चरण मिलाकर यात्रा करते हुए उसके 
विकास-क्रम का निरीक्षण करते जायें | 


(२) द्वितीयतः हम परिणति से ही आ्रारम्भ कर मूल तक पहुचाने 
का प्रयत्न करें ।॥ वृक्ष को देखिये श्लोर प्रतिलोम गति से यात्रा 
करते हुए बीज तक पहुचाने का प्रयत्न कीजिए। यदि प्रथम पद्धति 
श्रपनाई जा सके तो वह कुछ सुविधाजनक हो सक्रती है। पर यह समय 
साध्य है और बहुत कुछ आत्मनिष्ठ प्रक्रिया है। इस पद्धति से विचार 


2 ३ ७१ - 


करने में केवल स्रष्टा ही समर्थ हो सकता है श्रथवा उसके साथ रहने वाला 
श्रन्तरड़ मित्र---श्री कृष्ण के उद्धव की तरह ! कहा जाता है कि उद्धव 
श्री कृष्ण के सब कुछ थे--महाभृत्य, महाशिष्य, महामात्य । वे कभी भी 
भगवान का साथ नहीं छोड़ते थे । यहां तक कि श्रन्तःपुर के भी वे साक्षी 
थे | यदि ख्रष्ठा का कोई ऐसा अन्तरज्भ सखा मिले तभी हमें बीज से ले 
कर चरम परिणति के इतिहास की मांकी मिल सकेगी, पर यह दुर्लभ है। 
साहित्यिक वस्तु की परिणति ही हमारे सामने रहती है, हम उसके सिद्ध 
रूप को ही देख सकते हैं, साध्यमान्‌ को नहीं। अ्रतः दूसरी पद्धति से ही 
अखिक काम लेना पड़ता है। एक रचना अपने पूर्ण विकसित रूप में 
हमारे सामने है। हम उसकी एक एक परत उधेड़ कर देखते हैं, 
प्रपनी बुद्धि से भी काम लेते हैं, दूसरों से भी सहायता लेते हैं, यहां 
तक कि स्रष्टा से भी कुछ प्रकाश पा ले सकते हैं। इस तरह एक सिद्ध 
साहित्यिक बस्तु को हम हाथ में लेते हैं तो क्या हाथ लगता है ? 


पहली बात तो यह हाथ लगती है कि यह भाषा के माध्यम से 
किसी वस्तु की अभिव्यक्ति है। अ्रभिव्यक्ति शब्द जरा भारी सा जान 
पड़े तो कहिये कि वर्रान है । अ्रच्छा, अभिव्यक्ति या वर्णात सदा सक्रिय 
होते हैं, निर्माणात्मक होते हैं। अभिव्यक्ति कभी भी निष्क्रिय नहीं होती, 
अ्रभिव्यक्तमान वस्तु को ज्यों की त्यों उपस्थित नहीं कर सकती | वस्तु श्रौर 
भ्रभिव्यक्ति के बीच में व्यक्ति भ्रा जाता है। जिस श्रतीत में मनुष्य भाषा 
का श्राविष्कार नहीं कर सका होगा और मूक की तरह संकेतों के द्वारा ही 
ग्रभिव्यक्ति करता होगा उस समय भी अ्रभिव्यक्ति सत्य-स्थापन में समर्थ 
नहीं होती होगी। ग्रभिव्यक्ति, वस्तु में कुछ जोड़-जाड़ या कांठ-छाँट करती 
ही होगी । भाषा के आविष्कार ने इस पार्थक्य या दूरी को एक पग और 


बे २ रे + 


बढ़ाया होगा। भाषा ने साहित्य का रूप धारण किया तो इस पार्थक्य 
प्रें ग्रौर भी अ्रभिवृद्धि हुई और साहित्य जब नाटक, उपन्यास इत्यादि 
बना तब तक वह मूल वस्तु से एकदम दूर जा पड़ा था। श्रत्त: साहित्य पर 
(यहां उपन्यास पर) विचार करते समय यह विचार करना उसमें कितना 
श्रश कल्पना का है और कितना अ्रश यथार्थ का इस प्रश्त को छेड़ना 
ही छाया के साथ लठेती करने तथा अपने ही कधों पर चढ़ने के प्रयत्न 
के समान व्यर्थ है। 

(साहित्य एक ऐसा रासायनिक मिश्रण है कि इसके निर्माण के तन्तुगं 
को पृथक कर देखना श्रसम्भव है। साहित्य के केन्द्र में व्यक्ति प्रतिष्ठित 
रहता है, साहित्य के माध्यम से मानव श्रपने को अनेक परिस्थितियों में 
रखकर देखना, पहचानना चाहता है। श्रतः देखना यही है कि उपन्यास या 
साहित्य के द्वारा मानवीय सम्बन्धों की कहां तक श्रभिव्यक्ति हो सकी है। 
श्रतः उपन्यास के पात्र कैसे भी हों, दिव्य अ्दिव्य या दिव्यादिव्य इसकी 
परवाह नहीं । पात्र के रूप में जड़ या चेतन किसी को उपस्थित किया जा 
सकता है। श्राकाश श्रौर फताल को एक कर देने वाली घटनाग्रों का भी 
समावेद् हो सकता है पर सब के केन्द्र में मानव की प्रतिष्ठा होनी चाहिए। 
वे मानवीय सम्बन्धों, मूल्यों और महत्त्वों के प्रकटीकरण में कितने समर्थ 
हैं हमारे लिए इतनी सी ही बात महत्त्वपूर्ण है । यदि एक पत्थर के ठीकईे 
की आत्मकथा हमें मानवीय रहस्यों, सम्बन्धों, मुल्यों को समझाने में सहा- 
यक है, यदि वह हमें विश्व के साथ पारस्परिक सूत्रों में गतिशील रूप में 
अआबद्ध दिखला कर, श्रपने को पहचानने की शक्ति देता है, हम में मानव की 
468४79 की भांकी लेने की सामथ्य पेदा करता है, तो वह उच्चकोटि का 
साहित्य है। यदि श्रशोक, शिवाजी यथा महात्मा गांधी को लेकर सजित 
, स्‍वता भी हमें अन्दर से उभाड़ती नहीं, कुछ श्रात्म-निरीक्षण की प्रेरणा 


रन रे गे ++ 


नहीं देती, केवल थोड़ी बहुत उल्टी सीधी कथा भर कह कर रह जाती है। 
हमारे हृदय में सपने नहीं भर देती तो वर्णन भले ही अपने स्थान पर मह- 
त्वपूर्ण भी हो पर श्रेष्ठ साहित्य के पद की श्रधिकारिणी नहीं हो सकती । 


साहित्य का काम बोध भर ही देना वहीं है (बह तो बह देता ही 
है) पर श्रागे बढ़ कर आरात्म-प्रकाश भी देना है । एक ऐसा प्रकाश जो दिन 
की खुली रोशनी में नहीं मिल सकता--रात्रि में एक टाचें की सहादता से 
देखने में प्राप्त होता है । दिन के खुले प्रकाश में प्रकाश पा लेना भी प्रपने 
में कम महत्त्वपूर्ण नहीं है पर अ्रन्धकार के गढ़ को चीर कर एक पतली 
किरण जब प्रवेश करने लगती है भौर क्रमशः वहां के रहस्यों का उद्घाटन 
होने लगता है तब मानव हृदय एक अ्पूर्व श्रानन्दोल्लासानुभूति से भर जाता 
है । विशुद्ध प्रकाश श्र अ्रन्धकार को पराजित करता हुप्रा प्रकाश दो चीजें 
हैं। एक में निष्क्रियता है, दूसरा सक्रिय है, एक स्थितिशील है, दूसरा प्रगति- 
शील । अश्रतः साहित्य में गतिश्वील प्रकाश ही महत्त्वपूर्ण होता है । यदि 
भ्रन्धकार न हो तो भी कृत्रिम रूप से श्रन्धकार की सृष्टि करवा प्रकाश 
को उस पर हावी होता हुआ दिखलाने का प्रयत्न करना पड़ता है । 


वैज्ञानिक प्रयोगशालाम्रों में इस तरह के कृत्रिम अ्रन्धकार की सृष्टि करने 
की व्यवस्था की जाती है | तब साहित्य की प्रयोगश्ाला में इस तरह के 
प्रयोग की व्यवस्था क्‍यों न हो ? (ुतिहास दिन का नेसगिक प्रकाश है और 
कल्पना रात्रि का अ्न्धकार । ऐतिहासिक उपन्यास दिन के खुले प्रकाश में 
अपना व्यापार करते हैं, वहां प्रकाश का इतना आ्राधिक्य रहता है कि कोई 
चीज ठीक से नहीं देखी जा सकती । प्रकाश इस तरह अपनी सत्ता बनाये 
रख कर छाया रहता है कि वह ही श्रावरण बन जाता है। श्रतः कला, 
नेत्रोन्‍्मेषिणी कला, इतिहास के कुछ अभ्रंश को श्रावृत कर रखने वाले 


ल्‍न १ छह +८ 


प्रकाश के प्रांगश से हटाकर कल्पना की कोठरी में ले जाती है भौर वहां 
उसे एक टाच के सहारे देखने दिखलाने का उपक्रम करती है । उपन्यास 
श्रन्धकाररूपी गजकुम्भ को विदारण करते हुए सिंह की दीप्ति है श्रोर 


ऐतिहासिक उपन्यास, सिंह के द्वारा विदारित होती हुई गजकुम्भ की 
इयामलता, जिसके गर्भ से शत्‌ शत्‌ मुक्ताएं बिखर-बिखर पड़ती हैं। हम 


रूपक की भाषा में बोल रहे हैं। श्रतः इसमें दीख पड़ने वाली श्रसंगति को 
श्रपनी सहज बुद्धि से दूर कर वास्तविकता को पहचान लेनी चाहिए। 


प्रथम पद्धति से विचार करने में भ्र्थात्‌ बीज से श्रागे बढ़ कर श्र कुर 
तथा वृक्ष बनने के सातत्य को देखने में श्रालोचना को उतनी सुविधा नहीं 
होती । यह काम ख्रष्टा का है। पर आलोचक, ख्रष्टा के सहारे यहां भी 
कुछ तथ्य का पता लगा सकता है। बहुत से कथाकारों ने श्रपनी कहानी की 
'कहानी' कही है भोर बताया है कि घूल रूप में प्राप्त हुआ एक छोटा सा 
बीज किस-किस तरह कहां-कहां से रस-प्रहण करता हुआ, किन-किन बाधाश्रों 
को भेलता हुआ श्रपनी परिणति को पहुंचा है। हिन्दी में इस तरह का 
प्रयत्न नहीं हुआ है । प्रेमचन्द ने एक स्थान पर सिर्फ इतना ही कहा है कि 
रंगभूमि का प्लाट एक श्रन्धे भिखारी को देख कर ही उनके मस्तिथ्क में 
श्राया था। पर उन्होंने श्रागे बढ़ कर उस छोटे से बीज को रंगभूमि के रूप 
में परिणत करने वाली शक्तियों का स्वरूप निश्चित नहीं किया है। इस 
दृष्टि से श्र ग्न॑ जी के प्रसिद्ध औपन्यासिक हेनरी जेम्स के /27874088 बड़े 
ही महत्त्वपूर्ण हैं जहां उन्होंने कहीं से श्रा पड़ने वाली छोटी सी चिन- 
 गारी को एक तेजःपुज वृहज्ज्वाल के रूप में परिणत करने वाली सारी 
शक्तियों का विश्लेषण किया है। यहां पर उनके एक ?6908 के श्राधार 
पर बतलाने की चेष्टा कर रहा हूं कि एक छोटी सी सांस को भभावात 


कटख्व श ७9 *ल बमन्‍्म 


बना देने के लिए प्रतिभा कहां कहां से उपकरण एकत्र करती है। इससे 
यह भी समभने में सहायता मिलेगी कि साहित्यिक या कलात्मक सृष्टि में 
इतिहास (सत्य) श्लौर कल्पना का स्वरूप कैसा होता है। 

हेनरी जेम्स का एक प्रसिद्ध उपन्यास है 76 8090॥8 ४ 0 
720५7000, उसकी भूमिका में उसने लिखा है कि वर्षों पहले, एक 
बार जब वह किसी प्रीतिभोज में सम्मिलित होने के लिए गया तो वहां पर 
अपने भित्रों के साथ तरह-तरह के वार्तालाप के प्रवाह में निमग्न था कि न 
जाने कहां से बहता बहुता एक ठृण झ्रागया । वह था तो छोटा ही पर 
वह इतना नुकीला प्रामाणित हुआ कि वह हृदय-रंकत्र के उस स्तर तक 
पहुंच गया जहां से सृजन का प्रारम्भ होता है। वार्तालाप के प्रसंग में एक 
मित्र ने उत्तर की तरफ रहने वाली एक महिला की चर्चा छेड़ दी । वह 
महिला सभ्य, शिष्ट और भद्र थी। उसका एक इकलौता पूत्र था जिसे 
वह बहुत प्यार करती थी | पुत्र भी ऐसा वेसा नहीं, हर तरह से आ्रादर्श | 
पिता की मृत्यु निकट जान पड़ती थी । पिता के पास कुछ बहुमुल्य 
ऋप्प्णाप8 था। उनके उत्तराधिकार को लेकर माता और पुत्र में 
विरोध की मात्रा इतनी बढ़ गईं कि श्राज वे एक दूसरे के जानी दुश्मन 
हो रहे हैं । 

बात इतनी ही सी थी। इसमें मुश्किल से दस शब्द रहे होंगे, पर 
इतने से ही मानो बिजली की चमक की तरह उसका सारा मानस प्रदेश 
उद्भासित हो गया श्रौर उसमें उपन्यास को पूरी रेखा की श्रवस्थिति दृष्टि- 
गोचर होने लगी । कल्पना कीजिये कि सुसज्जित तथा सब तरह की 
मनोहर सामग्रियों से पूर्ण स्वागत कक्ष है, बिजली के बटन को दबाते ही 
कल्पना श्रंपनी गौरववास महिमान्विता के साथ प्रगट हो गईं हो। ऐसी 
स्थिति में देय कुछ श्रधिक है । 


बज 3 


लेखक की हुई | यहां तक कि जब इस अंग की और बातें कही जाने 
लगीं कि दोनों प्रतिद्वन्द्रियों में किस-किस तरह की चोटें चलने लगीं, एक 
ने दूसरे को मात देने के लिए कौन सी गोटी उठाई, दोवों में श्रपनी 
प्रभीए-सिद्धि के लिए केसे कंसे श्राघात-प्रतिघात होते रहे तो उसने इन 
सब के प्रति अपने कान ही मूंद लिए । होना तो यह चाहिये था श्रोर 
आपात्ततः यह बात ठीक भी मालुम होती है कि लेखक विस्तार की इन 
बातों का स्वागत करता, ध्यान देकर सुनता और श्रपने कथा-निर्माण में 
इनसे सहायता लेता । पर वह इन्हें व्यर्थ तथा श्रपनी कला-वस्तु की 
निर्मिति में बाधक समझता रहा । 


( प्रकृत्ति (सत्य) मानों एक स्मेहमयी पंगली मां हो जो श्रपने 
स्तेहातिरेकावेश में बच्चे को प्यार करते समय, पालने पर भुलाते 
समय प्यार के चुम्बनों और झलिगन के भार से ही उसका दम घोंठ दे । 
ग्रतः उसे इस व्यापार से रोकना चाहिए । यही काम लेखक करता है । वह 
देखता है कि समय रहते, बच्चे की जान रहते या तो मां को इस घातक 
व्यापार से निवारित करना चाहिये, नहीं तो बच्चे को ही वहां से ले भागना 
चाहिये । उत्पन्न तो करती है प्रकृति ही, पर खा भी बही जाती है, नष्ट 
भी वही करती है। प्रकृति की ध्वंस.लीला इतनी उम्र होती है कि उसका 
सृजनात्मक पहलू छिप जाता है श्रौर उसके रक्तरंजित पंजे ही 
( 7778 764 9 00% #7व 208४3 ) दिखलाई पड़ते हैं। 
कलाकार का ही प्रताप है कि वह प्रकृति के बालक को उसकी प्राण- 
घातिनी गोद से छीन कर या और किसी प्रकार से उसकी रक्षा की 
व्यवस्था करे) प्रकृति ने तो कितने ही रामों को पैदा किया होगा और 


नष्ठ कर दिया होगा । पर एक राम को कवि ने प्रकृति की गोद से हटा 


जज श्‌ 90७ «« 


कर अपनी गोद में लिया, आ्रातिशय्य या अभाव दोनों दोषों से रहित उचित 
मात्रा में स्नेह-संपोषण देकर परिवद्धित किया और उसी के प्रताप से वह 
राम आज भी जीवित है। विल्हण ने श्रपनी पुस्तक विक्रमांकदेव चरित 
के प्रारम्भ में ही दो इलोक लिखे हैं शोर वे हमारे प्रसंग में इतने मौजू' 
बेठते हैं कि उनको उद्ध,.त् करने का लोभ संवरण नहीं कर सकता । 


(१) प्रथ्वीपतेः सन्ति न यस्य पार्श्वे कबीश्वरास्तस्य कुतो यशांसि 
भूपा: कियन्तों व बभूचुरुव्या' जानाति नामापि न को5पि तेषाम्‌ 


(५) लंकापते: संकुचितं यशो यदू यत्कीर्तिपात्र रघुराजपुत्र: । 
स स्व एवादिकवे: प्रभावों न कोपनीयाः कवयः ज्ितीन्द्रौ: । 


श्र्थात्‌ जिस राजा के पास कवि नहीं, भला उसे यज्ञ की प्राप्ति कहां ? 
संसार में त जाने कितने राजाप्रों ने जन्म लिया परन्तु श्राज उनका कोई 
भी नाम-लेवा नहीं है । लंकापति रावश की कीत्ति आज इतनी मलिन 
पड़ी हुई है भौर राम इतने यशस्वी हैं--यह सब श्रादि कवि बाल्मीकि का 
प्रभाव है। राजाम्रों को कभी भी कवियों को नाराज नहीं करना चाहिए । 


जमीन की किसी तह में हड्डी की एक छोटी द्रुकडी पड़ी है, कुत्ते को 
उसकी गंध का पता चलता है शोर वह उसे ले श्राता है। उसी तरह की 
गंध साहित्यिक भी सु घता है श्रोर वहां पहुंच जाता है। परकुत्त' में और 
कलाकार में प्रन्तर है। कुत्ता हड्डी की ट्रुकड़ी लेता है तो उसे दांतों से 
चबा चंबा कर नष्ट कर देने के लिए पर कवि उसे उठा कर लाता है तो 
उसे स्थायित्व देने के लिए, उसे श्रमरत्व-प्रदान के लिए | कुत्ते के स्थान 
पर हम प्रकृति को रख सकते हैं श्रौर कलाकार तो कलाकार है ही ! 


पूर्वोल्िखित छोटे से संकेत पर हेनरी जेम्स ने ग्पने उपन्यास की भव्य 


«“ पैज्षेक ४ 


ग्रद्ठालिका का निर्माण किया है--वह संकेत जो मुफ्त में भिली चीज है 
जिसे किसी ने दी नहीं है, जो मिल गई है, भाग्य की तरह, श्रपने 
प्धाशाफ्राएए रूप में, जो जरा भी ज्यादा मिलती तो गर्भसथ शिशु जीवन 
ज्योति के दर्शन के पूर्व ही नष्ट हो जाता | बाहर से दूसरे लोगों द्वारा 
बताये गये संकेतों में स्थुलता होती है, श्रावश्यकता से श्रधिक बातें कही जाती 
हैं, उनकी नोक इतनी मोटी होती है कि सृजनधार के प्रवाह के लिए रंध्र 
नहीं बना सकती | ठोक पीट कर वेद्यराज बनाने वाले बहुत से 
007788]007966709 00प7868 की बातें सुनने में श्राती हैं पर इन्होंने 
किसी कथाकार को उत्पन्न किया हो यह बात सुनने को नहीं मिली । हां, 
जान को खतरे में डालने वाले नीम हकीम पेदा किये हों यह बात दूसरी 
है। जिस तरह हवा में सदा तेरते रहने वाले वेगेटाणु बड़े कौशल से उसी 
शरीर में प्रवेश करते हैं जो उनके लिए 77708 है और वहां से अपनी 
कलात्मक वस्तु रोग का सजन करते हैं । उसी तरह कथा के संकेत कहां 
नहों हैं। सारा विश्व ही वृह्कथा है जिसका दामन जरा निच्चुडा नहीं कि 
फरिश्ते उसमें वजू कर धन्य-धन्य होने लगते हैं । 


हमारा उहं श जेम्स की कला तथा +४8 579078 06 720797609 
का श्रध्ययन प्रस्तुत करना नहीं है । हम यहां इतना ही जाने कि इस छोटे 
से संकेत पर जिस कथा का निर्माण हुआ उसको रूप रेखा यह है। (१8 
0०7०४ के पृत्र 0ए़60 087०0 के विवाह की बात (०7७ 
37798000 से तय हो चुकी है । इसी श्रवसर पर 7]609 ५४७६४७/ नामक 
एक लड़की के हृदय में भी (2४७४ के लिए प्र'म के प्रकुर उत्पन्न होते 
हैं । 7]6009 चतुर और प्रतिभावाद्‌ लड़की है और /४78 (४७7७४ इसे 
पसन्द भी करती हैं पर भावी पुत्र वधू को नहीं चाहती श्र नहीं चाहती 


न १७६ «« 


कि उसके बहुमुल्य उपस्कर एक श्रवांछित व्यक्ति के हाथ लगें । श्रतः, बह 
उन्हें हटा कर एक दूसरे स्थान पर रखवा देती है । इस पर 7४०79 
बहुत क्षुब्ध होती है श्रौर विवाह का भ्रस्ताव तब तक के लिये स्थगित हो 
जाता है जब तक कि वे हटाई गई बहुमूल्य सामग्रियां पुनः यथा-स्थान 
नहीं ला दी जातीं। 


इसी परिस्थिति में #]9१8, ॥/78, (४6४०४४7 से मिलने आती 
है । आने के पहले वह 0एछ७४ से मिलती है और घटना के 
विकास क्रम से पूर्णतया परिचित हो जाती है। 09७87 मना कर देता 
है कि वह उसकी मां से श्रपनी प्रेमिका की शर्त की चर्चा न करे कारण 
कि इस बात को सुन मां का हृदय कड़ा न पड़ जाय और स्थिति में सुधार 
होने की रही सही आशा भी जाती रहे । वार्तालाप के प्रसंग में 7609& 
के मन में यह भी धारणा बनी है कि 0ए७॥ के हृदय में उसके लिए 
तरल भाव हैं भ्रौर परिस्थितियों के अनुकूल होने पर प्र म की आराधार-वस्तु 
में परिवर्तत हो सकता है अर्थात्‌ 0767 अपने पूर्वाग्नह का परित्याग कर 
ए]009 से विवाह पर विचार करने के लिए तेयार हो जा सकता है । 
वह सोचती है कि यदि समस्या का समाधान एक ही है कि मां अपने सत 
पर कुछ देर शोर हृढ़ रहे तो 06४ सामग्रियों के लौटाने के हठ को 
छोड देगा श्रौर (079 स्वयं मार्ग से हट जायेगी | ऐसी ही परिस्थिति में 
वह (78 667७४ से मिलने जाती है । ह 


यदि वह सीधी साथी , श्रपती स्वार्थ-सिद्धि को प्रधान मानने 
वाली, श्रपनी प्रवृत्तियों को ही महत्त्व देने वाली नारी होती है 
तो सब कुछ सहज रूप में सुलभ जाता । पर वह बड़ी सुरुचि- 
सम्पन्न, यूक्ष्म-दर्शी, प्रबुद्ध-हुदय और विकसित-मस्तिष्क नारी है 


ने र्‌ हु छ  अथ 


और इस ससस्‍्तो दुनियादारी से उसे संतोष नहीं होता । वह सोचती 
है कि इस ढंग से सब कुछ हल हो जाता है, पर (०79 के प्रति जो 
(27670 का एक कतंव्य है, 00!29707 है श्रथवा उन दोनों के प्रति 
उसका जो एक कर्तव्य है, उसका क्‍या हुआ ? क्‍या वह इतनी सस्ती चीज 
है कि उसे दुनियादारी के चलते सिक्के पर बेच दिया जाय । उसे सारे 
रहस्यों को भी छिपा रखना है। ॥/7४ (७976४7 साधारण महिला नहीं 
है, चतुर, दुनिया देखी हुई, दूसरों के हृदय से बात निकाल लेने वाली । 
ये दोनों महिलायें अपने अस्व-शस्त्रों से लेस होकर आपके सामने श्राती 
हैं, प्रौर इन दोनों में जो चोटे चलती हैं, पेंतरेबाजी होती है वही उप- 
न्यास का प्राण है और यह उपन्यास जिस रूप में हमारे सामने झाया है । 
उसे देखकर कौच कहेगा कि इसकी नींव केवल “दस दब्दों” पर है । इतने 
बड़े श्रश्वत्थ वृक्ष को देखकर कोई यह कल्पना भी करता है कि यह कितने 
छोटे बीज से उत्पन्न हुआ है ? ऐसी श्रवस्था में कहना कठिन है किकिला- 
वस्तु में कौन प्रधान है सत्य (इतिहास) या कल्पना “काकः किंवा क्रमे- 
लकः”” । हां, इतना ही कहा जा सकता है कि निमिति में कल्पना का 
देय कुछ प्रधक है।५ 


काक प्रियतम के श्रागमन की सूचना भले ही दे और वह इसके 
लिए पृज्य भी है पर प्रियतम के साथ वास्तविक समागम' तो उसे 
ग्रपती पीठ पर ढोकर लाने वाला ऊटठ ही कराता है । ठीक उसी 
तरह उपन्यास के बीज की सूचना तो न जाने कितनों को मिली होगी 
पर ऐसे बड़भागी विरल ही होते हैं जिनकी कल्पना झूपी क्रमेलक की पीठ 
पर चढ़कर श्रियतम घर ब्राता हो। श्रतः (कला-वस्तु में सत्य का महत्व 
नहीं है। महत्त्व इस बात का है कि ख्रष्टा ने कहां तक उसके द्वारा मानवीय 


कि रे ० ५ #मन 


सम्बन्धों श्रौर मल्यों को परस्परान्वित देखा है है यदि इतनी सी बात 
है तो सृजन की श्रधिकांश समस्या हल हो गई प्रन्यथा व्यक्ति के 
सामने 'रामचरित! ही क्‍यों न हो उसका कवि बन जाना सहज संभाव्य 
नहीं हो सकता । 


हेनरी जेम्म ने अपने एक लेख “98 #&/+5 00 0७077 में 
कुछ बहुत ही उपयोगी बातें कहीं हैं जिससे इस बात पर प्रकाश पड़ता है 
कि निरीक्षण और अनुभूति का सम्मेलन होता है तो किस तरह कला की 
जननी रासायनिक-संश्लेषण प्रक्रिया भी सक्रिय होती है। वह लिखता है 'मुभे 
याद है कि एक प्रतिभावान्‌ अ्ग्नेजी महिला उपन्यासकार ने मुझ से 
कहा था कि उसने अपनी एक कथा में एक प्रोटेस्टेन्ट मतावलम्बी फ्रांसीसी 
नवयुवक का जिस रुप में चित्रण उपस्थित किया है उसकी बहुत ही प्रशंसा 
की गई है। उस से कितने ही लोगों ने पूछा कि उसे इस रहस्यमय व्यक्ति के 
सम्बन्ध में ही इतनी जानकारी कैसे और कहां से मिली। इस तरह के ज्ञान- 
वद्ध के श्रवसर को प्राप्त करने के लिये लोगों ने उसे बधाई भी दी । यह 
ग्रवसर इतना सा ही है कि एक स्रमय पेरिस नगर में जब वह सीढ़ी से चढ़ 
कर ऊपर छुत पर जाने लगी तो उसे एक ऐसे बरामदे से हो कर जाना 
पड़ा जिसका कमरा खुला हुआ था और जहां पर भोजनोपरांत श्रति तृत्त 
रुप में कुछ प्रोटेन्सेन्ड नवयुवक टेबिल' के सामने बेठे हुए थे। इसी भलक 
ने मानस-पटल पर चित्र खींच दिया। यह भलक तो क्षरिक ही थी पर 
वह श्रनुभृति का क्षण था | उसके मस्तिष्क पर साक्षात्‌ संस्कार उगे, पर 
उसने उसके द्वारा ही एक टाइप की सृष्ठि की । वह जानती थी कि 
नवयुवक प्रोटेस्टेंट क्या होते हैं, वह यह भी जानती थी कि फ्रांसीसी होन॥ 
बया है, ग्रतः इसके सहारे ही उसने मृति का निर्माण किया और वास्त- 


रत 4 प्र 


विकता की सृष्टि की । ज्ञात से अज्ञात को उपलब्ध करने की शव्ित्र, वस्तु 
जातों की सारी पेचीदिगयों की देखने की शक्ति, नमृने को देखकर संपूर्ण 
वस्तु की जानता, जीवन को इस तरह अ्रनुभव करना कि श्राप इसके कोने 
कोने को बात जान सकें, ये सब बाते जब एकत्र हों तो कहा जा सकता है 
कि श्रनुभ्ति हुई । 


इसी प्रश्न को एक दूसरे उदाहरण के द्वारा समभने की चेष्ठा की 
जाय | फ्रांस के प्रसिद्ध उपन्यासकार 8087009 ४ का एक प्रसिद्ध उप- 
न्यास है 346 00728 ७४ 6 ९०४ इस उपन्यास की कथा कहां से 
मिली और उस सत्य कथा में उपन्यासकार ने क्या क्‍या परिवर्त्तन किये, ये 
बातें 5/80409/] के साहित्य के गअ्रध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को 
मातुम है । यह उपन्यास तत्कालीन समाचार पत्रों में प्रकाशित एक म्ुक- 
दमे की रिपोर्ट पर आराधारित है जिसको पढ़कर उस समय लोगों में पर्याप्त 
सनसनी फेल गई थी । मुकदमे की रिपोर्ट का सारांश यह है । 


3700706 .3876/66 नामक नवयुवक पादरी था। वह ४. श]- 
०४07व व १४, 86. 00760 के यहां दोनों स्थामों पर बच्चों के पढ़ाने 
का काम करता था । परल्तु दोनों स्थानों से उसे हटना पड़ा क्योंकि उसने 
दोनों स्थानों पर ही वहां की नवयुवतियों को फुसला कर भगाने का 
प्रयत्त कियाथा। बाद में उसने गिरजाघरों में धामिक शिक्षा लेने का 
प्रयत्न किया, पर श्रपने दुर्भाग्य के कारण वह कहीं भी प्रवेश नहीं 
प्राप्त कर सका । उसने मन में यही सोचा कि (:07070 परिवार 
के व्यक्तियों की बदनामी फेलाने के कारण यह बात हुई है । श्रतः एक 
दिन जब 7४. )४०70पएव गिरजाघर से प्रार्थना कर लौट रही थीं तो 
उसने उन पर पिस्तौल दाग दी। बाद में स्वयं को भी गोली मार ली । 


नि २ परे ++ 


भाग्य से गोली घातक सिद्ध नहीं हुईं। उस पर मुकदमा चला ओर उसे 
फांसी की सजा मिली । 


इसी रिपोर्ट के आधार पर उपन्यास की इमारत खड़ी की गई है । 
सारे उपन्यास के रहस्य तथा श्राननन्‍द को यहां पर सम्मृत्त करना कठिन है, 
पर फिर भी देख लेना अ्रनुचित न होगा कि इस सामग्री का क्‍या बना ? 
50॥0707/89/ स्वभाव से विद्रोही था, शक्ति को जीवन का वास्तविक तंत्व 
समभता था | श्रान पर झ्ाकर, प्रेम के लिए जान ले लेने श्र दे देने को 
वह जीवन की चरम श्रभिव्यक्ति मानता था । सम्यता के नाम पर नीरस, 
शांत तथा निश्चक्त जीवन व्यतीत करने वाले तथाकथित शभद्र लोगों के 
प्रति उसके हृदय में प्रास्था के भाव न थे । अश्रतः अ्रपने उपन्यास के प्रधान 
पात्र के लिए उसने उप8४ नामक नवयुवक को चुना जो निम्न वर्ग का 
था श्रीर जिसमें, उसके मतानुसार, श्रभी भी कुछ जीवट बाकी था । 
ण ए४7 बच्चों के शिक्षक के रूप में नियुक्त होता है और बच्चों की मां 
)890697708 08 678 को फांस लेता है, प्रेम के लिए नहीं परन्तु उच्च 
वर्ग से प्रतिशोध लेने के लिए तथा श्रात्म गौरव की भावना को सल्तुष्ट 
करने के लिए । 


पर इधर उधर कानाफू सी होने लगती है। श्रत: वह एक धारमिक 
शिक्षण संस्था में प्रवेश कर पुरोहिती के लिए शिक्षा प्राप्त करने लगता 
है। शिक्षा समाप्त कर लेने पर वह /(७76पांउ त6 0 7४008 नामेक' , 
किसी प्रतिष्ठित रईस के सेक्र टरी के पद पर नियुक्त हो जाता है श्रोर इस 
तरह वह उच्च वर्ग में प्रतिष्ठित होता है। यह घटना निम्त वर्ग का उच्च 
वर्ग के श्रभेद्न दुर्ग में प्रवेश का प्रतीक है । यहां पर भी वह श्रपने स्वामी 


न शेयर के 


की पुत्री की प्रशयोपलब्धि में समर्थ होता है। (७0708 भी मन- 

स्विनी, आत्मकेन्द्रित तथा अ्रसाधा रण चित्तवृत्ति की है और किसी सिद्धांत 
एवं मत के बन्धन को रोंद कर नियति के पथ पर अपने पेरों से चलने वाली 
लड़की है । इन दोनों में जो चोटे चलती हैं वे प्रेम की हैं या घृणा की यह 
कहना कठिन है। दोनों एक दूसरे पर अधिकार करना, नीचा दिखाना या 
दबाना चाहते हैं। अन्त में १॥967प68 गर्भवती हो जाती है। ग्रतः 
उसे भुकता ही पड़ता है । वह पिता से कहती है और पिता को भी दोनों 
के विवाह के लिए सम्मति देनी ही पड़ती है । 


पर जब सफलता दीखने लगती है उसी समय रंप्राक्ष) एक 
ऐसी गलती करता है कि सारी बातें ही उलठ पुलठ हो जाती है। 
वह अपने भावी इ्वसुर महोदय से प्रार्थना करता है कि |(७897708 
686 ०७7४७ से जिसके बच्चों को वह पहले पढ़ाता था और जिससे 
उसके प्रेम सम्बन्ध भी रहे थे, उसके चरित्र का प्रमाणा-पत्र 
ले लिया जाय। प्रमाण-पत्र जो मिलता है वह इतना ध्वंशक और 
वीभत्स है कि 0४, 66 79 20406 स्तंभित रह जाते हैं और 
इस विवाह के प्रस्ताव को एक दम अस्बीक्षत कर देते हैं। उंप्र97 
चाहता तो अपनी स्थिति को सुधार सकता था और भबअ्रनेक प्रमाणों के 
द्वारा श्रपती निर्दोषिता सिद्ध कर सकता था भौर )(, 6७ [9 (०७ भी 
दुनियादार आ्रादमी थे, उसे मान लेते। पर जुलियन ऐसा कुछ नहीं करता। 
करता क्या है कि पिस्तौल लेता है और २५० मील की दूरी पर स्थित 
५०४७४४१७४ नामक स्थान पर जाता है जहां १(७१७४7७ 6७ २०४७ 
रहती है श्रोर उसे गोली मार कर घायल कर देता है। 

ऊपर हेवरी जेम्स श्रौर 9/974]॥9] दो उपन्यास कारों की उपजीव्य- 


“ ररओ ४ 


रुपेण गहीत कथा का उदाहरण दिया गया है। मेरे जानते जहां तक प्रकृत 
वस्तु की मौलिक प्रकृति का सम्बन्ध है 5876॥9। की उपजीव्य- 
कथा श्रधिक मनोवैज्ञानिक है। अ्रधिक मनोवेज्ञानिक कहने का यह भअ्र्थ 
नहीं कि हेनरी जेम्स की श्राधारभृत कथा मनोवेज्ञानिक नहीं है। मेरा 
मतलब केवल यही है कि 59740%&।!| की कथा ऐसी लगती हे कि मानों 
उसके पात्र भ्रधिक प्रादिम ढंग से व्यवहार कर रहे हों, उनका 44 उनके 
80 के नियंत्ररा को ठीक से नहीं मानता | नहीं तो जुलियन ने अपने 
चरित्र सम्बन्धी प्रमाण-पत्र मंगवाने की जो भूल की है वेसी गलती कभी 
नहीं करता । हो न हो वह किसी श्रचेतन शवित के द्वारा प्रेरित है । यदि 
कथाकार की कल्पना में थोड़ी अभ्रधिक सक्रियता होती तो एक बहुत ही 
सुन्दर मनोवैज्ञानिक उपन्यास की रचना हो सकती थी। दोनों रचनाश्रों 
को आ्रामने सामने रख कर देखने से एक शौर भी बात स्पष्ट होती है कि 
(+॥०700/%! की कल्पना ने कथा में जोड़ तोड़ की तो है पर बहुत ही कम 
यहां तक कि सारे उपन्यास में वास्तविक घटनाओ्रों की ही छ,था मंडराती 
नजर भ्राती है | 


हेनरी जेम्स की रचना में भले ही कोई ऐसी बात न हो जिसमें किसी 
प्रचेतन शक्ति की प्रेरणा की गंध झ्राये, पर जो कुछ भी कहा गया है, 
मानसिक आधघात-प्रतिधात के दृश्य उपस्थित किये गये हैं उनका विस्तृत 
तथा संगत विवरण दिया गया हे। साथ में कल्पना ने मौलिक कथा के 
रूप की काया पलट कर दी है । (हमें प्राचीन दंत-कथाओं में रूप-परावर्त॑- 
ग्रुटिका की बात पढ़ने को मिलती हैं । किसी के पास ऐसी ग्रटिका होती है 
जिसके एक कण को खाते ही मनुष्य कुछ का कुछ हो जाता है, नर पशु हो 
जाय, पशु नर । यही रूप-परावर्त-ग्रटिका उपन्यासकार की सूजनात्मक 


- ईैं८६ - 


कल्पना में होती है। वह जरा सा सहारा पाकर कुछ का कुछ बना दे 
सकती है / यही कारण है कि जहां उपन्यास की सुजनात्मक कला का 
प्रनन उठता है श्रालोचकों का वोट हेनरी जेम्स के साथ होता है । 


उपन्यास की प्रवृत्ति 


विश्व में बरेण्य श्रैंणी के जितने उपन्यास हैं उनके पढ़ने से हम एक: 
ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि इनमें परस्पर विरोधी दो शक्तियों की 
समान बल, तनाव तथा संतुलन की श्रवस्थिति अनिवार्य है| व्यावहारिक 
दृष्टि से विश्व में दो विपरीत शक्तियां कार्य करती रहती हैं, स्थूल, सूक्ष्म, 
कैन्द्रानुगामी, केन्द्रापपामी, जीवन-मरणा, उत्थान पतन, व्यक्ति, समाज । 
इन दोनों में सदा संघर्ष चला करता है, एक दूसरे पर हावी होना चाहता 
है । पर(इतिहास ने कभी भी ऐसा युग नहीं देखा है जिसमें एक ने दूसरे 
को नेश्तोनाबूद कर अपना एकाधिपत्य स्थापित कर लिया हो । इन दोनों 
के संघर्ष में ही जीवन श्रपने सच्चे स्वरूप की उपलब्धि प्राप्त करता है ।) 
सांप कुछ श्रागे चलता है श्रौर पीछे मुड़ता है और इसी टेढ़े मेढ़े 
तरीके से शक्ति ग्रहण करता हुआा आगे बढ़ता है। इस तरह की समस्या 
भी उपन्यास-कला के सामने सदा रही है। 


उपन्यास को भी दोनों शक्तियों के सक्रिय स्वरूप के पृथकत्व 
को बनाये रखना पड़ता है, वह आरोपित रूप तो दिखला सकता है, 
पर साध्यावसान की सीमा तक नहीं जा! सकता । साथ ही उसे एक ऐसे 
57प7७४प76 का निर्माण करता पड़ता है जिसके क्रोड़ में इस दोनों की 
संतुलित अ्वस्थिति संभव हो सके । कला का काम वस्तु की स्पष्ट 
श्रनुकृति करना नहीं है। जो कलाकृति अपने कलात्मक स्वरूप की रक्षा 


»« शि्८छ -++ 


ने कर सके और प्रकृत वस्तु के प्रति आत्म-समपंण कर दे, वह कला 
का निकृष्ट उदाहरण है। आप किसी के यहां गये, वहां पर एक चित्र 
है । एक महिला बड़े ही पश्र|कर्षक ढंग से अ्रधरों पर मुस्कान लिए हुए 
श्रापका स्वागत कर रही है। चित्र इतना सजीव है कि आप कड़ी परीक्षा 
में पड़ जाए. और अपने व्यवहार का स्वरूप निश्चित करने के लिए इधर 
उधर बगलें भांकने लगें, तो वह कला का उत्तम उदाहरण नहीं कहा 
जायेगा। कला सदा कला-वस्तु और प्रकृत-वस्तु का शअ्रन्तर बनाये रख कर 
ही भावात्मक साहश्य का ज्ञान कराती है और अपने प्रति कलात्मक ढंग 
से प्रतिक्रिया करने के लिए प्रेरित करती है । 


कल्पना कीजिए कि आप रंगमंच पर अभिनय देखने के लिए 
था सिनेमा देखने के लिए गये । एक क्रर व्यक्ति एक निरीह बालिका 
पर अत्याचार कर रहा है । उसकी क्ररता पर आप इस तरह 
उत्तेजित हो गये कि श्राप स्टेज पर जूता चला बेठे । क्‍या वह 
ग्रभिनय सफल कहा जायेगा ? नहीं, कला से हम केवल तनन्‍्मयी- 
भवन योग्यता की ही अपेक्षा करते हैं, तत्पतिसक्रियीभवन की नहीं । 
अन्यथा करुण-रस का काव्य पढ़ कर, उदाहरणार्थ श्रभिमन्यु के निधन पर 
उत्तरा का विलाप पढ़ कर, हम भी उत्तरा की तरह ही शोकपूर्ण हो जाए 
तो काव्य को कौन पढ़ेगा ? ॥॥770007 #७700978760 4 प-छात- 
धो श्रर्थात्‌ कवि की काव्यानुभूति.पाठक की रसानुभूति की जननी होती 
है। श्रतः काव्य में होती तो है प्रत्यक्षानुभूति ही, पर वह रसानुभृति प्रसवा 
के रूप में दिखलाई पड़ती है भ्रर्थात्‌ उसमें न तो विशुद्ध प्रकृति ही है न 
विशुद्ध कला, न विशुद्ध प्रत्यक्ष ही है न विशुद्ध रत ही, पर उसमें रसोन्प्रुख 
प्रत्यक्ष है। रस प्रत्यक्ष में प्रलम्बित तथा प्रत्यक्ष रस में प्रोक्षेपित रहता 


है । इस तरह दो विपरीत वस्तुओं का प्रलम्बित तथा प्रोक्षेपित रूप को 
एक 8/77प0778 के अन्दर सानुपातिक ढंग से ला बिठाना उपन्यास का 
लक्ष्य है। उपन्यास में प्रायः व्यक्ति और समाज की समस्या रहती है पर 
अपनी सत्ता की रक्षा करते हुए भी दोनों परिवर्तित हो जाते हैं । 


हम यहां ऐतिहासिक उपन्याप्त की चर्चा कर रहे हैं । भरत: इसी के 
667708 में समस्या पर विचार करें । जिस उपन्यास को पढ़ कर यह 
धारणा बंधे कि इसके पात्र केवल इतिहास के सहारे ही जी रहे हैं, उनका 
वैयक्तिक जीवन है ही नहीं, मानवत्रा के उच्च शिखर से उत्तर कर ऐति- 
हासिकता की सतह पर गिर गये हैं, जिनकी ग्रात्मनिष्ठता, स्वतंत्रता ऐति- 
हासिक संस्थाओ्रों, घटनाओ्रों, वर्ग तथा श्रर्थ की सीमा में जकड़ दी गई हों, 
वह उपन्यास असफल कहा जा सकता है। यदि भ्रकबर और शिवाजी, 
तथा नेपोलियन के ऐतिह सिक वृत्त पर उनके व्यक्तित्व का बलिदान कर 
दिया गया तो उपन्यास के लिये रह हु। क्‍या गया ? 


ग्रतः उपन्यास में व्यक्ति और समाज दोन्सें की प्रवस्थिति अ्रनि- 
वार्य है। व्यक्तित्व की प्रमुखता उपन्यास को गीति या हृदयोद्गारों 
का रूप दे देगी। यदि उसके सामाजिक पहलू पर ही जोर दिया गया 
तो वह सूखा इतिवृत्त या इतिहास का रूप धारण कर लेगा। यह 
बात ऐतिहासिक पात्रों के नाम को लेकर चलने वाले उपन्यासों पर 
ही लागू नहीं होता । पावर भले ही काल्पनिक हों पर उनकी 
सामाजिकता पर श्रत्यधिक जोर देने वाले उपन्यासों पर भी लागू है। 
प्रेमचन्द की कलात्मक प्रतिभा ने तो किसी तरह व्यक्ति और समाज के 
सानुपातिक संतुलन को खोने नहीं दिया है; हालां कि कमभूमि, और 


सन 4 छह 


प्रमाश्नम में कहीं-कहीं पर डगमग अवश्य होते हैं। पर देश-विभाजन, श्रकाल, 
समाज के नेतिक पतन तथा स्वातन्व्य-प्राप्ति-जनित समस्याश्रों को लेकर 
लिखे गये अधिकांश उपन्यासों में तो मानवता सामाजिकता की सतह पर 
श्रा गई है, +407797 7078 केवल 5009) 00702 रह गया है । 


अतः उपन्यास में एक श्लोर कविता की सीमा में पहुंचने की तथा 
दूसरी ओर इतिहास के क्षेत्र में प्रवेश करने की स्वाभाविक प्रेरणा होती है। 


सका रे है दूँ. स्क 


साहित्य 
और 
प्लेटो 


# 


यूरोपीय साहित्य के इतिहास को मुख्यतः तीच चार विभागों में 
विभाजित किया जाता है, प्राचीच, मध्यकालीन, पुरर्जागरण तथा 
ग्राधुनिक । यों तो विभाजन के कितने ही अ्रत्य रूप हो सकते हैं शोर 
श्रमेक विचारकों ने प्रन्य ढंग से विवेचन भी किया है पर हमारे लिए 
विभाजन के इसी आधार का सहारा लेना उचित होगा क्‍यों कि हम 
लागिनस के साहित्य सम्बन्धी मान्यताग्रों की चर्चा कर रहे हैँ श्रौर लागिनस 
को प्राचीन काल के साहित्य विवेचकों में ही हम रख सकते हैं। लेखक 
जितना ही प्राचीन हो, उसके जीवन के सम्बन्ध में, उसकी रचना्रों के 
सम्बन्ध में उतनी ही ठोस और वथ्य-पूर्णा ज्ञान की कमी होती है, उसके 
तिथि-निर्णाय की समस्या उतनी ही कठिन होती है तथा उस्रकी रचनाग्रों 
की प्रामाणिकता उतनी ही संदिग्ध होती है। इस बात का कट अ्रनुभव 
भारतीय साहित्य के श्रध्येता से अधिक किस को होगा ? ऐसा लगता है 
कि रचनाश्रों का अधूरापन, उसमें क्षेपकों का समावेश, तिथि-निर्णय की 
उलभन आ्रादि ही उनकी प्राचीनता की कसौटी हो । 


5 हक 


इस कसौटी पर लांगिनस श्रौर उसकी रचना (0४ 8प0!770/७ श्रच्छी 
तरह खरी उतरती है। प्रथमतः तो उसकी एक ही रचना प्राप्त है 0४ 
870]77708 । द्वितीयत: कि वह भी अधृरी है, पुरी नहीं | पढने से स्पष्ट ही 
प्रतीत होता है कि बीच-बीच में टूट है, बातें छूट सी गई हैं। श्रसंभव नहीं 
लेखक ने रचना तो की है पूर्णा रूप में ही परन्तु समय के प्रवाह में बहुत 
थ्रश नष्ट हो गया हो श्र उनकी सुरक्षा संभव नहीं हो सकी हो । पुस्तक 
में व्यक्त विचारों की दिव्यता, उच्चता, उसका पाण्डित्य, ज्ञान-प्रखरता 
तथा प्रतिपादन की ग्रम्भोरता ने क्षेपक्रों को आने न दिया हो । रह गई 
लेखक के तिथि-निर्णाय की बात | इसके लिए तो इतना ही कहना पर्याप्त है 
कि लांगिनस को 800 9.0 से लेकर 800 ७.), तक कहीं भी रखा 
जा सकता है| ठीक कालिदास वाली बात समझ लीजिये ! 


लांगिनस के पूर्व प्लेटो और श्रारिस्टोटल नामक दो विद्वानों ने साहित्य 
के सम्बन्ध में श्रपने विचार उपस्थित किये थे । धप्लेटों के विचार डायलोज 
में सुरक्षित हैं तथा श्ररिस्टोटल के +00७008 में । दोनों ने साहित्य पर दो 
हृष्टिकोणों से विचार “किया था तथा साहित्य से दो प्रश्न किये थे ।' 
विचारक की पहली समस्या यह है कि वह सम्यक्‌ प्रश्न हो, श्रर्थात्‌ वह 
ज्ञातव्य वस्तु से ठीक तरह से, ठीक ढंग से सम्पक प्रश्न कर सके । उदा- 
हरण के लिए हमें मनुष्य पर विचार करना है। पर हम किस ढंग से 
विचार करें ? मनुष्य के तो श्रनेक रूप होते हैं। उसके चेतन मस्तिष्क 
- को लेते हैं तो वह मनोविज्ञान का विषय हो जाता है। यदि उसे पशु मात्र 
समझें तो वह प्राशिक्ञास्त्र का जीव हो जाता है। प्राकृतिक वस्तु के रूप 
में वह भौतिक शास्त्र का श्रग है, नैतिकता उसे सदाचार शास्त्र (#0008) 
के क्षेत्र में ला बेठायेगी और यदि हम उसे दुखान्त नाटक के अभिनेता के 


2 लि वि 


रूप में देखें तो वह साहित्य शास्त्र या अलंकार शास्त्र का विषय हो जाता 
है, जिसे श्र ग्र जी में 06008 कहते हैं । 

प्लेटो ने काव्य को एक बहुत ही व्यापक पृष्ठभूमि में, भ्रन्य संदर्भों के 
साथ मिला कर, देखने का प्रयत्न किया। वे मूलतः दाशनिक थे भौर 
उनका आविर्भाव उस समय ( 427-847 5. 0, ) में हुआ था जिस 
समय ?26]0007762897 फएा७7 में 0९78, 39]09778 के हाथों 
पराजित हो छुका था। कुछ ही दिन पहले &07678 को प्रजातन्त्री सर- 
कार ने सुकरात ( 470-889 8.0. ) को, इस श्रपराध के लिए जहर 
देकर मार डाला था, कि वे लोगों को सत्य के सच्चे स्वरूप को पह- 
चानने के लिए प्रेरित करते थे और उनकी वतंमान मान्यताञ्रों के खोखले- 
पन का रहस्योद्घाटन करते थे । श्रतः उनके चिन्तन-परक व्यक्तित्व ने उन्हें 
इस पतन के कारण हूढने तथा इस रोग को दूर करने की दवा का 
प्राविष्कार करने की ओर ग्रेरित किया | 


ग्रन्त में चल कर प्लैटो को पता चला कि इन सब विषमताश्रों के 
घूल में तत्कालीन प्रजातन्त्री राज-ब्यवस्था है। प्राज के कवि की तरह 
वे भी इसी नतीजे पर पहुंचे कि जम्हूरियत एक तर्जे हुकूमत है कि 
जिसमें, बन्दे को गिना करते हैं, तोला नहीं करते । प्रजातंत्री सरकार 
पूर्खो की सरकार है, जिसे वास्तविकता के सच्चे स्वरूप को पहचानने की 
शक्ति नहीं होती | श्रतः प्लेटो के सामने यह प्रश्न था, कि सरकार का सच्चा 
स्वरूप क्या होना चाहिये |! नियम और कानून किस तरह के हों !! नागरिकों 
के श्राचार विचार किस तरह के हों !!! ये व्यावहारिक प्रश्न हैं । इन पर ही 
विचार करते समय कविता का प्रश्व छिड़ गया है। प्रतः उत्तर जो बन 
पड़ा है उस पर उस व्यापक प्रश्न की छाया पड़ी है, जिसका यह व्याप्य 


हे है है हे: ४० 


है। श्रर्थात्‌ कविता व्याप्य है | गौणा है !! 99 078 एछए आ गई है ||! 
व्यापक प्रश्न तो दूसरा ही है। यही कारण है कविता के सम्बन्ध में 
प्लेटो ने जो विचार दिये हैं उनमें सर्वत्र एकरूपता ही हो, ऐसी बात नहीं, 
वे परस्पर विरोधी भी लग सकते हैं। किसी एक प्रसंग में प्लेटो ने कविता 
के बारे में जो विचार प्रगट किये हैं उन्हें ही साहित्य-सम्बन्धी मुख्य सिद्धांत 
मानकर चलना भ्रामक है ओर एक सही चीज को गलत ढंग से उपस्थित 
करना है । 


दर्शन जब व्यवहार के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो वही परिणाम 
होता है, जो प्लेटो के काव्य-संबंधी विचारों का हुआ है। दार्शनिक का 
ध्येय यह होता है कि वह ज्ञातव्य विषय को एक व्यापक स्कीम के संदर्भ 
में रखकर विचार करे। प्लेटो के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि सत्य क्‍या 
है ! किसी वस्तु का सच्चा स्वरूप क्‍या है !| मानव की किसी भी क्रिया, 
व्यवसाय या व्यापार के लिये उनके हृदय में तभी तक महत्त्व था, जब तक 
वह सत्य के स्वरूपान्वेषण में सहायक है। प्लेटो के विचार जिस पुस्तक 
में सुरक्षित हैं उसे डायलॉग्स(08]027068) कहते हैं। डायलॉग्स का प्रर्थ 
हैं बार्तालाप | प्लेटो के डायलॉग्स में कुछ व्यक्ति किसी विद्वेष विषय के 
सम्बन्ध में विचार-विनिमय करते हैं, उसके पक्ष तथा विपक्ष में तर्क-वितर्क 
करते हैं, कोई खण्डन में प्रवृत्त होता हे, कोई मण्डन में । इन वार्तालापों 
का प्रमुख पात्र सुकरात है, जो क्रमशः अपने उचित प्रदनों के द्वारा ज्ञातव्य 
बिषय के स्वरूप की श्रोर लोगों का ध्यान केन्द्रित करता है और श्रन्त में 
एक सर्वसम्मत परिभाषा के निर्माण में सफल होता हैं। 


इन वार्तालापों की संख्या २७ है। इन वार्तालापों में सर्व-प्रमुख 
वार्तालाप का नाम प्रजातन्त्र (+8.070!86) हैं जिसमें न्याय के सच्चे 


“+ शैर्ड + 


स्वरूप के पहचानने की चेष्टा की गई है। 5970]008प्रात्त नामक बार्ता- 
लाप में प्रेम के सत्स्वरूप पर विचार किया गया है। किसी वार्तालाप में 
साहस, तो किसी में शआ्रात्म संबत तो किसी में 6870]08787068 का प्रइत 
उठाया गया है । इन वार्तालापों का स्तर सदा एकसा ही हो, यह भी कोई 
प्रावश्यक नहीं । नाटकीयता तथा दार्शनिक गम्भीरता की दृष्टि से इनमें 
महान अन्तर है । कुछ वार्तालापों की श्रवतारणा गम्भीर वातावरण में 
प्रवश्य हुई है। ऐसा लगता कि ग्रुर अपने शिष्य-प्रशिष्यों के साथ सरस्वती 
सन्दिर में बेठकर किसी तात्विक चिन्तन में मरत हो । कुछ वातलिापों में 
चाय-पान का वातावरण है, जिसमें (0787 % 570 07 8७ किसी चीज 
को 680प58 किया जाता है । चाय की घृट भी है, हंसी मजाक भी 
चल रहा है पर विषय की गम्मीरता भी बत्ती हुई है। कुछ वार्तालापों में 
केवल कुछ विचारोत्तेजक सामग्री भर है। कुछ में केवल वाकचातुरी 
दिखाकर दूसरे के त्रिचारों के खोखलेपन को दिखलाया गया है ॥ कहने का 
ग्र्थ यह है कि इसमें सब तरह का वातावरण मिलेगा, हल्का से हल्का घौर 
गम्भीर से गम्भीर | अखसो रणीयान्‌ महतो महीयाव्‌ । 


इन वार्तालापों के मध्य प्रनेक श्रवसर आये हैं जहां प्रसंगानुरोध से 
कावता के संबंध में विचार उपस्थित किया गया है। परन्तु सारे वातावरण 
में यत्र-तत्र प्रकीर्ण कविता-संबंधी उक्तियों तथा विचारों को एकत्र कर 
देने से ही प्लेटो के काव्य शास्त्र का स्वरूप खड़ा नहीं हो सकेगा। ज्यादा 
से ज्यादा यही होगा कि परस्पर-विरोधी वेषम्यपूर्ण वक्तत्यों की पलटन 
खड़ी हो जाय । कारण कि प्लेटो के तक की आधारभूमि सदा बदलती 
रही है। अनेक विविध प्रसंगों के बीच में कविता का प्रश्न उठ खड़ा हुआ 
है ओर परिस्थिति की तात्कालिकता की जितनी मांग हुई है उसे ही पूरी 


कर वह भागे बढ़ कर अपने मुख्य विषय पर श्रा गया है । उदाहरणार्थ 
कविता की बात मुख्यतः चार वार्तालापों के प्रसंग में श्राई है। ॥009पॉ०- 
]06, .9ए8, 98078 तथा 707 में | इन सब प्रसंगों में श्रपती बात 
को स्पष्ट करने के लिए जीवन के भिन्न भिन्न स्तरों से उपमायें देनी पड़ी 
हैं, उनके मेल में लाकर ज्ञातव्य वस्तु के स्वरूप को खोलने की चेष्टा की 
गई है । यदि हम इन उपमाझ्रों तथा वक्तब्यों को प्रासंगिक परिस्थिति से 
तोड़ कर ले उडें, तो हमारे हाथ जो चीज आयेगी वह शअ्रधुरी होगी, 
या विक्रुत ! 


+69पर/0 श्र 49 ए8 में कविता के स्वरूप को स्पष्ट करने के 
लिए बारम्बार राजनीतिक जीवन से उदाहरण लाये गये हैं। 77988/प8 
में जो उदाहरण दिये गये हैं वे भ्रन्य कलाओ्रों, जैसे चित्रकला, संगीतकला- 
के क्षेत्र के हैं। इसमें वक्‍तृत्व कला (0४७0770) के क्षेत्र से उदाहरण 
देने का विशेष श्राग्रह दिखलाई पड़ता है । [07 में कविता को देवीभावा- 
विष्ट कवि की कृति के रूप में देखने की चेष्टा की गई है । "२6७प०॥0 
और [.898 के उदाहरणों में भी अन्तर है। जहां +००८०0!0 में एक 
प्रादर्श राज्य ([2874606 88966) की कल्पना सामने है वहां ॥/9ए/४ में 
श्रादर्श राज्य से किचिन्न्यून राज्य की बात हो रही है जिसकी ग्रपनी-अपनी 
सामाजिक, श्राथिक एवं राजनीतिक विशेषतायें होती हैं। श्रतः एक 
प्रसंग विशेष में श्राये हुए काव्य-सम्बन्धी वक्तव्यों को भट से सामाजिक या 
परस्पर विरोधी कह देना ठीक नहीं। यह तो स्पष्ठ ही है कि किसी विशिष्ट 
प्रसंग की तर्क-संगति के अ्रनुरोध से किसी विषय का श्रर्धविकास ही हो'सका 
है। तब पाठक का भी कर्तव्य हो जाता है कि वह मानस में लचीलापन 
लाये, एक ही बात को पकड़ कर बैठ न जाय । एक वार्तालाप से दूसरे 


४435 


बारतालाप पर जाते समय तदनुरूप अपनी मानश्रिक स्थिति में भी परि- 
बतंन कर ले । 


प्लेटो के वार्तालापों की रचना के कालक्रम का ठीक ठीक पता नहीं 
है। यह ज्ञात नहीं कि किस वार्तालाप की रचना पहले हुई झौर किसकी 
बाद में | पर ऐसा लगता है कि ज्यों-ज्यों प्लेटो का श्राग्रह सत्य के स्वरूप 
की ज्ञानोपलब्धि के लिए बढ़ता गया है त्यों-त्यों वे कविता तथा कल्पना- 
शील साहित्य के प्रति कठिन पड़ने लगे हैं। 8४97॥00शंपा7 में उन्होंने 
कवि को देश से नहीं निकाला है। 707 श्रौर 799०4४प7७ तक उन्होंने 
कवि तथा उसके महत्त्व को स्वीकार किया ही है। हाँ, कविता की वका- 
लत स्पष्ट शब्दों में नहीं की है पर उसकी स्थिति को स्वीकार श्रवश्य 
किया है। आदिम अ्रवस्था में जिस समय मनुष्य ने सार्थक शब्दों का 
उच्चारण किया होगा, उस समय प्रत्येक शब्द ही काव्यमय था, रूपकमय 
था ! उस समय सवाक मनुष्य कवि था, क्योंकि शब्दों का प्रयोग ही 
वस्तु्रों के श्रनधिगम्य सम्बन्ध को जताने तथा उस ज्ञान को कायम रखने 
के लिए किया जाता था | परन्तु काल-प्रवाह में पड़कर शब्दों और वस्तुग्रों 
के इस सम्बन्ध में क्वास होने लगा, लोग इसे भूलने लगे । 


जब ऐसी परिस्थिति श्राने लगती है तो समय-समय पर कवि का 
प्रवतार होता है जो इस पार्थक्य को दूर करता है भौर शब्द तथा भ्र्थ 
में संतुलव स्थापित करता है। कुछ इसी तरह के विचार शेली ने भी प्रगढ 
किये हैं। परन्तु हौलो ने जिस झ्रादिम युग की कल्पना की है, उस समय 
प्रत्येक व्यक्ति ही कवि था, उस समय शब्द और श्रर्थ भिन्न नहीं थे, उस 
समय वाह्य वस्तु ही मानो शब्दों केःरूप में ढल जाती थी, जिस तरह 


“ १६७ “ 


श्राज हम किसी बाह्य ठोस वस्तु को 66070 छए#ए४6४ में, प्रथवा 
#6067७४6 फञ७४७8४ को 80प्र7व फ9५४७४ में परिणत कर सकते हैं । 
पर बाद में शब्द और प्रर्थ में पार्थक्य थाने लगा। ज्यों-ज्यों सम्पता का 
विकात्त होता गया शब्द श्रर्थ से श्रलग होते गये । पहले जो कुछ शब्दों के 
द्वारा उच्चरित होता था बही सत्य होता था। पर अभ्रब ऐसा लगने लगा'* 
कि शब्द सत्य की श्रभ्िव्यक्ति नहीं भी कर सकते हैं। कवि-कल्पना के 
दाब्द सत्य के वाहक होते हैं, इसमें आदिम युग के मानव के लिए सहज 
विश्वास कर लेना सहज था। पर श्रब सभ्य मानव के लिए ऐसा-जरेसा 
विश्वास सहज नहीं रह गया । अ्रतः विचारकों तथा आ्रालोचकों को प्रयत्त 
करके कवि के इस स्वरूप को पुनः प्राप्त करना पड़ा । द 


इसके लिए एक ही उपाय था कि कवि को तथा उसके कल्पनाप्रसूत 
साहित्य को साधारण जीवन की सतह से हटा कर दूर रखा जाय । कवि 
जब तक श्रन्य साधारण व्यक्तियों की सतह पर रहता है तभी तक हम 
उस पर साधारण मापदण्ड के अ्रभमुसार विचार कर सकते हैं। जब वह कुछ 
करता है तो उसका हाथ पकड़ सकते हैं। जब वह बोलता है तो उसकी 
जीभ पकड़ सकते हैं। पर यदि वह दूसरे लोक का प्राणी हो जाता है, 
यथा इस लोक में रहते हुए भी किसी विशिष्ट वर्ग का व्यक्ति बन जाता है 
तो हमें उस पर विचार करते समय सतक रहना पड़ेगा। श्रतः उसे तीन 
रूपों में देखा गया । 


१. आविष्ट रूप में । 

२. सूक्ष्म हृष्टि-सम्पत्त रूप में । 

३. साधारण व्यक्ति के रूप में ही, पर ऐसा ब्यक्ति जिसमें साधा- 
रण बातों को ही सजीव रूप में उपस्थित करने को शक्ति हो । 


कलम र हैप 


प्लेटो ने एक स्थान पर कवि को श्राविष्ठ व्यक्ति के रूप में देखने के 
लिए संस्तुति की है। उस युग में (07806 की प्रथा प्रचलित थी । कुछ 
लोग देवी भावों से श्राविष्ट समफ्ले जाते थे । उनका शरीर तो साधारण 
व्यक्ति का सा ही रहता था पर समभा यह जाता था कि उनके प्रन्दर 
किसी देवता का निवास है | यदि स्थायी रूप से निवास नहीं है तो किसी 
अवसर विशेष पर वह उस घरीर पर श्रधिकार कर लेता है। ऐसे समय 
पर वह जो कुछ कहता है वह उस देवी आत्मा की वाणी होती है । उसी 
तरह कवि भी आविष्टात्मा होता है, उस पर सरस्वती, +प86 नामक 
देवी की सवारी रहती है और वह एक देवी उन्माद के वशीभूृत हो अपने 
काव्य की रचना करता है । 


कवि श्रौर कविता के सम्बन्ध में इस तरह के विचार ब्राज भी किसी 
न किसी तरह वर्तमान है। शैक्सपियर ने पागल, प्रेमी तथा कवि को 
कल्पना-जगत का निवासी कह कर, उन्हें एक ही श्र शी में रखा “8 
[प्र0४ा0, 008 0787 804 008 [00969 2.78 0| 777927790709 
8] 60708, 427ए4७॥ ने अपनी पुस्तक 870898077 के 
(&6770778 | में प्लेटो से दो हजार वर्ष पचातु “5768 फ्ाग& 
978 8778 50 ॥779वैं5858 76887 ७847 कह कर इसी सिद्धान्त 
की पुष्टि की थी। श्राज तो मनोविश्लेषण का संकेत पाकर कुछ 
लोग, कला ( #&7४ ) तथा मनोविकार का सीधा सम्बन्ध स्थापित 
करते हैं श्रोर कहते हैं कि कला का जन्म ही विकार-ग्रस्त मानस में 


होता है । 
कहा जाता है कि फ्रांस के प्रसिद्ध उपन्यासकार जोला ने १५ मनो- 


20 


विश्लेषणवादियों ([0870096४80) से भ्रपता विश्लेषण कराया और 
इस परिणाम पर पहुंचा कि उसकी प्रतिभा का मूल तत्व उसके व्यक्तित्व 
के विकृत श्रशों में हैं। उसी तरह 79प्र409078, हिएर08४व6े 
५४४७7४४७ इत्यादि ने भी अपने कृतित्व का श्रेय अभ्पने शारीरिक तथा 
मानसिक रुग्गता तथा पीड़ा को दिया है। यहां तक कि लोगों का 
विश्वास हो गया है कि बिना किसी अ्रभाव के प्रतिभा जागरित ही नहीं 
होती । +499%४वं ५४80४ ने तो कलाकार के स्वरूप को स्पष्ट 
करने के लिए “धाव और धनुष” ऐसे वाक्यांश का ही श्राविष्कार किया 
है और +7]008668 की मृति सामने रखी है। 7]0009068 एक 
प्रीक सैनिक का ताम था जिसके दारीर में घाव था, वह सदा बहता रहता 
था, उसमें से मवाद निकला करती थी। इतनी दुर्गन्ध निकला करती थी कि 
उसे सब लोगों से श्रलग दूर रहना पड़ता था। परन्तु उसके पास रामबाण 
की तरह प्रमोध धनुष था। श्रतः लोग सदा उसका आदर भी करते थे । 
प्रतः कलाकार मनसा रुगण व्यक्ति है, परन्तु उस रुण्णता से ही दिव्य 
कृतियां उत्पन्न होती हैं। ऐसी कुछ लोगों की धारणा है कि कमल कीचड़ 
से ही पेदा होता है। इसलिए कीचड़ का भी महत्व हम मन ही मन 
स्वीकार करते हैं । 


प्राचीन पाश्चात्य साहित्य के इतिहास में, प्लेटो के ॥07 नामक 
बातलाप में ही, कवि के इस श्रसाधारण, देव-प्रे रित, दिव्य-भावापत्न रूप 
का सर्व प्रथम विस्तृत और गंभीर विवेचन मिलता है। श्रत्तः उसे देख 
लेना हमारे लिये उपयोगी होगा। इससे पता चलेगा कि कवि के प्रति 
लोगों का क्या दृष्टिकोण था। 


युकरात, वार्तालाप के दौरान में 407 से कहते हैं “जो वरदान भाप 


को प्राप्त है, वह कला नहीं, परत्तु जेसा मैं श्रमी निवेदन कर रहा था, 
प्रे रणा है। कोई देवी शक्ति श्रापको संचालित कर रही है ठोक उसी तरह 
की शक्ति जो उस पत्थर में रहती है जिसे ॥४777[0068 चुम्बक के नाम 
से पुकारते हैं और जिसे साधारणतः 6790/69 का पत्थर कहा जाता 
है | यह पत्थर लोहे के छल्लों को अपनी प्रोर खींचता हो इतनी ही बात 
नहीं परन्तु इन छलल्‍लों में भी ऐसी शक्ति भर देता है कि बह लोहे के 
दूसरे छल्लों को अपनी ओर खींच सके । श्रापने देखा होगा कि कभी-कभी 
लोहे के छल्ले श्रापस में इस तरह श्राबद्ध-हो झूलने लगते हैं कि उनकी 
एक श्रूखला ही बन जाती है । इन सब लोहे के छल्लों में परस्पर खींचने 
को शक्ति उसी मूल-पत्थर से प्राप्त होती है। ठीक इसी तरह 2/०88 
नामक देवी स्वयं व्यक्तियों को प्रे रणा-प्रदान करती है श्रौर इन प्रेरित 
तथा स्फूर्त व्यक्तियों से लगकर श्रन्य व्यक्तियों की एक शव खला लटकी 
रहती है जो उन्हीं से (ग्रर्थात्‌ मूल प्रेरित व्यक्तियों से ) प्रे रखा प्राप्त 
करते हैं। कारण कि जितने श्रच्छे कवि हुए हैं, महाकाव्य झ्रथवा गीति- 
काव्य के रचियता, उन्होंने अ्रपती सुन्दर कविताओं की रचना कला के 
सहारे नहीं की है परन्तु इसलिए की है कि वे प्रेरित थे, झ्राविष्ठ थे ! 


जिप तरह आनन्दोत्सव के अवसर पर नाचने वाले (४07ए 78797 
की मानसिक स्थिति ठीक नहीं रहती (बह उन्माद की दशा में श्रा जाता है) 
उसी तरह श्रपनी सुन्दर कविताश्रों के खजन के क्षणों में गीति-कवियों की 
भी मानसिक अवस्था ठीक नहीं रहती। परन्तु संगीत और छन्दों के 
प्रभाव में श्राकर वे प्रेरित तथा श्राविष्ट हो जाते हैं॥ 39800770 कुमा- 
रिकाओं की तरह जो जब तक ॥)707ए8ए8 के प्रभाव में रहती हैं तब 
तक नदियों से दुग्ध श्र मधुधारा का संचय करती हैं, पर जब उनका 


सके ््‌ 9 १ ऋण 


मानस प्रकृत अवस्था में रहता है, तब नहीं ! गीति-कवि भी वही करता 
है जेसा कि वे स्वयं स्वीकार करते हैं। उनकी ही बातों से प्रमाणित होता 
है कि वे /738 की वाटिकाम्नों तथा निवास स्थान को चुव-च्ुन कर मधु- 
धारा-पूर्ण भरनों से अपने गीतों को संचित करते हैं। भ्रमर की तरह 
एक पुष्प से दूसरे पुष्प पर उड़कर । यह ठीक भी है, क्योंकि कवि पर 
किसी तरह का भार नहीं होता, उसके पर होते हैं, वह पविन्नात्मा है श्र 
जब तक वह प्रेरित न हो | साधारण बुद्धि का साथ न छोड़ दे !| उसका 
मानसिक संतुलन न बिगड़ जाय, उसमें किसी तरह की आाविष्करण शक्ति 
नहीं झ्ाती |! 


जब तक बह इस श्रवस्था को प्राप्त नहीं हो जाता, वह ॒निशक्त 
प्राणी है श्रौर श्रपती सिद्ध वाणियों का उच्चार नहीं कर सकता । कंवियों 
की कलम से मनुष्य के व्यापारों के सम्बन्ध में अनेक द्विव्य वाणी निस्सत 
हुई हैं लेकिन जिस तरह आप होमर के सम्बन्ध में कुछ बातें करते हैं तो 
कला का शआ्राश्रय लेते हैं, उसी तरह कवि-गण नहीं करते । वे केवल इतना 
ही करते हैं कि १(४४७ ने उन्हें जिस तरह प्रवृत्त किया है उसी के उच्चार 
के लिए वे प्रेरित होते हैं। बस भशौर कुछ नहीं ! जब प्र रणा श्राती है 
तो वह भिन्न भिन्न कवियों में भिन्न रूप में प्रकट होती है--कोई ॥)7609ए- 
78770 की रचना करता है, कोई देवताश्रों की स्तुति करता है, कोई 
सामूहिक रूप से गाये जाने वाले गीतों की रचना करता है, कोई महा- 
काव्य की, तो कोई +97700 छुनन्‍्दों की ! जो एक तरह की रचना में 
प्रवीण है वह दूसरी ररह की रचनाग्रों में प्रवीण नहीं होता, क्योंकि कवि 
के गीत कला के द्वारा नहीं देवी शक्ति की प्रेरणा से उच्चरित होते हैं। 
यदि कला के नियमों के द्वारा उसने शिक्षा प्राप्त की होती तो वह एक 


अमगक श्‌ 7] २ हजक 


ही विषय नहीं सब विषयों पर कह सकता था| अ्रतः ईश्वर सर्व प्रथम 
कवियों के मस्तिष्क का श्रपंहरण कर लेता है ओर भपने मन्‍्त्री के रूप में 
उनका प्रयोग करता है ताकि इन बहुमूल्य प्रवचनों का उच्चार करने 
वालों की दिव्यवाणी को सुनकर लोग यह न समझ लें कि वे स्वयं बोल 
रहे हैं परन्तु यह समझें, कि वक्ता स्वयं भगवाद है शौर इन लोगों के 
माध्यम से हमारे साथ वार्तालाप कर रहा है | 


मेरे कथन का सबसे श्राकर्षक उदाहरण 'ीजएआरशांओए8 578 
(!9]00/97 है। उसने केवल देव-स्तुति-परक रचना ही की जो शब्राज 
सब की जीभ पर नाचती है, भ्राज तक की लिखी सर्वेश्व ष्ठ रचनाओं में 
जिसकी गणना होती है श्रौर जिसके बारे में वह स्वयं कहता है कि वह 
(0४७ का एक आविष्कार मात्र है। इसके सिवा उसने कुछ भी नहीं 
लिखा जिसे लोग याद रखने की परवाह करें। ऐसा लगता है कि इसी 
तरीके से हमें याद दिलाता रहता है कि हम भूलें नहीं कि ये कवितायें 
मानंवी नहीं देवी शक्ति की उपज हैं, ईश्वरीय रचना है, कि कवि आझाविष्ट 
प्रणी तथा देवताग्रों का दुभाषिया मात्र है। जब एक निष्कृष्ट कवि के 
मुख से ईश्वर ने सर्व श्रेष्ठ गीत का उच्चार कराया तो क्‍या इससे पत। 
नहीं चलता कि कवि को वह देव प्रेरित व्यक्ति के रूप में प्रतिष्ठित 
करना चाहता था | 


इन पंक्तियों का श्रर्थ स्पष्ट है। प्लेटो कवि की स्वतन्त सत्ता को 
स्वीकार नहीं करते | वे इस बात को नहीं मानते कि कवि का कोई 
अपना व्यक्तित्व होता है, केवल कवि होने के नाते वह हमारे आझादर का 
पात्र हो नहीं सकता है कवि का जो कुछ महत्त्व हैं वह इसलिए है कि वह 
ईश्वर के हाथ की निर्जीव निष्क्रिय कठपुतली मात्र है जिसके द्वारा वह 


मम २ | ठ न्‍णक 


मानवता तक अपना दिव्य संदेश पहुचाना चाहता है। मतलब यह कि 
कवि स्वतथपूर्ण नहीं है। उस पर विचार करने के लिए हमें उसे पूरी 
मानवता के संदर्भ में रख कर देखना होगा। देखना होगा कि मानवता 
का हित किस तरह के विचारों तथा सिद्धान्तों के द्वारा हो सकता है, 
किस तरह के सिद्धान्त उसे उन्नत पथ की ओर ले जा सकते हैं । 


समाज की उन्नति क्‍या है। इस बात की स्पष्ट झुपरेख़ा प्लैटो के 
मस्तिष्क में पहले से ही वर्तमान थी । वे जानते थे कि इन्हीं बातों का 
ग्रनुकरण कर समाज का सांस्कृतिक उत्थान हो सकता है । वे प्रजातन्त्र 
की अभ्रसफलता देख चुके थे । प्रजातन्त्र की अतत्परता, शिथिलता तथा 
प्रसमंथता के कारण किस तरह 27078 को 58097 के हाथों 
बुरी तरह पराजित होना पड़ा था, इस बात की स्मृति उनके मस्तिष्क पर 
ताजी थी। उन्हीं की श्रांखों के सामने सुकरात जेसे मनीषी को जहर 
दिया जा चुका था यह बात भी वे भूले नहीं थे, श्रतः प्लेटो तात्का- 
लिक समाज के शुण-दोषों से परिचित ये श्रौर जानते थे कि समाज की 
उन्नति किस तरह हो सकती है। जिस पथ का अ्वलम्बन लेकर समाज 
उन्नत होगा वही उनका अनुमोदित पथ भी होगा। जिन तथा-कथित 
कवियों की वाणी में इस पथ को अपनाने की प्रेरणा नहीं होगी अथवा 
जिनकी वाणी लोगों को इस पथ से च्यूत करेगी वे कवि की प्रतिष्ठा के 
प्रधिकारी नहीं होंगे । 

ग्रतः कवि को प्लेंटो की मान्यताओं का, मन्तव्यों का, धाररणाम्रों 
का, समर्थन करना ही होगा । ऐसा लगता है कि प्लेटो ने मानों अपने 
ज्ञान की प्रांखों से विश्व के सारे रहस्यों को देख लिया था, वे सत्स्वरूप 
को ठीक तरह से पहचानते थे, वे जानते थे कि ईश्वर की इच्छा क्‍या है ! 


न्‍्_-ध कफ ही अत 


भ्रतः वे कवि को भी हिदायत दे सकते थे । यह ठीक है कि कृषि को, 
प्रारम्भ में, उन्होंने अपने ि6007०)06 से निकाल नहीं दिया था, जेसा 
कि भ्रागे चल कर उन्होंने किया । पर यह तो ठीक है कि प्रारम्भ से ही 
कवि के प्रति उवकी धारणा ऊंची नहीं थी। वे दार्शनिक को कवि से 
सदा ऊचा स्थान देते रहे। 407 में उन्होंने कवि की स्थिति अ्रवश्य 
स्वीकृत की है पर देवी-शरक्ति प्रेरित व्यक्ति के रूप में हो, स्वतन्त्र रूप में 
नहीं ! परन्तु वार्तालाप के दौरान में कवि को जिस ढंग से +5]0088 
किया गया है, उसकी बातों की निस्सारता दिखलाई गई है, उससे पता 
चलता है कि प्लेटो के हृदय में दाशनिक का महत्व कवि से श्रधिक है | 
हो सकता है समय के विक्रास के साथ प्लेटो के हृदय में यह भावना श्रौर 
भी विकसित हो गई हो श्रौर अ्रन्त में उसके दार्शनिक ने .+७.0०070 
में श्राते-पअ्रते कवि को एक दम देश-निकाला ही दे दिया हो ॥ 


86900]0 में प्लेटो ने एक संतुलित तथा ग्रादर्श समाज के स्वरूप 
तथा उसकी रचना सम्बन्धी सिद्धान्तों पर विचार किया है। एक ओर ये 
विचार अ्रपनी परिपक्वता के लिए दर्शनीय हैं तथा दूसरी ओर बहुत ही 
संयत एवं तर्क॑पूर्ण ढंग से प्रौढ़ भाषा में उपस्थित किये गये हैं। इस पुस्तक 
में दो स्थानों पर कविता अ्रथवा काल्पनाशील साहित्य पर चर्चा का प्रसंग 
उपस्थित हुप्ना है--द्वितीय तथा दशम परिच्छेंद में । द्वितीय परिच्छेद में 
काव्य सम्बन्धी जो बातें हैं वे कोई जमकर विस्तृत तथा सांगोपांग रूप में 
विवेचनात्मक दज्ढ से नहीं कही गई हैं। वे संक्षिप्त हैं श्रौर श्रन्य आतनुषं- 
गिक बातों के प्रवाह-क्रम में उठी हुई हल्की तरंग मात्र हैं । 


दशम परिच्छेद में कविता के स्वरूप पर अधिक विस्तारपूर्वक तथा 


जाके २ है है जि 


गम्भी रता से विवेचन किया गया है यद्यपि यहां भी बातें आदर्श समाज की 
कल्पना के प्रसंग में आई हैं । 


पाश्चात्य साहित्यालोचन के इतिहास में 09907०0 में प्रकटित 
प्लेटो के काव्य सम्बन्धी विचार बहुत ही महत्त्वपूर्ण समभे जाते हैं, आलो- 
चना क्षेत्र के ये (9]07 400077787 हैं । प्रथमतः तो ये श्रपनी प्राथ- 
मिकता के लिए ही दर्शनीय हैं। कारण कि इसके पूर्व इतने विवेचनापूर्णा 
ढड़ से विस्तारपूर्वक': किया गया साहित्य-सम्बन्धी विचार नहीं मिलता । 
इस दृष्टि से श्रपने विषय का यह पहला महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । यूनानी 
संस्कृति की प्रोढ़ता ने उस समय तथा विचार-मंथन करके जो नवनीत 
निकाला था उसकी सुन्दर भलक हमें यहां मिल जाती है| दूसरी बात यह 
कि आज हमारे सामने पाश्वात्य साहित्यालोचन की जो भव्य अ्रद्टालिका 
दिखलाई पड़ती है उसकी नींव यही है। इन्हीं बिचारों को लेकर सभी ने 
श्रपनी विचार-सरणि का सूत्रपात किया है। ये आलोचना शास्त्र के प्रार- 
म्मक सूत्र हैं, 9:070702 77076 है । किसी ने इसका समर्थन किया 
है, किसी ने खण्डन | किसी ने अपने ढड् से इनकी व्याख्या की है और 
इसी प्रयास में प्लेटो के ही शब्दों से वे बातें कहलवाई हैं जो शायद प्लेटो 
की कल्पना में भी नहीं श्राई हों--हो सका है तो समझा बुझा कर, नहीं 
तो गलेला देकर | श्रतः इस महत्वपूर्ण कथन की हम यहां उद्ध त 
कर रहे हैं । 

सुकरात और (]87००४ में वावालाप हो रहा है. 

(हमने श्रादर्श राज्य की जो रूपरेखा उपस्थित की है उसमें बहुत सी 
अ्च्छाइयां हैं परन्तु उन्त सबों में कविता के नियम के सम्बन्ध में विचार 
वंरने में जो आ्रानन्द आता है, वसा कहीं नहीं झ्राता ।* 


नव घर (6 श्र ५, अकछ 


ग्रापका संकेत किस ओर है ?' 

ओऔरासंकेत अनुकरणात्मक कविता की अस्वीकृति की ओर है। इसको 
हमें कभी भी स्थान नहीं देना चाहिए, और जब हमने आत्मा के भिन्‍न- 
भिन्‍न भ शों को अलग-प्रलग॒ करके देख लिया है तो यह बात श्र भी 
स्पष्ट हो जाती है । 

आपका मतलब नहीं समझा ।! 

'मैं श्रापको विश्वास में लेकर, यह बात कह रहा हूं। मैं नहीं चाहता 
कि मेरी ये बातें दुःखान्तकियों के लेखक तथा शेष अनुकरणक वर्ग के 
सामने कही जाएं, परन्तु श्राप से कहने में कोई हिचक नहीं कि कविता 
के नाम पर जितनी अनुकरणात्मक रचनाएं प्रचलित हैं वे सब की सब 
श्रोताश्रों की बुद्धि को चौपट कर देने वालो हैं। ऐसे लोगों के लिए एक 
ही दवा है कि उन्हें वस्तुओं के (जिनका वे प्रनुकरण करते हैं) वास्तविक 
स्वरूप का ज्ञान हो....श्रच्छा, यह तो बताओ, यह अनुकरण क्या बला 
है । मुझे तो इसका सच्चा ज्ञान नहीं । 

“जब शआ्रापको ही पता नहीं तब) मुझे इसका ज्ञान होगा यह बात 
आपने खूब कही ।! 

तब हम लोग यथा-प्‌र्वे साधारण ढद्भ से विचार प्रारम्भ करें ; जहां 
भी एक नाम से पुकारे जाने वाले श्रतेक वस्तु-व्यक्ति पाये जाते हैं, तब हम 
मान लेते हैं कि उनके श्रतुरूप कोई (089 या 0707 श्रवश्य होगा-- 
सममभे न ?! 

खूब ।' 

'अ्रच्छा, भ्रब कोई सामान्य उदाहरण लें | संसार में बहुत सी चार- 
पाइयां और मेजें हैं--हैं न!” 


हाँ 
परन्तु उनके 4689 या ४077४ तो दो ही हैं--एक चांरपाई का, 
दूसरा मेज का । 
टीक। 

_ “हमारे उपयोग के लिए जब कोई रचयिता चारपाई या मेज की 
रचना करने लगता है तो वह इसी 4066७ के अनुरूप उसे बनाता है--- 
इस, तथा इसी तरह के अन्य उदाहरणों के सम्बन्ध में भी हम इसी ढड़ से 
बातें करेंगे--परन्तु कोई भी रचयिता स्वयं 4669 का निर्माण तो नहीं 
कर सकता । केसे करेगा भला ?' 

'ग्रसम्भव ।! 


(फिर भी एक दूसरा कलाकार है---मैं जानना चाहूंगा कि उप्तके बारे 
में ग्रापका क्या कयन है ?' 

बह कौन है ?! 

'जो दूपरों के द्वारा बनाई हुई सब चीजों को बनाता है ।' 

'वहु तो बड़ा ही असाधारण आदमी होगा । 

जरा सा ठहरिये, तब श्रापको ऐसा कहने के और कारण भी मिलेंगे, 
कारण कि यह ऐसा झ्रादमी है जो हर किस्म का बतंन ही नहीं बना 
सकता, पौधे भी बना सकता है, पशुप्रों को भी बना सकता है, प्रपती भी 
रचना कर सकता है और सब चीजों की; जमीन और आसमावत्र तथा 
जमीत-झ्ासमान पर पाइ जाने वाली सब चीजों की | यहां तक कि वह 
देवताग्रों की भी रचना कर सकता है। 

“तब तो वह जादूगर होगा इसमें कोई संदेह नहीं । 


नल की पर .. 


“बरे, आपको तो विश्वास ही नहीं होता है, है न ऐसा ! तब क्या 
ग्रापका मतलब है कि ऐसी रचना करने वाला अ्रथवा बनाने वाला कोई 
हो ही नहीं सकता ? अथवा यह कि एक श्रर्थ में ऐसा रचयिता 
सृजक हो सकता है और दूसरे श्रर्थ में नहीं ? क्या आपको मालूम है कि 
एक तरीके के श्राप स्वयं सब चीजों की रचना कर सकते हैं ! 

“सो कैसे ? 

“बहुत सीधा तरीका है; श्रथवा बहुत से तरीके हैं, जिनके द्वारा यह 
कार्य शीघ्र और सहज ही सम्पन्न हो सकता है। सबसे सीधा और छिद्र 
तरीका यह है कि एक दर्पण लेकर चारों तरफ घुमाओ्रो । तुम देखोगे कि 
तुम शीघ्र ही सूरज, झ्राकाश, पृथ्वी, स्वयं, पशुप्रों, पौधों की तथा श्रभी 
जितनी चीजों की बातें कह रहे थे उन सब की रचना दर्पण में तुम 
कर रहे हो । ह 

“हां, पर वे तो प्रतिविम्ब मात्र होंगे। 

“बहुत ठीक । श्रव तुम राह पर प्रा रहे हो। चित्रकार भी तो मेरे 
ख्याब में दीक इसी तरह का व्यक्ति है भर्थातव्‌ प्रतिविम्बों का निर्माता ! 
है कि नहीं ?! 

“इसमें क्‍या सन्देह है ।! 

परन्तु तब मैं मानता हूं कि तुम कहोगे कि वह जो कुछ निर्माण 
करता है वह शभ्रसत्‌ है। फिर भी यह कहना, एक श्रर्थ में सही भी है कि 
चित्रकार चारपाई का निर्माण करता है ।' 


हां, परन्तु वास्तविक चारपाई का नहीं ।' 
आर चारपाई का जो निर्माण करता है उसके बारे में आपका क्‍या 


कब बट 6 नल 


कहना है ? आप कह रहे थे न कि वह भी निर्माण तो करता है पर 
उसवब्न नहीं जो हम लोगों के विचार में चारपाई का 669 है; उसका 
सारतत्व | परन्तु केवल एक विद्येष चारपाई का ।! 

हां, मैंने ऐसा कहा था ।! 

यदि वह उस चीज का निर्माण नहीं करता, जो है, तब वह सच्चे 
प्रस्तित्व का निर्माता नहीं हो सकता । वह श्रस्तित्व के बाहरी रूप का ही 
निर्माण कर सकता है । यदि कोई यह कहे कि चारपाई के निर्माण करने 
वाले प्रथवा किसी भी कारीगर की कृति का वास्तविक श्रस्तित्व है, तो वहु 
बात शायद ही सच्ची कही जा सके | 


कम से कम दार्शनिक तो कहेंगे ही कि वह सच्ची बात नहीं कह 
रहा है ।' 

तो इसमें श्राश्चरय नहीं कि उसकी कृति भी सत्य की श्रस्पष्ट श्लभि- 
व्यक्ति है । 

हां, कोई श्राश्चर्य नहीं | 

अच्छा, अ्रब इन उदाहरणों के श्रालोक में यह पता लगावें कि यह 
अनुकरण करने वाला कोन है ।' 

जैसी ग्रापकी मर्जी ।! 


तब, हमारे सामने तीन चारपाइयां हैं--एक प्राकृतिक चारपाई 
जिसका निर्माण, कहें तो ऐसा ही कह सकते हैं कि ईश्वर ने किया है-- 
क्योंकि दूसरा कोई निर्माता हो ही नहीं सकता ।? 


नहीं ।' 


- २१० - 


दूसरी चारपाई वह जो बढ़ई बनाता है ।! 

हां ।' 

तीसरी चारपाई वह जिसे चित्रकार बनाता है ।! 

हाँ 

तब चारपाइ्यां तीच तरह की हुई' श्रीर तीन तरह के कलाकार जो 
उनकी रचना करते हैं; ईश्वर, चारपाई को बनाने वाला कारीगर और 
चित्रकार । 

हां, तीन तरह की चारपाइयां हुई ।' 

चाहे अ्रपने मन से, चाहे प्रावश्यकतावश, ईश्वर ने प्राकृतिक रूप से 
एक ही चारपाई बनाई | सिर्फ एक ही !! ईश्वर ने दो या अधिक आदर्श 
चारपाइयां न तो बनाई ही हैं और न भविष्य में ही बनावेगा !” 

ऐसा क्यों ?! 

कारण कि यदि वह दो चारपाइयां बनाता है, तो इन दोंनों के 
ग्राधार रूप में एक अन्य चारपाई की कल्पना करनी ही होगी जिसे वह 
आ्रादर्श रूप में ग्रहणा करता है और यही 4669! चारपाई होगी, होष 
दोनों नहीं ! 

“बहुत अच्छा ।' 

“ईह्वर इस बात को जानता था और वह॒ एक श्रादर्श चारपाई का 
वास्तविक निर्माता होना चाहता था । किसी एक विशिष्ट घारपाई का 
विशिष्ट निर्माता नहीं । अतः उसने एक ऐसी चारपाई का-निर्माण किया 
जो निसर्गतः और श्रावश्यक रूप में एक ही हो सकती थी । 


हां, ऐसा हमारा भी विश्वास है ।! 


3 


'तब उसे हम चारपाई का प्राकृतिक निर्माता समभे वे १! 

“हां, जहां तक सृष्टि की प्राकृतिक प्रक्रिया के कारण वह इस 
चारपाई तथा अन्य वस्तुजातों का निर्माता है । 

और हम उस बढ़ई को क्या कहें ? क्या वह भी चारपाई का 
निर्माता नहीं है ?” 

हे | 9 

'प्रत्तु चित्रकार को आप निर्माता कहेंगे या नहीं ?* 

कभी नहीं !! 

धयदि वह निर्माता नहीं तो चारपाई से उसका क्या सम्बन्ध है । 

'भेरे विचार से कि हम उसे दूसरों की बनाई हुई वस्तु का श्रनुकर्त्ता 
कहें तो ठीक होगा ॥' 

अच्छी बात ।' 

तब जो ब्यक्ति प्रकृति से तीसरी सीढ़ी पर दूर है, उसे श्राप झनुकर्त्ता 
कहते हैं ।' 

ग्रवश्य ।' 

पतब तो दुखान्त काव्य की रचना करने वाला भी श्रनुकर्ता कहा 
जायेगा और दूसरे श्रतुकर्त्ताश्रों की तरह वह भगवान या सत्य से तीन 
पग दूर है । 

बात तो ऐसी ही मालूम पड़ती है ॥' 

“तब हम लोग श्रनुकर्ता के बारे में सहमत हैं। पर मैं आप से एक 
बात पूछू' | यदि किसी व्यक्ति में किसी मौलिक वस्तु तथा उसके श्रनुकरण 
करने की क्षमता वर्तमान है तब श्राप क्या समभते हैं कि वह मूर्ति के 


अर दर ५ हे जा. 


निर्माण करने की शोर ही गम्भीरतापूर्वक अपना समय लगायेगा ? क्‍या 
बह अनुकरण को ही अपने जीवन का प्रमुख सिद्धांत बनायेगा, मानों 
उसको कोई झ्रधिक महत्वपूर्ण काम करना ही न हो ! 

में ऐसी बात नहीं मानता |! 

सच्चे कलाकार की श्रभिरुचि वास्तविकता की ओर अ्रधिक होती है, 
धनुकरण की श्रोर नहीं । वह श्रपत्री यादगार के लिए बहुत से उत्तम कार्यों 
क्रो छोड़ जायेगा। वह दूसरों की विरदावली की रचना से श्रधिक यह बात 
पसन्द करेगा कि वह स्वयं ऐसी विरुदावलियों का विषय बन सके । 

तब क्‍या हम यह न समझे कि होमर से लेकर झ्ाज तक जितने 
फ्रवि नामक व्यक्ति हुए हैं वे सब अनुकर्त्ा हैं। वे गुणों की मूृति की 
मकलें करते हैं परन्तु वे सत्य तक कभी नहीं पहुंचते । 

'यहां एक दूसरी बात आती है। बअनुकर्ता या मूतियों का निर्माता 
वास्तविक अ्रस्तित्व के बारे में कुछ भी नहीं जानता । वह केवल बाहरी 
रूपों को जावता है । ठीक कहता हूं न ? 

हाँ 0 

'तब हम प्रश्न को स्पष्टतया समझ लें और इसके श्रद्ध ज्ञान-मात्र 
पे ही सन्‍्तोष न करें ।' 

बहुत श्रच्छा, आगे बढ़िये।' 

चदित्रकार के बारे में कहा जाता है कि वह लगाम का चित्र बना 
धकता है । क्या वह कांटे का चित्र भी बना सकेगा ? 

| हां | है 

'तब चमड़े तथा पीतल का काम करने वाले व्यक्ति भी ऐसा कर 
प्केंगे। हैत ! 

श्रवश्य 


हक रब ता 


परन्तु क्या यह बात भी ठीक है कि चित्रकार कांटे श्रथवा लगाम के 
वास्तविक रूप को जानता है, कभी नहीं हो सकता! पीतल तथा 
चमड़े का काम करने वाले भी शायद न जानते हों ! इसके सच्चे रूप का 
ज्ञान यदि किसी को है, तो, चुडसवार को ! जो यह जानता है कि उसका 
उपयोग किस प्रकार से हो । 

बहुत ठीक ।! 

क्या यही बात सब चीजों के लिए लागू नहीं हो सकती ?' 

कौन सी बात ?! 

यही कि सब चीजों के साथ सम्बन्ध रखने वाली कलाए तीन तरह 
की हैं| एक जो उनका उपयोग करती है; दूसरी जो उन्का निर्माण 


करती है भश्रौर तीसरी जो उनकी श्रनुकृति उपस्थित करती है । 
ठीक बात है।' 


तब यहां तक हम सहमत हैं कि प्रनुकर्ता को, श्रतुकरण की जाने 
वाली वस्तु का कुछ भी ज्ञान नहीं होता; भ्रनुकृति एक तरह का खेल 
है, तब दुखान्त कवि चाहे 797776 छन्द में स्चना करे श्रथवा 
+6700 छनन्‍्द में वह सर्वोत्कृष्ट श्रनुकर्त्ता है । 

“बहुत ठीक ।' 

“ भ्रव मैं ग्रापसे पूछता है कि क्या हम लोगों ने यह बात नहीं प्रामा- 
शित की कि अ्नुकरण, सत्य से तीन सीढ़ियां दूर है। झ्तः मैंने यह कहा कि 
चित्र-कला या लेखन-कला प्रथवा अ्नुकरण मात्र जब अपने सच्चे कत्त व्य 
का पालन करते हैं तो सत्य से बहुत दूर रहते हैं। ओर वे हमारे श्रन्दर 
वर्तमान उस तत्व के साथी हैं जो, शुद्धि श्रे उतनी ही दूर है शर उनका 


कोई सत्य तथा स्वस्थ लक्ष्य नहीं होता । 
“बहुत ढीक । 


न आ ह है 


“अनुकरणगील कला निम्नकोदि की होती है जिसका विवाह भी 
पभीच से होता है श्लौर उसकी सनन्‍्तान भी निम्न कोटि की होती है । 

“बहुत ठीक । 

“तब क्या यह बात चाक्षुष प्रतीति के लिए ही ढोक है भ्रथवा श्रावण 
के लिए भी जिसका सम्बन्ध कविता से है? 

“कदाचित्‌ यह बात कविता के लिए भी ठीक होगी । 

“तब हम इस प्रश्त को यों रख सकते हैं; मनुष्यों के द्वारा इच्छा या 
श्रनिच्छा पूर्वक जो कार्य किए जाते हैं वे श्रच्छे या बुरे परिमाण उत्पन्न 

करते हैं श्रथवा श्राननद या दुख उत्पन्न करते हैं। ऐसे कार्यो का श्रनु- 
करण करना ही शप्रनुकरण कहलाता है । 

“क्या हम लोग यह नहीं कह रहे थे कि यदि मनुष्य उच्च हुआ तब 
पुत्र की मृत्यु या ऐसी कोई प्रिय वस्तु को खो देने ऊसी स्थिति आ्राने पर 
वह इस परिस्थिति का सामना दूसरों से श्रधिक धर्य के साथ करेगा । 

।। हां, 

'परन्तु क्या उसे दुख होगा ही नहीं ? अ्रथवा यों कहें कि यदि दुःख 
होना अनिवार्य ही है तो भी वह दुःख को कम करके महसूस करेगा । 
उसमें एक नियम और तकी का तत्व वर्तमान रहता है, जो इस तरह की 
भावना पर नियंत्रण करना सिखलाता है। पर साथ ही उसमें अपनी 
विपत्ति की अनुभूति की भावना भी वर्त्तमाव रहती है जो श्रपने दुख को 
प्रनुभव करने के लिए भी उकसाती रहती है । 


£ ठीक । 
“नियम का ज्ञान यह कहेगा कि विपत्ति के श्रन्दर धेय रखना सर्वोत्तम 
है और हमें अधीर नहीं होना चाहिये, क्योंकि यह जानने का कोई तरीका 


हे: कह है. 2 कक 


नहीं है कि ऐसी चीजे अ्रच्छी हैं अथवा बुरी, अ्रधीर होने से कोई लाभ 
नहीं होता | दूसरी बात यह है कि कोई भी मानवीय वस्तु बहुत महत्त्वपूर्ण 
नहीं होती श्ौर जिस चीज की तात्कालिक आब्रावश्यकता है उसमें शोक 
बाधा उपस्थित करता है । 

“सब से प्रावश्यक पदार्थ क्‍या है ? 

“यही कि जो कुछ घटना घटे, उस पर हम बुद्धिपर्वक विचार करें । 
ग्रौर जब पासा फेंक दिया जाय तो श्रपने कार्यो को इस रूप में व्यवस्थित 
करें जिसे बुद्धि सर्वोत्तम समभती है। हम बालकों की तरह व्यवहार न 
करें, जो गिरने पर उस भ्रग को पक्रड़ कर चिल्लाते रहते हैं, जहां चोट 
लगती है । हमें चाहिये कि हम श्रपने श्रन्दर तत्परता से दवा लगाने की 
स्फूरति पेदा करें ! जो रुण्ण या दुखी है उसे उठाने की कोशिश करें !! श्नौर 
प्रपने घाव भरने वाली कला के द्वारा दूसरों के शोक के श्रांसू पोंछे ||! 

“हां, विपत्ति के श्राघात का सामना करने का यही सच्चा रास्ता है। 

हि छह, 

“हमारे श्रन्दर जो उच्च तत्व वर्तमान है, वह सदा बुद्धि के संकेद 
का श्रतुतरण करता है ! ह 

“यह तो स्पष्ट ही है । 

“और दूसरा तत्व जो दुखों की याद दिलवाता रहवा है और शोक 
में मग्स करवाता रहता है, जिसका कोई भ्रन्त नहीं, उसे हम निबु द्वि, बेकार 
प्रौर कायर कह सकते है । 

“सच, ऐसा तो कहना ही चाहिये। 

तब क्या यह बात ठीक नहीं है कि दुसरा तत्व मेरा, मतलब विद्रोह 
मूलक तत्व से है, सदा अनुकरण के लिए विविध प्रकार की सामग्री 


हे हक हु: हे 


उपस्थित करता है। दूसरी ओर चतुर और श्ञांत प्रकृति ज्यादा गम्भीर 
होने के कारण सहजता-पर्वक प्रनुकूल नहीं हो सकती भर यदि इसका 
प्रमुकरण किया भी जाय तो लोग इसकी प्रद्यंसा भी नहीं करेंगे । विशेषतः 
एक सार्वजनिक उत्सव के श्रवसर पर जहां एक स्थान पर श्रनेक प्रकार के 
मनुष्यों का समूह एकत्र होता है । क्योंकि जिस भावना की श्रनुकृति उप- 
स्थित की जा रही है, उससे वे अ्परिचित हैं । 

“डीक । 

“तब यह बात तथ हुई कि लोकप्रिय बनने का ध्येय रखते वाला 
श्रनुकरणशील कवि प्रकृति से ही ऐसा उत्पन्न नहीं होता और न उसकी 
कला ही मानव श्रात्मा के बुद्धि तत्व को प्रभावित करने के लिए उत्पन्न 
होती है, परन्तु वह तो आ्रावेश-मय तथा श्रस्थिर मनोवृत्तियों का ही शनु- 
करण करना पसन्द करेगा, जिनका अनुकरण करना सहज भी हे । 

“बहुत ढीक ! 

“ग्रब हम लोग ऐसे व्यक्ति को चित्रकार के समक्ष रख पकते हैं, 
क्योंकि वह इससे दो बातों में मिलता है! प्रथमतः तो, इसकी रचना में 
निम्न कोटि की सत्यता रहती है श्रौर इस तरह वह इससे मिलता है | 
दूसरी समानता यह हैं कि उसका भी सम्बन्ध इसकी ही तरह श्रात्मा के निम्न 
ग्रद् से रहता हैं। श्रतः यदि हम लोग एक सुव्यवस्थित राज्य व्यवस्था 
में उसे स्थान न दें, तो हम सही रास्ते पर हीं होंगे, क्योंकि वह भावनाओं 
को ही जाग्र॒त, पोषित, तथा प्रोत्साहित करेगा और बुद्धि को निबंल 
करेगा। जेसे नगर में जब पाप का अ्रधिकार बढ़ जाता हैं और पुष्य का 
तिरस्कार होता है उसी तरह, हमारा कहना, है कि अ्नुकरणशील कवि 
मनुष्यों के श्रन्दर एक बुरे तत्व की स्थापना करता है, क्योंकि वह बुद्धि- 
हीन तत्वों का प्रश्रय देता है, जिसमें कम और बेस की विवेक-बुद्धि नहीं 


लक | ५ ७ «« 


होती । वह एक ही चीज को एक समय बड़ा और दूसरे समय छोटा 
समभता हे । दूसरे शब्दों में जो मूर्तियों का निर्माण करता है और सत्य 
से बहुत दूर है । 

“बहुत ठीक ! 

. “परन्तु हमारी जो सबसे बड़ी श्विकायत है उसकी चर्चा तो मैंने श्रभी 
को ही नहीं | वह यह है कि कविता में अ्रब्छी बात को भी हानि पहुंचाने 
की शक्ति है। श्र बहुत कम ऐसे हैं, जिनको हानि नहीं पहुंचती। इस तरह 
कविता क्या भयानक चीज नहीं है ? 

“जरूर; यदि प्रभाव वेसा ही हो, जेसा श्राप कहते हैं ! 

“सुनो श्लौर विचार करो ! जब हम होमर की कविता का कोई श्रश 
पढ़ते हैं, या दुखान्त नाठकों के उच भागों को पढ़ते है, जिनमें नायक बहुत 
जोर-शोर से अपने शोक की अ्रभिव्यक्ति करता है, छाती पीट-पीट कर 
रोता है, तो मनुष्यों में बड़े से बड़ा व्यक्ति भी उसके साथ सहानुभूति प्रगठ 
करने में आनन्दित होता है। श्रौर उनकी भावतनाश्रों को जगा देने वाले 
कवि के कौशल पर मुग्ध हो जाता है । 

“हां, मैं खूब जानता हूं ! 

“परन्तु जब हम लोगों पर विपत्ति श्राती है, तब आपने देखा होगा 
कि हम ठीक इसके विपरीत गुणों को ही महत्त्व देते हैं। श्र्थात्‌ हम लोग 
शांत और धीर होना ही पसन्द करते हैं। यही पुरुषोचित व्यापार है, 
और वह चीज जो ऐसे वर्णन में ही आवन्द लेने को प्रेरित करती है; 
. बह है नारियों का व्यापार ! 

“बहुत ठीक | 
“तब क्या उस झादमी की प्रशंसा करना हमारै लिए ठीक होगा जो 


- शेश्य - 


उस कार्य को करता है, जिससे हम घुणा करते हैं और जिसे करते हुए 
स्वयं लज्जा का अनुभव करते है ! 

“नहीं, यह कभी भी युक्ति-युक्त नहीं होगा । 

“नहीं, मैं तो कहंगा कि एक दृष्टि से यह खूब युक्ति-युक्त कहा जा 
सकता है | 

८४किस दृष्टिकोण से ? बतलाइये | 

थआ्राप इस दृष्टि से विचार करें ; विपत्तिकाल में मनुष्य के अन्दर 
रोदन तथा विलाप के द्वारा श्रपने शोक को दूर करने की स्वाभाविक 
श्राकांक्षा होती है, परन्तु इस प्रवृत्ति पर हम विपत्ति के श्रवसर पर भमिय- 
न्वण करते हैं । इस नियन्त्रित प्रवृत्ति को कंवि के द्वारा सन्तुष्टि प्राप्त 
करने का श्रवसर दिया जाता है। श्रतः हम लोगों की प्रकृति जो बुद्धि या 
ग्रभ्यास के द्वारा डीक से शिक्षित नहीं होती, उसका उत्तमांश हमारी सहा- 
नुभूति के तत्व को खुलकर सामने श्राने का श्रवसर प्रदान करती है, क्योंकि 
शोक श्रपना न होकर दूसरे व्यक्ति का है | दर्शक भी यही सोचता है कि 
उस व्यक्ति की प्रशंसा करने, या उस पर करुणा करने में कोई निन्‍्दा की 
बात नहीं, जो आकर उससे श्रपनी अ्रच्छाई का वर्णान करता है, और 
ग्रपनी विपत्तियों को बढ़ा-चढ़ा कर कहता है। वह सोचता है कि झ्रानन्द 
तो मिल ही जाता है, तब वह इस श्रानन्द को श्रौर कविता को खोने की 
मूर्खता क्‍यों करे | मेरे रु्याल में बहुत कम लोगों में यह सोचने की बुद्धि 
होती है कि दूसरों की बुराई से अपने में भी बुराई भरा जाने की सम्भा- 
बना है। प्रतः दूसरों की विपत्ति को देखकर हृदय में जो शोक के भाव 
उत्पन्त होते हैं, उनको भपने अ्रन्दर दबाकर रखने में कठिनता होती है । 
क्या यही बात हास्य तथा इसके सम्बन्ध में नहीं कही जा सकती ? बहुत 
से ऐसे मजाक होते हैं, जिन्‍्हें करने में श्राप स्वयं लज्जा का श्रतुभव 


- २१६ - 


करेंगे। फिर भी उन्हीं मजाकों को या तो एकान्त में या हास्य रस के 
श्रभिनय में देखेंगे या सुनेंगे, तब आपको बहुत प्रसन्नता होगी श्रौर उनका 
भद्दापन शभ्रापको कुछ भी अरूचिकर नहीं लगेगा । करूणा में भी इसी 
बात की पुनरावृत्ति होती है कि मनुष्य के श्रन्दर एक तत्व होता है, जो 
हास्य की मांग करता है, लेकिन श्रादमी की बुद्धि इस पर नियन्त्रण! करती 
है; ताकि दूसरे उसको हंसोड न समझने लगें । इस नियन्त्रित तत्त्व को 
प्रवाह मिलने का श्रवसर मिलता है और नाटक में इस प्रवृत्ति के जागृत 
होने के कारण आदमी को श्रपने घर में भी, हास्य रस के कवि की तरह, 
श्रपनी श्रज्ञानावस्था में ग्राचरण करने का श्रवसर मिल जाता है। 

“बहुत ठीक । 

“बही बात काम, क्रोध तथा श्रन्‍्य आवेगों के बारे में, इच्छाश्रों, 
पीडाग्रों तथा आनन्द के बारे में भी कही जा सकती है, जो किसी क्रिया से 
अलग नहीं हो सकती । सब में कविता श्रावेशों को पुष्पित श्रोर पल्‍लवित 
ही करती है, उन्हें पुखाती नहीं; कविता उन्हीं को प्रधान बना देती है । 
हालांकि मानवता की प्रसन्नता श्लौर इनके सद्ग्रणों की वृद्धि के लिए 
आ्रवेज्ञों का नियन्त्रित होना आवश्यक है ! 

“मैं इसे प्रस्वीकार नहीं कर सकता । 

“ग्रतः, जब कभी श्राप होमर के प्रशंसकों से मिलें जो उसे ग्रीस 
निवासियों के शिक्षक की पदवी देते हैं और यह कहते हैं कि मनुष्यों की 
शिक्षा तथा उनकी व्यवस्था और शिक्षा लिए वह लाभदायक है, उसे बार- 
बार पढ़ना चाहिये और मनन करना चाहिए, ताकि श्रपना पूरा जीवन 
उसके श्रनुसार व्यवस्थित किया जा सके । हम ऐसे कहने वाले को प्यार 
करते हैं और उसका आदर करते हैं। वे अपनी बुद्धि के श्रनुसार बड़े ही 


सब २ र्‌ 0. -न्‍ 


भ्रच्छे व्यक्ति हैं। हम यह मानने के लिए तेयार हैं कि होमर कवियों में 
सर्वश्र ष्ठ है और सर्वप्रथम दुखान्त नाटकों को लिखने वाला है । परन्तु 
हमें एक विश्वास पर हृढ़ रहना चाहिए कि देवताग्रों की प्रशस्ति के रूप 
में और प्रसिद्ध व्यक्तियों की प्रशंसा के रूप में रची गई कविता ही ऐसी 
है, जिसे हम अपने राज्य में स्थान दे सकते हैं। कारण, यदि हमने इसके 
आगे जाकर मधुर कविता को, चाहे वह महाकाव्य हो या गीति काव्य, 
प्रवेश करने की श्रनुमति दी; तो इसका परिणाम यह होगा कि राज्य 
में से नियम शोर बुद्धि का राज्य उठ जायेगा | उसका संचालन, झानन्द 
और पीड़ा के आ्रधार पर होने लगेगा [! 

“यह बिलकुल ठीक है । 

“चू कि हम लोग पुनः कविता सम्बन्धी वार्तालाप पर ओा गये हैं; 
श्रतः तक से हमने जो पहले राज्य से उस कला को बहिष्कृत करने की 
बात सोची थी, जिसमें ये सब पग्रवृत्तियाँ हैं, कितना तको-पूर्ण था ! 
क्योंकि विवेक ने ही हमें ऐसा निर्णय देने के लिए बाध्य किया था । 
परन्तु डर है कि यह कला हम लोगों पर उज्जडता तथा विनय के अ्रभाव 
का लांछन लायेगी । झ्रत: हम लोग इससे नम्र निवेदन करें कि दर्शन 
और कविता में तो बहुत प्राचीन काल से ही लड़ाई चलती आरा रही है 
जिसके बहुत से प्रमाण मिले हैं। इसके बावजूद भी हमें प्यारे मित्र और 
प्रनुकरण शील सब कला बहनों को विश्वास दिलाते हैं कि यदि एक सुव्य- 
वस्थित राज्य में स्थान पाने की योग्यता का वे प्रमाण दे सकें, तो हम 
प्रसन्नतापूर्वकक: उनका स्वागत करेंगे। हम उनके आ्लाकर्षणों से अच्छी 
तरह परिचित हूँ; परन्तु इसके चलते हम सत्य का. परित्याग नहीं कर 
सकते | में कहने का साहस करता हुं कि उन पर मैं कितना मुग्ध हूं 


हक 7 हक 


उतना आप भी होंगे ! विशेषतः जब वह होमर के काव्य में उपस्थित है !! 

“हां, सचमुच मैं उस पर बहुत ही मुग्ध हूं ! 

“तब क्या मैं यह प्रस्ताव करू कि उसे देश में लौट भ्राने की 
अनुमति दे दी जाय । परन्तु एक ही शर्त पर कि वह अपने पक्ष की बका- 
लत गीत-काव्य में या किसी दूसरे छुन्द के माध्यम से करे | 

“हां, अवश्य | 

“और हम कविता के प्रेमियों और समर्थकों को, जिनकी कमी नहीं है, 
इसकी श्रनुमति दे दें कि वे गद्य में, इसके समर्थन में बातें कहे । वे लोग ' 
इतना ही नहीं प्रमाणित करें कि कविता केवल आनन्ददायक होती है, 
अपितु वे यह भी प्रमाणित करने की चेष्टा करें कि वह राज्य के लिए तथा 
मानव जीवन के लिए भी उपयोगी है। तब हम उनकी बातों को बहुत 
सहृदयतापूर्वक सुनेंगे । क्योंकि यदि यहु बात साबित हो जाय, तो हम 
लोग लाभ में ही रहेंगे। मतलब यह कि यह प्रमाणित हो जाय कि 
कविता में झ्ानन्ददायकता के साथ-साथ उपयोगिता भी है ! 

(हां, श्रवश्य; हम लोग श्रवश्य लाभ में रहेंगे ! 

“परन्तु यदि उसका पक्ष प्रमाणित नहीं होता, तब मेरे मित्र [ हमें 
उसका पक्ष छोड़ देना पड़ेगा | यद्यपि इसके लिए हमें कुछ कम कष्ट नहीं 
होगा । पहले देखा जाता है कि जब हम किसी चीज को प्यार करते हैं 
बाद में यह पता चलता है कि इस प्यार के कारण हमारे हितों में बाधा 
होती है तो हम उन्हें छोड़ देते हैं। हम लोगों के हृदय में भी कविता के 
लिए आदर के भाव हैं क्योंकि राज्य की शिक्षा ने हमारे हृदय में इस 
तरह के भाव भर दिये हैं; इसलिए हम चाहते हैं कि यह अपने 
सच्चे और सर्वश्रेष्ठ रूप में उपस्थित हो; परन्तु जब तक वह 


हल 2 अक 


श्रपने पक्ष का समर्थन नहीं कर पाती, तब तक उन लोगों का तर्क हमें 
प्रभावित करता रहेगा भोर हम लोग कविता के भधुर स्वर को सुनते 
हुए भी बार-बार श्रपने हृदय में यह बात कहते रहेंगे कि कविता के प्रेम 
में बच्चों की तरह न पड़े जिस प्रेम ने बहुतों को बन्दी बना कर रखा 
है । जो कुछ हो, हम अश्रच्छी तरह जानते हैं कि कविता के सम्बन्ध में हमने 
जिस तरह विचार किया है उसके अनुसार यह नहीं कहा जा सकता कि 
कविता सत्य की द्योतक है। जो कविता की बातों को सुने उसे सदा 
उसके बहकावे से बचना चाहिए और हम जो कह रहे हैं उसे ही सिद्धांत- 
वाद समभना चाहिये । 
“मैं श्रापकैे साथ पूर्ण रूप से सहमत हूं | 


“हां, यहां पर एक बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न उपस्थित है; यह जिस रूप 
में दिखाई पड़ता है, उससे भी भ्रधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि मनुष्य 
कैसा ही हो, भ्रच्छा या बुरा, यदि प्रतिष्ठा, धन, शक्ति तथा कविता के 
ब्रावेश में आकर व्यक्ति न्याय और गुणों की श्रवहेलना करे तो उसकी 
क्या दशा होगी ! द 

“हैं श्रापके तर्क से पूर्णा विश्वस्त हुं श्र मेरा विश्वास है कि 
कोई भी विश्वस्त होगा |” 

ऊपर प्लेटो के वार्तालाप का जो श्रनुवाद विस्तार परुर्वक दिया गया 
है, वह इसलिए कि पाइ्वात्य समालोचना साहित्य में यह प्रथम अवसर है 
जिसमें कविता के सम्बन्ध में व्यवस्थित रूप में जम कर बातें कहीं गई 
हैं। इसके पहले छुट-पुट बातें तो मिल जत्ती है, परन्तु गम्भीरतापूर्वक 
विचार नहीं किया गया है। अतः समालोचना के क्षेत्र का प्रथम वक्तव्य 
होने के कारण यह बहुत ही महत्वपूर्णा है. भ्ौर श्रागे चलकर इसके 


- शेश्३े - 


समर्थन या खण्डन में जो बातें कही गई है; इन्हों को लेकर समालोचना 
क्षेत्र का विकास हुआ है । विचारकों में यह प्रवाद प्रचलित है कि सारे 
यूरोपीय दर्शनशास्त्र का विकास प्लेटो के वक्तव्य पर की गई टिप्पणी 
तथा व्याख्या के सिवाय श्रौर कुछ नहीं है । 


प्लेटो के उपरोक्त कथन से कुछ बातें स्पष्ट हो जाती है; प्रथमतः 
तो उसका व्यवहारिक दृष्टिकोण; प्लेटो यहाँ पर एक आदर्श राज्य की 
सुरक्षा भर व्यवस्था की बात कर रहे थे और उसी के प्रसंग में कविता 
ध्ोर कवि की बात भी उठाई गई थी इसलिए एक व्यापक व्यवहारिक 
बात की छाया सारे वातावरण पर मंडराती सी दिखलाई पड़ती है। 
यही कारण है कि उन्होंने कला के तीन रूप उपस्यित्र किये हैं । 


एक वह जो किसी चीज का उपयोग करती है दूसरी वह जो बनाती 
है तीसरी वह जो अनुकरण करती है। 


इन तीमों में उन्होंने उपयोग करने वाली कला का अ्रधिक महत्त्व 
दिया है। परन्तु वह इतना कह कर ही नहीं रह गये हैं। उन्होंने यह 
भी कहा है कि कविता की उत्पत्ति माननीय श्रात्मा की जिस तह से 
होती है। वह बहुत ही निम्न स्तर का है (77796705 7७४ 07 #98 
807)) दूसरी बात यह है कि यह श्रोताग्रों को श्रशक्त बनाती है कारण 
कि इसके द्वारा भावेगों की पुष्टि होती है, जिनको नियन्त्रण में रखना 
मनुष्य के विकास के लिए बहुत ग्रावश्यक है | 


श्रतः हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि प्लेटों की तीव स्थापनाएं 
थी, एक कविता, प्रनुकरण का झनुकरण है। श्रतः सत्य की तीसरी श्रेणी 
पर है। दूसरी कि कविता की उत्पत्ति मानवीय आात्मा की नीची सीढ़ी 


« ररध + 


पर होती है। तीसरी कविता के श्रोताओ्रों के श्रावेगों को जगाकर उन्हें 
निःशक्त बनाती है। श्रतः हम देखते हैं कि यदि इन लान्छुनों से कविता 
की रक्षा करनी है तो हमें इन तीनों बातों का उत्तर देना होगा; कि कविता 
अनुकरण का अनुकरण नहीं है! कि कविता मानवीय श्रात्मा के बहुत 
ही सार्थक श्रौर महत्त्वपूर्ण स्तर पर जन्म लैती है श्रौर श्रत्त में यह भी 
दिखलाना पड़ेगा कि कविता एक क्षण श्रोताप्रों के श्रावेगों और भाषों 
को जगाती भले ही दीख पड़े, परन्तु श्रन्त में चलकर वह इन्हें शान्त ही 
करती है! इन तीनों बातों को अ्ररस्त ने प्रच्छी तरह दिखलाया है । 
पग्रतः हम श्रब प्ररस्त के सिद्धान्तों को देखेंगे । इस के द्वारा भ्ररसस्‍्तृ 
की बातों का ज्ञान तो होगा ही, प्लेटो के विचारों का भी स्पष्टीकरण 


होगा । 


- २१५ - 


साहत्य 
से 
साहित्यकार 





साहित्य के श्रध्ययन के लिए कितनी ही पद्धतियां प्रचलित हैं। कोई 
साहित्य पर ऐतिहासिक हष्टिकोश से विचार करता है-कोई सामाजिक से, 
कोई श्राथिक से, कोई साहित्यिक से, कोई मनोवेज्ञानिक से | सब के द्वारा 
हमें श्रालोच्य वस्तु के सत्स्वरूप के समभने में सहायता मिलती है, उसके 
छिपे पहलू पर प्रकाश की किरणों पड़ती हैं श्रोर वस्तु-विषयक ज्ञान की गह- 
राई में हम ज्यों-ज्यों पैठते जाते हैं हमारे ग्रानन्‍्द की अ्रभिवृद्धि होती है, चित्र 
का विस्तार होता है । चर्तेकी जब स्टेज पर भ्रपने तरल-गतित्व अद्भुसंचा- 
लन-चां चल्य से दर्शकों को मुग्ध करती हुई भ्राती है तो उस पर तरह-तरह 
के रंग-विरंगे प्रकाश की किरणों फेंकी जाती हैं। नत्त की भी वहौ है, 
उसके श्रद्धों की संचालन-गति में भी कोई अन्तर नहीं, वातावरण भी वही 
है पर प्रक्षिप्त प्रकाश के रंग-विभेद के कारण कितने छिपे रहस्य प्रकट 
होने लग जाते हैं, नई-नई बातें सामने श्राने लग जाती हैं झौर हमारे रसा- 
स्वादन में श्रपूर्व॑ समृद्धि श्रा जाती है। श्रपने ताल, लय श्रोर सुषमा के 
साथ वस्तु रचना पाठकों के सामने है,रचना वही है पर ऐतिहासिक (हष्टिकोण) 


ने रघुवंश, कुमार-संभव में ने जाने क्या-क्या रहस्य दिखला दिये। इतिहास 
ने रघु की द्विग्विजय को समुद्रगुप्त की विजय-यात्रा से मिला कर देखने 
की प्रेरणा दी तो सचमृुच्च हुद्य को श्राइचर्य-युक्त प्रसादन प्राप्त हुआ | 
उसी तरह श्रर्थ-शास्त्र, समाज-श्षास्त्र तथा काब्य-शास्त्र के भी हम कम 
कृतज्ञ नहीं है ; 


साहित्य के श्रध्ययन के इन विविध दृष्टिकोणों में एक जीवन वृत्ता- 
त्मक दृष्टिकोण भी है; जिसको श्र ग्रेजी के कुछ शब्दों के सहारे .8०60- 
00279[07000 [90776 07 एा०ए भी कह सकते हैं। इस में लेखक 
के जीवन वृत्तात्त के श्रालोक में उसके साहित्य के सत्स्वरूप को समभने 
की चेष्टा की जाती है। पहले लेखक या कवि के जीवन-बृत्त का श्रध्ययन 
किया जाता है, देखा जाता है कि किस परिवार में उसका जन्म हुमा, 
कैसी परिस्थितियों का उसे सामना करना पड़ा, उसकी श्रवस्था में क्या-क्या 
परिवर्तन हुए और इन परिवतंनों का प्रतिबिम्ब कहां तक उसकी कृत्तियों 
में अ्भिव्यक्त हुआ है। इसका श्रच्छा उदाहरण कबीर या सूर का साहित्य 
हो सकता है। कबीर का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जो चारों 
शोर से तिरस्कृत था, उनके जीवन के अ्रनुभव बड़े कद्ठु थे । श्रतः उनकी 
वाणी आक्रोशमयी हो गई, भाषा सीधे प्रहार करनेवाली हो गई, उनके 
सारे साहित्य में उनके हृदय की कट्रुता परिलक्षित होती है। सूर उच्च कुल 
में उत्पन्न हुए, उन्हें सामाजिक श्रपमाव का शिकार नहीं होना पड़ा । 
श्रतः उनकी वाणी की सौम्यता नष्ट नहीं होने पाई । 


इसी तरह केश्नव के काव्य की विशेषताओ्रों को, उनके आ्ाचार्यत्व को, 
उनके पात्रों की वाकचातुरी को, उनकी श्रलंकार-प्रियता को, केशव के 
राजसी वैभव तथा दरबारी जीवन से मिलाकर देखने की चेष्टा की गई 


5 है (७ अा 


है | श्रालोचकों ने कहा ही है कि केशव को सदा राज-दरबार में रहना 
पड़ता था, वहाँ के आ्राचार-विचार का सदा ध्याव रखना पड़ता था, वे 
जानते ये कि राज-दरबार में किस तहजीब से बातचीत की जाती है, वहां 
कृटर विरोधी से भी वार्तालाप के प्रसंग में एक मर्यादा का पालन करना 
पड़ता है। यही कारण है उनके श्र गद, रावण से वार्तालाप करते समय 
तुलसी के भ्रगद की भांति उच्छुड्डल नहीं हो गये हैं ! मर्यादा का ऋति- 
क्रमण नहीं कर गये हैं! उनकी भाषा में एक सभ्य शिषड्ट राजदूत का 
बांकपन है । 


साहित्य के अध्ययन पर, एक दूसरे ढंग से विचार करें तो तीन पद्धतियां 
हो सकती हैं। प्रथमतः तो यह कि हम बाह्य परिस्थितियों, उदाहरणार्थ, 
ऐतिहासिक, सामाजिक तथा राजनेतिक परिस्थितियों की श्रोर से साहित्य 
प्र विचार करें | हमारा दृष्टिकोण यह हो कि इन अमुक परिस्थितियों के 
कारण ही श्रमुक तरह के साहित्य की सृष्टि हो सकी है। इसमें सारी 
सूजन प्रक्रिया की बागडोर परिस्थितियों के ही हाथ में रहती है। वे ही 
सारथि हैं। दूसरी पद्धति यह है कि हम साहित्य के माध्यम से ही परिस्थि- 
तियों की ओर मांकें। कल्पना कीजिये कि प्रेमचंद-कालीन युग का इतिहास 
सर्वधा लुप्त हो गया है। कोई भी दूसरा साधन नहीं है, जिसके द्वारा 
हम उस समय की सांस्कृतिक, राजनेतिक श्रथवा सामाजिक परिस्थितियों 
का परिचय प्राप्त कर सकें । केवल प्रेमचंद का ही साहित्य, उनकी कहा- 
नियां तथा उपन्यास उपलब्ध है। यदि हम चाहें तो इन पुस्तकों के सहारे 
उस युग का एक श्रच्छा इतिहास तेयार कर सकते हैं, उस समय के राज- 
नैतिक तथा सामाजिक जीवन का चित्र तेयार कर सकते हैं । 


तीसरी पद्धति वह है जो किसी रचना पर विचार करते समय उसे 


0 5 कक 


सर्वृतंत्र स्वतन्त्र, निरपेक्ष, स्वत: पूर्ण रूप मे विचार करने की संस्तुति 
करती है। इसके भ्रनुपार किसी रचना को उसके रूप में ही न देखकर उसे 
श्रन्य श्रावान्तर बातों से सम्बद्ध कर देखना समस्या को और भी उलभा देना 
हैं। हमारा सारा ध्यान ७४४ पर, शब्दों पर केन्द्रित होना चाहिये | हम 
जब किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का मुल्यांकन करते हैं तो हमारा ध्यान 
व्यक्ति के विशुद्ध रूप पर ही रहता है। हम उसके परिवार की ओर तथा 
उसके जन्म के इतिहास की श्रोर नहीं देखने जाते । हम यह नहीं देखते 
कि यह व्यक्ति वेध पुत्र है या प्रवेध, धामिक रूप से अनुमोदित वैवाहिक 
सम्बन्धों से इसकी उत्पत्ति हुई है श्रथवा यह व्यक्ति कामोन्माद-जन्य 
स्वच्छुन्द सम्मेलन की उपज है। हमारे सामने व्यक्ति साक्षात्‌ रूप में 
उपस्थित है, उसके सारे कार्य कलाप हमारी श्रांखों के सामने हैं, हम इन्हीं 
बातों के आधार पर श्रपता मत निश्चित करेंगे। प्राजकल नई श्रालोचना 
( र७ए (78087 ) के नाम से जो श्रालोचना प्रचलित हो रही है 
वह यही करती है। यह सब कुछ छोड़कर रचना की श्रान्तरिक संगति 
([768779] 607880709) पर विचार करती है। 


इन तीन आलोचना पद्धतियों में से प्रथम पद्धति साहित्य-रचना से 
कुछ भयभीत सी मालूम पड़ती है। वह साहित्य से मेलजोल बढ़ाना तो 
चाहती है, उसे समभना भी चाहती है पर मत ही मन कुछ डरी सी 
. भी रहती है। अ्रतः सीधे उसके पास ने जाकर अपने साथ अनेक सहकारी 
मित्रों को भी ले लेती है। इतिहास, श्र्थज्ञास्त्र तथा नीति शास्त्र जितने 
भी सहायक हो सकते हैं और जिस किसी की भी सहायता उसे प्राप्त हो 
सकती है, उसे साथ लेकर पेंतरेबाजी करती हुई, ललकारती हुई साहित्य 
क्षेत्र में प्रवेश करती है। वहां पहुंचते हो उसकी यात्रा समाप्त हो जाती 


0 आह 


है | मानों वह मंजिले मकसूद पर पहुंच मई । दूसरी पद्धति ठीक इसके 
विपरीत है। प्रथम पद्धति की यांत्रा जहां समाप्त हो जाती है उसी स्थल 
से दूसरी पद्धति की यात्रा आारम्भ होती है । उसके चरण साहित्य के क्षेत्र 
में पहले से ही जमे रहते हैं। उसको ही 0886 बनाकर वह दूसरे क्षेत्रों की 
प्रोर अग्रसर होती है। पहली पद्धति दूसरे देशों से सेनिक संधि कर, उनकी 
सेना को लेकर साहित्य के क्षेत्र पर श्राक्ररणा करती है । दूसरी पद्धति 
दूसरे राष्ट्रों से सेनिक मेत्री नहीं करती । वह श्रपने ही देश की सारी 
शक्तियों को संगठित करती है, (/07860900707 की श्राज्ञा प्रचारित 
करती है, प्रत्येक योग्य तथा सक्षम नवयुवक को सेना में भर्ती करती है, 
उन्हें सैनिक शिक्षा देती है। इस तरह सुजज्जित हो, राष्ट्रीयता के भावों 
से उमगती हुई सेना को लेकर वह श्न्य क्षेत्र की श्रोर बढ़ती है, चाहे वह 
क्षेत्र इतिहास का हो, श्रर्थशास्त्र का हो, मनोविज्ञान का हो श्रथवा 
जीवनवृत्त का । 


पहली पद्धति दूर से चलकर साहित्य के क्षेत्र में ग्राकर विश्राम लेती 
है, दूसरी पद्धति साहित्य के क्षेत्र से चलकर दूर देश की यात्रा बरती है । 
तीसरी पद्धति इन दोनों से पृथक है। वह साहित्य क्षेत्र की है और उसी की 
होकर रहती है । वह अपने पुरे ध्यान को रचना की शब्दावली पर ही 
केन्द्रित करती है। वह न तो साहित्य के क्षेत्र में ही किसी विदेशी वस्तु 
को लाने की चेष्टा करती है श्रौर ने साहित्य को ही विदेश भ्रमण करने 
के लिए ले जाना चाहती है। वह कहती है कि हमें पश्रपने क्षेत्र को छोड़ 
कर इधर-उधर जाने की कोई जरूरत नहीं । यदि हम कहीं दूर देश से 
चल कर श्रायें भी हों, तो साहित्य के ग्रमुतकलश की एक घुठ से ही तृप्त 
होकर हम श्रन्य सारी बातों को भूल जाते हैं; या हमें भूल जानी चाहियें भर 


“ ओरेक ते 


इस तंरह श्रंन्य॑ बातों के ज्ञान का प्रश्त साहित्य के मृश्यांकन के समय उठता 


ही नहीं । 
गुचे हमारे दिल के इस बाग में खिंलेंगे । 


इस खाक से उठे हैं इस खाक में सिलेंगे | 


यह है, हमारी नईं झालोच ना ! 

इन तीनों पद्धतियों में से यहां हमारा सम्बन्ध है दूसरी पद्धति से; जो 
साहित्य के क्षेत्र में पांव जमा कर द्रसरे क्षेत्रों की ओर श्रागे बढ़ती है। 
हम यह देखना चाहते हैं कि हम कृति के प्राधार पर कृतिकार तक 
पहुंच सकते हैं या नहीं, उसके जीवनवृत्त का पुनरनतिर्माण कर सकते हैं या 
नहीं । कृतिकार के जीवनवृत्त की सीमा तो बहुत व्यापक हो जाती है, 
उसके व्यापकत्व के क्षेत्र में तत्कालीन राजनेतिक तथा सामाजिक इतिहास 
भी श्रा जाता है कारण कि जीवन की घठनाग्रों के स्वरूप निर्धारण में तो 
परिस्थितियों का हाथ अनिवार्यतः रहता ही है | परन्तु हम श्रपने को इतनी 
बड़ी परिधि के फैलाव में नहीं रखेंगे। हम अपने को मनोविज्ञान तक ही 
सीमित रखेंगे, उन्हीं घटनाओ्रों को लेंगे जिनका साक्षातूँ सम्बन्ध व्यक्ति के 
भानसतत्व, उसकी मानसिक प्रक्रिया से है अथवा जिन्हें सहज ही किसी 
भानसिक शक्ति के कारण-कार्य-म्ु खला में बेठाकर देखा जा सके | 


एक बार अलवर में राजस्थान साहित्य भ्रकादमी की उपनिषद्‌ में, हिन्दी 
के एक प्रमुख कथाकार जब उद्घाटन भाषण दे रहे थे, तो मैंने देखा कि 
श्रोतागणों में से कुछ लोग श्रपनी हथेलियों में कुछ पुष्पों को लेकर मंसल 
रहे थे, कुछ फूलों की पंखुड़ियों को छिन्च भिन्न कर रहे थे, कुछ लोग 
फूलों को उछाल रहे थे । इसी तरह भ्रनेक व्यक्ति भाषण श्रवण के साथ 
साथ प्रनेक तरह के व्यापारों में मस्त थे ; जिनका भाषण-भ्वण से कुछ 


“ रेरे१ - 


भी सम्बन्ध नहीं हो सकता था। पर ये क्रियायें कुछ ऐसे सहज ढ़ंग से 
हो रही थीं मानों उन श्रोताश्रों को इस श्रसंग्रति का प्राभाप्त मात्र भी न 
हो । मुझे तुरन्त कालिदास की पावती याद आई । 


एवं वादिनि देवों पितुः पार्शवे अधोमुखी । 
लीला-कमल-पत्राणि गणयामास पाती । 


श्र्थात्‌ जब देवषि नारद पाती के विवाह की चर्चा हिमालय से कर 
रहे थे तो उस समय श्रपने पिता के पाश्वे में खड़ी श्रधोमुखी पार्वती कमल 
की पंखुड़ियों को गिन रही थी। यहां पर लीला-कमल-पन्नों की गणना 
करना एक घटना है ! जीवन वृत्त है! घटना को सहज ही पार्वती के 
मनोविज्ञान के संदर्भ में देखा जा सकता है। एक मनोवैज्ञानिक सहज ही 
में पार्वती की जीवन-कथा को इस व्यापार से मिला कर देख सकता है । 
इसमें एलेक्ट्रा प्रन्थि, श्रथवा जितने भी 4)6667986 (७०४ 9शांछाए की 
बातें झाधुनिक मनोविज्ञान वेत्ताश्रों ने बताई हैं; उनका कच्चा चिट्ठा 
उधाड़ कर रख सकता था । 


बह पूछ सकता है कि पाव॑ती ने श्रपने को कमल की पंखुड़ियों की 
गणना तक ही क्‍यों सीमित रखा ? वह और कुछ भी तो कर सकती थी ? 
वहां से टल ही जाती; ऐसे अवसर पर कुमारियां ऐसा ही करती आई हैं । 
श्रथवा यदि वहां से टली नहीं तो पेर के श्रग्रूठों से धरती को कुरेदने भी 
लग सकती थी ? दांतों तले श्र गुली भी तो दबा सकती थी ? वह भोली 
भाली नहीं थी कि उसको कुछ ज्ञान भी नहीं था।. हमने देखा है उस 
तरुणार्कराग वस्त्र धारण करने वाली पुष्पस्तकावनम्रा को,संचारिणी पल्ल- 
विनी लता को, नितम्ब से त्रस्त होने वाली कनकदाम कांची को पुन पुनः 


35 0 


सम्भालता हुईं, श्रपने म्रुख के फेरे देने वाले प्रमरों को निवारण करती हुई 
विचित्र भाव भंगी से शंकर की पूजा करने जाने वाली पाव॑ती को ग्रतः 
एक मनोविज्ञान वेत्ता इसी घटना के सूत्र के सहारे पार्वती के जीवन-वबृत्त 
की कल्पना कर सकता है। वह कह सकता है कि एकबार पार्वती जब अपने 
पिता की पूजा के लिए उद्यान में पुष्प लाने गई तो उसने पुष्पष्तवकों पर 
अमर शोर भ्रमरियों को परस्पर अनुगमन करते देखा तो इतनी विभोर 
हो गईं कि पुष्पों को चुनना भूल गई, किसी श्रज्ञातावेश में मग्न हो बेठ 
गई | इधर हिमालय की पूजा के समय का श्रतिक्रमण होने लगा तो 
लोगों ने जाकर देखा कि पार्वती किसी पुष्पलता के नीचे भावमर्न श्रव- 
स्‍्था में बेठी है। यदि पार्वती के साथ यह घटना नहीं घटी हो तो कालि- 
दास के साथ ही सही । 


दुर्भाग्य से हमें कालिदास या पार्वती की विस्तृत जीवन कथा प्राप्त 
नहीं है। यदि प्राप्त होती और उनके जीवन की एक-एक घटना का पता 
होता तो हमें यह लीला-कमल-पत्र की गणना को वहां देख लेवा कठिन 
भी नहीं होता । पर ये लोग जो भाषण के समय तरह-तरह के व्यापारों 
में मग्न थे, उनकी जीवनी तो प्राप्त है। यदि प्राप्त नहीं है तो उसे प्राप्त 
किया जा सकता है। उन्हें विश्वास में लेकर उनसे बातें पूछी जा सकती 
हैं। यदि वे नहीं बताते हैं तो एक कुशल जासूस की तरह हम उसका पता 
लगा सकते हैं। यह सारा जीवन श्रभिव्यक्ति है। हम सब श्रपने को ग्रशि.- 
व्यक्त कर रहे हैं। कोई किसी तरह, कोई किसी तरह । कोई लिख कर 
प्रभिव्यक्त कर रहा है, तो कोई चोरी डकेती कर, तो कोई नेता या उप- 
देशक बन कर। गांधी भी श्रपने को अ्रभिव्यक्त कर रहे हैं, जिन्ना 
तथा भगर्तास॒ह भी; इन लोगों को व्यक्ति में पा लेना कंठिन नहीं है । 


« रेर३े३े - 


श्राप अपने जीवम में दो तरह के व्यक्तियों के सम्पर्क में श्राये होंगे । 
एक व्यक्ति है। बड़ा परिश्रमी है, जी तोडकर परिश्रम करता है, श्रपने 
लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ग्राकाश पाताल का कुलावा एक कर देता है | 
पर श्रपने क्ृतित्व तथा उपलब्धि से उसे कभी भी संतोष नहीं होता । 
उसके मन में सदा यह भावना बची रहती है कि संसार ने उसके परिश्रम 
तथा प्रतिभा का यथोचित सत्कार नहीं किया । उपेक्षा का डर उसके 
हुदय को सदा कचोटता रहता है। दूसरी शोर झाप ऐसे व्यक्तियों के 
सम्पक में भी प्राये होंगे जिन में अदभुत झात्म-विश्वास होता है। वे परि- 
श्रम नहीं करते, साधना का कष्ट उठाना उन्हें श्रच्छा नहीं लगता, पर 
साथ ही उनकी इच्छा यह होती है कि सफलता उनके पेर चूमे, उनकी 
इच्छा की पूि तुरत हो जाय; और उनकी इच्छा प्री भी होती है! 
प्रथवा जो कुछ भी उपलब्धि होती है, उसे ही वे इच्छा की पूर्ति मान 
लेते हैं !! 


यदि ग्राप मनोवेज्ञानिक हैं, मनुष्य के कार्यकलाप जो रूप धारण! 
कर लेते हैं, उनके 79608770 के निर्माण के मानसिक रहस्यों के ज्ञाता 
हैं, तो आप को कल्पता कर लेने में कोई भी कठिनाई नहीं होगी कि प्रथम 
मातृ-दग्धवंचित बालक है । जब वह बालक था तो इसे मातृ-हीन जीवन 
व्यतीत करना पड़ा था; श्रथवा यदि माता जीवित भीथीतो उसके 
स्तनों में दूध की कमी थी। बालक बिचारा दूध के लिये बहुत रोता था, 
हाथ पेर पटकता था, तब कहीं उसे थोड़ा दूध मिलता था। जो दूध 
मिलता भी था, उस में माता के स्तनों कीं उष्णता न थी,बोतल की ठंडक 
तथा निर्जीविता थी। श्राज भी वह 30#76-90%99ए ही बचा 
हुआ है । 


कक २ 5 धर व 


दूसरी और दूसरे व्यक्ति की कहानी दूसरी हो सकती है । वह स्वध्थ 
माता का पत्र था, माता के स्तनों में दुग्ध की धारा प्रवाहित होती रहती 
थी । जहां उसने संकेत किया कि दूध-भरे गर्म-गर्म स्तन उसके लिये उप- 
स्थित हैं, उसके लिए उसे जरा भी परिश्रम करने की श्रावश्यकता नहीं 
है। शभ्राज भी उसी तृप्त बालक की तरह वह व्यवहार कर रहा है। 
चाहता है कि सारी दुनियां उसके संकेतों पर नाचे, श्रौर दुनियां नाचती 
भी है | 


इस तरह के श्रध्ययन, श्र ग्रंजी साहित्य में बहुत उपस्थित किये गये 
हैं। राबर्ट लुई स्टेवेन्‍्सन की एक प्रसिद्ध पुस्तक है ॥97 ८&0०९०॥॥ 
शत 7 पर एत8, इसमें एक ऐसे व्यक्ति की कथा कही गई है, जो दुहरे 
व्यक्तित्व का था। एक व्यक्तित्व सम्य, सौम्प तथा मानवीय ग्॒खों से 
परिपूर्ण था, दूसरा छौतान था, राक्षस था, नारकीय क्ृत्यों का पुज । 
. जब एक दवा खा लेता था, तो दूसरे व्यक्तित्व की स्थापना हो जाती थी 
प्रौर पहला व्यक्तित्व तिरोहित हो जाता है। मनोवेज्ञानिकों ने कहा है, हो 
न हो स्टेवेन्‍स्सन की यह कथा उसके बाल्यकालीन जीवन की कथा से 
सम्बद्ध है; जिसने उसे श्रपत्ती कल्पना को इस ढंग से ढालने को प्र रित 
किया। स्टेवेन्सन को मां का दूध भर पेट पीने को नहीं मिला था, वह 
बराबर दूध के लिए तरसता रहा। यही कारण है कि उसके उपन्यास में 
प्रीतिभोजों और भोजन समारोहों के वर्णान की भरमार है। इस उपन्यास 
की मुख्य धुरी कोई पेय पदार्थ है, जिस पर कथा का चक्र घुमता रहता है । 
स्टेवेन्‍्सन श्रपने. बालकालीन प्रन्थियों से मुक्त नहीं हो सका है, शायद 
कोई भी नहीं हो सकता; और ग्राज भी अपनी मौखिक मांगों की पूर्ति 
प्रकारान्तर से कर रहा है। स्टेवेन्सन की जीवनी लेखकों ने पत्ता लगा केर 


“ बेरेश + 


देखा है कि मनोवेज्ञानिकों के द्वारा सुभाई गई ये बातें गलत नहीं | जब 
वह बालक था तो उसकी मां एक डायरी रखती थी जिसमें उल्लिखित 
ब्रातों से इन बातों का समर्थन होता है । 


शेक्सपियर का जगविख्यात दुःखांत नाटक 'हैमलेट” की कहानी प्रसिद्ध 
है। अपने पिता की हत्या करने वाले व्यक्ति से बदला लेने के लिए तथा 
उसके वध करने के लिए हैमलेट प्रतिश्र त है। चाहता है कि किसी तरह 
वह पितृहन्ता की हत्या कर डाले। पर फिर भी उस पर कुछ ऐसी लाचारी 
है कि वह श्रपनी श्रतिज्ञा को पूरी नहीं कर पाता। कोई ऐसी श्रहृश्य 
शक्ति है जो उसे ऐसा करने से रोकती है। ऐसा क्‍यों है ? इसके विरोधा- 
भास के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए श्रनेक व्यास्यायें दी गई हैं। कुछ 
लोगों का विचार है कि हैमलेट बेसे व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है 
जिसकी बोद्धिकता क्रियात्मक शक्ति को चर गई है भ्रर्थात्‌ कुछ ऐसे व्यक्ति 
होते हैं जो चित्तन में इस तरह डबे रहते हैं कि काम करने की उनकी 
शक्ति जाती रहती है। हैमलेट ऐसा ही व्यक्ति है | दूसरा सिद्धान्त यह है 
कि इस नाटक में, शेक्सपियर ने मनोविकार-ग्रस्त तथा संकल्पहीन व्यक्ति 
का चित्रण किया है जिसे न्यूरेसथेनिया का रोग है। ऐसे ही “मुण्डे-मुण्डे 
मतिभिन्ता' की तरह, जितने वि्वारक उतने हो मत । 


परन्तु सबसे विचित्र, पर विश्वासोत्पादक मत मनोवैज्ञामिक श्रध्ययन 
करने वालों का है। उनका कहना है कि यह कहना कि हैमलेट मनो- 
विकार.ग्रस्त तथा संकल्पहीन न्यूरेस्थेनिक व्यक्ति है सत्य का अ्रपलाप है, 
क्योंकि इस सिद्धांत का समर्थन हेमलेट के प्रन्य क्रियाकलापों से नहीं होता। 
हैमलेट निशचेष्ट भ्रकर्मण्य व्यक्ति नहीं हे, क्योंकि अवसर श्राने पर दो-दो 
तीन-तीन व्यक्तियों की हत्या करने में उसे जरा भी हिचक नहीं । तब क्‍या 


- २३६ - 


कारण है कि वह यहीं पर कच्चा पड़ जाता है। पिता की यृतात्मा ने 
हैमलेट को अपने ह॒त्याकारी से प्रतिशोध लेने की शपथ दिलाई है। इस 
पर भी वह कार्य पूरा नहीं कर सकता तो एक मात्र कारण यही हे कि 
इस कार्य का रूप ही कुछ ऐसा था, जिसे वह कर नहीं सकता थी। जिस 
व्यक्ति ने उसके पिता की हत्या की और उसकी मां के साथ विवाह कर 
वह मां के साथ उसी रूप में संबद्ध हो गया जिस रूप में उसका पिता था; 
उसकी हत्या न करने में उसे कोई न कोई श्रान्तरिक विवशता थी । 


यदि इडिपस ग्रन्थि वाले सिद्धांत के टर्मूस में विचार किया जाय तो 
पता चलेगा कि पिता के हृत्याकारी ने, उसकी बाल्यकालीन प्रच्छन्त इच्छा 
की पूति की है । बाल्यकालीन अवस्था में वह अ्रपने पिता को मातृप्र मं 
के प्रतिदवन्दी के रूप में देखता था, समभता था कि वह पिता माता की 
प्रे मोपलब्धि में बाधक है | श्रतः उसको किसी न किमी तरह यहां तक कि 
हत्या के द्वारा भी अपने मार्ग से हटा देना चाहिये। ग्राज एक दूसरे व्यक्ति ने 
प्रकारान्तर से उसकी ही इच्छा की पूति की है तो उसके विरोध में उसकी 
हत्या को बांह केसे उठे भला। ग्रतः यहां हम शैक्सपियर श्रर्थात्‌ हैमलेट 
के निर्माणकर्ता के मनोविज्ञान के सीधे सम्पर्क में श्राते हैं। हम यह देखते 
हैं कि हैमलेट की रचना शेक्सपियर के पिता की मृत्यु के दिनों के समीप 
हुई है भ्र्थात्‌ उन दिनों में जब वह अपने पिता की चेत्यिक क्रिया से 
निवृत्त भी नहीं हुआ था। यह एक ऐसा श्रवसर है जब कि पिता के 
सम्बन्ध को लेकर हमारे मस्तिष्क में जितनी श्रज्ञात शक्तियां या प्रे रणायें 
होती हैं वे सक्रिय हो जाती है । मेकबेथ के निर्माण का आ्राधार भी हैम- 
लेट की तरह संतानहीनता ही है। यह भी जानी हुई बात है कि शेक्स- 
पियर का एक पुत्र था जो बाल्यकाल में ही मर गया था। उसका नाम 


- २३७ « 


हैमनेट था । हैमनेट और हैमलेट में कितनी समानता है। श्रतः शैक्सपियर 
की जीवनी से प्राप्त मनोविज्ञान का प्रतिबिम्ब स्पष्टतः उसकी रचनाओं 
में दीख पड़ता है। वे पारस्परिक सहयोग से एक दूसरे की सहायता कर 
रहे हैं। कालिदास के शब्दों में 'अन्योन्य-शोभा-जननादू व भूव 
साधारणो भूषण भूष्य भावः ।” 


प्राचीन काल के लेखकों की विशुद्ध जीवनी का पता लगाना कठिन 
है। लोगों में ऐतिहासिक बुद्धि का इतना विकास नहीं हो सका था| ग्रतः 
उनकी कृतियों के आधार पर उनके जीवनवृत्त के ॥?9600877 की खोज 
तो की जा सकती है। पर हमारे सामने कोई ठोस श्राधार नहीं है जिसके 
सहारे उनकी सत्यता की जांच की जा सके । पहले तो सब महान आ्रात्मा- 
भ्रों की जीवनी का ढांचा एक ही तरह का होता था। महावीर भ्ौर बुद्ध 
का जीवनवृत्त एक ही तरह का है । बचपन से ही उनमें प्रतिभा के बीज 
परिलक्षित होने लगते हैं। कुछ संत प्रारम्भ में घोर कामासक्ति के शिकार 
रहेंगे । बाद में किसी महात्मा के सम्पर्क से श्रथवा किसी प्रभावशाली 
घटना सें उनके हुदय में ऐसी प्रतिक्रिया होगी कि उनके जीवन का प्रवाह 
ही बदल जायेगा । 


पर अब परिस्थितियों में परिवर्तन श्राया है। लोगों के विस्तृत जीवन 
वृत्त की कथा को सुरक्षित रखने की श्रोर लोगों का ध्यान गया है । 
न्यूयार्क के हाइड पार्क में एक पूरा पुस्तकालय ही है जिसमें #+छ7 रत 
20|७70 .00089ए8)/ की जीवनी तथा उसके समय से सम्बन्धित 
सामग्री भरी पड़ी है। चचिल वगेरह ने स्वयं ही अपने बृहद्‌ संस्मरण 
लिखे हैं पर फिर भी उनके जीवन पर प्रकाश डालने वाली इतनी सामग्री 
उपलब्ध है कि उसे भी रखने के लिए एक बहुत बड़े पुस्तकालय की 


व २ शेप ० 


श्रावश्यकता पड़ेगी । ऐसी अवस्था में लेखकों के साहित्य की राह से होकर 
उनके जीवनवृत्त की शोर बढ़ना उतना भयावह नहीं है। मनोविज्ञाव से जो 
कुछ संकेत मिलें दूसरे साधनों के द्वारा उनकी सत्यता की परीक्षा की जा 
सकती है । शत 


जब मैं “आझाधुनिक हिन्दी साहित्य और मनोविज्ञान” नामक शोध 
प्रबंध के लिए सामग्री एकत्र कर रहा था तो मेरे पृज्य निरीक्षक आ्राचार्य 
प्रवर डॉ० लक्ष्मीसागर वाष्णेय जी ने सुझाव दिया था कि कथाकारों की 
रचनाप्रों के श्राधार पर उनके मनोविज्ञान का अ्रध्ययन किया जाय । 
मतलब यह कि हमारा दृष्टिकोण एक मनोविश्लेषक का हो जो अपने 
रोगियों के विकार के मुलोदगम का पता लगाने के लिए उनकी क्रियाक्रों 
का, व्यवहा रों का, श्र ग संचालन का, भूलों का, जीभ की फिसलन का, 
उनके स्वप्नों का सूक्ष्म अध्ययन करता है, मुक्त श्रासंग वाली पद्धति से 
उपलब्ध बातों पर विचार करता है, और प्तब की संगति बैठाकर अपना 
मत निश्चित करता है । उसी तरह हम कथाकार की कृति को इस तरह 
देखें मानों वह कथाकार के श्रभ्यंतर में काम करने वाली प्रेरणा का 
पृ जीभृत रूप हो । ऐसा मानकर हम उस प्रेरणा के भूलस्वरूप को 
पहचानने में समर्थ हो सकते हैं । मेघदूत में यक्ष ने मेघ से हिमालय का 
वर्गान करते हुए कहा है । 
श्र गोच्छाये: कुमुदविशदेयों बितत्य स्थितः खं 
राशीभूतः प्रतिदिनमिब अ्यम्बकस्याट्रहास्य: | 


“जिसके उज्ज्वल शिखर ग्राकाश में इस तरह फेले हुए हों मानों 
दिन-दिन एकत्र किया हुआ शिवजी का अट्टह्ास हो ।” मेघ ने, कहिये कवि 


“ शेरे६ ८ 


ने पर्वत की क्शाल उज्ज्वल अश्र लिह चोटियों को देखा । यह कथाकार 
का विशाल उपन्यास है। उसे देखकर कबि को कल्पना में तत्परत्व 
जागरित हुआ । उसने उडान भर कर देखा कि श्ररे यह जो बड़ासा 
हिमालय दीख पड़ता है, ठोसू पत्थर का पु'ज, निस्सीम, वह तो कुछ नहीं, 
शिव के देनिक अश्रदृहास की राशिमात्र हैं। उसी तरह आलोचक को मनो- 
विज्ञान बतला सकता है कि कथाकार के वृह॒द-काय उपन्यासों के स्वरूप 
को संगठित करने व।ली एक मानस की ग्रन्धि है जो उसके बचपन में किस 
घटना के कारण बन गई हो और वह झाज भी लेखक को ब्रपती श्रभि- 
व्यक्ति के लिए बेताव करती रही हो । 


| 


इस तरह कृति के सहारे कृतिकार के मनोविज्ञान के श्रध्ययच का 
प्रयत्न यहां किया जायेगा। श्रर्थात्‌ यहां पर हमें मनोविश्लेषक बन जाना 
पड़ेगा । मनोविश्लेषक झौर साहित्यिक मवोवेज्ञानिक का कार्य बहुत हद 
तक समान है, एक तरह का हैं । दोनों के पास ७090]७७ की जीवन 
प्रतीक सामग्री है। मनोविश्लेषक के सामने स्वप्त हैं, भूलें है, रहन-सहन 
का ढंग है, इत्यादि | साहित्य-मनोविज्ञान के सामने विशाल रखना समूह 
है । परन्तु श्रन्तर केवल इतना ही है कि साहित्य के सामने जो सामग्री है 
वह मृत है, निर्जीव है, प्रश्त करने पर बोल चहों सकती | पर मनों- 
विश्लेषक के सामने शांत वातावरण में श्रारामदेह सोफे पर पड़ा हुप्रा 
जीवित व्यक्ति है जो हर तरह से सहायक हो सकता है। इतने से श्रन्सर 
को छोड़कर दोनों का करतंव्य करीब-करीब एक सा ही है और दोनों को 
एक ही तरह सामग्री तथा पद्धति से काम लेना पड़ता है। 


परन्तु इस तरह के प्रयत्न की श्रोर अग्रसर होने के पहले यह देख 
लिया जाय कि और लोगों ने इस तरह के प्रयत्न किये गये हैं या नहीं । 


अमतक र्‌ है. हूँ. धान 


श्ौर यदि किये है तो उनका क्या परिशाम हुआ ? हिंदी में तो इस 
तरह का प्रयत्न हुआ नहीं; “जीविवकवेराशयो न वक्तव्य:” कहकर इस 
तरह के प्रयास के मूल पर ही कुठाराधात कर दिया गया है। पर यह्‌ 
बात प्राजकल की मान्यता से, विशेषतः जिस तरह को अध्ययन-पद्धति की 
चर्चा होरहों है, उससे एकदम विपरीत है । कारण कि इस तरह के प्रथाश्व 
से जो तथ्य उपलब्ध हों उनकी सत्यता की जांच के लिए दो बातें 
आवश्यक हैं ; प्रथमतः तो कवि जीवित हो, तभी तो वह श्रपने सम्बन्ध 
में कही गई बातों के बारे में कुछ अधिकार पृर्वक कह सकेगा अ्रथवा 
उस से कहलाया जा सकेगा ; यदि जीवित नहीं है, तो दूसरा उपाय यह है 
कि उनके जीवन से सम्बन्धित विपुल सामग्री प्राप्त हो। ये दोनों बातें 
हिन्दी में मोजूद नहीं । मौजूद नहीं हैं, इस बात को गलत ढंग से नहीं 
समझा जाय । मैं यह कह ही केसे सकता हूं कि आज हिन्दी साहित्य में कोई 
भी कथाकार या कवि जीवित नहीं है । कहने का भर्थ केवल यह है कि बहुत 
कम ऐसे साहसी, निर्भीक और स्पष्ट (7७77) साहित्यिक हैं, जो अपने को 
मनो विश्लेषण की कसौदी पर कसे जाने में सहयोग दे सकें । पर अ्रग्नोजी 
में इस तरह के अनेक श्रध्ययन प्राप्त हैं। उनमें एक को मैं यहां लू गा । 


4608 686! ने अ्रपनी छोटी पुस्तक 4 ,॥8/87ए४ 37087७0॥5 
में ४४7७ (४७087 के उपन्यास ।089 ४/0४8807'8 +0घ88 को 
मेकर इस तरह के भ्रव्ययन का प्रयत्न किया है | इसमें [?/0/2880./ 55 
7४॥067 की कथा है। ये एक ख्याति प्राप्त प्रोफेसर हैं। अध्यापक रूप 
में इन्ट्रोंने पर्याप्त यश अ्रजित किया । लक्ष्मी की भी इन पर कृपा रहीं। 
ग्रभी हाल ही में इन्हें अपनी एक महत्वपूर्ण रचना पर पुरस्कार प्राप्त 
हुआ धोर इन्होंने श्रपत्री पुत्री तथा पत्नी की अ्सन्नता के लिए एक सुन्दर 


“ रेड - 


मकान बनवाया है । इनकी पुत्री +0080&77074 का विवाह एक चुस्त 
दुरुस्त चलते पुर्जे तथा प्रदर्शनप्रिय 4,0पां8 ॥/978878 नामक नवयुवक 
से हुआ है। रोजामण्ड के प्रेमी तथा प्रोफेसर के एक शिष्य |070 0पौ- 
9870 के आविष्कार का प्रधोग अपने व्यापार की उन्नति के लिए करके, 
इसने परिवार की समृद्धि में योग दिया है। पर प्रोफेसर को इन लोगों के 
ग्राधिभौतिक दृष्टिकोण से सनन्‍्तोष नहीं और वह दिन प्रति दिन इन लोगों 
से कट कर मनता प्रलग पड़ता जाता है। उसका परिवार उसके हृदय के 
भावात्मक ब्रश को संतुष्ट नहीं कर पाता। अ्रतः वह अपने पुराने मकान 
को जहां उसने जीवन के २५ वर्ष व्यत्ोत किये हैं, छोड़ना नहीं चाहता 
झौर यदि छोड़ता भी है, तो नये मकान की एक कोठरी में सबसे भ्रलग रह 
कर ही जीवन-यापन करता है । कहने का श्र्थ यह है कि धन-धान्य पुत्र 
कलत्र सब तरह से भरे-पूरे रहने पर भी उसे सन्तोष नहीं, एक अभाव की 
पीड़ा उसे कचोढती रहतो है । 


पुस्तक के दूसरे भाग मैं प्रोफेसर के प्रिय शिष्य 400 (एव 
की कथा कही गई है । इस कहानी का प्रमुख श्रश् वह है जहां पर 0पएक- 
]8700 अपने ह00087ए नामक एक मित्र के सहयोग से मेक्सिको के 
पर्वतीय प्रदेश में एक ग्रफा को खोज निकालता है जिसमें कुछ अश्राधुनिक 
सभ्यता से अछूदी वन्य जातियां निवास करतीं हैं। यहां का जीवन 
ग्रादिम ढंग का पर साथ ही जटिल भी था। यहां पर उसने कुछ ऐसे 
बर्तन पाये जो पुरातत्त्व की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं। इसी तरह की 
प्रमेक सामग्रियों के नमूने लेकर वह वाशिंगटन झ्राया श्र श्रधिकारियों से 
मिलकर इन महत्वपूर्ण वस्तुओं की ओर उनका ध्यान ग्राकषित करना 
घाहा । पर वहां की लाल फीताशाही तथा भ्रधिकारियों के ठंडे, रूखे 


ल्‍- रे इ ० 


तथा उदासोन व्यवहार से बड़ी निराशा हुईं । इस तरह निराध्य होकर जब 
बह पुनः उस पर्वत स्थान को लौठता है, तो पाता है कि उसके साथी ने 
जर्मन पुरातत्त्व प्रेमी के हाथों श्रच्छे मूल्य पर उन-सब सामग्रियों को बेच 
दिया और सारी धन-राशि को अपने मित्र 07070 के नाम से बैंक 
में जमा कर दिया है। मित्र तो सदुभावना से प्रेरित था और उसने मन 
में यही सोचा था कि वहु ()पघ७7०० के हित की दृष्टि से ही यह सब 
व्यापार कर रहा है। पर 0प)9700 ने इसको विश्वासधात के रूप में 
ग्रहशा किया, क्रोध में आकर अपने मित्र से सारे सम्बन्ध विच्छेंद कर 
लिये और एकान्तवास करने के लिए उसी उच्च शिवरस्थ ग्रुंफा में चला 
गया । वहां रह कर अपने सारे साहसिक क्रिया-कलापों को लिपिबद्ध किया। 
कुछ दिनों के बाद वह पर्वत से उतर आ्राया, बेंक से रुपये निकाले, कालेज 
में जाकर अश्रध्ययन करने लगा और बहीं पर उसकी प्रोफेसर से घुलाकात 
हुई, जो उसका ग्रुरु तथा पयप्रदर्शंक बना । 


तृतीय भाग में पुनः प्रोफेसर की कहानी कही गई है। श्रकेले, उदा- 
स, निस्तैज, मुर्दादिल वह कोठरी में जीवन व्यत्तीत कर रहा है । उसके 
परिवार के श्नन्‍्य सदस्य श्रीष्म ऋतु बिताने के लिए कहीं बाहर भये हैं। 
एक दिन नींद के टूटने पर वह पाता है कि घूयें से सारा कमरा भर गया 
है और उसका दम घुट रहा है पर उठकर खिड़कियों को खोलने में प्रपने 
को वह श्रसमर्थ पा रहा है कि शुद्ध वायु का संचार हो सके । मानी 
उसमें जीवित रहने की इच्छा का ही श्रभाव हो गया हो। भाग्यवश्ष 
उसकी नौकरानी ठीक समय पर श्रा जाती है और प्रोफेसर के प्राणों की 
रक्षा करती है। यहीं उपन्यास की समाप्ति होती है । 


इस उपन्यास का विवेचन तीन स्तर पर किया जा सकता है । साहित्य 


“ अह्ुके + 


के इतर पर, मनोविश्लेषण के स्तर पर तथा अ्रात्मकथा के स्तर पर | 
साथ ही यह भी देखना होगा कि इन तीनों ह्तर पर से की गई शालो- 
चताओं में कहाँ तक पारस्परिक संगति हैं ॥ 


कुँछ लोगों ने इस उपन्यास पर साहित्यिक भ्रथवा कलात्मक हृष्टि से 
विचार किया है | कलात्मक हृष्टि की प्रमुख समस्या यह होती है कि 
ग्रानोच्य वस्तु के मिन्न भिन्न भागों में कहां तक परस्परान्विति के तत्व 
वर्शमान हैं ध्ौर वे सब मिलकर कहां तक संगठित पूर्णता का झ्राभास देते 
हैं। यदि श्रायाततः आलोच्य वस्तु के भिन्न-भिन्न श्रश संगठित से नहीं 
देख पड़ते तो कला के श्रालोचक का यह प्रयत्न होता है कि उसमें कोई 
ऐसा भिन्‍्दु ढू ढे, जिस स्थान पर खड़े होकर देखने से, वस्तु के कलात्मक 
ऐक्य को ठीक से देखा जा सके | कला वा पारखी यह मानकर चलता है 
कि हमारे पास जो वस्तु उपस्थित है वह यों ही नहीं परन्तु किसी सृजना. 
समक ज्ेरणा के परिशामस्वरूप अस्तित्व में आई है । श्रतः इसमें कोई ऐसा 
संयोजक- तत्व अवश्य है जिसने सारे भ्रवयवों को एक संगठन में आ्राव्नद्ध 
कर रखा हैं। उसे ढ ढवा होगा और तब तक हु ढना होगा, जब तक वह 
हुए तरफ से निराश न हो जाय । वह स्ृष्टा को 327०7 ता ते? 
देते के लिए सदा तेयार रहता है। वह प्रयत्नपुदंक रचना के उस शीर्प- 
स्थल पर पाठकों का ध्यास श्राकृषित करता जिसकी ऊंचाई परसे देखने पर 
प्रसंबद्ध सें दोख पड़ते वाने श्रश भी मीचे होकर दीख पड़ने लगें । 


इस उपन्‍्यास के पाठक की सुझ्य कठियाई यह है कि इसमें श्राई हुई 
कथाग्रों में संगठन के तत्व दीख नहीं पड़ते । पहले भाग में प्रफेतर के 
पाश्विरिक जीवन की कथा है, दूसरे में ():0/७8700 की कथा थ्रा जाती 


५ श्र कि 


है। तीसरे भाग में पुनः अफरेसर की कथा श्रा जाती है जो मरते-मरते 
बचता है। सारे उपन्यास में एक व्यापक सदित्व चाडिए, जिसके व्यापकत्व 
की सीमा में सारी वस्तुएं यथास्थानावस्थिति की धारणा उत्पन्न कर 
सकें । प्रोफेसर ब्राउन ते पाठकों का ध्यान इस बात की ओर श्राउषित 
किया है कि यदि हम गृह के प्रतीकात्मक स्वरूप को ध्यान में रखें तो 
सारी प्रसंगतियां दूर हो जाती हैं। प्रोफेसर के पास दो भ्रृह् हैं, एक पुराना 
प्रौर इसरा तया । पुराना ग्रह उसके लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह उसके 
जीवन सम्बन्धी प्राध्यात्मिक मुल्यों का प्रतिनिधित्व करता है । नया ग्रह 
तुच्छ है क्योंकि इसकी नींव श्राधिभोतिकता पर है श्रोर इस तरह उसके 
जीवनव्यापी स्वप्नों पर कुठाराधात है । उसका शिष्य जिस पार्वत्य शुफा 
का पता लगाता है उसके साथ भी प्रफेसर को सहानुभूति है, कारण कि 
यह मानवता के वास्तविक गौरव तथा प्राध्यात्मिक शुल्यों का ही 
प्रतीक है । 


तीसरे भाग में आकर इन ग्रहों को लेकर जो मानसिक संघर्ष चल 
रहा है उसका स्त्ररूप स्पष्ठ है और उपन्यास की कलात्मकता स्पष्ट होती है। 
प्रथम भाग मैं प्रोफेसर के हृदय में नये गृह के प्रति जो एक श्रनिच्छा है, 
विरक्ति है, ओदासीन्‍न्य है, वह स्पष्ट है। तीसरे भाग के प्रारम्भ में यह 
बात स्पष्ट हो जाती है कि परिवर्ततशील परित्यितियों के कारण उसके 
लिये पुराने गृह में रहना सम्भव नहीं, उसे समय के साथ बदलना पड़ेगा ; 
वह बदलता भी है। पर बाद में ऐसा लगता है कि उसका विकास रुक 
गया है, उसके व्यक्तित्व में नुतन वायु का संचार होता रक गया है और 
बह फिर से अपने बाल्यकालीन जीवन ( पुराने गृह ) की और प्रत्यावतव 
करने के लिए प्रेरित हो रहा है। भविष्य उसके लिए रुक गया है और 


सकल ५ श प्‌ ५. अमल 5 


बह भूत, भृत्यु अर्थात्‌ श्रपने तृतीय ग्रृह के लिए तेयारी कर रहा है । 


ग़ह की प्रतीकात्मकता की झ्ोर हपारा ध्याव आराकषित कर और प्रोफेसर 
की मानसिक क्रियाप्रों के स्वरूप का रहस्योद्घाटन कर, ब्राउन ने उपन्यास 
के कलात्मक ऐक्य सूत्र को सफलतापूवंक खोजवर पुस्तक के साहित्यिक यहुत्त्व 
को बतलाया है और श्रब इतना हो गया है कि इसके चलते पुस्तक के रसा- 
स्वादन में पठक को सहायता मिली है। पर इस झ्रालोचना से एक बात 
को समभने में कुछ भी सहायता नहीं मिलती । प्रोफेवर पीटर के विषाद 
प्रसन्‍्तोष श्रवसन्‍्नता तथा खिन्तता का कारण क्या है ? वह हर तरह से 
पूर्ण है, लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की उस पर कृपा है, उसकी सन्‍्तान 
हर तरह से फल-फून रही हैं। स्वयं प्रोफेसर ने भी क्रितनी ही महत्त्वपूर्ण 
पुस्तकों की रचना कर, अपार यज्ञ का अर्जन किया है। तब उसे किस 
बात की कमी है, जो उसे बेचेन किये रहती है | 


चलें मनोविश्लेषण के पास, शायद वहु इस प्रश्न को लेकर इस पर 
कुछ प्रकाश डाल सके । वह कहानी को ध्यानपूर्वक्र सुनकर कहेगा; इसमें 
हमें एक ही सूत्र हाथ लगता है, जिसके सहारे हम प्रोफेनर के आ्रान्तरिक 
गोपनीय रहस्यों का कुछ-कुछ पता चला सकते हैं। सारी कथा में प्रोफे- 
सर साहब के गृह-प्रेम की प्रमुखता छाई हुई है श्रपते पुराने वाले घर में वह 
सब से ऊपर वाली कोठरी में रहता है। उस का सारा परिवार नीचे रहता 
है। वह अपने परिवार वालों से एकदम अलग सा ही है । कभी-कभी ही 
इन दोनों में सम्पर्क होता है। मनुष्य जिस स्थान पर बहुत दिलों से रहता 
है, उससे प्र मे हो जाना भ्रस्वाभाविक नहीं । परल्तु प्रोफेसर के गृह-प्र मे 
में ऐसा श्रातिशय्य है, प्रगाढता है, विवशता है कि वह सनोविकार की 
सीमा को छू रहा है और हमें अपने भीतर के इतिहास की श्रोर भांकते 


के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि प्रोफेसर श्रपत्रे अध्ययन तथा साहित्यिक 
सृजन के लिए थोड़ा सा एकान्त चाहता है, तो कोई असाधारण बात नहीं, 
सभी ऐसा चाहते हैं। परन्तु उनके व्यवहार में एक विचित्रता है। वह 
प्रलग “भी रहता है, पर साथ ही साथ अपने परिवार 'वालों को सेवाग्रों 
पर अधिकार का दावा भी करता है। चाहता है कि वे उसके सुख-सोविध्य 
का ध्यान रखें, उसकी देख-रेख करें, भोजन का ध्यान रखे। यदि इस 
तरह के व्यक्ति के मनोविज्ञान पर ध्यान दें, तो पता चलेगा कि उसकी 
मानसिक प्रक्रिया बच्चे की तरह है--वह बच्चा जो अपने को अपनी मां और 
उसके स्तन का एक मात्र स्वामी समभता है; उसका इच्छानुसार उपभोग 
कर सकता है, पर इसके लिए उसे किसी तरह का प्रतिदान भी करना है, 
इसकी कोई बाध्यता नहीं समझता । उसकी कोठरी उसकी मां के गर्भ 
की तरह है जिसके श्ञांत, शीतोष्ण वातावरण में बाह्य संसार से दूर, 
प्रनुत्तरदायी, गर्भरथ बालक की तरह अपने को सुरक्षित समभता है। 


उस कोठरी में एक बृद्धा नौकरानी भी रहती है | साथ ही दो मूर्तियां 
भी हैं--एक नारी मूर्ति, ऐसी कि श्रद्धा के भाव उत्पन्न करती है, दूसरी में 
शारीरिक सौन्दर्य तथा ग्राकर्षण की प्रधानता है। नौकरानी तो माता का 
प्रतीक है। मनोवेज्ञानिक दृष्टि से माता के दो रूप होते हैं, एक में बह 
हमारी सुरक्षिका है और दूसरे में वह काम भाव का*“आधार होती है । ये 
दोनों मूतियां मानों माता के दोनों रूप का प्रतिनिधित्व करती हैं श्रर्थात्‌ 
प्रपनी एकान्त कोठ5री में मां अपने दोनों रूपों के साथ उपस्थित है । 


दूसरे भाग में ()०४७४त०ें की जो कथा कही गई है वह भी मनोवैज्ञा- 
निक हृष्टि से इसी से मिलतो-बुलती है। नायक पर्वत के उच्च शिखर पर 


के चर चुछु >- 


गुफा की खोज करने में सफल होता है। श्रुफा नारी का श्रतीक है-उसकी 
मां का जो उसकी दृष्टि में कुमारी है। वहां मिट्टी के पुराने वतव प्राप्त 
करता है ; ये बर्तन भी नारी के प्रतीक है। उसका जो साथी वर्तनों को 
बेच देता है वह उस भाई या पिता का प्रतीक है; जो उसकी मां के प्र मे 
का प्रतिदन्दी है। 0४४०७१॥४९ श्रपने साथी से ऋलग (कर अकेला उस 
गुफा में चला जाता है, जहां कुछ दिन रह कर अपनी सारी साह्िक 
कथाग्ओं को लिपिवद्ध करता है। ध्यान से देखने पर पता चलेगा कि यह 
भी उसके मातुप्रे म का ही प्रतीक है; जिसे वह रवस्पेश स्वतःत्र होकर 
उपभोग करना चाहता है । 


जब अफेसर नये गृह में झाता है तो, उपन्यास में कहा गया है कि 
वह नीचे की कोठरी में भ्पना सिव्रास-स्थान बनाता है, ऊप. वाले भाग 
में परिवार के अन्य सदस्य रहते हैं। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसका भ्र्थ 
यह होता है कि चाहे मनुष्य बचपन से सले ही चिपका रहना चाहे पर 
जीवन का प्रवाह तो श्ागे बढ़ता ही जाता है। परिस्थितियां उसे बदलने 
के लिये बाध्य बरती है। प्रोफेसर समभ.ता हैं कि उसका युग बीत गया । 
उसे नीचे रहना पड़ेगा, दूसरे श्रब ऊपर रहेंगे । एक तरह से जीवन के साथ 
उसका समझभोता है ; परन्तु किर भी बह बालक ही हैं, जीवन से दुर ही 
पड़ता जाता है । उसके सामने दो विकल्प हैं--या तो वह अपने परिवार 
से सर्वथा ग्रलग हो जाय अथवा अपनी अकर्मप्यता को छोड कर सक्रिय 
जीवन व्यतीत करे । उपन्यासदार में दिखलाया ह कि प्रोफ़ेसर का दम 
घुट रहा है | मानो वह कह रहा है कि मां गर्भ में आवश्यकता से श्र.धक 
दिन तक रहने से तो ऐसा होता ही है। उपन्यास के अन्त तक प्रोफेसर 
की समस्या का कुछ भी हल नहीं निकलता हे; सिवा इसके कि प्नन्त में 


“ रेस + 


जलकर मां पृथ्वी उसे श्रपने गर्भ में समाहित कर ही लेगी ! श्रतः हम 
देखते है कि मनोविज्ञान ने मां तथा उसके गर्भ की मूति को सामने लाकर 
प्रोफेसर की खिन्नता तथा विषाद का समाधान उपस्थित किया । 


ऊपर मनोविश्लेषण के सिद्धान्तों के श्राधार पर उपन्यास के प्रमुख 
पात्र प्रोफेसर के जीवन के पैटर्न को, बाहरी ढांचे की रूपरेखा प्रस्तुत की 
गई है। श्रव इस उपन्यास की लेखिका 2/(88 ५0१७ (४७४४6 की 
बास्तविक जीवनी तथा उसकी घटनाश्रों से मिला कर देखा जाय तो पता 
चलेगा कि उपन्यास के नायक प्रोफेसर के व्यापारों तथा घटताग्रों से 
विचित्र साम्य है । ऐसा लगता है कि लेखिका की जीवनी ही उपन्यास 
के पात्र, तथा उनकी घटनाश्रों का रूप-धारण कर सामने भा रहे हैं। 
पा एप ]3%0फ७97 नामक एक व्यक्ति ने '४१॥9 (४०७४287 की एक 
प्रामाणिक जीवनी लिखी है तथा 06७7 ॥,6ए78 ने उसके संस्मरण 
लिखे हैं | इन दोनों पुस्तकों को मिलाकर श्रध्ययत्त करने से लेखिका के 
जीवन के सम्बन्ध में पर्याप्त प्रामारिक सामग्री प्राप्त हो सकती है। यहां 
विस्तार भय से लेखिका की सम्पूर्ण जीवनी का उल्लेख करना सम्भव 
नहीं | हम यहां पर कुछ मोटी-मोटी बातों पर ही सन्तोष करेंगे। 


पहली बात तो यह कि इस उपन्यास की सारी प्रगति ग्रहन्परिवर्तन 
तथा ग्रह-निर्माण की केद्ध-भुभि पर चक्कर काट रही है। लेखिका की 
जीवनी से पता चलता है कि उसे भी जीवन में कितने ही बार 
परिस्थितियों से बाध्य होकर निवास-स्थान में परिवर्तत करना पड़ा है । 
प्रध्ययन करने वालों ने पता लगा कर देखा है, त्तत्‌ अवसर पर लिखी 


कहानियों में तत्तन्निवास ग्रहों की छाया पाई गई है । 


करना हि ४६ «४ 


लेखिका के जीवन की एक महत्त्वपुर्ण घटना है पीटर्सवर्ग की एक 
सम्पन्न महिला 78900)]8 (0७|ए०४ से उसकी मेची ! इस नवयुवती 
ने लेखिका को अपने संरक्षण में लिया और उसे अपने विशाल प्रासाद में 
निवास करने के लिए निमंत्रित किया । वहां पर शांत, सुन्दर, स्वच्छ 
कमरा दे दिया, जहां पर शांति पृवक रह कर साहित्य-प्रशयन का कार्य 
किया जा सके । लेखिका ने इस अवसर से लाभ भी उठाया और अनेक 
कहानियों तथा उपन्यासों की रचना की । इसी समय १६१६, १६१७ में 
नई घटना घटी । ॥8809!|]6 ने 780 'िं&॥700प77४ नामक व्यक्ति से 
विवाह कर लिया। ठीक इस समय के बाद की रचताम्रों में नई बात 
दीख पडने लगती है श्र्थात्‌ उनमें एक श्रांतरिक विक्षेम, चिता तथा 
असन्तोष की कलक आने लगी है । ऐसा लगता कि लेखिका किसी श्रांत- 
रिक चोट से बेताब है । इसी समय का उपन्यास है--.ह]086 [७0५9 
जिसमें एक ऐसी नारी की कथा है जो निरंतर परिवर्सन-शील तथा 
प्रगतिशील संसार में रह कर भी प्राचीन विगत मूल्य के साथ चिपकी हुई 
है। इसी के पश्चात्‌ क्‍8 ॥?70888078 0788 नाम के उपन्यास 
की रचना हुई । द 


इस उपन्यास के प्रारम्भ करने के पहले लेखिका अपनी सहेली के 
निमंत्रण पर फ्रांस में उनके महल में निवास करने के लिए गई थी। वहां 
पर उसे रहने की हर तरह की सुविधा थी, विवाहित दम्पत्ति उसके सुख- 
सोविध्य का हर तरह से र्याल रखते थे और चाहते थे कि वह शांतचित्त 
तथा दत्तचित्त हो रचना कार्य में प्रवृत्त हो सके । पर जो होना था वह 
होकर रहा | ॥(788 (४9०7४87 को ऐसा श्रनुभव हुआ कि वहां रह कर 
. उसके लिये काम कर सकना कठिन है । 


“ २५० - 


थहीं पर ।,60॥ ४१6] ने किचिद विस्तार से लेखिका की जीवन 
सम्बन्धी घटना तथा उपन्यास की घटनाओ्रों को तुलना की है। सब बातों 
का उल्लेख करना सम्भव नहों । पर कुछ पंक्तियां उद्धत की जारही हैं 
जितसे दोनों के साम्य का परिचय मिलेगा । 


“0०9 (90878 838700ए प00/007788 ४8५78 ॥77078 
779क77708 77  €5छकांणए8 806 #क्षतोाव876 00 ॥ 758 
॥०00१8 ॥0870 008 परणां ए8789] प07007 78 77070 608 फ0707४; 
967 7790#38778 8]0077888, 7006 |॥87 88970670 07 8प78 0ं:- 
प्र७ 9207888, 080 ४80 98 7884॥[ए #68व १760 868 
0078[. 488 79/80/7870 80प88 जरा ॥8 86जए708-70077 
(93 0880 $0797887780 760 006 [070708807" 8 478706 80786 
क्‍[8 608 (0700788807 0 867 70009, 2/88 (४67 07 
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9008ए89 8760888.,.. 98 70एछ 07889 ७60 ५४१॥9७ ै४5ए7७५७ 
(88 98007708 86 घ७एछ 70प890 पा 9ए 09. 07068888778 
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(0000878; 88 +98 [070768807, # 90प80 ४96 (8788 ४६, 
॥0786 8978 +05987707वें छा60 ॥,0प6; 8006 88 (0 
08788 कांड (/8ए७४ 00वें 90087"ए छा 086ए, 0४एफए $0 
[096 67870, 


॥ 0 


ऊपर कहा गया है कि इसी समय से मिस काथर की रचनाओं में 
विषाद, श्रवसाद तथा निराशा की उम्र छाया मंडराने लगी है । पर 
लेखिका के जीवन की घटनाओं के ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद इसके 
रहस्य को जानने में कोई कठिनाई नहीं रह जाती । लेखिका को आ्रान्तरिक 
सुरक्षा की आवश्यकता है। पर वह ऐसा अनुभव करती है कि 
48908|)6 के “विवाह के पश्चात्‌ इसकी सुरक्षा का आधार ही 
नष्ठ होगया । श्रब तक तो अपनो सखी पर उसका एकाधिकार था श्रौर 
उसके स्नेह के साम्राज्य की वह एकाधिकारिणी थी पर विवाहोपरान्त 
उसमें हिस्सा बंठवाने वाला एक अन्य व्यक्ति झ्रगया । जन्म से ही बह 
दु:खिनी रही, मातृहीन तथा पितृहीत । एक स्थान पर रह सकना उसके 
भाग्य में न था । इस स्थान्‌ से उस स्थान पर मारी मारी फिरी | श्राशा 
की एक पतली रेखा ॥89086 के व्यक्तित्व में दीख पड़ी थी । वह भी 
धुघली हो चली “ 'ब उसकी रक्षा कोन करे ? यही कारण है कि उसकी 


रचनाओं में नेराश्य की प्रधानता हो चली है। 
की 


ऊपर साहित्य की दृष्टि से, मनोविश्लेषण की दृष्टि से, उपन्यास पर 
विचार किया गया है | बाद में लेखिका की जीवन सम्बन्धी घटनाओं से 
मिला कर भी उपन्यास को देखा गया है । तब क्‍या यह कहना कठिन 
होगा कि रचना के श्राधार पर लेखक के जीवन के पेटर्न का पता लगा 


लेना कठिन है !!